Tuesday, December 19, 2017

केदारनाथ से वापसी भी कम रोमांचक नहीं (A Trek from Kedarnath to Gaurikund)

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने केदारनाथ धाम में होने वाली संध्या आरती के बारे में पढ़ा, आरती समाप्त होने के बाद खाना खाकर हम आराम करने के लिए अपने होटल में आ गए ! अब आगे, खाना खाकर होटल से चले तो ठण्ड काफी बढ़ चुकी थी, होटल तक पहुँचते-2 सभी लोग सिकुड़ चुके थे ! एक तो ठण्ड और दूसरा दिनभर लम्बा सफ़र करके अच्छी थकान हो गई थी, इसलिए सोने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी ! आधी रात को ठण्ड के कारण मेरी नींद खुल गई, मैंने महसूस किया जैसे-2 रात बढती जा रही थी, मौसम भी ठंडा होता जा रहा था, हालत ये थी कि रजाई में भी ठिठुरन हो रही थी ! गनीमत थी कि कमरे में अतिरिक्त रजाइयाँ रखी थी, शायद होटल वाले को पहले से ही अंदाजा था इसलिए ये अतिरिक्त रजाइयाँ पहले से ही रख दी थी, ठण्ड बढ़ी तो हमने 2-2 रजाइयाँ ओढ़ ली ! इसके बाद बढ़िया नींद आई और ठण्ड के कारण दोबारा नींद नहीं खुली ! रात को सोते समय हमने सुबह का अलार्म लगा दिया था ताकि समय से उठकर वापसी की राह पकड़ सकें ! सुबह अलार्म बजने पर जब मेरी नींद खुली तो पिताजी पहले ही उठ चुके थे, देवेन्द्र की भी नींद खुल चुकी थी और वो प्राणायाम करने में लगा था !


बर्फ से ढकी पहाड़ियों का एक दृश्य (A view of snow covered Mountains)

Monday, December 11, 2017

केदारनाथ धाम की संध्या आरती (Evening Prayer in Kedarnath)

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

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पिछले लेख में आपने केदार घाटी में स्थित भैरवनाथ मंदिर के बारे में पढ़ा ! अब आगे, चाय पीने के बाद घूमते हुए हम मंदिर परिसर में पहुंचे ! मंदिर में इस समय आरती की तैयारियां चल रही थी, जो शाम साढ़े छह बजे शुरू होती है, अभी साढ़े पांच बज रहे थे, इसलिए हम टहलते हुए मंदिर के पीछे चल दिए ! मंदिर के ठीक पीछे हमने भीम शिला देखी, इस शिला के बारे में तो आप जानते ही होंगे, अगर नहीं जानते तो आपको बता दूं कि यही वो शिला है जिसने 2013 में केदारनाथ में आई त्रादसी के समय केदारनाथ मंदिर की रक्षा की थी ! स्थानीय लोग बताते है कि प्रलय से पहले यहाँ ये शिला नहीं थी, लेकिन 2013 में जब चोराबारी ताल के रास्ते प्रलय आई तो पता नहीं कहाँ से 25-30 फीट चौड़ा ये पत्थर मंदिर के ठीक पीछे आकर कुछ इस तरह रुक गया कि ऊपर से बहकर आ रहा मलवा इस पत्थर से टकराकर दाएं-बाएं मुड गया ! इस मलवे में बहुत सारा कीचड और बड़े-2 पत्थर बहकर आए थे जिसने केदार घाटी में भयंकर प्रलय मचाया था ! इस प्रलय में मंदिर तो पानी में डूब गया, लेकिन भीम शिला ने मुख्य इमारत को मलवे की वजह से कोई हानि नहीं होने दी !


केदारनाथ मंदिर में की गई सजावट

Tuesday, December 5, 2017

केदार घाटी में स्थित भैरवनाथ मंदिर (Bhairavnath Temple in Kedar Valley)

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप केदारनाथ के दर्शन कर ही चुके है, अब आगे, दर्शन करने के बाद सभी लोगों को तेज भूख लगी थी, आखिरकार सुबह से हमने खाया ही क्या था ! हल्का-फुल्का खाते हुए ही हमने केदारनाथ की चढ़ाई चढ़ी थी ! रात्रि में रुकने का इंतजाम तो हम कर ही चुके थे, उस होटल में इस समय खाने की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए भोजन करने के लिए हम मंदिर के सामने एक होटल में जाकर रुके ! होटल क्या था, जलपान गृह था, जहाँ आपको चाय, पकोड़े, बिस्कुट, नमकीन और हल्का-फुल्का भोजन मिल जायेगा ! थोड़ी देर इन्तजार करने के बाद हमारा खाना आ गया, खाने का स्वाद तो पूछो ही मत, बस पेट भरने के लिए कुछ खाना था तो खा लिया, वरना खाना ज्यादा स्वादिष्ट नहीं था ! हमने दाल मंगाई थी, जो दाल परोसी गई, उसमें इतनी तेज मिर्च थी कि जैसे सारे होटल की मिर्च उस दाल में ही डाल दी हो ! खैर, दूसरी दाल आई, ये पहले से थोड़ी बेहतर थी, सबने भरपेट भोजन किया, इसी दुकान के बाहर मिठाइयों में लड्डू खूब सजा रखे थे ! छोटे-2 रंगीन लड्डू थे, पूछने पर पता चला 5 रूपए प्रति पीस, ऐसे ही मन भर गया, तो आगे बढ़ गए ! 


भैरवनाथ मंदिर का एक दृश्य (A View of Bhairavnath Temple)

Thursday, November 30, 2017

रामबाड़ा से केदारनाथ की पैदल यात्रा (A Trek from Rambada to Kedarnath)

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

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पिछले लेख में आप गौरीकुंड से रामबाड़ा पहुँचने तक की यात्रा के बारे में पढ़ चुके है, अब आगे, रामबाड़ा तक चलने में हमें कोई दिक्कत नहीं हुई, लेकिन यहाँ से आगे बढे तो काफी खड़ी चढ़ाई थी ! थोड़ी दूर चलने के बाद हर मोड़ पर हमारी हिम्मत जवाब दे रही थी इसलिए हम 50-60 मीटर चलने के बाद रुक जाते, खड़े-2 थोड़ी देर आराम करते, फिर आगे बढ़ते ! ये सिलसिला अनवरत जारी रहा, इस बीच देवेन्द्र ये कहकर हमारी हिम्मत बंधा रहा था कि थोड़ी आगे जाने पर समतल मार्ग आ जायेगा, फिर ज्यादा परेशानी नहीं होगी ! सुबह जब हम सोनप्रयाग से चले थे तो मेरा विचार था कि देर शाम या रात तक हम केदारनाथ जाकर वापिस आ जायेंगे, लेकिन अब चढ़ाई करते हुए लगने लगा था कि आज वापसी करना शायद संभव ना हो ! जैसे-2 हम ऊँचाई पर पहुँचते जा रहे थे, आस-पास दिखाई देने वाले नजारों की ख़ूबसूरती भी बढती जा रही थी लेकिन थकान के कारण हालत ऐसी हो गई थी कि जेब से मोबाइल निकालकर फोटो खींचने तक की हिम्मत नहीं हो रही थी ! लेकिन इसी बीच देवेन्द्र शॉर्टकट मार्ग से होता हुआ हर दृश्य को अपने कैमरे में कैद करता हुआ तेजी से आगे बढ़ रहा था !

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केदारनाथ मंदिर का एक दृश्य (A View of Kedarnath Temple)

Saturday, November 18, 2017

गौरीकुंड से रामबाड़ा की पैदल यात्रा (A Trek from Gaurikund to Rambada)

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

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दिनभर लम्बा सफ़र तय करके अच्छी थकान हो गई थी, इसलिए बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई ! यहाँ बढ़िया ठण्ड थी गनीमत थी कि कमरे में गर्म कम्बल रखे थे ! रात को जितनी देर भी सोये, बढ़िया नींद आई, सोने से पहले ही हमने सुबह 4 बजे का अलार्म लगा दिया था ! अलार्म बजने से पहले ही नींद खुल गई, उठकर अलार्म बंद किया और बारी-2 से नहाने-धोने में लग गए ! मैं तो ब्रश करते हुए ही नीचे जाकर होटल वाले को 2 बाल्टी गरम पानी देने का कह आया था ! सुबह सोनप्रयाग से केदारनाथ जाने वाले यात्रियों की अच्छी भीड़ रहती है इसलिए यहाँ के होटलों के नीचे बनी खान-पान की दुकानें भी सुबह 4 बजे ही खुल जाती है ! मैं ब्रश करने के बाद गरम पानी के आने का इन्तजार करता रहा, इस बीच देवेन्द्र और मेरे पिताजी बारी-2 से ठन्डे पानी से स्नान कर चुके थे ! मैं गरम पानी लेने दोबारा नीचे गया, यहाँ आकर देखा कि गरम पानी के नाम पर तो यहाँ लूट मचा रखी है, 1 बाल्टी गरम पानी में ये लोग 2 बाल्टी ठंडा पानी मिलाकर, 3 बाल्टी पानी बना देते है और तीन लोगों को दे देते है ! पानी ऐसा कि आप एक बूंद भी ठंडा पानी ना मिला सकें, होटल वाले ने मुझे कुछ देर इन्तजार करने को कहा !


केदारनाथ जाते हुए रास्ते में लिया एक चित्र

Sunday, November 12, 2017

रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि मंदिर होते हुए सोनप्रयाग (A Road Trip from Rudrprayag to Sonprayag)

वीरवार, 12 अक्तूबर 2017

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रुद्रप्रयाग से चले तो दोपहर के 3 बज रहे थे, आधे घंटे का सफ़र तय करके हम अगस्त्यमुनि मंदिर (Augustyamuni Temple) पहुंचे, समुद्रतल से 1000 मीटर की ऊँचाई पर मन्दाकिनी नदी के किनारे सड़क के दूसरी ओर स्थित ये मंदिर रुद्रप्रयाग से 19 किलोमीटर दूर है ! इस मंदिर को प्रसिद्द हिन्दू मुनि अगस्त्य ऋषि का घर माना जाता है, अगस्त्य ऋषि एक दक्षिण भारतीय मुनि थे जो जंगलों में विचरण करते हुए उत्तराखंड आए और सिला ग्राम में रहकर उन्होंने अनेक वर्षों तक तपस्या की ! इस दौरान उन्होंने यहाँ एक शिव मंदिर भी बनवाया जो बाद में अगस्त्येश्वर महादेव मंदिर (Augstyashwar Mahadev Temple) के नाम से प्रसिद्द हुआ ! प्रारंभ में तो ये मंदिर दक्षिण भारतीय शैली में बना हुआ था, लेकिन बाद में जब इस मंदिर का पुनरुद्धार हुआ तो इसे वर्तमान स्वरुप दिया गया ! मंदिर के मुख्य भवन में अगस्त्य मुनि का कुंड और उनके शिष्य भोगाजित की प्रतिमा स्थित है ! ये सब जानकारी मंदिर परिसर में एक दीवार पर अंकित थी ! साल में एक दिन यहाँ मेला भी लगता है तब देश-विदेश से हज़ारों श्रद्धालु इस मेले में शामिल होने के लिए आते है, बैसाखी का त्यौहार भी यहाँ बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है !
अगस्त्यमुनि मंदिर का एक दृश्य (A View of Augstyamuni Temple)

Wednesday, November 8, 2017

रुद्रप्रयाग में है कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple in Rudrprayag)

वीरवार, 12 अक्तूबर 2017

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भगवान् शिव को समर्पित कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple) रुद्रप्रयाग से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ! चार धाम की यात्रा पर निकले अधिकतर श्रद्धालु इस मंदिर को देखते हुए ही आगे बढ़ते है, गुफा के रूप में मौजूद ये मंदिर अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है ! कहते है कि केदारनाथ की ओर प्रस्थान करते हुए भगवान् शिव ने इस मंदिर के पास मौजूद गुफा में रूककर कुछ समय प्रार्थना की थी, गुफा में मौजूद सैकड़ों प्राकृतिक शिवलिंग इस बात को प्रमाणित करते है ! महाशिवरात्रि पर इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है ! इस गुफा के अलावा मंदिर के आस-पास माँ पार्वती, श्री गणेश जी, हनुमान जी, और माँ दुर्गा की जो मूर्तियाँ है, वो भी प्राकृतिक रूप से प्रकट हुई है ! कहा जाता है कि भगवान् शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए इस मंदिर के पास मौजूद गुफा में रहकर कुछ समय बिताया था ! भस्मासुर ने शिवजी की आराधना करके ये वरदान प्राप्त किया था कि जिसके सिर पर भी वो हाथ रख देगा, वो उसी क्षण भस्म हो जायेगा ! भस्मासुर भी बड़ा तेज था, इस वरदान को आजमाने के लिए उसने भगवान् शिव को ही चुना !

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कोटेश्वर महादेव मंदिर से दिखाई देता एक दृश्य (A view from Koteshwar Mahadev Temple)

Saturday, November 4, 2017

रुद्रप्रयाग में है अलकनंदा और मन्दाकिनी का संगम (Confluence of Alaknanda and Mandakini Rivers - RudrPrayag)

वीरवार, 12 अक्तूबर 2017

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केदारनाथ यात्रा के पिछले लेख में आप रुद्रप्रयाग आते हुए माँ धारी देवी (Dhari Devi Temple) के दर्शन कर चुके है, गाडी लेकर हम कल्यासौड़ से चले तो 20 किलोमीटर चलने के बाद रुद्रप्रयाग पहुंचे ! रुद्रप्रयाग भी एक अच्छा और बड़ा शहर है, ये काफी ढलान पर बसा है, गाडी चलाते हुए या पैदल चलते हुए आपको इस बात का आभास हो जाता है ! शहर में प्रवेश करते ही मार्ग काफी संकरा और ढलान भरा हो जाता है, ढलान वाले मार्ग से होते हुए हम रुद्रप्रयाग के मुख्य बाज़ार में पहुँच गए ! बाज़ार के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा पीपल का पेड़ है जिसके नीचे एक छोटा मंदिर और एक मोटरसाइकिल स्टैंड भी है ! इस पीपल के पेड़ के पास ही रुद्रप्रयाग से केदारनाथ और बद्रीनाथ मार्ग पर जाने वाली बसें भी खड़ी होती है, अपनी चोपता यात्रा के दौरान बस का इन्तजार करते हुए हमने इस बाज़ार में काफी समय बिताया था ! यहाँ अच्छा-ख़ासा बाज़ार है, आपको अपनी ज़रूरत का लगभग सभी सामान इस बाज़ार में मिल जायेगा, आज हम यहाँ बिना रुके आगे बढ़ गए ! थोड़ी आगे बढ़ने पर मुख्य मार्ग दो भागों में विभाजित हो जाता है, बाईं ओर जाती सड़क पर आगे जाकर एक लोहे का पुल बना है पुल पार करने के बाद ये मार्ग केदारनाथ चला जाता है !

rudrprayag
रुद्रप्रयाग में संगम का एक दृश्य (A view of sangam in Rudrprayag)

Tuesday, October 31, 2017

उत्तराखंड के कल्यासौड़ में है माँ धारी देवी का मंदिर (Dhari Devi Temple in Uttrakhand)

वीरवार, 12 अक्तूबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप हमारे गुडगाँव से हरिद्वार-ऋषिकेश होते हुए देवप्रयाग पहुँचने तक का विवरण पढ़ चुके है ! अब आगे, देवप्रयाग से चले तो 39 किलोमीटर चलने के बाद श्रीनगर पहुंचकर खाने के लिए रुके, यहाँ सड़क के किनारे ही गढ़वाल विश्वविद्यालय है और सड़क से थोड़ी दूरी पर एक मेडिकल कॉलेज भी है ! श्रीनगर में कॉलेज में पढने वाले लड़के-लड़कियों की अच्छी-खासी भीड़ देखने को मिली, यहाँ के माहौल को देखकर कोई कह नहीं सकता कि आप किसी मेट्रो शहर से दूर एक पहाड़ी क्षेत्र में है ! श्रीनगर एक बड़ा शहर है, यहाँ अच्छा-ख़ासा बाज़ार है, फल-फ्रूट से लेकर ज़रूरत का लगभग सभी सामान आपको मिल जायेगा ! गाडी सड़क के किनारे खड़ी करके हम गढ़वाल विश्वविद्यालय के सामने स्थित एक छोटे से होटल में खाना खाने के लिए पहुंचे ! खाने में रोटी, चने की सब्जी और आंवले, टमाटर, लहसुन और अदरक से बनी चटनी भी शामिल थी, सब्जी-रोटी तो ठीक-ठाक थी लेकिन चटनी का स्वाद लाजवाब था ! वैसे 30 रूपए प्रति थाली के हिसाब से बढ़िया भोजन था, सबने भरपेट खाया, यहाँ से फारिक होकर चले तो बगल में ही एक फल की दुकान से रास्ते में खाने के लिए कुछ सेब खरीद लिए !


dhari devi temple
अलकनंदा नदी में स्थित धारी माता का मंदिर (A View of Dhari Devi Temple in Uttrakhand)

Friday, October 27, 2017

दिल्ली से केदारनाथ की एक सड़क यात्रा (A Road Trip from Delhi to Kedarnath)

बुधवार, 11 अक्तूबर 2017

केदारनाथ (Kedarnath) जाने का जो सपना मैं पिछले कुछ सालों से देखता आ रहा था वो आखिर इस साल सच हो ही गया, पिछले साल भी अक्टूबर में कुछ दोस्तों के साथ केदारनाथ जाने का पूरा मन था लेकिन यात्रा से कुछ दिन पहले शौर्य को डेंगू हो जाने से मेरा इस यात्रा पर जाना स्थगित हो गया ! इस साल भी दशहरा पर जयंत के साथ जाने की योजना थी लेकिन अंतिम समय में कुछ व्यस्तता के कारण नहीं जा सका ! काफी जद्दोजेहद और योजना में उतार-चढ़ाव के बाद आखिर इसी साल दशहरा से दो सप्ताह बाद यानि अक्टूबर की 11 तारीख को केदारनाथ जाने का संयोग बनता दिखा ! मेरे अलावा इस यात्रा पर देवेन्द्र और उसका एक मित्र अनिल भी जाने वाले थे, देवेन्द्र मेरे साथ पहले कसौली की यात्रा भी कर चुका है, लेकिन अनिल मेरे साथ पहली बार किसी यात्रा पर जा रहा था ! इस यात्रा पर जाने की जानकारी जब मैंने अपने परिवार में दी तो मेरे पिताजी ने भी केदारनाथ साथ चलने की इच्छा जताई, उनका इस यात्रा पर साथ चलने की बात सुनकर मुझे काफी अच्छा लगा ! अब यात्रा में केवल 1 ही दिन शेष था, और हमें सारी तैयारियां इसी एक दिन में करनी थी, पूरे जोर-शोर से तैयारियां होने लगी !


देवप्रयाग स्थित रघुनाथ मंदिर में लिया एक चित्र (In Raghunath Temple, Devprayag)

Sunday, October 22, 2017

मसूरी से चंबा होते हुए ऋषिकेश यात्रा (A Road Trip from Mussoorie to Rishikesh)

शनिवार, 22 अप्रैल 2017 

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रात को खाना खाने के बाद हम समय से आराम करने अपने बिस्तर पर चले गए, दिनभर की थकान के कारण रात को अच्छी नींद आई और सुबह समय से आँख भी खुल गई ! आज हमें मसूरी से आगे चंबा के लिए निकलना था, बीच में धनोल्टी, सुरकंडा देवी मंदिर और कनातल घूमने का भी विचार भी था ! हम सब नहा-धोकर समय से तैयार हुए और नाश्ता करने के बाद मसूरी में बिताये यादगार लम्हों को अपने मन में समेटे हुए गाडी लेकर यहाँ से प्रस्थान किया ! वापसी में लाइब्रेरी चौक को पार करने के बाद हम लेंडोर होते हुए धनोल्टी जाने वाले मार्ग पर चल दिए, शुरू में मार्ग थोडा संकरा था लेकिन जैसे-2 आगे बढ़ते गए, रास्ता भी चौड़ा होता गया ! थोड़ी देर बाद हम एक खुले मार्ग पर थे, इस मार्ग पर लेंडोर पार करने के बाद एक जगह से बहुत सुन्दर नज़ारे दिखाई देते है, अपनी पिछली धनोल्टी यात्रा के दौरान हमने यहाँ रूककर कुछ फोटो भी खिंचवाए थे ! लेकिन आज यहाँ वो हरियाली तो नहीं थी जो जुलाई-अगस्त के महीने में रहती है, हाँ, घना जंगल तो अब भी यहाँ था !

मसूरी से धनोल्टी जाने का मार्ग (Mussoorie Dhanaulti Road)

Wednesday, October 18, 2017

उत्तराखंड का एक खूबसूरत शहर मसूरी – Mussoorie, A Beautiful City of Uttrakhand

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दिल्ली से चलकर देहरादून में स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर और गुच्चुपानी गुफा देखने के बाद मसूरी जाने वाले मार्ग पर चल दिए । अब आगे, वैसे तो आपने मसूरी के बारे में पढ़ा ही होगा, बहुत से लोग तो घूम भी चुके होंगे । चलिए, आगे बढ़ने से पहले उत्तराखंड में स्थित इस शहर के बारे में थोड़ी जानकारी दे देता हूं । उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित यह हिल स्टेशन देहरादून से महज 35 किलोमीटर दूर है । समुद्र तल से 1880 मीटर की ऊंचाई पर बसा यह पर्वतीय शहर दिल्ली से मात्र 290 किलोमीटर दूर है, यही वजह है कि मसूरी सप्ताहिक अवकाश पर दिल्ली और इसके आस पास से आने वाले पर्यटकों से भरा रहता है । ऐसे में यहां की भीड़-भाड़ को देखकर कभी-कभी तो माल रोड पर घूमते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे आप दिल्ली के किसी व्यस्त इलाके में घूम रहे हो । लेकिन मसूरी के बढ़िया मौसम और इसके आस-पास फैले प्राकृतिक नजारों की मौजूदगी आपको एक सुखद अहसास देती है यही वजह है कि किसी भी मौसम मैं यहां आने वाले पर्यटकों की गिनती कभी कम नहीं होती ।

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हमारे होटल की खिड़की से दिखाई देता एक दृश्य (A view from our Hotel)

Sunday, July 16, 2017

देहरादून का टपकेश्वर महादेव मंदिर और रॉबर्स केव (गुच्चुपानी) – Robbers Cave and Tapkeshwar Mahadev Temple of Dehradun

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017 

हमारा मसूरी जाने का विचार एकदम से ही बना था, दरअसल, हुआ कुछ यूँ कि पिछले महीने ऋषिकेश जाने से पहले मेरा विचार एक पारिवारिक यात्रा पर जाने का ही था लेकिन जब शौर्य की परिक्षाएँ ख़त्म होने के बाद स्कूल शुरू हो गए तो पारिवारिक यात्रा ख़तरे में पड़ गई ! इस बीच मुझे कुछ दोस्तों के ऋषिकेश जाने के बारे में पता चला तो आनन-फानन में मैं भी उनके साथ घूमने के लिए ऋषिकेश निकल गया ! ऋषिकेश से आए हुए तीन सप्ताह भी नहीं बीते थे कि एकाएक इस यात्रा का संयोग बन पड़ा, इस तीन दिवसीय यात्रा में हम देहरादून, मसूरी, धनोल्टी, चम्बा और ऋषिकेश होते हुए हरिद्वार आने वाले थे ! मसूरी और धनोल्टी तो मैं पहले भी जा चुका हूँ, लेकिन परिवार के साथ इन जगहों पर पहली बार ही जाना हो रहा था ! इस यात्रा में घूमने वाली अधिकतर जगहें मैं पहले से देख चुका था इसलिए यात्रा में कुछ नयापन लाने के लिए मेरा विचार कुछ नई जगहें तलाशना था ! आगरा में रहने वाले मेरे एक मित्र रितेश गुप्ता पिछले वर्ष चकराता गए थे, बातचीत के दौरान उन्होनें देहरादून में घूमने की कुछ जगहों का ज़िक्र किया तो मैने भी इन जगहों को अपनी यात्रा में शामिल कर लिया !

टपकेश्वर महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार

Friday, June 23, 2017

दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले की सैर - दूसरी कड़ी (A Visit to Historical Monument of Delhi, Red Fort)

शुक्रवार, 26 मई 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप दिल्ली भ्रमण के दौरान लाल किला परिसर में मौजूद "वॉर मेमोरियल संग्रहालय (War Memorial Museum), ऐतिहासिक बावली (Baoli in Red Fort, Delhi) और दीवान-ए-आम (Diwan E Aam)" देख चुके है ! अब आगे, दीवान-ए-आम के पीछे एक बड़ा बगीचा है और बगीचे के उस पार है "रंग महल" (Rang Mahal) ! राजकीय आवासों में सबसे बड़े इस महल का प्रयोग मुगल काल में "शाही हरम" (Shahi Haram) के रूप में होता था, शाहजहाँ के राज में इसे "इम्तियाज़ महल" (Imtiyaz Mahal) के नाम से जाना जाता था ! प्यालीदार मेहराबों से युक्त ये महल 6 कक्षों में विभाजित था, इस महल के उत्तरी और दक्षिणी भाग को "शीशमहल" (Sheesh Mahal) के नाम से जाना जाता था ! शीशमहल की दीवारों और छतों के उपर शीशे के छोटे-2 सैकड़ों टुकड़े लगे हुए थे जो इनपर पड़ने वाले प्रकाश को परावर्तित कर एक मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करते थे ! इस महल के बीच में एक जल धारा भी बहती थी जिसे "नहर-ए-बहिश्त" यानि "स्वर्ग की जलधारा" कहते थे ! 
दीवान-ए-खास की एक झलक (A View of Diwan E Khas)

Monday, June 19, 2017

दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले की सैर - पहली कड़ी (A Visit to Historical Monument of Delhi, Red Fort)

शुक्रवार, 26 मई 2017

अगर आप दिल्ली भ्रमण पर निकले है और "लाल क़िला" (Red Fort) नहीं घूमे तो क्या खाक दिल्ली घूमे ? लाल किला घूमे बिना आपका दिल्ली भ्रमण अधूरा है, और हो भी क्यों ना, आख़िर दिल्ली का इतिहास जो जुड़ा है इस किले से ! दिल्ली भ्रमण पर चलते हुए आज मैं भी आपको इसी किले की सैर कराने लेकर चल रहा हूँ ! चलिए, शुरुआत करते है इस किले के इतिहास से, जिसका निर्माण पाँचवे मुगल बादशाह "शाहजहाँ" (Shahjahan) ने करवाया था ! वही शाहजहाँ जिन्हें "आगरा" में "ताजमहल" (TajMahal) के निर्माण के लिए जाना जाता है और जिसके शासनकाल में मुगल साम्राज्‍य अपनी समृद्धि के चरम पर था ! 1628 में गद्दी संभालने के बाद शाहजहाँ का मकसद अपने दादा अकबर की तरह अपनी सत्ता का विस्तार करना था, अपने शासनकाल के दौरान सन 1638 में शाहजहाँ ने अपनी राजधानी को आगरा से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय किया ! दरअसल, शाहजहाँ आगरा की बढ़ती भीड़-भाड़ से परेशान थे, उन्हें ये बिल्कुल पसंद नहीं थी ! इसी सिलसिले में शाहजहाँ ने "शाहजहानाबाद" नाम का एक शहर बसाया जिसे बाद में "पुरानी दिल्ली" के नाम से जाना गया !
दिल्ली के लाल किले की एक झलक (A View of Red Fort, Delhi)

Thursday, June 15, 2017

हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध और महाराणा प्रताप संग्रहालय (The Battle of Haldighati and Maharana Pratap Museum)

रविवार, 20 नवंबर 2016 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने कुम्भलगढ़ के विश्वप्रसिद्ध किले के बारे में पढ़ा, किला देखने के बाद हम सब यहाँ से निकलकर अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव "हल्दीघाटी" की ओर चल दिए ! अब आगे, जब हम किले से चले थे तो दोपहर के 11:30 बज रहे थे, बढ़िया धूप खिली थी, यहाँ से हल्दीघाटी जाने के 3 मार्ग है, भगवान जाने, हमारे ड्राइवर को पता नहीं था, या वो दूसरे मार्ग खराब थे, वो हमें "बरवाडा" वाले लंबे मार्ग से लेकर गया ! हालाँकि, हमने गाड़ी किलोमीटर के हिसाब से आरक्षित नहीं करवाई थी लेकिन फिर भी वो हमें जिस मार्ग से लेकर गया उससे हल्दीघाटी की दूरी 68 किलोमीटर थी जबकि एक अन्य मार्ग से "कोशीवाड़ा" होते हुए ये दूरी महज 52 किलोमीटर थी ! खैर, जिस मार्ग से हम जा रहे थे, उसके किनारे दोनों ओर दूर-2 तक फैली ऊसर ज़मीन दिखाई दे रही थी और बीच में ये सड़क थी ! इस मार्ग पर जाते हुए रास्ते में कहीं कोई गाँव पड़ जाता तो कुछ लोग दिखाई दे जाते, और गाँव पार होते ही फिर वही सन्नाटा ! ऐसे ही चलते हुए हम एक गाँव के पास जाकर रुके, यहाँ हमने रास्ते में खाने-पीने का कुछ सामान लेने के लिए गाड़ी रोकी !


संग्रहालय के बाहर बनी एक प्रतिमा

Sunday, June 11, 2017

कुम्भलगढ़ का किला - दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार (Kumbhalgarh Fort, The Second Longest Wall of the World)

रविवार, 20 नवंबर 2016

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम माउंट आबू से चलकर कई परेशानियों को पार करते हुए कुम्भलगढ़ पहुँचे ! अब आगे, केलवाड़ा में रात को जब सोए थे तो मौसम ठीक था लेकिन आधी रात के बाद अचानक ठंड बढ़ गई, गनीमत थी कि कमरे में कंबल रखे थे, तो ज़्यादा परेशानी नहीं हुई ! हालाँकि, रात को कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनकर एक बार नींद भी खुली लेकिन खिड़की बंद करने के बाद पता नहीं चला कब सुबह हो गई ! सुबह समय से सोकर उठे, आज हमारा उद्देश्य "कुम्भलगढ़ किला" (Kumbhalgarh Fort) देखने के बाद "हल्दी घाटी" होते हुए वापिस उदयपुर पहुँचने का था, जहाँ से हमारी दिल्ली वापसी के लिए रात्रि ट्रेन थी ! बिस्तर से निकलने के बाद सभी लोग बारी-2 से नित्य क्रम से फारिक होकर तैयार होने लगे ! लेकिन हॉल में एक ही बाथरूम होने के कारण दिक्कत हो रही थी और समय भी ज़्यादा लग रहा था ! समस्या हल करने के लिए कुछ लोग नीचे वाले तल पर स्थित बाथरूम में पहुँच गए, और अगले एक घंटे में सब लोग नहा-धोकर तैयार हो चुके थे ! 
कुम्भलगढ़ किले का प्रवेश द्वार 

Tuesday, June 6, 2017

माउंट आबू से कुम्भलगढ़ की सड़क यात्रा (A Road Trip From Mount Abu to Kumbhalgarh)

शनिवार, 19 नवंबर 2016 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने "दिलवाड़ा के जैन मंदिरों" के बारे में पढ़ा, माउंट आबू से वापिस आने से पहले हम यहाँ के सबसे ऊँचे स्थान पर स्थित "गुरु शिखर" मंदिर भी घूम आए ! अब आगे, गुरु शिखर से वापिस आकर हम अपनी गाड़ी में बैठे और अपने अगले पड़ाव "कुम्भलगढ़" की ओर निकल पड़े ! अब तक हम माउंट आबू में देखने की अधिकतर जगहें घूम ही चुके थे ! इसलिए अब हमारा मन यहाँ से निकलकर कुम्भलगढ़ पहुँचने का था, आज की रात कुम्भलगढ़ में रुककर सुबह विश्व प्रसिद्ध "कुम्भलगढ़ का किला" (Kumbhalgarh Fort) देखते हुए वापिस उदयपुर जाने का था ! उदयपुर के लिए वापिस जाते हुए हम रास्ते में हल्दीघाटी में स्थित "महाराणा प्रताप संग्रहालय" (Maharana Pratap Museum) भी देखने वाले थे ! हम गुरु शिखर से चले तो साढ़े तीन बज रहे थे, यहाँ से कुम्भलगढ़ की दूरी 184 किलोमीटर है, जिसे तय करने में लगभग 3.5 घंटे से 4 घंटे का समय लगने वाला था ! माउंट आबू से वापिस जाते हुए जसवंतगढ़ तक तो हम उसी मार्ग से जाने वाले थे जिससे हम सुबह उदयपुर से यहाँ आए थे, फिर जसवंतगढ़ में राष्ट्रीय राजमार्ग को छोड़कर हमें बाईं ओर को जाने वाले एक मार्ग पर जाना था !
जसवंतगढ़ में लिया एक चित्र 

Friday, June 2, 2017

दिलवाड़ा के जैन मंदिर (Jain Temple of Delwara, Mount Abu)

शनिवार, 19 नवंबर 2016 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम उदयपुर से चलकर सड़क मार्ग से होते हुए माउंट आबू पहुँचे ! यहाँ की नक्की झील और हनीमून पॉइंट देखने के बाद हम ब्रहमकुमारी के आश्रम गए, यहाँ भी आधा घंटा घूमने के बाद हम आश्रम से बाहर आकर अपनी गाड़ी की ओर चल दिए ! अब आगे, माउंट आबू में स्थानीय भ्रमण के लिए कई जगहें है, कुछ जगहें तो आप यात्रा के पिछले लेख के माध्यम से घूम ही चुके है इसी श्रंखला में आगे बढ़ते हुए हम माउंट आबू में स्थित अगले दर्शनीय स्थल की ओर चल रहे है जिसका जैन धर्म के लोगों में बड़ा महत्व है ! एक तरफ जहाँ जैन धर्म अपनी सादगी के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है वहीं दूसरी ओर इस धर्म के तीर्थ स्थल अपनी सुंदरता के लिए दुनिया भर में जाने जाते है ! इन्हीं प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है “दिलवाड़ा के जैन मंदिर” (Jain Temples of Delwara), जो दुनिया भर में अपनी उत्कृष्ट वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है ! राजस्थान के सिरोही (Sirohi) जिले के माउंट आबू (Mount Abu) में स्थित दिलवाड़ा के जैन मंदिरों का निर्माण 11वी से 13वी शताब्दी के मध्य हुआ था !

गुरु शिखर जाते हुए रास्ते में लिया एक चित्र

Monday, May 29, 2017

उदयपुर से माउंट आबू की सड़क यात्रा (A Road Trip from Udaipur to Mount Abu)

शनिवार, 19 नवंबर 2016 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हमने उदयपुर में पहला दिन स्थानीय भ्रमण करते हुए बिताया, पहले दिन घूमते हुए हम उदयपुर की अधिकतर जगहें देख चुके थे जिसमें "सिटी पैलेस (City Palace), पिछोला झील (Lake Pichhola), रोपवे (Ropeway), सहेलियों की बाड़ी (Saheliyon ki Bari) और फ़तेह सागर झील (Fateh Sagar Lake)" शामिल थे ! दिन भर घूमकर और रात्रि भोजन करने के बाद आराम करने के लिए हम वापिस अपने होटल आ गए ! अब आगे, दिन भर घूमते हुए शाम को अच्छी-ख़ासी थकान हो गई थी इसलिए रात को बढ़िया नींद आई और सुबह समय से सोकर उठे ! आज उदयपुर में हमारा दूसरा दिन था, और सबका मन "माउंट आबू" (Mount Abu) जाने का था, वैसे ये विचार भी एकदम ही बना था, दिल्ली से तो यही सोचकर चले थे कि उदयपुर घूमने के बाद "हल्दीघाटी" (Haldighati) होते हुए "कुम्भलगढ़ का किला" (Kumbhalgarh Fort) घूम लेंगे ! वापसी में "चितौडगढ़ का किला" (Chittorgarh Fort) देखने के बाद दिल्ली की ट्रेन पकड़ कर वापिस आ जाएँगे ! लेकिन कल रात को एकदम से माउंट आबू जाने का विचार बन गया, इसलिए रात को ही इस यात्रा के हमारे एक साथी रवि ने गाड़ी का इंतज़ाम भी करवा दिया जो सुबह हमें अपने होटल से लेकर माउंट आबू घुमा देगी !

नक्की झील का एक दृश्य (A View of Nakki Lake, Mount Abu)

Thursday, May 25, 2017

उदयपुर का सिटी पैलेस, रोपवे और पिछोला झील (City Palace, Ropeway and Lake Pichola of Udaipur)

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दिल्ली से उदयपुर पहुँचने के बाद स्थानीय भ्रमण पर निकल चुके है ! उदयपुर में घूमते हुए अब तक हम "फ़तेह सागह झील" (Fateh Sagar Lake) और "सहेलियों की बाड़ी" (Saheliyon ki Bari) देख चुके है और फिलहाल "सिटी पैलेस" (City Palace, Udaipur) के प्रवेश द्वार के पास खड़े है जहाँ दुष्यंत हम सबके लिए सिटी पैलेस में जाने की टिकटें लेने के लिए कतार में खड़ा है ! अब आगे, आज का पूरा दिन तो हम स्थानीय भ्रमण करते हुए ही बिताने वाले थे, दुष्यंत जब टिकट ले रहा था तो टिकट खिड़की पर एक मजेदार घटना घटी ! नोटबंदी के कारण पूरे देश में पुराने नोटों के लेन-देन पर रोक लग चुकी थी लेकिन टिकट खिड़की पर बैठे एक अधिकारी ने एक विदेशी पर्यटक को टिकट देने के बाद 500 रुपए के पुराने नोट थमा दिए ! मैं दूर खड़ा ये सब देख रहा था, विदेशी नागरिक पैसे लेकर टिकट खिड़की से हट ही रहा था कि तभी मैं झट से आगे बढ़ा और उस विदेशी नागरिक को बता दिया कि इन नोटों का चलन यहाँ 10 दिन पहले बंद हो चुका है इसलिए वो इन नोटों को ना ले ! मेरी बात सुनकर उसने वो नोट खिड़की पर बैठे अधिकारी को वापिस कर दिए !

पिछोला झील से दिखाई देता एक दृश्य

Friday, May 19, 2017

उदयपुर में पहला दिन – स्थानीय भ्रमण (Local Sight Seen in Udaipur)

वीरवार, 17 नवंबर 2016

काफ़ी सोच विचार करने के बाद भी समझ नहीं आ रहा कि इस यात्रा को कहाँ से शुरू करूँ, चलिए, यात्रा की योजना कैसे बनी इस बात से ही शुरुआत करते है यात्रा शुरू करने से पहले आपको बता दूँ कि इस बार मैं आपको राजस्थान के प्रसिद्ध शहर "उदयपुर" की घुमक्कडी पर लेकर चल रहा हूँ वैसे तो मैं एक बार पहले 2011 में भी उदयपुर जा चुका हूँ, तब मैं और शशांक दिसंबर के अंतिम सप्ताह में वहाँ गए थे और कई जगहें घूम कर आए थे लेकिन उदयपुर में इतना कुछ देखने को है कि एक बार में मैं सबकुछ नहीं देख पाया ! मेरी पिछली उदयपुर यात्रा को आप यहाँ क्लिक करके विस्तार से पढ़ सकते है ! उदयपुर से वापिस आने के बाद मन के किसी कोने में दबी हुई इच्छा थी कि मौका मिलेगा तो एक बार फिर से उदयपुर जाकर उन जगहों को ज़रूर देखूँगा ! ये दबी इच्छा पिछले साल जागृत हो उठी जब मेरे कुछ मित्रों ने उदयपुर यात्रा पर साथ चलने के लिए मुझसे पूछा ! हुआ कुछ यूँ कि रोजाना ऑफिस साथ चलने वाले कुछ मित्र उदयपुर जाने की योजना बना रहे थे, मेरे मना करने के बावजूद उन्होनें मुझे भी इस यात्रा में शामिल कर लिया !

उदयपुर में फ़तेह सागर झील का एक दृश्य  (A view of Fateh Sagar Lake, Udaipur)

Wednesday, May 10, 2017

हिमाचल का एक दर्शनीय स्थल - मशोबरा (Mashobra - A Beautiful Place in Himachal)

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इस यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम धर्मपुर के बाद एक नए मार्ग से होकर यहाँ शोघी पहुँचे थे ! हमारा कल का पूरा दिन तो सफ़र में ही बीता था, वो अलग बात है कि सफ़र के दौरान ही हमने बहुत से खूबसूरत नज़ारे देखे ! दिन भर के सफ़र की थकान के कारण रात को समय से नींद भी आ गई और सुबह समय से सोकर उठे ! अब आगे, नींद खुलते ही अपने कमरे की खिड़की का पर्दा हटाया तो बाहर घाटी का शानदार नज़ारा देखने को मिला ! हल्का-2 कोहरा और घाटी में तैरते बादल लाजवाब लग रहे थे, दिन की शुरुआत ही ऐसे नज़ारों से हो जाए तो क्या कहने ! होटल के रिशेप्शन पर फोन करके सबसे पहले हमने अपने लिए चाय मंगाई ! चाय की चुस्कियों के साथ पहाड़ों पर ऐसे नज़ारे देखना हमेशा ही सुखद एहसास रहता है ! यहाँ से घाटी में दूर बलखाती सड़क भी दिखाई दे रही थी, थोड़ी देर बैठकर एकटक इन नज़ारों को देखते रहे ! इतने में हमारी चाय भी आ गई, चाय पीते-2 आज दिन के कार्यक्रम पर चर्चा भी की, लेकिन कार्यक्रम कुछ था ही नहीं तो चर्चा क्या करते ? बस ऐसे ही गप्पे मारते रहे !
शोघी में होटल के पास लिया एक चित्र

Saturday, May 6, 2017

दिल्ली से शोघी की एक सड़क यात्रा (A Road Trip to Shoghi)

शनिवार, 16 जुलाई 2016

अभी पिछले महीने ही कुछ सहकर्मियों के साथ शिमला घूम कर आया था, तब हम शिमला और इसके आस-पास की जगहों जैसे कसौली, चैल, और कुफरी भी गए थे ! एक महीना भी नहीं गुजरा था कि एक बार फिर से यात्रा का संयोग बनने लगा, लेकिन इस बार पारिवारिक यात्रा पर जाने का विचार था ! हालाँकि, घूमने जाने की जगह अभी निश्चित नहीं थी बस ये था कि फिर से कोई पहाड़ी यात्रा ही करनी है ! खैर, यात्रा की जगह तो अंतिम दिन तक भी निश्चित नहीं हुई, वैसे कभी-2 बिना योजना के किए गए ऐसे सफ़र बड़े मजेदार होते है, जिसमें कोई नियम, कोई पाबंदी, या कोई मंज़िल निश्चित नहीं होती ! बस चलते-2 जो अच्छा लगा देख लिया, जहाँ मन किया रुक गए, और फिर जब मन करे, आगे बढ़ चलो ! हालाँकि, ऐसे सफ़र के अपने फ़ायदे-नुकसान भी होते है, लेकिन फिर भी अगर मौका मिले तो कभी ऐसी यात्रा भी करके देखिए, यकीन मानिए, ये सफ़र आपको ताउम्र याद रहेगा ! चलिए, वापिस अपनी यात्रा पर चलते है जहाँ हमें इस यात्रा के लिए थोड़ी-बहुत जो खरीददारी करनी थी वो कर ली, और निर्धारित दिन सुबह 5 बजे हम इस सफ़र पर निकल पड़े !



विरजेश्वर महादेव मंदिर का एक दृश्य

Sunday, April 30, 2017

जंगल के बीचों-बीच स्थित है ताड़केश्वर महादेव मंदिर (A Trip to Tarkeshwar Mahadev Temple)

रविवार, 26 मार्च 2017

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ज़हरिखाल में रात को अच्छी-ख़ासी ठंड थी, गनीमत थी कि कमरे में कंबल रखे थे ! सुबह अलार्म बजने पर सोकर उठे, खिड़की से बाहर झाँककर देखा तो अभी अंधेरा ही था ! एक नज़र सड़क के उस पार होटल के बोर्ड पर भी दौड़ाई जहाँ पिछले साल तेंदुआ आया था, शुक्र है अभी वहाँ कोई नहीं था ! फोन चार्जिंग में लगाने के बाद सब बारी-2 से नित्य क्रम में लग गए, थोड़ी देर में रोशनी हुई तो मैं और शशांक नीचे सड़क पर टहलने आ गए ! 10-15 मिनट बाद वापिस ऊपर गए और अगले एक घंटे में हम दोनों नहा-धोकर तैयार हो चुके थे ! हितेश देरी से सोकर उठा था इसलिए अभी तैयार होने में लगा था ! हम दोनों खाली बैठे थे तो बरामदे में आकर वहीं रखी एक गुलेल से दूर दिखाई दे रहे एक खंबे पर निशाना लगाने लगे ! फिर चाय पीकर होटल का बिल चुकाने के बाद सवा सात बजे तक हम तीनों होटल से निकलकर लैंसडाउन के लिए प्रस्थान कर चुके थे ! ज़हरिखाल से लैंसडाउन में प्रवेश करते ही 100 रुपए का प्रवेश शुल्क अदा किया, ये शुल्क प्रतिदिन देना होता है, मतलब एक दिन में अगर आपने एक बार शुल्क दे दिया तो आप दिनभर अनगिनत बार आ-जा सकते हो, लेकिन अगले दिन आपको फिर से ये शुल्क अदा करना होगा !
ताड़केश्वर महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार (Tarkeshwar Mahadev Temple, Lansdowne)

Wednesday, April 26, 2017

पौडी - लैंसडाउन मार्ग पर है खूबसूरत नज़ारे (A Road Trip from Devprayag to Lansdowne)

रविवार, 26 मार्च 2017

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देवप्रयाग से चले तो हमारे पास दो विकल्प थे, या तो हम टिहरी जाकर डैम देखते या फिर यहाँ से पौडी होते हुए लैंसडाउन चले जाते ! हमने सोच-समझकर दूसरा विकल्प चुना, इसकी मुख्य वजह थी कि लैंसडाउन जाते हुए हम कई जगहें देख सकते थे जबकि टिहरी में डैम के अलावा बाकी जगहें थोड़ी दूर है ! फिर एक वजह ये भी थी कि मैने पौडी से अदवानी होते हुए सतपुली जाने वाले मार्ग पर पड़ने वाले घने जॅंगल के बारे में काफ़ी सुन रखा था ! बीनू भाई के ब्लॉग पर इस जगह के बारे में पढ़ा भी था और जंगल की फोटो भी देखी थी, बस तभी से मन में इस जगह को देखने की इच्छा थी ! अपने दोनों साथियों को इस बारे में पहले ही बता दिया था कि इस मार्ग पर नज़ारों के अलावा ज़्यादा कुछ देखने को नहीं मिलेगा ! इस पर उन्होनें कहा था कि तीनों दोस्त साथ में सफ़र कर रहे है इससे ज़्यादा हमें और कुछ नहीं चाहिए ! जहाँ ठीक लगे, ले चल यार, तूने जगह चुनी है तो बढ़िया ही चुनी होगी, बस फिर क्या था दोस्तों का साथ मिला तो हम भी चल दिए एक नए मार्ग पर कुछ नज़ारों की तलाश में !


गग्वारस्यूं घाटी का विहंगम दृश्य (A View of Gagwarsyun Valley)

Saturday, April 22, 2017

देवप्रयाग में है भागीरथी और अलकनंदा का संगम (Confluence of Alaknanda and Bhagirathi Rivers - DevPrayag)

रविवार, 26 मार्च 2017

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हम कुछ समय नदी के किनारे बैठकर बिताना चाहते थे पहले गोवा बीच जाने का विचार था लेकिन फिर सोचा जब आज ही देवप्रयाग निकलना है तो क्यों ना चलकर शिवपुरी में बैठा जाए ! इसलिए राफ्टिंग के बाद हमने अपनी गाड़ी उठाई और शिवपुरी के लिए निकल पड़े, शिवपुरी से थोड़ी पहले सड़क पर काफ़ी जाम लगा था ! हमने भी अपनी गाड़ी सड़क के किनारे खाली जगह देख कर खड़ी कर दी और एक ढाबे पर खाना खाने के लिए जाकर बैठ गए ! अगले पौने घंटे में खाना खाकर यहाँ से फारिक हुए, अब तक रोड पर लगा जाम भी खुल चुका था ! थोड़ी दूर जाकर हमने अपनी गाड़ी खड़ी की और नदी किनारे जाने के लिए पैदल चल दिए ! सड़क से नीचे उतरकर झाड़ियों को पार करने के बाद नदी किनारे कुछ टेंट लगे हुए थे, जहाँ कुछ लोग वॉलीबाल खेल रहे थे ! हम उन्हें अनदेखा करते हुए नदी की ओर चल दिए, जहाँ से हमने राफ्टिंग शुरू की थी वो जगह यहाँ से थोड़ी ही दूर थी ! आधा घंटा नदी किनारे बैठ कर गप्पे मारते रहे, शाम के सवा छह बज रहे थे, सूर्यास्त भी होने को था ! शाकिब को अपने घर निकलना था और हमें भी देवप्रयाग के लिए प्रस्थान करना था !


देवप्रयाग के पास का एक चित्र

Tuesday, April 18, 2017

रोमांचक खेलों का केंद्र है ऋषिकेश (Adventure Games in Rishikesh)

शनिवार, 25 मार्च 2017

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ऋषिकेश - उत्तराखंड
आज हम ऋषिकेश घूमने के अलावा गंगा नदी में राफ्टिंग भी करने वाले थे, आगे बढ़ने से पहले कुछ जानकारी इस जगह के बारे में दे देता हूँ ! ऋषिकेशउत्तराखंड के देहरादून जिले में हिमालय की तलहटी में स्थित है ! ये शहर धर्म के साथ-2 रोमांच के लिए भी सारी दुनिया में मशहूर है फिर चाहे वो रिवर राफ्टिंग हो, बंजी जंपिंग या कोई और रोमांचक खेल, ऋषिकेश में सब कुछ होता है ! ऋषिकेश को गढ़वाल का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है, क्योंकि चाहे हिमालय में स्थित चारों धाम हो या पहाड़ों की ऊँचाई पर बसे अन्य कोई दुर्गम स्थान, अधिकतर जगहों पर जाने के लिए रास्ता ऋषिकेश से होकर ही निकलता है ! ऋषिकेश तीन तरफ से हरिद्वार, पौडी गढ़वाल और टिहरी गढ़वाल से घिरा हुआ है ! यहाँ आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या भी कम नहीं है हर साल यहाँ हज़ारों की तादात में विदेशी लोग आते है ! कुछ लोग तो यहाँ के रोमांच की दुनिया का मज़ा लेने आते है जबकि अन्य लोग आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए ऋषिकेश का रुख़ करते है !


ऋषिकेश में स्थित मरीन ड्राइव

Friday, April 14, 2017

दिल्ली से ऋषिकेश की सड़क यात्रा (A Road Trip to Rishikesh from Delhi)

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

आज मैं आपको ले चल रहा हूँ एक नए सफ़र पर, उत्तराखंड के इस सफ़र पर हमें यात्रा करते हुए बहुत मज़ा आया, उम्मीद है यात्रा लेख पढ़कर आपको भी आनंद आएगा ! यात्रा की शुरुआत करते है लक्ष्मी नगर से, जहाँ मैं और शशांक अपने-2 दफ़्तर से लौटकर आ चुके थे और यहाँ शशांक के फ्लैट पर बैठकर इस सफ़र पर जाने के लिए अपने एक अन्य साथी हितेश के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे ! समय रात के साढ़े 10 बज रहे थे लेकिन हितेश की अभी कोई खोज-खबर नहीं थी ! शाम को जब उस से बात हुई थी तो उसने कहा था कि वो अपने दफ़्तर से 9 बजे के आस-पास निकल लेगा, इस हिसाब से तो अब तक उसे आ जाना चाहिए था ! रात के समय गुड़गाँव से दिल्ली आने में समय ही कितना लगता है, फिर सोचा, हो सकता है किसी काम में फँस गया हो और निकलने में देर हो गई हो ! फिर भी उसे एक फोन तो कर ही देना था, अब उसका फोन नहीं लग रहा, पता नहीं कहाँ पहुँचा होगा, दफ़्तर से निकला भी होगा या नहीं ! मन में यही उधेड़-बुन चल रही थी, कि तभी शशांक ने एक बार फिर से उसे फोन लगाया, इस बार घंटी बजी, उसने फोन भी उठाया और बोला कि उसे दफ़्तर से निकलने में देर हो गई है हमारे पास वो 11 बजे तक ही पहुँच पाएगा !



khatauli
दिल्ली-हरिद्वार राजमार्ग पर खतौली के पास (Somewhere on Delhi-Haridwar National Highway 334)

Monday, April 10, 2017

रामनगर फ़ोर्ट और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (A Visit to Ramnagar Fort and BHU)

रविवार, 14 अगस्त 2016

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लंबे सफ़र की थकान के कारण रात को बढ़िया नींद आई और सुबह समय से सोकर उठे ! हमारा कमरा होटल की दूसरी मंज़िल पर था, कमरे की खिड़की गैलरी में खुल रही थी इसलिए बाहर के मौसम के बारे में कुछ भी नहीं पता चल रहा था ! बिस्तर से उठकर दोनों नित्य क्रम में लग गए, बाथरूम कमरे के बाहर गैलरी में था ! थोड़ी देर में बारी-2 से हम दोनों नहा धोकर तैयार हो गए ! आज शाम को ही हमारी वापसी की ट्रेन थी, मतलब घूमने ले लिए आज का पूरा दिन अभी भी हमारे था ! वापिस जाने से पहले हम रामनगर किला और बीएचयू घूम लेना चाहते थे, तो कार्यक्रम कुछ इस तरह था कि पहले चलकर रामनगर का किला देख लेते है दोपहर तक वापिस आकर बीएचयू चले जाएँगे और फिर शाम होते-2 मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन पहुँच जाएँगे ! होटल के काउंटर पर जाकर देखा तो कोई नहीं था, आवाज़ लगाई, एक कर्मचारी बगल वाले कमरे से निकलकर आया ! मैने कहा, दो चाय मिलेगी, वो बोला बाज़ार से दूध लाना पड़ेगा, आधा घंटा लगेगा ! इतना समय नहीं है हमारे पास, ऐसा कर हमारा हिसाब कर दे, हम अभी निकल रहे है !


बनारस में गंगा किनारे स्थित रामनगर किले का एक दृश्य

Thursday, April 6, 2017

परमहंस आश्रम, सिद्धनाथ दरी और चुनार के किले का भ्रमण (Visit to Siddhnath Dari, ParamHans Aashram and Chunar Fort)

शनिवार, 13 अगस्त 2016

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पिछले लेख में आपने लखनिया दरी और जरगो बाँध के बारे में पढ़ा, जरगो बाँध से चलकर हम परमहंस आश्रम के सामने पहुँच चुके थे ! ये आश्रम मिर्ज़ापुर के सक्तेषगढ़ में पड़ता है और आस-पास के इलाक़ों में इस आश्रम का बहुत नाम है ! मुख्य मार्ग को छोड़कर हम आश्रम की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए, आश्रम के प्रवेश द्वार से कुछ दूरी पर सड़क के किनारे गाड़ियाँ खड़ी करने की व्यवस्था है ! चंद्रेश भाई ने बताया यहाँ साल में एक बार मेला लगता है तब देश-विदेश से यहाँ हज़ारों लोग दर्शन के लिए आते है, मेले के दौरान तो यहाँ पैर रखने तक की जगह भी नहीं मिलती ! अपनी बाइक यहाँ खड़ी करके हम बगल में ही लगे एक नल पर हाथ-पैर धोने लगे ! हमारे अलावा कुछ अन्य लोग भी इस समय आश्रम में जाने की तैयारी कर रहे थे, ये लोग जीप से आए थे जिस पर पर बिहार का नंबर था ! इसके अलावा भी अलग-2 शहरों के रेजिस्ट्रेशन नंबर के वाहन आश्रम के बाहर खड़े थे ! ये आश्रम स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज को समर्पित है, यथार्थ गीता जोकि भगवान कृष्ण द्वारा रचित भगवत गीता का सरल रूप है की रचना इन्होनें ही की थी ! 


सिद्धनाथ दरी का एक दृश्य

Sunday, April 2, 2017

लखनिया दरी और जरगो बाँध भ्रमण (Visit to Lakhaniya Daari and Jargo Dam)

शनिवार, 13 अगस्त 2016

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम नई दिल्ली से रात को चलकर सुबह मंडुवाडीह पहुँचे, फिर मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन से निकलकर 2-3 ऑटो बदलकर नारायणपुर पहुँचे ! अब आगे, नारायणपुर में ऑटो से उतरकर हम दोनों एक तिराहे पर खड़े हो गए, चंद्रेश भाई को फोन करके बता दिया कि हम कहाँ खड़े है ! बगल में ही एक बाज़ार था जहाँ से हमने कुछ केले और बिस्कुट के पैकेट ले लिए ! लखनिया दरी के पास पता नहीं कुछ मिलेगा या नहीं ! थोड़ी देर बाद चंद्रेश भाई अपने एक मित्र के साथ हमारे पास पहुँचे, हम चारों बड़ी गर्मजोशी से मिले ! कुछ देर बातें करने के बाद चारों लोग बाइक पर सवार होकर अपनी मंज़िल की ओर निकल पड़े ! चंद्रेश भाई ने मुझसे पूछा, पहले कहाँ चले ? मैं बोला, देखनी तो सब जगहें है, आप अपनी सहूलियत के हिसाब से देख लो ! वो बोले, चलिए आपको पहले लखनिया दरी ही ले चलते है वापसी में जरगो बाँध ले चलेंगे, हमें कौन सी सवारी बदलनी है, बाइक तो है ही अपने पास ! हालाँकि, हमारी ये पहली मुलाकात थी, लेकिन सफ़र के दौरान एक बार भी ऐसा महसूस नहीं हुआ ! हमेशा यही लगा जैसे हम सब एक दूसरे को बरसों से जानते हो, वैसे मुलाकात पहली थी तो क्या हुआ, फ़ेसबुक के माध्यम से तो हम दोनों एक-दूसरे को काफ़ी समय से जानते ही थे !


लखनिया दरी जाते हुए रास्ते में लिया एक चित्र

Wednesday, March 29, 2017

मिर्जापुर यात्रा - लखनिया दरी (Trip to Lakhania Daari, Mirzapur)

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

इस यात्रा पर जाने का मेरा मन तो उस समय से था, जब मैने अपने एक सहकर्मी से लखनिया दरी जल प्रपात के बारे में सुना था ! दरअसल, मेरे एक मित्र ने अपने कॉलेज के दिनों के एक वाकये का ज़िक्र करते हुए इस जल प्रपात के बारे में बताया था कि किस तरह वो अपने दोस्तों के साथ अपनी क्लास छोड़कर इस जल-प्रपात को देखने चले गए थे ! इस झरने के बारे में जैसा विवरण उस मित्र ने दिया था उसे सुनकर इस झरने के प्रति मेरा आकर्षण काफ़ी बढ़ गया था ! फिर जब इंटरनेट पर इस झरने की वीडियो देखी और इसके बारे में पढ़ा तो झरने को देखने की इच्छा बढ़ गई ! झरने से संबंधित सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ मैने एक डायरी में लिख ली थी ताकि ज़रूरत पड़ने पर अपने अलावा अन्य लोगों को भी लाभान्वित कर सकूँ ! देखते-2 साल बीत गया, लेकिन इस यात्रा पर जाने का संयोग नहीं बना, समय बीतता रहा और इस दौरान कई यात्राएँ भी होती रही, लेकिन लखनिया दरी मेरी यात्रा डायरी के किसी पन्ने में गुमनाम सा पड़ा रहा !


बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जाने का मार्ग

Saturday, March 25, 2017

शिमला में देखने योग्य मुख्य स्थल (Local Sightseen in Shimla)

रविवार, 5 जून 2016

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इस यात्रा के पिछले लेख में आपने चैल और कुफरी के बारे में पढ़ा, जब हम शिमला पहुँचे तो शाम होने वाली थी, गाड़ी पार्किंग में खड़ी करके हम एक होटल में आकर रुके ! थोड़ी देर आराम करने के बाद हम सब माल रोड पर घूमने निकल पड़े ! पिछली शिमला यात्रा के दौरान मैं माल रोड पर बहुत ज़्यादा नहीं घूमा था, आज मौका मिला तो माल रोड के कई चक्कर काटे ! अब भूख भी लगने लगी थी, दोपहर में कुफरी में मैगी ही खाने को मिली थी ! यहाँ शिमला में माल रोड के नज़दीक रिज के मैदान के पास एक मशहूर रेस्टोरेंट है गुफा, सोचा आज हम भी देख लेते है, अब तक कई मित्रों से इस रेस्टोरेंट के बारे में सुन रखा था ! आज जाकर पता चला, वाकई शानदार जगह है, अगर आप शिमला घूमने आ रहे है तो इस रेस्टोरेंट में ज़रूर जाइए ! रेस्टोरेंट के अलावा यहाँ बार भी है, मतलब खाने-पीने का पूरा इंतज़ाम है ! गोलाकार आकृति में बने इस रेस्टोरेंट में बैठने के लिए सोफे भी लगे है, हम भी एक बढ़िया सा सोफा देखकर बैठ गए ! ऑर्डर देने के थोड़ी देर बाद ही हमारा खाना परोस दिया गया, खाना लाजवाब बना था, सबने खूब खाया !


रात में दिखाई देता शिमला का चर्च

Tuesday, March 21, 2017

चैल में देखने योग्य मुख्य स्थल (Local sightseen in Chail)

शनिवार, 4 जून 2016

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पिछले लेख में आपने साधुपुल के बारे में पढ़ा, दिन भर के सफ़र की थकान की वजह से रात को बढ़िया नींद आई ! सुबह समय से सोकर उठे, घड़ी देखी तो अभी 5 बज रहे थे, कॉटेज की खिड़की से बाहर झाँककर देखा तो अभी हल्का-2 अंधेरा ही था ! बिस्तर से उठकर हमने हाथ-मुँह धोया और अपना कैमरा लेकर कॉटेज से बाहर आ गए, नदी के पास पहुँचे तो हल्का-2 उजाला होने लगा था ! ये जगह तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरी हुई थी, जिसके कारण कल हम सूर्यास्त का नज़ारा ठीक से नहीं देख पाए थे ! आज सूर्योदय देखने की उम्मीद के साथ दिन की शुरुआत कर रहे थे, नदी को पार करने के लिए पानी में पैर डाला तो महसूस किया कि इस समय पानी कल शाम से भी ज़्यादा ठंडा था ! सूर्योदय का नज़ारा देखने की ख्वाहिश लिए हम नदी के किनारे-2 पानी की विपरीत दिशा में चल दिए, उधर से ही सूर्य की लालिमा दिखाई दे रही थी ! इस समय चारों तरफ सन्नाटा था, इसलिए बहते हुए पानी की आवाज़ भी काफ़ी तेज लग रही थी ! हम सब नदी के किनारे-2 चलते रहे, अपने कैंप से थोड़ी दूर जाने पर नदी के किनारे खूब पत्थर बिखरे पड़े थे ! नदी के एक किनारे तो घने पेड़-पौधे थे जबकि दूसरी ओर ऊँचाई पर कुछ मकान और एक मंदिर बना हुआ था, मंदिर के बगल से एक अन्य स्त्रोत से बहकर आने वाले पानी के निशान दिखाई दे रही थी ! इस समय तो इसमें पानी नहीं था लेकिन बारिश के मौसम में इसमें आस-पास का पानी बहकर आता होगा !


कुफरी का एक दृश्य