Wednesday, November 8, 2017

रुद्रप्रयाग में है कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple in Rudrprayag)

वीरवार, 12 अक्तूबर 2017

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भगवान् शिव को समर्पित कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple) रुद्रप्रयाग से महज 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है ! चार धाम की यात्रा पर निकले अधिकतर श्रद्धालु इस मंदिर को देखते हुए ही आगे बढ़ते है, गुफा के रूप में मौजूद ये मंदिर अलकनंदा नदी के तट पर स्थित है ! कहते है कि केदारनाथ की ओर प्रस्थान करते हुए भगवान् शिव ने इस मंदिर के पास मौजूद गुफा में रूककर कुछ समय प्रार्थना की थी, गुफा में मौजूद सैकड़ों प्राकृतिक शिवलिंग इस बात को प्रमाणित करते है ! महाशिवरात्रि पर इस मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है ! इस गुफा के अलावा मंदिर के आस-पास माँ पार्वती, श्री गणेश जी, हनुमान जी, और माँ दुर्गा की जो मूर्तियाँ है, वो भी प्राकृतिक रूप से प्रकट हुई है ! कहा जाता है कि भगवान् शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए इस मंदिर के पास मौजूद गुफा में रहकर कुछ समय बिताया था ! भस्मासुर ने शिवजी की आराधना करके ये वरदान प्राप्त किया था कि जिसके सिर पर भी वो हाथ रख देगा, वो उसी क्षण भस्म हो जायेगा ! भस्मासुर भी बड़ा तेज था, इस वरदान को आजमाने के लिए उसने भगवान् शिव को ही चुना !

koteshwar mahadev temple
कोटेश्वर महादेव मंदिर से दिखाई देता एक दृश्य (A view from Koteshwar Mahadev Temple)

फिर क्या था, शिवजी आगे-2 और भस्मासुर उनके पीछे-2 ! कहते है कि भस्मासुर से बचने के लिए शिवजी ने कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास स्थित इस गुफा में रहकर कुछ समय बिताया था ! बाद में भगवान् विष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके भस्मासुर का संहार करते हुए शिवजी की सहायता की थी ! लोगों का ये भी मानना है कि महाभारत युद्ध के बाद जब पांडव मुक्ति का वर लेने के लिए भगवान् शिव को ढूंढ रहे थे तो शिवजी इसी गुफा में ध्यानमग्न थे ! शहर की भीड़-भाड़ से दूर इस मंदिर के आस-पास शांति और सम्मोहित करने वाला माहौल रहता है ! धार्मिक लोगों के लिए तो ये जगह स्वर्ग है ही, प्रकृति प्रेमियों के लिए भी मंदिर परिसर से दिखाई देने वाले नज़ारे किसी जन्नत से कम नहीं है ! ऊंची-2 खड़ी चट्टानों के बीच से निकलते पेड़ और इन चट्टानों पर उगे अलग-2 किस्म के पेड़-पौधों के बीच शांत रूप से बहती अलकनंदा नदी की सुन्दरता देखते ही बनती है ! गुफा के अन्दर मौजूद प्राकृतिक रूप से बनी मूर्तियाँ और शिवलिंग यहाँ प्राचीन काल से ही स्थापित है ! रुद्रप्रयाग में संगम देखने के बाद हम भी इस मंदिर में दर्शन के लिए चल दिए ! 

संगम स्थल से चले तो रुद्रप्रयाग में बने लोहे के पुल के पास से अलकनंदा नदी के किनारे बद्रीनाथ की ओर जाने वाले मार्ग के समानांतर नदी के दूसरी ओर चलते रहे ! ये चोपता-पोखरी मार्ग है, लोहे के पुल से लगभग 4 किलोमीटर चलने के बाद हम कोटेश्वर महादेव मंदिर के सामने जाकर रुके ! शहर की भीड़-भाड़ से दूर अलकनंदा के किनारे बना ये एक शानदार मंदिर है, सड़क के किनारे दाईं ओर मंदिर तक जाने वाले मार्ग का मुख्य प्रवेश द्वार बना है ! गाडी खड़ी करके हम इस प्रवेश द्वार से होते हुए मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए, इस मार्ग पर शुरुआत में ही कुछ दुकानें है, आगे बढ़ने से पहले हमने एक दूकान से मंदिर में चढाने के लिए प्रसाद ले लिया ! आप भी अगर इस मंदिर में जा रहे है तो यहीं से प्रसाद ले लें क्योंकि आगे बढ़ने पर कोई दूकान नहीं है ! थोड़ी दूर चलने पर ये मार्ग बाएं मुड जाता है, इसी मोड़ पर एक उद्यान भी बना है, जिसमें बच्चों के खेलने-कूदने के लिए झूले लगे है ! मोड़ से आगे का रास्ता काफी ढलान भरा है, आपके बाईं ओर ऊंची पहाड़ी है जिस पर कई किस्म के पेड़-पौधे लगे है, जबकि दाईं ओर अलकनंदा नदी बहती है !

कोटेश्वर महादेव मंदिर जाने का प्रवेश द्वार 

कोटेश्वर महादेव मंदिर जाने का पैदल मार्ग (Way to Koteshwar Mahadev Temple, Rudrprayag)
इस मार्ग पर चलते हुए हमें कई जगह पहाड़ी छिपकलियाँ देखने को मिली, आकार में सामान्य छिपकलियों से थोड़ी बड़ी और रंग में एकदम काली ! कुछ दूर चलने के बाद आपकी दाईं ओर मंदिर का मुख्य भवन है जबकि सामने दो पहाड़ियों के बीच से बहती अलकनंदा नदी का एक विहंगम दृश्य दिखाई देता है ! आपकी बाईं ओर जाता पक्का मार्ग एक गुफा पर जाकर समाप्त हो जाता है ! नदी का जलस्तर बढ़ने पर पानी की लहरें इस गुफा के प्रवेश द्वार तक उठती है, गुफा के पास वाले पत्थरों पर बने पानी के निशान इस बात की पुष्टि कर रहे थे ! हम अपने जूते-चप्पल यहीं उतारकर पैदल ही इस गुफा की ओर चल दिए, मंदिर में मौजूद एक व्यक्ति ने हमें आवाज़ लगाकर कहा कि जल चढाने के लिए मंदिर के मुख्य भवन से एक लोटा ले जाओ ! देवेन्द्र जाकर मुख्य भवन से एक लोटा ले आया, और हम सब गुफा की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! गुफा की ओर जाने वाले मार्ग पर एक छोटा प्राकृतिक झरना बह रहा था ! हमने शिवलिंग पर चढाने के लिए इसी झरने से जल भरा और गुफा में दाखिल हुए ! गुफा के अन्दर प्राकृतिक रूप से बने सैकड़ों शिवलिंग विद्धमान थे, जो प्रसाद हम अपने साथ लाये थे वो हमने जल के साथ यहाँ चढ़ा दिया !

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास का दृश्य

कोटेश्वर महादेव मंदिर का एक दृश्य

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास से अलकनंदा नदी का एक दृश्य

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास एक गुफा

गुफा के अन्दर का एक दृश्य
ये गुफा थोड़ी संकरी थी, आप इसमें सीधे खड़े भी नहीं हो सकते, अन्दर अच्छी ठंडक थी, और एकदम शांत वातावरण था ! बारी-2 से यहाँ पूजा करने के बाद हमने मंदिर के आस-पास कुछ चित्र लिए और फिर सीढ़ियों से होते हुए नदी के किनारे चल दिए ! यहाँ बड़ी-2 काले रंग की चट्टानें है, इन चट्टानों के बीच कुछ भाग में रेत भी फैला हुआ है, जिससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि बारिश के मौसम में इस नदी का जलस्तर काफी बढ़ जाता होगा ! एक जगह तो ऐसी भी दिखी, जहाँ दो बड़े-2 पत्थरों के कारण नदी की चौड़ाई महज 9-10 फीट ही रह जाती है ! नदी के किनारे ही एक संगमरमर के पत्थर पर स्वामी हरिदोस गिरी नाम के एक महापुरुष का नाम अंकित था जिन्होनें 4 सितम्बर 1994 को इस स्थान पर जल समाधि ली थी ! वाकई, बड़ी हिम्मत का काम है इस तरह की जल समाधि लेना, उस महापुरुष के जज्बे को सलाम है जिन्होनें यहाँ जल समाधि ली ! थोड़ी देर नदी के किनारे बिताने के बाद हम सीढ़ियों से होते हुए ऊपर आ गए ! यहाँ से थोड़ी दूरी पर हमें शनिदेव का एक मंदिर दिखाई दिया, ऊपर जाने से पहले हम शनिदेव के दर्शन करने भी गए !

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास वाली गुफा का एक दृश्य


यहाँ एक समाधी स्थल भी है

नदी के बीच का एक दृश्य, फिल्हाल यहाँ पानी नहीं था !

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास अलकनंदा नदी का दृश्य


पानी के अन्दर की चट्टाने

अलकनंदा नदी का एक दृश्य

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास एक शनि मंदिर
लोगों ने शनिदेव को तेल और लोहे के सैकड़ों त्रिशूल चढ़ाए हुए थे, मंदिर के बगल में इन त्रिशुलों का ढेर लगा हुआ था ! शनिदेव के मंदिर से निकलने के बाद हम सीढ़ियों से होते हुए ऊपर आ गए, रास्ते में हमें माँ शेरावाली, पंचमुखी हनुमान, गणेश जी के अलावा कुछ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी देखने को मिली ! सभी जगह हाथ जोड़ते हुए आगे बढे तो मुख्य मंदिर में जाकर शिवलिंग की पूजा की, इसके बाद हमने वापसी की राह पकड़ी ! वापिस आते हुए रास्ता थोडा चढ़ाई का था, 10-15 मिनट का सफ़र तय करके हम अपनी गाडी के पास पहुँच चुके थे, आगे बढ़ने से पहले हमने यहाँ बैठकर सेब खाए जो हम श्रीनगर से खरीदकर लाए थे ! यहाँ से चले तो हम फिर से केदारनाथ जाने वाले मार्ग पर चल दिए, अब हमारा अगला पड़ाव अगस्त्यमुनि  मंदिर (Augstyamuni Temple) था जिसका वर्णन मैं इस यात्रा के अगले लेख में करूँगा !

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास एक अन्य मंदिर

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास एक अन्य मंदिर

कोटेश्वर महादेव मंदिर के पास एक अन्य मंदिर
क्यों जाएँ (Why to go Rudrprayag): अगर आपको धार्मिक स्थानों पर जाना अच्छा लगता है तो निश्चित तौर पर उत्तराखंड स्थित रुद्रप्रयाग में आकर आप निराश नहीं होंगे ! रुद्रप्रयाग में घूमने के लिए अनेकों जगहें है, शहर की भीड़-भाड़ से दूर 2-3 दिन आप यहाँ आराम से बिता सकते है ! 

कब जाएँ (Best time to go Rudrprayag): रुद्रप्रयाग आप साल भर किसी भी महीने में जा सकते है लेकिन बारिश के मौसम में उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएँ अक्सर होती रहती है इसलिए बारिश के दिनों में तो ना ही जाएँ ! अगर फिर भी बारिश के मौसम में जाने का विचार बने तो अतिरिक्त सावधानी बरतें !

कैसे जाएँ (How to reach Rudrprayag): दिल्ली से रुद्रप्रयाग की कुल दूरी लगभग 387 किलोमीटर है जिसे तय करने में आपको लगभग 10 से 11 घंटे का समय लगेगा ! दिल्ली से रुद्रप्रयाग जाने के लिए सबसे बढ़िया मार्ग हरिद्वार-ऋषिकेश-देवप्रयाग होते हुए है, दिल्ली से हरिद्वार तक 4 लेन राजमार्ग बना है जबकि ऋषिकेश से आगे पहाड़ी मार्ग शुरू हो जाता है और सिंगल मार्ग है ! आप चाहे तो हरिद्वार तक का सफ़र ट्रेन से कर सकते है और हरिद्वार से आगे का सफ़र बस या जीप से तय कर सकते है ! इसमें आपको थोडा अधिक समय लगेगा !

कहाँ रुके (Where to stay near Rudrprayag): रुद्रप्रयाग में रुकने के लिए आपको बहुत विकल्प मिल जायेंगे, किराया 700-800 रूपए से शुरू होकर हज़ारों रूपए तक जा सकता है ! यहाँ अलकनंदा के किनारे गढ़वाल मंडल का एक होटल भी है, आप अपने बजट के हिसाब से कोई भी होटल ले सकते है !

क्या देखें (Places to see near Rudrpayag): रुद्रप्रयाग एक धार्मिक स्थल है, यहाँ संगम स्थल पर रुद्रनाथ और चामुंडा देवी मंदिर देखने के लिए बढ़िया जगह है ! रुद्रप्रयाग से 4 किलोमीटर दूर चोपता मार्ग पर अलकनंदा नदी के किनारे कोटेश्वर महादेव मंदिर भी देखने के लिए एक बढ़िया स्थान है ! इसके अलावा 15 किलोमीटर दूर केदारनाथ मार्ग पर अगस्त्यमुनि मंदिर है !

अगले लेख में जारी...

केदारनाथ यात्रा
  1. दिल्ली से केदारनाथ की एक सड़क यात्रा (A Road Trip from Delhi to Kedarnath)
  2. उत्तराखंड के कल्यासौड़ में है माँ धारी देवी का मंदिर (Dhari Devi Temple in Uttrakhand)
  3. रुद्रप्रयाग में है अलकनंदा और मन्दाकिनी का संगम (Confluence of Alaknanda and Mandakini Rivers - RudrPrayag)
  4. रुद्रप्रयाग में है कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple in Rudrprayag)
  5. रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि मंदिर होते हुए सोनप्रयाग (A Road Trip from Rudrprayag to Sonprayag)

2 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रदीप जी , कोटेश्वर महादेव के सुन्दर दर्शन करा दिए आपने !! अलकनंदा का दृश्य तो अत्यंत सुंदर लग रहा है

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    1. धन्यवाद योगी जी, कोटेश्वर महादेव मंदिर से अलकनंदा नदी के दृश्य वास्तव में लाजवाब थे !

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