Sunday, April 30, 2017

दरवान सिंह म्यूज़ीयम और ताड़केश्वर महादेव मंदिर (A Visit to Darwan Singh Museum and Tarkeshwar Mahadev Temple)

रविवार, 26 मार्च 2017

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

ज़हरिखाल में रात को अच्छी-ख़ासी ठंड थी, गनीमत थी कि कमरे में कंबल रखे थे ! सुबह अलार्म बजने पर सोकर उठे, खिड़की से बाहर झाँककर देखा तो अभी अंधेरा ही था ! एक नज़र सड़क के उस पार होटल के बोर्ड पर भी दौड़ाई जहाँ पिछले साल तेंदुआ आया था, शुक्र है अभी वहाँ कोई नहीं था ! फोन चार्जिंग में लगाने के बाद सब बारी-2 से नित्य क्रम में लग गए, थोड़ी देर में रोशनी हुई तो मैं और शशांक नीचे सड़क पर टहलने आ गए ! 10-15 मिनट बाद वापिस ऊपर गए और अगले एक घंटे में हम दोनों नहा-धोकर तैयार हो चुके थे ! हितेश देरी से सोकर उठा था इसलिए अभी तैयार होने में लगा था ! हम दोनों खाली बैठे थे तो बरामदे में आकर वहीं रखी एक गुलेल से दूर दिखाई दे रहे एक खंबे पर निशाना लगाने लगे ! फिर चाय पीकर होटल का बिल चुकाने के बाद सवा सात बजे तक हम तीनों होटल से निकलकर लैंसडाउन के लिए प्रस्थान कर चुके थे ! ज़हरिखाल से लैंसडाउन में प्रवेश करते ही 100 रुपए का प्रवेश शुल्क अदा किया, ये शुल्क प्रतिदिन देना होता है, मतलब एक दिन में अगर आपने एक बार शुल्क दे दिया तो आप दिनभर अनगिनत बार आ-जा सकते हो, लेकिन अगले दिन आपको फिर से ये शुल्क अदा करना होगा !
ताड़केश्वर महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार (Tarkeshwar Mahadev Temple, Lansdowne)
लैंसडाउन की घुमावदार पहाड़ियों से होते हुए जब हम टिप इन टॉप की ओर जा रहे थे तो मार्ग में हमने अनगिनत फ़ौजियों को मार्ग पर दौड़ लगाते देखा ! ये इन सैनिकों की नियमित दिनचर्या का एक हिस्सा है, लैंसडाउन में प्रवेश करने के बाद सबसे पहले हम यहाँ के सबसे ऊँचे स्थान टिप इन टॉप पर जाकर रुके, यहाँ आने वालों के लिए ये स्थान मुख्य आकर्षण का केंद्र रहता है ! यहाँ से बलखाती सड़कों का दूर तक का नज़ारा एकदम साफ दिखाई देता है, पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके हम टिप इन टॉप जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! यहाँ बगल में ही गढ़वाल मंडल का एक गेस्ट हाउस भी है, जहाँ रुकने के लिए अग्रिम आरक्षण करवाना ही लाभप्रद रहता है ! क्योंकि आज भी जब हमने पता किया तो ये खाली नहीं था, मैं जब पिछली बार लैंसडाउन आया था तब भी यहाँ रुकने के लिए हमें कमरा नहीं मिला था ! टिप इन टॉप जाते हुए रास्ते में बुरांश के सुंदर फूल खिले हुए थे, कुछ फोटो हमने रास्ते में लिए और कुछ व्यू पॉइंट पर जाकर ! बढ़िया धूप खिली थी इसलिए आँखें भी ठीक से नहीं खुल पा रही थी ! 

साफ मौसम होने का ये फ़ायदा तो था कि व्यू पॉइंट से दूर तक की पहाड़ियाँ दिखाई दे रही थी,10-15 मिनट यहाँ बिताकर हमने वापसी की राह पकड़ी ! यहाँ से थोड़ी दूरी पर ही संतोषी माता का एक मंदिर भी है, इसके अलावा रास्ते में एक चर्च भी पड़ता है जो आज बंद था ! ये सेंट मैरी चर्च है जिसका निर्माण 1895 में हुआ था, प्रार्थना के लिए ये केवल रविवार हो ही खुलता है, इसलिए हम इस चर्च के अंदर नहीं जा सके ! कोई बात नहीं, बाहर से ही कुछ फोटो लिए और फिर दरवान सिंह म्यूज़ीयम देखने के लिए ठंडी सड़क की ओर चल दिए ! साढ़े आठ बजे हम म्यूज़ीयम के प्रवेश द्वार के सामने पहुँच चुके थे, थोड़ी आगे बढ़े तो एक खुला मैदान था, यहाँ अपनी गाड़ी खड़ी करके वापिस प्रवेश द्वार की ओर चल दिए ! सामने ही एक बड़ा मैदान था जहाँ इस समय परेड चल रही थी, हम खड़े ही हुए थे कि द्वार के पास खड़े एक सैनिक हमें देखकर बोला, म्यूज़ीयम 9 बजे खुलेगा अभी आप अंदर नहीं जा सकते ! हमने कहा ठीक है, अंदर नहीं जा सकते लेकिन यहाँ खड़े होकर परेड तो देख सकते है, उसे इस बात से कोई आपत्ति नहीं थी ! 

उसने ये निर्देश देते हुए हामी में सिर हिलाया कि यहाँ फोटो खींचने पर पाबंदी है इस बात का ध्यान रखना ! चलो ठीक है, जब तक म्यूज़ीयम नहीं खुलता, परेड ही देख लेते है ! ये तो आप जानते ही है कि लैंसडाउन एक छावनी क्षेत्र है, इसलिए यहाँ सैनिकों के प्रशिक्षण से लेकर नियमित परेड और अन्य गतिविधियाँ चलती ही रहती है ! इस समय भी मैदान पर 250-300 जवान परेड कर रहे थे, इनमें से कुछ सैनिकों को नियमों की अवहेलना करने के कारण सज़ा भी मिली हुई थी ! 5-6 जवान फ्रॉग जंप मार रहे थे, तो कुछ बंदूक लेकर मैदान के चक्कर लगा रहे थे, कुछ लोग गोल-2 घूमकर कलाबाज़ी मार रहे थे तो कुछ अन्य दूसरी सज़ा भुगत रहे थे ! सच में बहुत सख़्त नियम होते है सेना में, इन्हें देखकर ही अच्छे-2 लोगों के पसीने निकल जाए ! इसके बावजूद परेड का जो नज़ारा यहाँ से दिखाई दे रहा था वो वाकई लाजवाब था ! इन सैनिकों की हिम्मत और जोश देखकर यहाँ से हटने का मन ही नहीं करता, फिर जब थोड़ी देर में म्यूज़ीयम खुल गया तो हम यहाँ से आगे बढ़े और म्यूज़ीयम के प्रवेश द्वार की ओर चल दिए ! 

आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि म्यूज़ीयम में आप फोन तो ले जा सकते है लेकिन फोटोग्राफी पूर्ण रूप से वर्जित है ! अब सेना के नियम है तो पालन भी करना पड़ता है, प्रवेश द्वार पर बैठे एक सैनिक से 60 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से 3 प्रवेश टिकट लिए और अंदिर दाखिल हो गए ! यही जवान यहाँ बैठा हुआ सीसीटीवी के माध्यम से अंदर की गतिविधियों पर नज़र रखे हुए था ! इस म्यूज़ीयम का नाम दरवान सिंह नेगी के नाम पर रखा गया है जो ब्रिटिश काल में गढ़वाल राइफल्स की पहली बटालियन में नायक के पद पर पदस्थ थे ! प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होनें अपने पराक्रम से सबको प्रभावित किया, फलस्वरूप उन्हें तत्कालीन सर्वोच्च सेना पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस से नवाजा गया ! म्यूज़ीयम का उद्घाटन 1983 में किया गया और फिर इसमें गढ़वाल राइफल्स से संबंधित दुर्लभ वस्तुओं को संग्रहित किया गया ! गढ़वाल रेजीमेंट के इतिहास को भी इस म्यूज़ीयम में बखूबी दिखाया गया है, इस रेजीमेंट की स्थापना 1887 में हुई थी दोनों विश्व युद्धों में इस रेजीमेंट ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया ! 

वर्तमान में इस रेजीमेंट में 19 बटालियन है जिसमें 25000 सैनिक है ! म्यूज़ीयम में प्रवेश करते ही गढ़वाल रेजीमेंट के जवानों की उपलब्धियों को दीवारों पर लगे चित्रो और लेखों के माध्यम से बारीकी से समझाया गया है ! अपने शौर्य और पराक्रम से गढ़वाल रेजीमेंट के जवानों ने जो सम्मान और पुरस्कार अर्जित किए है उनकी जानकारी भी इस म्यूज़ीयम में दी गई है ! कोई युद्ध हो, प्राकृतिक आपदा हो, या शांति स्थापित करने से लेकर रण कौशल, किसी भी क्षेत्र में गढ़वाल रेजीमेंट के जवानों के योगदान को कमतर नहीं आँका जा सकता ! ये जवान मातृभूमि और देशवासियों को अपनी सेवाएँ देने के लिए सदैव तत्पर रहते है ! म्यूज़ीयम में गढ़वाल रेजीमेंट के सिपाहियों की पोशाकें, रेजीमेंट से संबंधित किताबें और चित्र, पुरस्कार, युद्ध के दौरान विपक्षियों से छीने गए हथियार वगेरह शामिल है ! दीवारों पर अलग-2 समय घटी घटनाओं का ज़िक्र किया गया है एक तरफ 1991 में उत्तरकाशी में आए भूकंप का चित्रण किया गया है तो एक जगह कारगिल युद्ध से संबंधित जानकारी दी गई है ! 

इन सभी घटनाओं में गढ़वाल रेजीमेंट के योगदान का बखूबी चित्रण किया गया है ! वाकई, ये प्रदर्शनी देख कर किसी भी भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाए ! गढ़वाल रेजीमेंट का विश्व के अन्य देशों की सेनाओं के साथ साझा युद्ध अभ्यास का चित्रण भी इस प्रदर्शनी में किया गया है ! एक कोने में उत्तराखंड के चारों धाम और कुछ अन्य दर्शनीय स्थानों का चित्रण भी किया गया है ! हम यहाँ एक घंटे से अधिक समय तक रहे, और इस समय का सबने भरपूर आनंद लिया ! बस एक ही मलाल रहा कि काश अंदर फोटोग्राफी की अनुमति भी होती तो अलग ही बात होती ! जब पूरा म्यूज़ीयम घूम लिए तो हम सब बाहर आ गए, मैदान में अभी भी परेड चल रही थी ! हमने अपनी गाड़ी ली और गाँधी चौक चल दिए ताकि पेट-पूजा करके आगे का सफ़र जारी रख सके ! गाँधी चौक पर एक दुकान में जाकर चाय-समोसे और जलेबी से नाश्ता किया ! वापिस आकर गाड़ी में बैठे और लैंसडाउन से बाहर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! 

घुमावदार रास्तों से होते हुए 4-5 किलोमीटर चले तो एक तिराहा आया, यहाँ से दाएँ जाने वाला मार्ग दुग्गड़ा चला जाता है जबकि बाईं ओर जाता हुआ मार्ग ताड़केश्वर महादेव मंदिर को चला जाता है ! यहाँ से मंदिर की दूरी 33 किलोमीटर है, और पूरा पहाड़ी रास्ता है ! 1800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित ये मंदिर लैंसडाउन घूमने आने वाले लोगों के लिए देखने की एक शानदार जगह है ! देवदार के ऊँचे-2 पेड़ों से घिरे इस मंदिर का बहुत महत्व है ! ताड़केश्वर धाम का मंदिर 1500 साल पुराना सिद्ध स्थान है, ताड़केश्वर एक सिद्ध पुरुष थे और जन्म से ही संत थे ! वे शिव स्वरूप थे और भगवान शिव के ही तेजोमयी अंश से प्रकट हुए थे ! वे दिगंबर वेषधारी थे जो अपने शरीर पर भस्म लगा कर एक हाथ में त्रिशूल और चिमटा तथा दूसरे हाथ में डमरू बजाते हुए अपने ईष्ट देवता शिव का जाप करते हुए इधर-उधर विचरण किया करते थे ! इस दौरान उन्हें मार्ग में जब कोई मानव ग़लत काम करते हुए या निज स्वार्थ के लिए जानवरों को पीटते हुए दिख जाता तो वो उसे ज़ोर से आवाज़ देकर फटकारते थे ! ऐसे लोगों को वो आर्थिक और शारीरिक दंड देने की चेतावनी देते थे ! 

इसके अलावा जो उनका वास्तविक रूप पहचान कर उनकी शरण में जाता था उसे मनचाहा फल भी देते थे ! यह सिद्ध पुरुष मानव को ग़लत काम करने पर ताड़ते थे, ताड़ने का अर्थ होता है डांटना, फटकारना, या पीटना ! इसलिए वह जन समुदाय में ताड़केश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो गए ! ताड़केश्वर महादेव के इस मंदिर को लेकर कई अन्य कहावतें भी है लेकिन उनमें कितनी सच्चाई है इसका किसी को नहीं पता ! जो जानकारी मैं आपको दे रहा हूँ वो मैने मंदिर के बाहर लगे एक बोर्ड पर पढ़ी थी ! लैंसडाउन से बाहर आकर पड़ने वाले तिराहे से हम ताड़केश्वर मंदिर जाने वाले मार्ग पर चल दिए, इस रास्ते पर अनगिनत मोड़ है, बीच-2 में कहीं रास्ता सँकरा भी हो जाता है ! घुमावदार रास्तों से होते हुए हम मंदिर की ओर बढ़े जा रहे थे रास्ते में 2-3 जगहों पर रुककर हमने फोटो भी खींचे ! इस मार्ग पर पड़ने वाले कुछ गाँव है चमेटा, सिसॅल्डी, चमकोट, और चखुलियाखाल ! चखुलियाखाल से मुख्य मार्ग को छोड़कर एक मार्ग बाईं ओर चली जाती है यही मार्ग मंदिर तक जाता है, इस मोड़ से मंदिर की दूरी 5 किलोमीटर है ! 

हम मुख्य मार्ग को छोड़कर इसी मार्ग पर चल दिए, मुख्य मार्ग की अपेक्षा ये काफ़ी सँकरा और सुनसान है जगह-2 सड़क टूटी भी हुई है और सड़क के किनारे गहरी खाई है ! यहाँ ज़रा भी चूके तो कोई भी दुर्घटना हो सकती है, यहाँ अगर लापरवाही की तो अंजाम बहुत बुरा होगा ! घने जंगल से घिरे इस मार्ग पर इक्का-दुक्का गाड़ियाँ ही आ रही थी ! कभी-2 तो ये भी लग रहा था कि शायद आज इस मंदिर पर जाने वाले हम पहले यात्री तो नहीं, बड़ी सावधानी से हमने ये मार्ग पार किया ! मंदिर से 2 किलोमीटर पहले एक गाँव है गुंडलखेत, यहाँ स्थानीय लोग बोतलों में भरकर बुरांश और माल्टे का रस बेच रहे थे ! एक स्थानीय व्यक्ति से रास्ता पूछकर आगे बढ़े तो थोड़ी देर में ही हम मंदिर के पास बने पार्किंग स्थल पर पहुँच गए ! यहाँ पहले से ही 3-4 गाड़ियाँ और 2-3 बसें खड़ी थी ! बाद में पता चला कि कोटद्वार से कॉलेज के कुछ छात्र यहाँ आए थे ! हमने गाड़ी पार्किंग में खड़ी करके मंदिर में चढ़ाने का प्रसाद लिया और मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर हो लिए ! पार्किंग से मंदिर की दूरी 400 मीटर के आस-पास है, जिसके लिए एक पक्का मार्ग बना है, ऊँचा-नीचा मार्ग है इसलिए किनारे रेलिंग भी लगी है ! 

आगे जाने पर एक मार्ग मंदिर की धर्मशाला की ओर चला जाता है जबकि दूसरा मार्ग मंदिर के मुख्य भवन तक जाता है ! इसी मार्ग पर चलते हुए मंदिर के सामने वाले मैदान में पहुँचे, यहाँ कुछ गाएँ घास चर रही थी, जबकि कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ ग्रुप बनाकर मैदान में बैठे थे ! हम मंदिर की ओर बढ़ते रहे, यहाँ प्रवेश द्वार के पास दोनों ओर हज़ारों घंटियाँ बँधी हुई है कहते है लोग यहाँ आकर मन्नत माँगते है और मन्नत पूरी होने पर यहाँ घंटिया चढ़ाते है ! मंदिर में घूमते हुए आधे घंटे में पूजा करके फारिक हुए तो बाहर आकर मैदान के पास एक लोहे की सीट पर बैठ गए, मंदिर में कोई भीड़ नहीं थी इसलिए आराम से पूजा की ! मंदिर प्रांगण में अलग-2 देवी-देवताओं की मूर्तियाँ लगाई है वैसे ये मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, मंदिर प्रांगण में एक शिवलिंग भी है ! जानकारी के लिए बता दूँ कि मंदिर की अपनी धर्मशाला भी है जहाँ लोगों के रुकने की व्यवस्था है, इस समय तो मुझे धर्मशाला में कोई मिला नहीं इसलिए ज़्यादा जानकारी नहीं जुटा सका ! 

आधा घंटा यहाँ बिताने के बाद हमने वापसी की राह पकड़ी, हमें आज ही घर वापसी करनी थी, इसलिए यहाँ से चले तो ज़्यादा कहीं रुके नहीं ! जिस रास्ते से हम मंदिर तक गए थे वापसी में भी उसी रास्ते से दुग्गड़ा के लिए चले, लेकिन दुग्गड़ा पहुँचने से पहले एक जगह गाड़ी पन्चर हो गई ! 10 मिनट टायर बदलने में लगे, फिर 4 बजे दुग्गड़ा से चले तो कोटद्वार, नजीबाबाद होते हुए बिजनोर पहुँचे ! 7 बजे खतौली को पार करके हरिद्वार-दिल्ली राजमार्ग पर जा मिले, आधे घंटे इस राजमार्ग पर चलने के बाद एक ढाबे पर खाने के लिए रुके ! यहाँ से गाड़ी चलाने की ज़िम्मेदारी हितेश ने संभाल ली, मेरठ-नोयडा पार करते हुए रात को साढ़े दस बजे हम अपने घर पलवल पहुँचे ! आज कुल 400 किलोमीटर के आस-पास गाड़ी चली, अच्छी-ख़ासी थकान भी हो गई थी, इसलिए लेटते ही नींद आ गई ! सुबह उठकर दफ़्तर भी जाना है तो दोस्तों ये सफ़र यहीं ख़त्म करते है, जल्द ही आपको किसी नए सफ़र पर लेकर चलूँगा !
ज़हरिखाल में हमारा रुकने का ठिकाना

टिप एन टॉप की ओर जाते हुए

टिप एन टॉप से दिखाई देता घाटी का नज़ारा

टिप एन टॉप में बने गेस्ट हाउस

लैंसडाउन में चर्च के सामने

टिप एन टॉप से वापिस आते हुए

दरवान सिंह म्यूज़ीयम जाने का मार्ग


लैंसडाउन का गाँधी चौक

ताड़केश्वर मंदिर जाने का मार्ग 

ताड़केश्वर मंदिर जाने का मार्ग 

ताड़केश्वर मंदिर जाने का मार्ग 

बाएँ जाने वाला मार्ग ताड़केश्वर मंदिर जाता है

ताड़केश्वर मंदिर के पास पार्किंग 

मंदिर की ओर जाने का मार्ग

मंदिर की ओर जाने का मार्ग

मंदिर की ओर जाने का मार्ग


मंदिर प्रांगण में बँधी घंटिया









मंदिर से वापिस आते हुए



मंदिर से वापिस आते हुए
क्यों जाएँ (Why to go Lansdowne): अगर आप साप्ताहिक अवकाश (Weekend) पर दिल्ली की भीड़-भाड़ से दूर प्रकृति के समीप कुछ समय बिताना चाहते है तो लैंसडाउन आपके लिए एक बढ़िया विकल्प है ! इसके अलावा अगर आप प्राकृतिक नज़ारों की चाह रखते है तो आप निसंकोच लैंसडाउन का रुख़ कर सकते है ! अगर दिसंबर-जनवरी में पहाड़ों पर बर्फ देखने की चाहत हो तो भी लैंसडाउन चले आइए, दिल्ली के सबसे नज़दीक का हिल स्टेशन होने के कारण लैंसडाउन लोगों की पसंदीदा जगहों में से एक है !

कब जाएँ (Best time to go Lansdowne): लैंसडाउन आप साल भर किसी भी महीने में जा सकते है बारिश के दिनों में तो यहाँ की हरियाली देखने लायक होती है लेकिन अगर आप बारिश के दिनों में जा रहे है तो मेरठ-बिजनौर-नजीबाबाद होकर ही जाए ! गढ़मुक्तेश्वर वाला मार्ग बिल्कुल भी ना पकड़े, गंगा नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण नेठौर-चांदपुर का क्षेत्र जलमग्न रहता है ! वैसे, यहाँ सावन के दिनों में ना ही जाएँ तो ठीक रहेगा और अगर जाना भी हो तो अतिरिक्त समय लेकर चलें क्योंकि उस समय कांवड़ियों की वजह से 
मेरठ-बिजनौर मार्ग अवरुद्ध रहता  है !

कैसे जाएँ (How to Reach Lansdowne): दिल्ली से लैंसडाउन की कुल दूरी 260 किलोमीटर है जिसे तय करने में आपको लगभग 7 से 8 घंटे का समय लगेगा ! दिल्ली से लैंसडाउन जाने के लिए सबसे बढ़िया मार्ग मेरठ-बिजनौर-नजीबाबाद होते हुए है, दिल्ली से खतौली तक 4 लेन राजमार्ग बना है जबकि खतौली से आगे कोटद्वार तक 2 लेन राजमार्ग है ! इस पूरे मार्ग पर बहुत बढ़िया सड़क बनी है, कोटद्वार से आगे पहाड़ी मार्ग शुरू हो जाता है !

कहाँ रुके (Where to stay in Lansdowne): लैंसडाउन एक पहाड़ी क्षेत्र है यहाँ आपको छोटे-बड़े कई होटल मिल जाएँगे, एक दो जगह होमस्टे का विकल्प भी है मैने एक यात्रा के दौरान जहाँ होमस्टे किया था वो है अनुराग धुलिया 9412961300 ! अगर आप यात्रा सीजन (मई-जून) में लैंसडाउन जा रहे है तो होटल में अग्रिम आरक्षण (Advance Booking) करवाकर ही जाएँ ! होटल के लिए आपको 800 से 2500 रुपए तक खर्च करने पड़ सकते है ! यहाँ गढ़वाल मंडल का एक होटल भी है, हालाँकि, ये थोड़ा महँगा है लेकिन ये सबसे बढ़िया विकल्प है क्योंकि यहाँ से घाटी में दूर तक का नज़ारा दिखाई देता है ! सूर्योदय और सूर्यास्त देखने के लिए भी ये शानदार जगह है !


कहाँ खाएँ (Where to eat in Lansdowne): लैंसडाउन में छोटे-बड़े कई होटल है, जहाँ आपको खाने-पीने का सभी सामान आसानी से मिल जाएगा ! अधिकतर होटलों में खाना सादा ही मिलेगा, बहुत ज़्यादा विकल्प की उम्मीद करना बेमानी होगा !


क्या देखें (Places to see in Lansdowne): लैंसडाउन में देखने के लिए कई जगहें है जैसे भुल्ला ताल, दरवान सिंह म्यूज़ीयम, टिप एन टॉप, और एक चर्च भी है ! 
टिप एन टॉप के पास संतोषी माता का मंदिर भी है ! चर्च सिर्फ़ रविवार के दिन खुलता है जबकि म्यूज़ीयम रोजाना सुबह 9 बजे खुलकर दोपहर को बंद हो जाता है, फिर शाम को 3 खुलता है, अगर आप लैंसडाउन आए है तो ये म्यूज़ीयम ज़रूर देखिए ! लैंसडाउन से 35 किलोमीटर दूर ताड़केश्वर महादेव मंदिर भी है, लैंसडाउन से एक-डेढ़ घंटे का सफ़र तय करके जब आप ताड़केश्वर महादेव मंदिर पहुँचोगे तो मंदिर के आस-पास के नज़ारे देखकर आपकी सारी थकान दूर हो जाएगी ! चीड़ के घने पेड़ो के बीच बने इस मंदिर की सुंदरता देखते ही बनती है !

समाप्त...

ऋषिकेश लैंसडाउन यात्रा
  1. दिल्ली से ऋषिकेश की सड़क यात्रा (A Road Trip to Rishikesh)
  2. ऋषिकेश में रिवर राफ्टिंग (River Rafting in Rishikesh)
  3. देवप्रयाग – भागीरथी और अलकनंदा का संगम (A Morning in Devprayag)
  4. देवप्रयाग से पौडी होते हुए लैंसडाउन (A Road Trip from Devprayag to Lansdowne)
  5. दरवान सिंह म्यूज़ीयम और ताड़केश्वर महादेव मंदिर (A Visit to Darwan Singh Museum and Tarkeshwar Mahadev Temple)

2 comments: