Tuesday, October 31, 2017

उत्तराखंड के कल्यासौड़ में है माँ धारी देवी का मंदिर (Dhari Devi Temple in Uttrakhand)

वीरवार, 12 अक्तूबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप हमारे गुडगाँव से हरिद्वार-ऋषिकेश होते हुए देवप्रयाग पहुँचने तक का विवरण पढ़ चुके है ! अब आगे, देवप्रयाग से चले तो 39 किलोमीटर चलने के बाद श्रीनगर पहुंचकर खाने के लिए रुके, यहाँ सड़क के किनारे ही गढ़वाल विश्वविद्यालय है और सड़क से थोड़ी दूरी पर एक मेडिकल कॉलेज भी है ! श्रीनगर में कॉलेज में पढने वाले लड़के-लड़कियों की अच्छी-खासी भीड़ देखने को मिली, यहाँ के माहौल को देखकर कोई कह नहीं सकता कि आप किसी मेट्रो शहर से दूर एक पहाड़ी क्षेत्र में है ! श्रीनगर एक बड़ा शहर है, यहाँ अच्छा-ख़ासा बाज़ार है, फल-फ्रूट से लेकर ज़रूरत का लगभग सभी सामान आपको मिल जायेगा ! गाडी सड़क के किनारे खड़ी करके हम गढ़वाल विश्वविद्यालय के सामने स्थित एक छोटे से होटल में खाना खाने के लिए पहुंचे ! खाने में रोटी, चने की सब्जी और आंवले, टमाटर, लहसुन और अदरक से बनी चटनी भी शामिल थी, सब्जी-रोटी तो ठीक-ठाक थी लेकिन चटनी का स्वाद लाजवाब था ! वैसे 30 रूपए प्रति थाली के हिसाब से बढ़िया भोजन था, सबने भरपेट खाया, यहाँ से फारिक होकर चले तो बगल में ही एक फल की दुकान से रास्ते में खाने के लिए कुछ सेब खरीद लिए !


dhari devi temple
अलकनंदा नदी में स्थित धारी माता का मंदिर (A View of Dhari Devi Temple in Uttrakhand)

श्रीनगर से थोडा आगे चलने पर अलकनंदा नदी में एक हाइड्रो प्रोजेक्ट का काम चल रहा है, इसलिए नदी के जल को काफी बड़े क्षेत्र में रोक कर झील का रूप दे दिया गया है ! यहाँ कुछ दूर तक सड़क के दाईं ओर तो ऊंचे-2 खड़े पहाड़ है जबकि बाईं ओर गहरी खाई में दिखाई देती अलकनंदा नदी है ! घुमावदार रास्तों से होते हुए हम रुद्रप्रयाग की ओर बढ़ते रहे, इसी मार्ग पर श्रीनगर से रुद्रप्रयाग की ओर 14 किलोमीटर चलने के बाद अलकनंदा नदी के बीचों-बीच धारी देवी का एक मंदिर (Dhari Devi Temple) बना है ! मुख्य मार्ग पर चलते हुए काफी दूर से ही नदी के बीच स्थित ये मंदिर दिखाई देता है ! थोड़ी आगे बढ़ने पर सड़क के किनारे ही मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग का प्रवेश द्वार भी है ! मैं पहले भी इस मार्ग से जा चुका हूँ लेकिन उस समय बस से यात्रा करने के कारण मुझे इस मंदिर में जाने का सौभाग्य नहीं मिला था ! आज अपनी गाडी से यात्रा कर रहे थे तो इस मंदिर में जाना बनता ही था ! मंदिर के प्रवेश द्वार से थोड़ी आगे एक मोड़ पर सड़क के किनारे गाडी खड़ी करके हमने वहीँ एक दूकान से पूजा सामग्री ली और मंदिर के प्रवेश द्वार की ओर चल दिए !


श्रीनगर शहर का एक दृश्य (A view of Srinagar, Uttrakhand)


धारी माता के मंदिर जाते हुए (On the Way to Dhari Devi Temple)

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धारी देवी जाने का प्रवेश द्वार (Entrance to Dhari Devi Temple)

बाज़ार में सजी पूजा सामग्री
मंदिर जाने के मुख्य प्रवेश द्वार पर बढ़िया चित्रकारी की गई है, द्वार के ऊपरी भाग में देवी-देवताओं की कुछ मूर्तियाँ भी बनाई गई है, जो द्वार की सुन्दरता में चार चाँद लगा देते है ! इस द्वार से अन्दर जाने पर मंदिर तक जाने के लिए सीमेंट का पक्का मार्ग बना है, मंदिर जाते हुए अधिकतर मार्ग ढलान वाला ही है ! मुख्य मार्ग से इस मंदिर की दूरी लगभग आधा किलोमीटर होगी ! चलिए, आगे बढ़ने से पहले थोड़ी जानकारी इस मंदिर के बारे में दे देता हूँ, माँ काली को समर्पित इस मंदिर में मूर्ति के ऊपरी भाग यानि सिर की पूजा होती है ! इन्हें स्थानीय लोग धारी देवी के नाम से पुकारते है, और इन लोगों में धारी माता की बहुत मान्यता  है ! लोगों का मानना है कि काले रंग के पत्थर से बनी ये मूर्ति दिन में तीन बार रूप बदलती है, प्रात: काल ये मूर्ति कन्या, दोपहर में युवती और शाम होते-2 ये वृद्धा का रूप धारण कर लेती है ! हालांकि, मैंने इस मंदिर में ज्यादा समय नहीं बिताया इसलिए इस बात को प्रमाणित करने के लिए मेरे पास साक्ष्य नहीं है ! वैसे, इस मूर्ति का निचला भाग गुप्तकाशी से 13 किलोमीटर दूर कालीमठ में स्थित है, जहाँ माता की काली रूप में पूजा की जाती है !

अगली बार कभी गुप्तकाशी (Guptkashi) जाना हुआ तो कालीमठ भी दर्शन के लिए ज़रूर जाऊंगा ! ऐसा माना जाता है कि कालीमठ मंदिर से मूर्ति का सिर वाला भाग बाढ़ में मन्दाकिनी नदी में बहकर धारी नाम के इस गाँव में आ गया था, जिसे स्थानीय लोगों ने मिलकर समीपवर्ती एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, मंदिर के सामने नदी के उस पार स्थित धारी गाँव के ब्राह्मण ही इस मंदिर के पुजारी है ! धारी गाँव (Dhari Village) द्वापर युग में ही बस गई थी इसलिए इसे “द्वापर की धारी(Dwapar Ki Dhaari) के नाम से भी जाना जाता है ! इसी गाँव के नाम पर देवी माँ के इस मंदिर का उपनाम धारी देवी प्रसिद्द हुआ ! इतिहासकारों द्वारा जुटाए गए साक्ष्यों के अनुसार माँ धारी इस स्थान पर लगभग 3000 वर्ष पूर्व प्रतिष्ठापित हो चुकी थी और तभी से ये धारी ग्रामवासियों की इष्ट और कुल देवी है ! ये पवित्र स्थान भारतवर्ष में स्थित 108 शक्तिपीठों में से एक है, माँ धारी देवी को उत्तराखंड की रक्षक के रूप में भी जाना जाता है ! कहते है कि इसी स्थान पर माँ काली की कृपा से महाकवि कालीदास को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी !

हर साल यहाँ चार धाम की यात्रा पर जाने वाले लाखों यात्री और नवरात्रों के दौरान भी हज़ारों श्रद्धालु अपनी मन्नत लेकर माता के दर्शन के लिए आते है ! 2013 में आई आपदा से पहले ये मूर्ति 20 मीटर ऊंचे एक चट्टान पर स्थापित थी ! श्रीनगर में चल रहे हाइड्रो प्रोजेक्ट के कारण 2013 में इस मंदिर को यहाँ चट्टान से हटाकर किसी दूसरी जगह पर स्थापित करना था ! कुछ लोग तो इस विस्थापन को ही 2013 में आई आपदा का कारण मानते है, इनका कहना है कि ये देवी का प्रकोप का ही परिणाम था क्योंकि जिस रात इस मंदिर का विस्थापन कार्य आरम्भ हुआ उसके अगली सुबह ही केदारनाथ में चोरा-बारी ताल के रास्ते प्राकृतिक आपदा आ गई ! इसके बाद धारी देवी के मंदिर को विस्थापित ना करके इसके मूल स्थान पर ही सीमेंट के ऊंचे-2 स्तंभों पर एक मंदिर बनाकर वहां स्थापित कर दिया गया ! चलिए, अब वापिस यात्रा पर चलते है, अब तक हम प्रवेश द्वार से निकलकर ढलान वाले मार्ग से होते हुए मंदिर के काफी करीब आ चुके थे, जहाँ आकर ये मार्ग ख़त्म होता है वहीँ से नदी के बीच में स्थित इस मंदिर के मुख्य भवन तक जाने के लिए लोहे का एक पुल बना है !


मंदिर मार्ग पर जाने का प्रवेश द्वार 

way to dhari mata
मंदिर की ओर जाने का मार्ग (Way to Dhari devi Temple)

dhari devi temple
मार्ग से दिखाई देता धारी माता का मंदिर (A view of Dhari Devi Temple)

मंदिर की ओर जाने का पुल (Bridge to Dhari Devi Temple)
मंदिर तक जाने वाले पुल के दोनों ओर लोहे की जालियां लगी है और इस पुल के ऊपरी भाग में शेड लगा है ताकि किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके ! जूते-चप्पल यहीं उतारकर अन्य श्रद्धालुओं की तरह हम भी इस पुल से होते हुए मंदिर की ओर चल दिए ! पुल के दोनों ओर लगी जालियों पर बंधी सैकड़ों घंटियाँ इस मंदिर के महत्त्व और मंदिर के प्रति लोगों की आस्था को प्रमाणित करती है, लोग श्रद्धा स्वरुप अपनी मन्नतों के लिए इस मंदिर में घंटियाँ चढ़ाते है ! पुल पार करके थोड़ी देर बाद हम मंदिर के मुख्य भवन में थे, मंदिर परिसर में अभी भी निर्माण कार्य चल रहा है और मंदिर के बाहरी भाग में रंग-रोगन का कार्य भी बाकि है ! पूजा सामग्री पुजारी को देकर हम हाथ जोड़कर मूर्ति के सामने बने पूजा स्थल में बैठ गए, मन को शांत करके कुछ देर माँ की भक्ति में ध्यान लगाया और अपनी केदारनाथ यात्रा के सफल होने की प्रार्थना की ! यहाँ बैठकर हमें जिस अलौकिक सुख की प्राप्ति हुई, उसे शब्दों में बयाँ कर पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है ! मंदिर परिसर में मूर्ति की फोटो खींचने पर प्रतिबंध लगा है इसलिए हमने मुख्य भवन के फोटो नहीं खींचे !


मंदिर के अन्दर लगा एक बोर्ड 

मंदिर का परिक्रमा मार्ग

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धारी माता की मूर्ति, विकिपीडिया के सौजन्य से लिया चित्र (An Idol of Dhari Devi, Source Wikipedia)
पंडित जी ने पूजा के बाद प्रसाद और कुछ अन्य सामग्री हमें लौटा दी, नारियल को भी फोड़कर माता को अर्पित करने के बाद हमें प्रसाद स्वरुप दे दिया ! इस मंदिर से देखने पर अलकनंदा नदी का एक शानदार दृश्य दिखाई देता है, मंदिर के बगल में ही कुछ दूरी पर एक झूला पुल भी बना है ! कुछ समय मंदिर के मुख्य भवन में बिताने के बाद हमने मंदिर की एक परिक्रमा की और पुल के रास्ते बाहर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! अपने-2 जूते पहनने के बाद हम झूला पुल पर गए, लोहे के मोटे-2 तारों पर टिके इस पुल को नदी के उस पार स्थित धारी गाँव और इसके आस-पास रहने वाले स्थानीय लोग प्रयोग में लाते है ! हम भी नदी के उस पार तक गए, इस तरह हमने झूला पुल पर से इस मंदिर के दिखाई देने वाले नजारों को भी देख लिया ! मंदिर से वापसी का मार्ग थोडा चढ़ाई भरा था, इस मार्ग के एक ओर कुछ फेरी वाले लॉकेट, कड़े, अंगूठियाँ और प्रयोग में लाई जाने वाली अन्य सामग्रियां बेच रहे थे ! वापिस आते हुए मार्ग के किनारे कुछ अन्य मंदिर भी थे, जिसमें से हम भैरवनाथ (Bhairavnath Temple) और हनुमान जी के मंदिर में गए !


धारी माता के मंदिर के पास लिया एक चित्र 

मंदिर की ओर जाने का पुल (A Bridge to Dhari Devi Temple)

मंदिर से दिखाई देता अलकनंदा नदी का एक दृश्य (A View of Alaknanda from Dhari Devi Temple)


झूला पुल कल्यासौड़
धारी देवी मंदिर के पास बना एक झूला पुल (A Bridge to Dhari Village)



वैसे पहाड़ी क्षेत्रों में हर छोटे-बड़े स्थानों पर देवी-देवताओं को स्थापित कर दिया जाता है, शांत जगह पर होने के कारण ऐसे किसी भी मंदिर में समय बिताना हमेशा एक सुखद अनुभव रहता है ! अपनी पहाड़ी यात्राओं के दौरान मैं ऐसे कई मंदिरों में गया हूँ जो बहुत ज्यादा विख्यात ना होने के बावजूद भी बहुत सुन्दर होते है ! कुछ देर बाद हम मंदिर के प्रवेश द्वार से होते हुए मुख्य मार्ग पर वापिस आ गए, यहाँ से अपनी गाडी में सवार होकर हमने सोनप्रयाग की ओर अपना सफ़र जारी रखा ! इसी के साथ मैं इस लेख पर विराम लगाता हुआ फिर से गाडी का स्टेरिंग पकड़कर आगे बढ़ रहा हूँ ! जल्द ही इस मार्ग पर पड़ने वाले किसी ऐसे ही धार्मिक स्थल पर पहुंचकर गाडी रोकूंगा और आपको एक नई जगह की सैर करवाऊंगा !


मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक और चित्र (A view from dhari devi entrance)
क्यों जाएँ (Why to go Dhari Devi Temple): अगर आपको धार्मिक स्थानों पर जाना अच्छा लगता है तो निश्चित तौर पर उत्तराखंड के कल्यासौड़ में स्थित धारी देवी के मंदिर आकर आप निराश नहीं होंगे ! प्रकृति प्रेमी लोगों के लिए भी यहाँ देखने के लिए काफी कुछ है, शहर की भीड़-भाड़ से दूर यहाँ कुछ सुकून के पल बिताये जा सकते है ! स्थानीय लोगों में तो धारी माता के मंदिर की बहुत मान्यता है !  

कब जाएँ (Best time to go Dhari Devi Temple): धारी माता के मंदिर आप साल भर किसी भी महीने में जा सकते है लेकिन बारिश के मौसम में उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएँ अक्सर होती रहती है इसलिए बारिश के दिनों में तो ना ही जाएँ ! अगर फिर भी बारिश के मौसम में जाने का विचार बने तो अतिरिक्त सावधानी बरतें !

कैसे जाएँ (How to reach Dhari Devi Temple): दिल्ली से धारी देवी के मंदिर की कुल दूरी लगभग 370 किलोमीटर है जिसे तय करने में आपको लगभग 9 से 10 घंटे का समय लगेगा ! दिल्ली से धारी देवी के मंदिर जाने के लिए सबसे बढ़िया मार्ग हरिद्वार-ऋषिकेश-देवप्रयाग होते हुए है, दिल्ली से हरिद्वार तक 4 लेन राजमार्ग बना है जबकि ऋषिकेश से आगे पहाड़ी मार्ग शुरू हो जाता है और सिंगल मार्ग है ! आप चाहे तो हरिद्वार तक का सफ़र ट्रेन से कर सकते है और हरिद्वार से आगे का सफ़र बस या जीप से तय कर सकते है ! इसमें आपको थोडा अधिक समय लगेगा !

कहाँ रुके (Where to stay near Dhari Devi Temple): धारी देवी मंदिर के आस-पास तो शायद ही आपको रुकने के लिए कोई होटल मिले ! लेकिन यहाँ से 14 किलोमीटर दूर श्रीनगर में आपको रुकने के लिए काफी विकल्प मिल जायेंगे ! श्रीनगर एक बड़ा शहर है जहाँ आपको अपनी ज़रूरत अनुसार छोटे-बड़े कई होटल मिल जाएँगे, होटल के लिए आपको 700 से 1000 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते है !

क्या देखें (Places to see near Dhari Devi Temple): धारी देवी मंदिर एक धार्मिक स्थल है, इस मंदिर के अलावा अलकनंदा नदी के किनारे बैठकर भी कुछ समय बिता सकते है ! इसके अलावा आप नदी के उस पार बसे धारी गाँव का भ्रमण भी कर सकते है, इस तरह आप पहाड़ी जीवन को करीब से जान पाएंगे ! रुद्रप्रयाग भी यहाँ से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, रुद्रप्रयाग में संगम के अलावा कुछ अन्य दर्शनीय स्थल भी है !

अगले भाग में जारी...

केदारनाथ यात्रा
  1. दिल्ली से केदारनाथ की एक सड़क यात्रा (A Road Trip from Delhi to Kedarnath)
  2. उत्तराखंड के कल्यासौड़ में है माँ धारी देवी का मंदिर (Dhari Devi Temple in Uttrakhand)
  3. रुद्रप्रयाग में है अलकनंदा और मन्दाकिनी का संगम (Confluence of Alaknanda and Mandakini Rivers - RudrPrayag)
  4. रुद्रप्रयाग में है कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple in Rudrprayag)
  5. रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि मंदिर होते हुए सोनप्रयाग (A Road Trip from Rudrprayag to Sonprayag)

4 comments:

  1. आज भी 30 rs में थाली मिलती है ग़ज़ब है..बढ़िया दर्शन धारी देवी के...बढ़िया पोस्ट

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    1. जी हाँ, प्रतीक भाई, पहाड़ों पर ऐसा ही है ! उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद !

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  2. जय माँ धारी.........अच्छी जानकारी

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    1. धन्यवाद महेश भाई, जय माँ धारी !!

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