Tuesday, December 19, 2017

केदारनाथ से वापसी भी कम रोमांचक नहीं (A Trek from Kedarnath to Gaurikund)

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें !

यात्रा के पिछले लेख में आपने केदारनाथ धाम में होने वाली संध्या आरती के बारे में पढ़ा, आरती समाप्त होने के बाद खाना खाकर हम आराम करने के लिए अपने होटल में आ गए ! अब आगे, खाना खाकर होटल से चले तो ठण्ड काफी बढ़ चुकी थी, होटल तक पहुँचते-2 सभी लोग सिकुड़ चुके थे ! एक तो ठण्ड और दूसरा दिनभर लम्बा सफ़र करके अच्छी थकान हो गई थी, इसलिए सोने के लिए ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी ! आधी रात को ठण्ड के कारण मेरी नींद खुल गई, मैंने महसूस किया जैसे-2 रात बढती जा रही थी, मौसम भी ठंडा होता जा रहा था, हालत ये थी कि रजाई में भी ठिठुरन हो रही थी ! गनीमत थी कि कमरे में अतिरिक्त रजाइयाँ रखी थी, शायद होटल वाले को पहले से ही अंदाजा था इसलिए ये अतिरिक्त रजाइयाँ पहले से ही रख दी थी, ठण्ड बढ़ी तो हमने 2-2 रजाइयाँ ओढ़ ली ! इसके बाद बढ़िया नींद आई और ठण्ड के कारण दोबारा नींद नहीं खुली ! रात को सोते समय हमने सुबह का अलार्म लगा दिया था ताकि समय से उठकर वापसी की राह पकड़ सकें ! सुबह अलार्म बजने पर जब मेरी नींद खुली तो पिताजी पहले ही उठ चुके थे, देवेन्द्र की भी नींद खुल चुकी थी और वो प्राणायाम करने में लगा था !


बर्फ से ढकी पहाड़ियों का एक दृश्य (A view of snow covered Mountains)

अब हमारे पास अतिरिक्त कपडे तो थे नहीं, इसलिए नहाने का तो सवाल ही नहीं था ! हाथ-मुंह धोने का विकल्प था इसी उद्देश्य से जब मैं बाथरूम में गया तो टूटी खोलते ही मेरी हाथ-मुंह धोने की इच्छा भी एक ही पल में समाप्त हो गई ! पानी इतना ठंडा था कि हाथ सिकुड़ गए, लेकिन फिर भी मन रखने के लिए ऊँगली भिगाकर आँख पोछ लिए ! जैसे-तैसे करके नित्य-क्रम से निवृत हुए और सवा पांच बजे तक हमने अपना होटल छोड़ दिया ! यहाँ से निकलते हुए किराये की बकाया राशि भी होटल के मालिक को दे दी, जो होटल के सामने बने एक टेंट में सो रहा था, उसे नींद से भी हमने ही जगाया, वो भी सोच रहा होगा इतनी सुबह भी भला कोई जाता है क्या ! वैसे उसका टेंट काफी बढ़िया था, अन्दर हीटर भी लगा था, और ज़रूरत का अन्य सामान भी था ! होटल मालिक ने हमें चाय पीकर जाने का न्योता दिया, लेकिन हम उसे इतनी सुबह परेशान नहीं करना चाहते थे इसलिए बिना चाय पिए ही निकल पड़े ! वैसे केदारनाथ से वापसी भी कम मजेदार नहीं थी, हम यहाँ से जल्दी निकले थे ताकि समय से नीचे पहुंचकर सोनप्रयाग में वासुकी गंगा और मन्दाकिनी का संगम स्थल देख सके और त्रियुगीनारायण मंदिर जाने के लिए भी हमारे पास पर्याप्त समय रहे !



हम होटल से चले थे तो अभी अँधेरा ही था, मंदिर के सामने से निकलते हुए बाहर से ही हाथ जोड़कर हम केदारनाथ से वापिस गौरीकुंड आने वाले मार्ग पर चल दिए ! मंदिर के पीछे दिखाई दे रहे पहाड़ चाँद की मद्धम रोशनी में चमक रहे थे, इसका मतलब रात को बर्फ़बारी हुई थी क्योंकि शाम तक तो इन पहाड़ों पर बर्फ नहीं थी लेकिन इस समय पहाड़ों पर बर्फ की एक चादर बिछ चुकी थी ! गौरीकुंड जाने वाले मार्ग पर जगह-2 सफ़ेद लाइटें लगी थी और इस समय हमारे अलावा इक्का-दुक्का लोग ही इस मार्ग पर दिखाई दे रहे थे ! हाँ, जगह-2 कुत्ते ज़रूर झुण्ड बनाकर खड़े थे, शायद ये भी ठण्ड से परेशान थे, इनमें से 3-4 कुत्ते तो हमारे साथ भी हो लिए ! रात के इस सन्नाटे में नदी की आवाज़ भी काफी दूर तक सुनाई दे रही थी ! हम चारों आगे-पीछे ही चल रहे थे, इस बीच हममें से कोई पीछे रह जाता तो उसे कुत्ते घेरकर खड़े हो जाते ! अनिल जूते के फीते बाँधने के लिए एक जगह रुका तो कुत्तों ने उसके चारों तरफ एक घेरा बना लिया, पता ही नहीं चल रहा था कि ये कुत्ते हमें बचा रहे थे, या डरा रहे थे ! वैसे कुछ दूर चलने के बाद हमें एहसास हुआ कि ये हमारी सुरक्षा ही कर रहे थे !

थोड़ी आगे बढे तो हमें रास्ते में नीचे जाते हुए कुछ अन्य लोग भी दिखाई दिए, इनमें से एक ने अपने सर पर रजाई रख रखी थी तो दुसरे ने एक प्लास्टिक के कट्टे में स्टोव और बर्तन रखे हुए थे ! इन्हें देखकर हमारे लिए अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था कि ये केदार घाटी से वापिस नीचे अपने घरों को लौट रहे थे ! वैसे भी दीवाली आने वाली थी और हर कोई दीवाली का त्योहार अपने परिवार के साथ ही मनाने की सोचता है ! दीवाली के बाद केदारनाथ के द्वार बंद होने के बाद केदार घाटी में रहने वाले अधिकतर लोग नीचे मैदानी इलाकों में जाकर कुछ नया रोजगार ढूँढ लेते है, अगले साल पट खुलने पर ये फिर से घाटी में लौट आयेंगे ! हम थोड़ी दूर ही चले थे कि बिजली चली गई, और चरों तरफ घना अँधेरा हो गया ! पहाडो पर जंगली जानवरों का भय लगातार ही बना रहता है और अँधेरे में तो ये खतरा दुगुना हो जाता है ! इसलिए हम कुछ देर के लिए एक शेड के नीचे लगी कुर्सियों पर जाकर बैठ गए, थोड़ी देर बाद हमने फिर से चलना शुरू किया, अब धीरे-2 उजाला होने लगा था ! हम बीच-2 में रूककर पहाडो को भी एक नज़र देख ले रहे थे, उगते सूरज की लालिमा में ये पर्वत स्वर्णिम दिखाई दे रहे थे !



वैसे तो नीचे उतरते हुए हमें ज्यादा थकान नहीं हो रही थी लेकिन फिर भी हम बड़ी सावधानी से उतर रहे थे, वापसी में तो हम अधिकतर शॉर्टकट रास्तों से होते हुए तेजी से नीचे आ रहे थे ! हर घुमावदार मोड़ से नीचे दूर तक दिखाई दे रही घाटी का एक शानदार दृश्य दिखाई दे रहा था और केदारनाथ के पीछे दिखाई दे रहे बर्फ के पहाड़ हमसे लगातार दूर होते जा रहे थे ! इस बीच रास्ते में कई पड़ाव आए, जहाँ रात्रि विश्राम के लिए निजी टेंट भी लगे हुए थे, इन टेंटों के बारे में मैं केदारनाथ जाने वाले लेख में पहले ही बता चुका हूँ ! वापिस आते हुए हमें रास्ते में कई लोग भी मिले जो ऊपर जा रहे थे, रात्रि विश्राम के लिए ये रास्ते में पड़ने वाले टेंटों में ही रुके थे ! ऐसे ही एक व्यक्ति ने रूककर हमसे पुछा, कि भाई मंदिर अभी कितना दूर है, ज़रूरी जानकारी देने के साथ ही हमने उसका हौंसला बढाने के लिए दो शब्द कहे और आगे बढ़ गए ! जाते हुए थकान की वजह से रास्ते में पड़ने वाले जो सुन्दर दृश्य हम नहीं देख पाए थे, वापसी में हमने इस जगहों को जी भरकर देखा !


केदारनाथ से वापिस आते हुए एक दृश्य


एक जगह जाकर रास्ता दो हिस्सों में बंट रहा था, हम नया रास्ता लेना चाहते थे, इस मार्ग पर कुछ दूर जाते ही हमें नीचे बकरियों का एक झुण्ड दिखाई दिया, जिसकी वजह से हमें वापिस पुराने मार्ग पर लौटना पड़ा ! रास्ते में छोटे-बड़े अनेकों झरने आए, ये सभी झरने पहाड़ों से गिरते हुए नदी में मिल रहे थे, जैसे-2 हम नीचे आते जा रहे थे, नीचे घाटी में बहकर जाती हुई मन्दाकिनी नदी का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा था ! हम रामबाड़ा पहुच चुके थे, और लोहे का एक पुल पार करते हुए फोटो खींचने में लगे थे, इसी बीच एक दुखद घटना घटी ! दरअसल, हुआ कुछ यूं कि एक परिवार जिसमें एक बुजुर्ग महिला भी शामिल थी, केदारनाथ जा रहा था, बाकि लोग तो पैदल चल रहे थे लेकिन बुजुर्ग महिला खच्चर पर सवार थी ! पुल पार करने के लिए जैसे ही वो खच्चर ऊपर चढ़ा, उसका संतुलन थोडा बिगड़ा, एक झटके के साथ ही बुजुर्ग महिला नीचे गिर पड़ी ! महिला के सिर पर गंभीर चोट आई, खून भी बहने लगा, खच्चर वाले ने फ़ोन करके आनन-फानन में प्राथमिक चिकित्सा के लिए एक व्यक्ति को बुलाया ! उस व्यक्ति ने आकर महिला के सिर पर पट्टी की और फिर ये लोग एक डोंगी में बिठाकर उक्त महिला को वापिस ले जाने लगे !


केदारनाथ से वापिस आते हुए एक दृश्य

केदारनाथ से वापिस आते हुए एक दृश्य



केदारनाथ से वापिस आते हुए एक दृश्य



इसी पुल पर वो हादसा हुआ था 
डोंगी एक विशेष प्रकार की टोकरी होती है जिसमें इंसान को बिठाकर एक व्यक्ति अपनी पीठ पर उठाकर पहाड़ी क्षेत्रो में दुर्गम स्थानों पर ले जाते है ! वैसे तो हेमकुंड साहिब में भी इस तरह की डोंगियाँ काफी प्रचलन में है, लेकिन आजकल अधिकतर दुर्गम स्थलों पर इस तरह की डोंगियाँ देखने को मिल जाती है ! नदी का पुल पार करने के बाद हम एक दुकान पर चाय पीने के लिए रुके, यहाँ रास्ते में जगह-2 अभी भी सफाईकर्मी बड़ी मुस्तेदी से अपना काम कर रहे थे ! चाय की दुकान पर बैठा आदमी बहुत बडबोला था, हमारे बैठते ही बोलने लगा मेरी दुकान से बढ़िया चाय आपको पूरे केदारनाथ में नहीं मिलेगी, उसकी ये बात सुनकर उसकी दूकान की चाय के लिए हमारी उम्मीदें बढ़ गई, लेकिन चाय पीकर वोही स्वाद आया जो हम पिछले दो दिनों से ले रहे थे ! बल्कि, इस चाय में अजीब सी गंध आ रही थी, शायद गाय-भैंस का दूध नहीं था ! चाय-बिस्कुट खाकर यहाँ से आगे बढे तो थोड़ी देर बाद रास्ते में वही परिवार मिला, ये लोग डोंगी को रखकर कुछ देर आराम करने के लिए रुके थे ! हमारे वहां से निकलते ही ये परिवार भी हमारे पीछे-2 हो लिया, चलते-2 इस परिवार की महिला से मेरी बातचीत शुरू हुई ! 


रास्ते में दिखाई देता एक झरना 


हल्की बातचीत के बाद पता चला कि ये लोग आगरा से थे, और यहाँ पहली बार आए थे लेकिन इस हादसे के कारण अब ये सोनप्रयाग जाकर आगे की योजना पर विचार करेंगे ! महिला का मन अभी भी मंदिर जाने का था, लेकिन अपनी सास के चोटिल हो जाने से अब इनका केदारनाथ जाना खटाई में पड़ गया था, बोली होटल जाकर पता चलेगा कि दर्शन करके वापिस जायेंगे या ऐसे ही वापसी की राह पकडनी पड़ेगी ! महिला ने बताया कि खच्चर वाले को ये लोग आने-जाने का 3000 रूपए का अग्रिम भुगतान कर चुके थे और अब इस हादसे के बाद तो ये खच्चर से जाने वाले नहीं, मतलब सारे पैसे डूब गए ! मेरे विचार में तो ऐसी यात्राओं पर अग्रिम भुगतान से बचना चाहिए, हाँ, अगर ज्यादा ज़रूरी हो तो पेशगी के रूप में कुछ दे देना चाहिए,  लेकिन सारे पैसे एडवांस देना कहाँ की समझदारी है ? मैंने इन्हें केदारनाथ में चलने वाले हेलीकाप्टर सुविधा की जानकारी दी और इसी से जाने की सलाह भी दी, पसंद आएगी तो चले जायेंगे नहीं तो वापसी की राह पकड़ेंगे ! इस बीच जब नज़र दौड़ाई तो पता चला देवेन्द्र मुझसे काफी आगे निकल चुका था, पिताजी भी थोड़ी दूरी पर जाते दिखाई दे रहे थे !


नीचे बहकर जाती मन्दाकिनी नदी
फिर जब देवेन्द्र एक झरने के पास फोटो खींचने के लिए रुका तो मैं और पिताजी उससे आगे निकल गए, अनिल अभी भी सबसे पीछे चल रहा था ! जब हम चाय पी रहे थे तो उसे खाने की तीव्र इच्छा थी, लेकिन चाय वाले के पास खाने का इंतजाम नहीं था ! इसलिए हमें अंदेशा था कि अनिल शायद कहीं खाने के लिए रुक गया होगा, इक्का-दुक्की जगहों पर बड़े-2 तवों पर गरमा-गर्म पराठे बन रहे थे ! गौरीकुंड से दो किलोमीटर पहले हमें एक अन्य परिवार ऊपर जाता दिखाई दिया, पति-पत्नी और गोदी में एक छोटा बच्चा ! उन्हें देखकर मुझे नहीं लग रहा था कि बच्चे को गोदी में लेकर ये ऊपर चढ़ पाएंगे, जहाँ अकेले चलने में ही हालत खराब हो जाती है वहां बच्चे को लेकर कहाँ चढ़ा जायेगा ! लेकिन किसी को एक नज़र देखकर उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति का अंदाजा लगाना थोडा मुश्किल काम है ! खैर, तेजी से चलते हुए हम कुछ ही देर में गौरीकुंड पहुँच गए, कुछ देर के इन्तजार के बाद देवेन्द्र और अनिल भी आ गए ! हम सुबह सवा पांच बजे केदारनाथ से चले थे और गौरीकुंड पहुँचते-2 सवा दस बज गए थे इस तरह हमें नीचे उतरने में कुल 5 घंटे का समय लगा !

गौरी माता मंदिर का एक दृश्य 




केदारनाथ जाते हुए हम गौरीकुंड में स्थित माँ पार्वती/गौरी के मंदिर नहीं जा पाए थे इसलिए वापसी में इस मंदिर के दर्शन भी करने थे ! सीढ़ियों से होते हुए हम इस मंदिर की ओर बढ़ गए, सीढियाँ ख़त्म होने के बाद एक तरफ तो गर्म पानी का कुंड था जबकि दूसरी ओर माँ पार्वती का ये मंदिर स्थित है ! हमारे पास अभी भी अतिरिक्त कपडे नहीं थे इसलिए कुंड में स्नान नहीं कर सके, मंदिर के मुख्य द्वार से थोडा पहले कुछ लोग पूजा सामग्री बेच रहे थे ! हम सब मुख्य द्वार से होते हुए मंदिर परिसर में दाखिल हुए, बड़ा शानदार मंदिर बना है, बनावट देखकर ही कोई भी इसकी प्राचीनता का अनुमान लगा सकता है ! मंदिर के बाहर भी एक प्रतिमा लगी थी, मंदिर की छत टीन की बनी थी और मुख्य भवन के अन्दर फोटोग्राफी वर्जित थी, इसलिए आपको बाहर की फोटो से ही काम चलाना पड़ेगा ! दर्शन के बाद सीढ़ियों से होते हुए हम गौरीकुंड टैक्सी स्टैंड की ओर चल दिए ! यहाँ से निकलते हुए हम गर्वित महसूस कर रहे थे कि आखिर वर्षों टली आ रही हमारी केदारनाथ की यात्रा भी संपन्न हो ही गई ! 10 मिनट की यात्रा करने के बाद टैक्सी स्टैंड के सामने खड़े थे, जहाँ कई टैक्सियाँ यात्रियों के इन्तजार में खड़ी थी !





सबसे आगे वाली जीप में जाकर हम बैठ गए, इस जीप में पहले से ही 2 लोग बैठे हुए थे, जीप वाला खड़ा होकर अन्य सवारियों के आने की प्रतीक्षा कर रहा था ! इस बीच हम जीप में बैठे आगे के कार्यक्रम पर चर्चा करते रहे, सोनप्रयाग में हमारे पास घूमने के लिए अभी दो जगहें और बची थी इसमें से एक था सोनप्रयाग में वासुकी ताल ओर मन्दाकिनी का संगम स्थल और दूसरी जगह थी सोनप्रयाग से 13 किलोमीटर दूर त्रियुगीनारायण  मंदिर ! इतने में 5-6 सवारियां आ गई और जीप भर गई, अब हम चलने के लिए तैयार थे कुल ही मिनटों बाद हमारी जीप सोनप्रयाग जाने वाले मार्ग पर दौड़ रही थी ! 15-20 मिनट बाद हम सोनप्रयाग पहुंचे, यहाँ जीप से उतरकर हम तेजी से अपने होटल की ओर चल दिए ! होटल पहुंचकर हमने अपने कपडे लिए और नहाने के लिए सोनप्रयाग में संगम पर चल दिए ! संगम स्थल के बारे में विस्तार से अगले लेख में लिखूंगा, फिल्हाल इस लेख पर यहीं विराम लगाता हूँ जल्द ही नए लेख के माध्यम से आपसे फिर मुलाकात होगी !

क्यों जाएँ (Why to go Kedarnath): अगर आपको धार्मिक स्थानों पर जाना अच्छा लगता है तो निश्चित तौर पर उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ आपके लिए एक बढ़िया जगह है ! केदारनाथ उत्तराखंड में स्थित चार धाम में से एक है यहाँ जाने के लिए सोनप्रयाग बेस कैम्प है और यहाँ जाते हुए रास्ते में घूमने के लिए अनेकों जगहें है, शहर की भीड़-भाड़ से दूर 2-3 दिन आप यहाँ आराम से बिता सकते है ! 

कब जाएँ (Best time to go Kedarnath): केदारनाथ के द्वार हर वर्ष मई में खुलकर दीवाली के बाद बंद हो जाते है ! साल के 6 महीने भारी बर्फ़बारी के कारण केदारनाथ मंदिर बंद रहता है ! बहुत से लोग बर्फ़बारी के दौरान भी सोनप्रयाग आते है लेकिन इस दौरान बर्फ के अलावा उन्हें कुछ नहीं मिलता ! बारिश के मौसम में उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएँ अक्सर होती रहती है इसलिए इन दिनों भी यहाँ ना ही जाएँ ! अगर फिर भी इस दौरान जाने का विचार बने तो अतिरिक्त सावधानी बरतें !


कैसे जाएँ (How to reach Kedarnath): दिल्ली से केदारनाथ की कुल दूरी लगभग 481 किलोमीटर है, जिसमें से सोनप्रयाग तक की 460 किलोमीटर की दूरी आप निजी वाहन से भी तय कर सकते है ! सोनप्रयाग से आगे 5 किलोमीटर गौरीकुंड है जहाँ जाने के लिए सोनप्रयाग से जीपें चलती है ! अंतिम 17 किलोमीटर की यात्रा आपको पैदल ही तय करनी होती है ! सोनप्रयाग तक आपको लगभग 15 से 16 घंटे का समय लगेगा, सोनप्रयाग से आगे पैदल यात्रा करने में 7-8 घंटे लगते है ! दिल्ली से सोनप्रयाग जाने के लिए सबसे बढ़िया मार्ग हरिद्वार-देवप्रयाग-रुद्रप्रयाग होते हुए है, दिल्ली से हरिद्वार तक 4 लेन राजमार्ग बना है जबकि ऋषिकेश से आगे पहाड़ी मार्ग शुरू हो जाता है और सिंगल मार्ग है ! आप चाहे तो हरिद्वार तक का सफ़र ट्रेन से कर सकते है और हरिद्वार से आगे का सफ़र बस या जीप से तय कर सकते है ! इसमें आपको थोडा अधिक समय लगेगा !


कहाँ रुके (Where to stay near Kedarnath): केदारनाथ में रुकने के लिए कई होटल है जहाँ रुकने के लिए आपको 500-600 रूपए में कमरा मिल जायेगा ! मई-जून में ये किराया बढ़कर दुगुना भी हो जाता है ! हेलीपेड के पास डोरमेट्री की व्यवस्था भी है जहाँ प्रति व्यक्ति आपको 600-700 रूपए देने होंगे ! केदारनाथ में खान-पान के बहुत ज्यादा विकल्प नहीं है इसलिए सुख सुविधाओं की बहुत ज्यादा उम्मीद ना करें !


क्या देखें (Places to see near Kedarnath): केदारनाथ चार धामों में से एक धार्मिक स्थल है, यहाँ 1 किलोमीटर की दूरी पर भैरवनाथ मंदिर है, 4 किलोमीटर दूरी पर चोराबारी ताल भी है, चोराबारी ताल से आगे ग्लेशियर शुरू हो जाते है ! सोनप्रयाग में वासुकी गंगा और मन्दाकिनी नदियों का संगम होता है ! सोनप्रयाग से 13 किलोमीटर दूर त्रियुगीनारायण का मंदिर है, जबकि सोनप्रयाग से 5 किलोमीटर दूर गौरीकुंड में भी पार्वती माता का मंदिर है !

अगले लेख में जारी...

केदारनाथ यात्रा
  1. दिल्ली से केदारनाथ की एक सड़क यात्रा (A Road Trip from Delhi to Kedarnath)
  2. उत्तराखंड के कल्यासौड़ में है माँ धारी देवी का मंदिर (Dhari Devi Temple in Uttrakhand)
  3. रुद्रप्रयाग में है अलकनंदा और मन्दाकिनी का संगम (Confluence of Alaknanda and Mandakini Rivers - RudrPrayag)
  4. रुद्रप्रयाग में है कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple in Rudrprayag)
  5. रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि मंदिर होते हुए सोनप्रयाग (A Road Trip from Rudrprayag to Sonprayag)
  6. गौरीकुंड से रामबाड़ा की पैदल यात्रा (A Trek from Gaurikund to Rambada)
  7. रामबाड़ा से केदारनाथ की पैदल यात्रा (A Trek from Rambada to Kedarnath)
  8. केदार घाटी में स्थित भैरवनाथ मंदिर (Bhairavnath Temple in Kedar Valley)
  9. केदारनाथ धाम की संध्या आरती (Evening Prayer in Kedarnath)
  10. केदारनाथ से वापसी भी कम रोमांचक नहीं (A Trek from Kedarnath to Gaurikund)
  11. सोनप्रयाग का संगम स्थल और त्रियुगीनारायण मंदिर (TriyugiNarayan Temple in Sonprayag)

4 comments:

  1. बढ़िया रोमांचक वापसी की यात्रा जिसमे आपने नजारो का भरपूर आनंद किया और साथ ही उस महिला के प्रति संवेदना भी दिखी आपकी...हर हर महादेव

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    1. धन्यवाद, प्रतीक भाई ! हर हर महादेव !

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  2. चढने के मुकाबले उतरना ज्यादा खरनाक होता है,हम अमरनाथ यात्रा में4 घँटे में बलटाल उतर गए थे लेकिन सुबह सो कर जगेतो पैरो में दर्द जबरदस्त

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    1. बिलकुल सही कहा आपने वसंत जी, पहाड़ों पर उतरते हुए ज्यादा खतरा होता है !

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