Saturday, November 18, 2017

गौरीकुंड से रामबाड़ा की पैदल यात्रा (A Trek from Gaurikund to Rambada)

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

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दिनभर लम्बा सफ़र तय करके अच्छी थकान हो गई थी, इसलिए बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई ! यहाँ बढ़िया ठण्ड थी गनीमत थी कि कमरे में गर्म कम्बल रखे थे ! रात को जितनी देर भी सोये, बढ़िया नींद आई, सोने से पहले ही हमने सुबह 4 बजे का अलार्म लगा दिया था ! अलार्म बजने से पहले ही नींद खुल गई, उठकर अलार्म बंद किया और बारी-2 से नहाने-धोने में लग गए ! मैं तो ब्रश करते हुए ही नीचे जाकर होटल वाले को 2 बाल्टी गरम पानी देने का कह आया था ! सुबह सोनप्रयाग से केदारनाथ जाने वाले यात्रियों की अच्छी भीड़ रहती है इसलिए यहाँ के होटलों के नीचे बनी खान-पान की दुकानें भी सुबह 4 बजे ही खुल जाती है ! मैं ब्रश करने के बाद गरम पानी के आने का इन्तजार करता रहा, इस बीच देवेन्द्र और मेरे पिताजी बारी-2 से ठन्डे पानी से स्नान कर चुके थे ! मैं गरम पानी लेने दोबारा नीचे गया, यहाँ आकर देखा कि गरम पानी के नाम पर तो यहाँ लूट मचा रखी है, 1 बाल्टी गरम पानी में ये लोग 2 बाल्टी ठंडा पानी मिलाकर, 3 बाल्टी पानी बना देते है और तीन लोगों को दे देते है ! पानी ऐसा कि आप एक बूंद भी ठंडा पानी ना मिला सकें, होटल वाले ने मुझे कुछ देर इन्तजार करने को कहा !


केदारनाथ जाते हुए रास्ते में लिया एक चित्र
खिन्न होकर मैं वापिस ऊपर आ गया और ठन्डे पानी से ही नहा लिया, मेरे बाद अनिल ने भी ठन्डे पानी से ही स्नान किया ! ठन्डे पानी का असर ऐसा था कि काफी देर तक सिर में झुनझुनाहट रही, लेकिन जैसे-2 समय बीतता गया, हालात सामान्य हो गए ! होटल से निकलने से पहले हमने अपने साथ एक-2 गरम जैकेट भी रख लिए, सोनप्रयाग में सुबह से ही उद्घोषणा हो रही थी कि यात्रा पर जाने वाले लोग अपने वाहन पार्किंग स्थल में खड़ा करके ही यात्रा पर जाए ! हम भी यात्रा पर निकलने से पहले अपनी गाडी पार्किंग में खड़ी कर आए, पार्किंग से आए तो रजिस्ट्रेशन कार्यलय खुल चुका था ! यात्रा पर जाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए आपको अपना एक पहचान पत्र दिखाना होता है, 5 मिनट से भी कम समय लगा और हम सबकी रजिस्ट्रेशन पर्ची तैयार हो गई ! रजिस्ट्रेशन कार्यालय के बगल में ही एक बड़ी स्क्रीन पर केदारनाथ के मुख्य भवन और बीच में पड़ने वाले अलग-2 पडावों को सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से दिखाया जा रहा था ! यात्रा पर्ची लेकर वापिस चौराहे पर आए तो गौरीकुंड जाने के लिए जीपें तैयार खड़ी थी, हम चारों आधे से ज्यादा भरी हुई एक जीप में जाकर बैठ गए !


यात्रा पर्ची


डोली की दरों की लिस्ट
कुछ देर इन्तजार करने के बाद हमारी जीप चल दी, 20 मिनट का सफ़र तय करके हम गौरीकुंड पहुंचे !बिना समय गंवाए हम गौरीकुंड से चल पड़े, सवा छह बज रहे थे, अभी चारों तरफ अँधेरा ही था ! यहाँ गौरीकुंड में माँ पार्वती को समर्पित एक मंदिर है, इस मंदिर के बगल में ही गरम पानी का स्त्रोत भी है, गंधक के पानी का, इस पानी में नहाने से शरीर के त्वचा सम्बंधित रोगों से निजात मिल जाती है ! केदारनाथ की यात्रा शुरू करने वाले अधिकतर श्रद्धालु इन दोनों जगहों पर होकर ही आगे बढ़ते है, लेकिन हम इन जगहों को वापसी में देखेंगे ! सुबह-2 यहाँ अच्छी ठण्ड थी, जय भोलेनाथ का नारा लगाते हुए हमने गौरीकुंड से अपनी पैदल यात्रा शुरू की, और थोडा आगे बढ़ने पर लाठियां ले ली ! रास्ते में रूककर खड़े-2 आराम करने के लिए ये लाठियां बहुत आरामदायक होती है, अपने शरीर का भार इसपर डालकर आप बैठे बिना भी आराम कर सकते है, इस तरह आपका शरीर ठंडा भी नहीं पड़ता और ज्यादा थकान भी महसूस नहीं होती ! अगर आप हर जगह बैठकर आराम करेंगे तो कुछ समय बाद आपकी दोबारा उठने की हिम्मत नहीं होगी, और बार-2 बैठकर उठने से शरीर को भी ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है !


रास्ते से दिखाई देती मन्दाकिनी नदी
देवेन्द्र और अनिल ने लाठी के बिना ही यात्रा जारी रखने का निर्णय लिया, इसलिए मैंने दो लाठियां ही ली ! ऐसे पहाड़ी मार्ग पर चलते हुए कम मौसम ख़राब हो जाये, किसी को भी इसका अंदाजा नहीं होता, इसलिए लाठियां लेते समय मैंने 4 पोंचू भी ले लिए ! पोंचू पोलीथिन का एक रेनकोट होता है, जो आपको ठण्ड से तो नहीं लेकिन बारिश से बचा लेता है, आजकल तो ये हर पहाड़ी इलाके में मिल जाता है ! ऐसे पोंचू मैंने वैष्णो देवी में भी देखे थे, हल्का और छोटा होने के कारण आप इसे मोड़कर अपनी जेब में भी रख सकते है ! आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि गौरीकुंड 1982 मीटर की ऊँचाई पर है जबकि केदारनाथ मंदिर की समुद्र तल से ऊँचाई 3553 मीटर है, इस तरह 17 किलोमीटर की दूरी तय करने में आपको लगभग 1600 मीटर की ऊँचाई चढ़ना होता है, यानि प्रति किलोमीटर आपको लगभग 100 मीटर ऊपर चढ़ना है, पढने में तो ये चढ़ाई ज्यादा नहीं लगती लेकिन चलने में ये ठीक-ठाक चढ़ाई है ! गौरीकुंड से चलने के बाद हमारा पहला पड़ाव जंगलचट्टी था, जिसकी दूरी गौरीकुंड से 4 किलोमीटर है ! पक्का मार्ग बना है और चढ़ाई भी ज्यादा नहीं है, रास्ते में जगह-2 साइन बोर्ड लगे है, रास्ते में पड़ने वाले नजारों की तो जितनी तारीफ़ की जाए, वो कम है !


केदारनाथ जाने का पैदल मार्ग

दूर दिखाई देते बर्फ से ढके पहाड़



जंगलचट्टी जाते हुए सामान्य सी दिखने वाली चढ़ाई आपके हाथ-पैर खोलने के लिए काफी है ! इस मार्ग पर चलते हुए आपको रास्ते में सड़क पर जगह-2 झाड़ू लगाते हुए सफाईकर्मी दिख जायेंगे, यहाँ इतने खच्चर चलने के बावजूद मार्ग पर बढ़िया साफ़-सफाई देखने को मिली ! पता नहीं यहाँ हमेशा ही ऐसा रहता है या अगले सप्ताह प्रधानमन्त्री के आने के कारण इतनी जद्दोजेहद चल रही थी, वजह जो भी हो, लेकिन यहाँ आने वाले लोगों के लिए तो ये बढ़िया ही था ! केदारनाथ जाते हुए रास्ते में कई खूबसूरत झरने पड़ते है जिसके नीचे से गुजरते हुए ना चाहकर भी आपके ऊपर पानी की कुछ छींटे पड़ ही जाती है ! घुमावदार रास्तों से गुजरते हुए बीच-2 में नीचे घाटी में बहती हुई मन्दाकिनी नदी और दूर दिखाई देती बर्फ से लदी ऊंची-2 पहाड़ियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है, जो आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है ! जंगलचट्टी से पहले एक हेलीपेड आता है, सीमेंट से बना दूर तक फैला एक बड़ा चबूतरा है, वैसे इस हेलीपेड का प्रयोग अक्सर आपातकाल में ही किया जाता है ! यहाँ से पहाड़ियों के बीच दूर दिखाई देते बर्फ से ढके पहाड़ भी दिखाई देने शुरू हो जाते है !




जंगलचट्टी से थोडा आगे एक झरना

पहाड़ों के बीच से बहकर आती मन्दाकिनी नदी

पहाड़ों के बीच से बहकर आती मन्दाकिनी नदी


बर्फ से आच्छादित इन पहाड़ियों के पास ही केदारनाथ घाटी है और इसी घाटी में स्थित है केदारनाथ मंदिर ! इस मार्ग पर चलते हुए आपको रास्ते में लम्बे-2 बालों वाले पहाड़ी कुत्ते भी देखने को मिल जायेंगे, मैंने इन पहाड़ी कुत्तों के बारे में बहुत सुना है, कि अगर ऐसे 2-3 पहाड़ी कुत्ते हो तो ये तेंदुए को भी ललकार देते है ! पता नहीं इस बात में कितनी सच्चाई है, कोई पहाड़ी मित्र ये लेख पढ़ रहा हो तो इस बात की पुष्टि ज़रूर करें ! जंगलचट्टी में एक दुकान पर रूककर हमने चाय पी, केदारनाथ जाते हुए रास्ते में पड़ने वाले ऐसी पडावों पर केदार समिति की ओर से वाईफाई की मुफ्त सुविधा दी गई थी ! ताकि सिग्नल ना आने की सूरत में भी लोग अपने सगे-सम्बन्धियों को यात्रा से सम्बंधित जानकारी दे सकें ! इस क्षेत्र में बीएसएनएल के अलावा शायद ही किसी दुसरे मोबाइल कम्पनी के सिग्नल आते है और ऊपर केदार घाटी में तो बीएसएनएल का ही एकछत्र राज है ! सिग्नल की इस दिक्कत से निजात दिलाने के लिए ही केदारनाथ मार्ग पर जगह-2 ऐसे वाईफाई जोन बनाये गए है जहाँ आप इन्टरनेट की सुविधा का निशुल्क लाभ ले सकते है ! 

15-20 मिनट बाद चाय पीकर फारिक हुए तो यहाँ से चले, घाटी में बहती नदी के किनारे इतनी बड़ी-2 चट्टानें है कि इनके सामने सबकुछ एक तिनके के समान लगता है ! मार्ग काफी घुमावदार है, चढ़ाई भी धीरे-2 बढती रहती है, जंगलचट्टी से 2 किलोमीटर चलने के बाद हम भीमबली पहुंचे ! भीमबली तक हम नदी के बाईं ओर चलते रहे जबकि यहाँ से मुख्य मार्ग दो भागों में बंट जाता है, एक मार्ग नदी के बाईं ओर जाता है जबकि पुल पार करके एक अन्य मार्ग नदी के दाईं ओर भी जाता है ! पुल के उस पार जाने वाला मार्ग अपेक्षाकृत थोडा छोटा है, लेकिन दूर से ही दिखाई दे रहा था कि इस मार्ग पर खड़ी चढ़ाई थी ! इस मार्ग पर खच्चरों की तादात अच्छी-खासी थी, जो लोग पैदल केदारनाथ जाने में असमर्थ है वो या तो हेलीकाप्टर या फिर खच्चरों का सहारा लेते है ! बार-2 बताने जी ज़रूरत नहीं कि भीमबली से आगे बढ़ने पर आस-पास दिखाई दे रहे नजारों की भरमार थी ! हर एक मिनट में हमें घाटी में आसमान की ओर हेलीकाप्टर उड़ते हुए दिखाई दे रहे थे, भीमबली से एक किलोमीटर चलने के बाद हम रामबाड़ा पहुंचे !



केदारनाथ जाते हुए रास्ते में दिखाई देते दृश्य

केदारनाथ जाते हुए रास्ते में दिखाई देते दृश्य

खच्चरों पर लादकर ले जाते सामान


पहाड़ी इलाका होने के बावजूद भी यहाँ बिजली की अच्छी व्यवस्था थी, जगह-2 खम्बे लगे थे जिनके ऊपर सफ़ेद रोशनी देते बल्ब लगे थे, शायद यहाँ सौर ऊर्जा से बिजली की व्यवस्था की गई थी ! वैसे तो केदारनाथ जाने का मार्ग पक्का बना हुआ है लेकिन बीच में कहीं-2 टूटा हुआ है ! रास्ते में जहाँ कहीं भी यात्रा ठहराव आता, कुछ स्थायी-अस्थायी इमारतें भी दिख जाती, जगह-2 पीने के पानी की व्यवस्था भी थी ! इंसानों के लिए पानी की टूटियां लगी थी तो जानवरों के लिए हौद बने हुए थे, कुल मिलाकर यात्रा करते हुए पीने का पानी खरीदने की तो ज़रूरत नहीं पड़ती ! इस क्षेत्र में खच्चरों की तादात देखकर तो यही लगता है कि खच्चर यहाँ की जीवन रेखा है, इनके बिना स्थानीय लोगों का जीवन शायद इतना सरल ना हो ! खाने-पीने से लेकर भवन निर्माण सामग्री सभी वस्तुओं की ढुलाई इन खच्चरों के माध्यम से ही होती है ! केदारनाथ जाते हुए हमें रास्ते में हज़ारों खच्चर दिखे, कुछ लोगों को लेकर केदार घाटी की ओर जा रहे थे तो कुछ अन्य खान-पान और रोजमर्रा प्रयोग में लाई जाने वाली अन्य वस्तुओं को लेकर ऊपर जा रहे थे !


रामबाड़ा के बाद खड़ी चढ़ाई शुरू हो जाती है

रामबाड़ा के बाद खड़ी चढ़ाई

ऊपर से दिखाई देता घुमावदार मार्ग

ऊपर से दिखाई देता घाटी का एक दृश्य

ऊपर से दिखाई देता घाटी का एक दृश्य


धीरे-2 चलते हुए हम काफी ऊँचाई पर आ चुके थे, अब तो हमारे ऊपर सूरज की रोशनी भी अच्छी-खासी पड़ने लगी थी, जब नीचे घाटी में थे तो धूप ना पड़ने के कारण ठण्ड लग रही थी, लेकिन यहाँ बढ़िया धूप के कारण राहत थी ! देवेन्द्र हम सबसे आगे चल रहा था, रास्ते में जितने भी शॉर्टकट पड़ रहे थे, देवेन्द्र उन सबका बखूबी इस्तमाल कर रहा था ! शायद ही कोई ऐसा शॉर्टकट रहा हो जिसे देवेन्द्र ने छोड़ा हो, वाकई जिस तरह से वो पहाड़ पर चढ़ रहा था, ऐसा लग रहा था कि वो मैदानी इलाके में चल रहा हो ! जैसे-2 थकान बढती जा रही थी, हमारी चलने की गति भी कम होती जा रही थी ! मैं, पिताजी से थोडा ही पीछा चल रहा था, जबकि अनिल हम सबसे पीछे चल रहा था ! बर्फ से लदे पहाड़ अब सूर्य की रोशनी में चमक रहे थे, यहाँ चारों तरफ दिखाई दे रहे नज़ारे ही थे जो थकान होने के बावजूद हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरणा दे रहे थे ! हम रामबाड़ा में कुछ देर आराम करने के लिए रुके, भूख तो लगी थी और खाने का मन भी था लेकिन फिर सोचा अगर खाना खा लिया तो पहाड़ पर चढ़ाई करना मुश्किल हो जायेगा !



रास्ते से दिखाई देता एक दृश्य








यही सोचकर हल्का-फुल्का खाकर काम चलाया, कुछ समय यहाँ रूककर आराम किया और फिर यहाँ से आगे बढे ! ये लेख काफी बड़ा हो गया है इसलिए रामबाड़ा से आगे के सफ़र का वर्णन मैं इस यात्रा के अगले लेख में करूँगा !

क्यों जाएँ (Why to go Kedarnath): अगर आपको धार्मिक स्थानों पर जाना अच्छा लगता है तो निश्चित तौर पर उत्तराखंड में स्थित केदारनाथ आपके लिए एक बढ़िया जगह है ! केदारनाथ उत्तराखंड में स्थित चार धाम में से एक है यहाँ जाने के लिए सोनप्रयाग बेस कैम्प है और यहाँ जाते हुए रास्ते में घूमने के लिए अनेकों जगहें है, शहर की भीड़-भाड़ से दूर 2-3 दिन आप यहाँ आराम से बिता सकते है ! 

कब जाएँ (Best time to go Kedarnath): केदारनाथ के द्वार हर वर्ष मई में खुलकर दीवाली के बाद बंद हो जाते है ! साल के 6 महीने बर्फ़बारी के कारण केदारनाथ मंदिर बंद रहता है ! बहुत से लोग बर्फ़बारी के दौरान भी सोनप्रयाग आते है लेकिन इस दौरान बर्फ के अलावा उन्हें कुछ नहीं मिलता ! बारिश के मौसम में उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएँ अक्सर होती रहती है इसलिए इन दिनों भी यहाँ ना ही जाएँ ! अगर फिर भी इस दौरान जाने का विचार बने तो अतिरिक्त सावधानी बरतें !


कैसे जाएँ (How to reach Kedarnath): दिल्ली से केदारनाथ की कुल दूरी लगभग 481 किलोमीटर है, जिसमें से सोनप्रयाग तक की 460 किलोमीटर की दूरी आप निजी वाहन से भी तय कर सकते है ! सोनप्रयाग से आगे 5 किलोमीटर गौरीकुंड है जहाँ जाने के लिए सोनप्रयाग से जीपें चलती है ! अंतिम 17 किलोमीटर की यात्रा आपको पैदल ही तय करनी होती है ! सोनप्रयाग तक आपको लगभग 15 से 16 घंटे का समय लगेगा, सोनप्रयाग से आगे पैदल यात्रा करने में 7-8 घंटे लगते है ! दिल्ली से सोनप्रयाग जाने के लिए सबसे बढ़िया मार्ग हरिद्वार-देवप्रयाग-रुद्रप्रयाग होते हुए है, दिल्ली से हरिद्वार तक 4 लेन राजमार्ग बना है जबकि ऋषिकेश से आगे पहाड़ी मार्ग शुरू हो जाता है और सिंगल मार्ग है ! आप चाहे तो हरिद्वार तक का सफ़र ट्रेन से कर सकते है और हरिद्वार से आगे का सफ़र बस या जीप से तय कर सकते है ! इसमें आपको थोडा अधिक समय लगेगा !


कहाँ रुके (Where to stay near Kedarnath): केदारनाथ में रुकने के लिए कई होटल है जहाँ रुकने के लिए आपको 500-600 रूपए खर्च करने पड़ेंगे ! हेलीपेड के पास डोरमेट्री की व्यवस्था भी है जहाँ प्रति व्यक्ति आपको 600-700 रूपए देने होंगे ! केदारनाथ में खान-पान के बहुत ज्यादा विकल्प नहीं है इसलिए सुख सुविधाओं की बहुत ज्यादा उम्मीद ना करें !


क्या देखें (Places to see near Kedarnath): केदारनाथ चार धामों में से एक धार्मिक स्थल है, यहाँ 1 किलोमीटर की दूरी पर भैरवनाथ मंदिर है, 4 किलोमीटर दूरी पर चोराबारी ताल भी है, चोराबारी ताल से आगे ग्लेशियर शुरू हो जाते है ! सोनप्रयाग में वासुकी गंगा और मन्दाकिनी नदियों का संगम होता है ! सोनप्रयाग से 13 किलोमीटर दूर त्रियुगीनारायण का मंदिर है, जबकि सोनप्रयाग से 5 किलोमीटर दूर गौरीकुंड में भी 
पार्वती माता का मंदिर है !

अगले लेख में जारी...

केदारनाथ यात्रा
  1. दिल्ली से केदारनाथ की एक सड़क यात्रा (A Road Trip from Delhi to Kedarnath)
  2. उत्तराखंड के कल्यासौड़ में है माँ धारी देवी का मंदिर (Dhari Devi Temple in Uttrakhand)
  3. रुद्रप्रयाग में है अलकनंदा और मन्दाकिनी का संगम (Confluence of Alaknanda and Mandakini Rivers - RudrPrayag)
  4. रुद्रप्रयाग में है कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple in Rudrprayag)
  5. रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि मंदिर होते हुए सोनप्रयाग (A Road Trip from Rudrprayag to Sonprayag)
  6. गौरीकुंड से रामबाड़ा की पैदल यात्रा (A Trek from Gaurikund to Rambada)
  7. रामबाड़ा से केदारनाथ की पैदल यात्रा (A Trek from Rambada to Kedarnath)
  8. केदार घाटी में स्थित भैरवनाथ मंदिर (Bhairavnath Temple in Kedar Valley)
  9. केदारनाथ धाम की संध्या आरती (Evening Prayer in Kedarnath)

6 comments:

  1. रामबाडा तो देखा था ये रामबाणा कहाँ से आ गया...
    आपदा के बाद किसी जगह का नाम रखा है क्या...

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    1. संदीप भाई, गलती बताने के लिए धन्यवाद ! इस गलती को अब को सुधार दिया है !

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  2. शानदार
    यात्रा बहुत अच्छी चल रही है
    ओर संदीप भाई आपका जवाब नही
    प्रणाम स्वीकार कीजिये

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    1. धन्यवाद महेश जी !

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  3. हर हर महादेव केदारनाथ की यात्रा जितनी बार की जाए कम होगी

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