Thursday, May 25, 2017

उदयपुर का सिटी पैलेस, रोपवे और पिछोला झील (City Palace, Ropeway and Lake Pichola of Udaipur)

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !

यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दिल्ली से उदयपुर पहुँचने के बाद स्थानीय भ्रमण पर निकल चुके है ! उदयपुर में घूमते हुए अब तक हम "फ़तेह सागह झील" (Fateh Sagar Lake) और "सहेलियों की बाड़ी" (Saheliyon ki Bari) देख चुके है और फिलहाल "सिटी पैलेस" (City Palace, Udaipur) के प्रवेश द्वार के पास खड़े है जहाँ दुष्यंत हम सबके लिए सिटी पैलेस में जाने की टिकटें लेने के लिए कतार में खड़ा है ! अब आगे, आज का पूरा दिन तो हम स्थानीय भ्रमण करते हुए ही बिताने वाले थे, दुष्यंत जब टिकट ले रहा था तो टिकट खिड़की पर एक मजेदार घटना घटी ! नोटबंदी के कारण पूरे देश में पुराने नोटों के लेन-देन पर रोक लग चुकी थी लेकिन टिकट खिड़की पर बैठे एक अधिकारी ने एक विदेशी पर्यटक को टिकट देने के बाद 500 रुपए के पुराने नोट थमा दिए ! मैं दूर खड़ा ये सब देख रहा था, विदेशी नागरिक पैसे लेकर टिकट खिड़की से हट ही रहा था कि तभी मैं झट से आगे बढ़ा और उस विदेशी नागरिक को बता दिया कि इन नोटों का चलन यहाँ 10 दिन पहले बंद हो चुका है इसलिए वो इन नोटों को ना ले ! मेरी बात सुनकर उसने वो नोट खिड़की पर बैठे अधिकारी को वापिस कर दिए !

पिछोला झील से दिखाई देता एक दृश्य
नोट वापिस लेते हुए अधिकारी मुझे घूरकर देखा रहा था, पता नहीं अब तक कितने विदेशियों को पुराने नोट दे चुका होगा ! मैं बोला जब तुम किसी से पुराने नोट ले नहीं रहे हो तो इन लोगों को क्यों दे रहे हो? मैने कहा, यार विदेशी लोग है, शायद इन्हें नोटबंदी की जानकारी ना हो, लेकिन हमारा तो फर्ज़ बनता है कि उनके साथ ग़लत ना होने दे ! हम तो पुराने नोटों को बैंक में जमा कर देंगे लेकिन ये बेचारे रद्दी हो चुके इन पुराने नोटों को कहाँ खपाएँगे ! इतना कहने के बाद हमने 250 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से 8 टिकटें ली और टिकट खिड़की से मुड़कर महल के प्रवेश द्वार की ओर चल दिए ! टिकट घर से महल के अंदर जाने के लिए पक्का मार्ग बना है, इस मार्ग के दोनों ओर अशोक के पेड़ लगे है और पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ भी है ! 5 मिनट की पद यात्रा करके हम "गणेश पोल" (Ganesh Pol) वाले द्वार से होते हुए महल परिसर में दाखिल हो गए ! गणेश पोल एक विशाल द्वार है जिसके बाहरी हिस्से पर नुकीले भाले लगे हुए है, पक्की सड़क अंदर तक गई है और गाड़ियाँ खड़ी करने के लिए अंदर पार्किंग की व्यवस्था भी है ! 

महल में जाने का मार्ग (Way to City Palace)
सिटी पैलेस का प्रवेश द्वार
बाहरी प्रवेश द्वार (गणेश पोल) से लेकर महल के अंदर तक जगह-2 महल की देखरेख करने वाले असंख्य सेवक खड़े है, इनकी वेशभूषा देख कर ही शाही परिवार के ठाट-बाट और रुतबे का अंदाज़ा लगाया जा सकता है ! मुख्य सड़क पर चलते हुए आगे जाने पर थोड़ा चढ़ाई भरा मार्ग भी है यहाँ से देखने पर बाईं ओर "पिछोला झील" (Pichhola Lake) का सुंदर दृश्य दिखाई देता है ! गाढ़े नीले रंग का पानी देख कर मुझे तो ज़यसमंद झील (Jaismand Lake) की याद आ गई ! ये सड़क जाकर ख़त्म होती है महल के दूसरे प्रवेश द्वार पर, गणेश पोल महल का बाहरी प्रवेश द्वार है, जबकि जहाँ हम अब खड़े थे ये महल का भीतरी प्रवेश द्वार है ! इस प्रवेश द्वार पर भी महल के सुरक्षाकर्मी खड़े थे ! प्रवेश द्वार के बाहर बने एक कक्ष में जाकर टिकट दिखाने के बाद हम मुख्य द्वार से होते हुए महल में दाखिल हो गए, महल में इस समय मरम्मत का काम चल रहा था ! यहाँ कुछ सीढ़ियों से होते हुए हम मुख्य हाल में पहुँच गए, जहाँ "उदयपुर के सारे राजाओं" (Kings of Udaipur) के नाम उनके शासन काल के साथ एक दीवार पर अंकित है ! 

सिटी पैलेस जाने के मार्ग से दिखाई देती पिछोला झील

महल का द्वितीय प्रवेश द्वार



इतिहास में रूचि रखने वाले लोगों के लिए यहाँ मेवाड़ से संबंधित बहुत बढ़िया जानकारियाँ उपलब्ध है, अधिकतर लोग यहाँ खड़े होकर सेल्फी लेने में लगे थे ! इस हाल के सामने ही शस्त्रागार है सीढ़ियों से होते हुए हम शस्त्रागार (Armory) में पहुँचे, यहाँ तीर-कमान से लेकर तोप के गोले, भाले, बंदूके और दूसरे छोटे अश्त्र-शस्त्र रखे गए है ! शस्त्रों से संबंधित जानकारी हर शस्त्र के नीचे ही दी गई है, अधिकतर शस्त्र शीशे के बक्सों में बंद करके रखे गए है ताकि लोग इन्हें छू ना सके ! इस कक्ष की दीवारों पर उस समय की घटनाओं को दर्शाते कुछ चित्र भी लगाए गए है शस्त्रागार से होते हुए हम सीढ़ियों से चढ़कर महल के प्रथम तल पर पहुँच गए, यहाँ के झरोखों से देखने पर पिछोला झील दिखाई देती है ! ये झील तत्कालीन शासकों द्वारा सुरक्षा की दृष्टि से महल के चारों तरफ खुद्वा दी गई थी ताकि दुश्मनों के हमले से महल की सुरक्षा की जा सके ! प्रथम तल पर संगमरमर की बढ़िया कारीगरी की गई है, झरोखे भी खूब बने है ! झील के ऊपर से बहकर आती ठंडी हवा इन झरोखों से होते हुए हमारे तन-मन को शीतलता प्रदान कर रही थी ! 

यहाँ झरोखों के पास खड़े होकर जो सुकून मिल रहा था उससे सभी लोग वाकिफ़ थे इसलिए लोग यहाँ से गुज़रते हुए कुछ समय यहाँ रुकने के बाद ही आगे बढ़ रहे थे ! महल के इस भाग में अधिकतर कक्ष महिलाओं के थे, ये जानकारी लगभग हर कक्ष के बाहर अंकित थी इन कक्षों के सामने ही एक उद्यान था कहते है कि शाही घराने की स्त्रियाँ इस उद्यान में विचरण किया करती थी ! राजा किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर विचरण करती इन स्त्रियों को देखकर प्रसन्न होते थे, ये जानकारी हमें एक गाइड से मिली ! उद्यान में बैठने के लिए पत्थर की सीटें भी बनी हुई थी, यहाँ घूमने आने वाले लोग जब कुछ देर इस उद्यान में आराम करने के लिए रुकते है तो अनायास ही उस दौर की कल्पना करने लगते है जब इस महल में शाही परिवार रहा करते थे ! इस महल में संकरी सीढ़ियाँ, गुप्त दरवाजे और अनगिनत गुप्त मार्ग थे, आपातकाल के समय राजा इन मार्गों का उपयोग किसी सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए किया करते थे ! हालाँकि, वर्तमान में बहुत से गुप्त दरवाज़ों और मार्गों को बंद भी कर दिया गया है ! 

शस्त्रागार का एक दृश्य
शस्त्रागार का एक दृश्य
शस्त्रागार का एक दृश्य
शस्त्रागार का एक दृश्य
उद्यान से निकलकर एक संकरे मार्ग पर बनी सीढ़ियों से होते हुए हम महल के दूसरे भाग में पहुँच गए ! यहाँ कई सुसज्जित पालकियाँ रखी हुई थी, प्राप्त जानकारी के अनुसार शाही घराने की महिलाएँ इन पालकियों में सवार होकर ही महल के बाहर जाया करती थी ! उस समय वाकई बड़ा शाही रहन-सहन था, शाही घराने के लोग समय-2 पर विदेश दौरों पर भी जाया करते थे कभी उच्च शिक्षा के लिए तो कभी मौज-मस्ती के लिए ! मैने दीवान जर्मनी दास द्वारा लिखित "महाराजा" (Maharaja) और "महारानी" (Maharani) नामक पुस्तकों में उस दौर के शाही रहन-सहन के बारे में पढ़ा था ! अंग्रेज अधिकारियों और अन्य गणमान्य व्यक्तियों से मेल-जोल बढ़ाने के लिए उस समय अलग-2 रियासतों के शासक समय-2 पर दावतों का आयोजन किया करते थे ! कभी ये अँग्रेज़ों को अपने यहाँ बुलाते थे तो कभी खुद अँग्रेज़ों द्वारा आयोजित पार्टियों में जाया करते थे, आज हमारे देश में जितने भी हिल स्टेशन है अधिकतर अँग्रेज़ों द्वारा ही बसाए हुए है ! यहाँ एक पत्थर का दरवाजा भी था और यहाँ के गाइड यहाँ आने वाले हर पर्यटक को इस दरवाजे के बारे में ज़रूर बताते है !

अपनी पिछली उदयपुर यात्रा के दौरान भी मैने एक गाइड को इस दरवाजे के बारे में कहते सुना था कि राजा अपनी रानियों और अन्य मेहमानों से हँसी-मज़ाक का कोई भी मौका नहीं चूकते थे ! इसके लिए राजा ने एक पत्थर का दरवाजा बनवाया हुआ था और अपने मेहमानों और रानियों को जान-बूझ कर उस दरवाजे को खोलने के लिए कहता ! अब पत्थर का दरवाजा भला कोई कैसे खोले, बाद में दरवाजे की हक़ीकत का पता चलने के बाद दोनों लोग खूब हंसते ! खैर, ज़रूरी नहीं कि ये सब बातें बिल्कुल सच ही हो, क्योंकि यहाँ के गाइड यात्रियों की दिलचस्पी का ख़याल रखते हुए कभी-2 कोई बात थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर भी बता देते है ! आगे बढ़ने पर एक कक्ष में उस समय के आभूषण भी रखे हुए थे जिन्हें रानियाँ उपयोग में लाती होंगी ! आभूषणों में तागड़ी (कमर में बाँधने वाला एक आभूषण) और कान की बालियां प्रमुख थी ! थोड़ी ओर आगे बढ़े तो एक दीवार पर उदयपुर के महाराणाओं के वीर साथियों के नाम और उनके सहयोग का बखूबी वर्णन किया गया था ! 

महल के अंदर का एक दृश्य

एक पालकी

रानियों द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले आभूषण
इसके बाद हम घूमते हुए महल के निचले तल पर आ गए, यहाँ भी निर्माण कार्य चल रहा था और लोहे के बड़े-2 बक्से रखे हुए थे ! ये महल बहुत बड़े वर्ग में फैला हुआ है, और इसमें घूमते हुए बड़ा आनंद आता है ! महल परिसर में ही एक कैंटीन भी है जहाँ खाने-पाने का सामान मिलता है, महल देखने के बाद जब हम बाहर निकले तो साढ़े तीन बज रहे थे ! सुबह फ़तेह सागर झील के पास नाश्ता करने के बाद से कुछ नही खाया था, इसलिए सबको बहुत तेज भूख लगी थी ! महल परिसर में मौजूद कैंटीन में जाकर देखा तो यहाँ काफ़ी भीड़ थी, लोग खाने का ऑर्डर देने के बाद भी प्रतीक्षा कर रहे थे ! हमें भी अपने खाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता, इसलिए हम महल के निकास द्वार से होते हुए बाहर आ गए ! महल के बाहर सड़क के दोनों ओर अच्छा बाज़ार है, ख़ान-पान से लेकर साज़-सज्जा और राजस्थानी कारीगरी की वस्तुएँ यहाँ उपलब्ध थी ! बाज़ार में 2 एटीएम भी थे, जहाँ लोग कतार में खड़े थे, कुछ विदेशी लोग भी पैसे निकालने के लिए कतार में खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे ! 

उदयपुर के महाराणाओं के वीर साथियों का विस्तृत ब्यौरा

सिटी पैलेस से बाहर आते हुए
खाने के लिए एक बढ़िया होटल ढूँढने के चक्कर में हमारी आँखों ने सारा बाज़ार खंगाल दिया, आख़िरकार एटीएम के सामने एक चबूतरे पर हमें एक होटल दिखाई दिया ! देखने में बढ़िया होटल लग रहा था, हम सब भोजन करने के लिए सीढ़ियों से होते हुए इसी होटल में चल दिए ! इस होटल में अंदर और बाहर दोनों जगह बैठने की व्यवस्था थी, हम बाहर बरामदे में एक बड़ी टेबल के चारों ओर लगी कुर्सियों पर जाकर बैठ गए ! खाने का ऑर्डर देने के बाद थोड़ी देर में ही हमारा खाना परोस दिया गया, हमें यहाँ का खाना और सर्विस दोनों ही बहुत बढ़िया लगे ! अगले एक घंटे में हम खा-पीकर यहाँ से फारिक हुए, 8 लोगों के खाने का बिल आया 3800 रुपए, खाना थोड़ा महँगा था लेकिन घूमने जाओ तो कभी-2 चलता है ! बिल भरने के बाद यहाँ से निकले तो अपनी गाड़ी वाले को फोन कर आने के लिए कह दिया ! फोन पर उसने हमें महल के बगल से जाते एक मार्ग पर आने को कहा, हम सब टहलते हुए इस मार्ग पर चल दिए ! कुछ ही देर में हमें सामने से गाड़ी वाला आता दिखाई दिया, यहाँ से गाड़ी में सवार होकर हम पिछोला झील की ओर चल दिए ! 

अगले कुछ ही पलों में हम "पिछोला झील" (Lake Pichhola) के सामने खड़े थे, जब हम  गाड़ी से उतर गए तो ड्राइवर ने गाड़ी पार्किंग में ले जाकर खड़ी कर दी ! 5.30 बज रहे थे, शाम होने लगी थी, झील में नौकायान के लिए ये एकदम उपयुक्त समय था ! नौकायान के लिए झील के किनारे बने एक टिकट घर से 150 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से 8 टिकट लेकर हम एक नाव में सवार हो गए ! नाव में कई लाइफ जैकेट रखी थी, नौका चालक के कहे अनुसार हमने एक-2 जैकेट पहन ली ! पिछली बार 2011 में जब मैं उदयपुर आया था तो पिछोला झील में नौकायान (Boating in Pichhola Lake) के लिए 50 रुपए का टिकट था, इस बार तिगुना किराया हो गया है, बहुत महंगाई बढ़ गई है ! रोपवे के लिए भी पिछली बार 50 रुपए ही खर्च करने पड़े थे, लेकिन इस बार 100 रुपए देने पड़े ! खैर, थोड़ी देर में ही हमारी नाव किनारे से चलकर झील के बीच में पहुँच गई ! मोटर बोट का ये फ़ायदा रहता है कि रफ़्तार से चलने के कारण पल भर में ही काफ़ी दूरी तय कर लेती है ! वैसे इस झील में मोटर बोट ही चलती है, पेडल बोट का आनंद लेना हो तो माउंट आबू की नक्की झील में आइए !

जब हम झील के बीचों-बीच पहुँचे तो यहाँ से सिटी पैलेस का शानदार दृश्य दिखाई दे रहा था, झील के बीच में ही 18वीं सदी में बना ताज पैलेस भी है ! सभी आधुनिक सुविधाओं से लैस ये एक पाँच सितारा होटल (Five Star Hotel, Udaipur) है उदयपुर आने वाले बहुत से सैलानी इस होटल में आकर रुकते है ! झील के बीच में एक अन्य होटल भी है नाम है जगमंदिर पैलेस, इन दो होटलों के अलावा झील के किनारे तो कई होटल है ! अब धीरे-2 सूर्यास्त भी होने लगा था, हम लगातार फोटो खींचने में लगे थे, सूर्यास्त के कारण झील के पानी में सूरज की लालिमा साफ झलक रही थी ! अगले कुछ ही पलों में वो सूर्यास्त का वो पल भी आया जिसका हम सब बेसब्री से इंतजार कर रहे थे ! सूर्यास्त होने के बाद भी पूरी तरह अंधेरा नहीं हुआ था, झील का एक लंबा चक्कर लगाने के बाद हम झील के किनारे आ गए ! झील से थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद हम रोपवे (Ropeway in Udaipur) के पास पहुँच गए, यहाँ 100 रुपए के हिसाब से 8 टिकट लिए और ट्रॉली में बैठने के लिए अंदर चल दिए ! 

पिछोला झील के किनारे का एक दृश्य
नौकायान के दौरान झील से दिखाई देता एक दृश्य
नौकायान के दौरान झील से दिखाई देता एक दृश्य
पिछोला झील से दिखाई देता सूर्यास्त का एक नज़ारा
नौकायान के दौरान झील से दिखाई देता एक दृश्य
नौकायान के दौरान झील से दिखाई देता एक दृश्य
नौकायान के दौरान झील से दिखाई देता एक दृश्य
नौकायान के दौरान झील से दिखाई देता एक दृश्य
पिछोला झील से दिखाई देता सूर्यास्त का एक नज़ारा
नौकायान के दौरान झील से दिखाई देता एक दृश्य
नौकायान के दौरान झील से दिखाई देता एक दृश्य
पिछोला झील से दिखाई देता सूर्यास्त का एक नज़ारा
पिछोला झील से दिखाई देता सूर्यास्त का एक नज़ारा
कुछ देर की प्रतीक्षा के बाद हमारा नंबर आ गया, यहाँ से चले तो 10 मिनट में ही हम रोपवे के दूसरे छोर पर पहुँच गए जो एक पहाड़ी पर था ! रोपवे से ऊपर जाते हुए नीचे देखने पर घना जंगल दिखाई देता है और दिखाई देती है मार्ग पर दौड़ती छोटी-2 गाड़ियाँ ! यहाँ से पिछोला झील का एक मनोरम दृश्य दिखाई दे रहा था, झील के बीचों-बीच स्थित "जगमंदिर पैलेस" (Jagmandir Palace) रात की कृत्रिम रोशनी में जगमगाता रहता है ! रोपवे से उतरे तो यहाँ से थोड़ी दूरी पर माता का एक मंदिर है, रास्ते में एक दरगाह भी पड़ती है ! माता के दर्शन करने के लिए हम मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! ऊपर जाते हुए हमें रास्ते में कई विदेशी युवा जोड़े दिखे, जो नशा करने में व्यस्त थे ! यहाँ राजस्थानी परिधान में फोटो खींचते हुए कुछ लोग भी खड़े थे, हमारे कुछ साथियों ने भी यहाँ फोटो खिंचवाए ! मंदिर में पहुँचे तो आरती का समय हो चुका था, इस तरह हमें यहाँ की संध्या आरती में शामिल होने का भी सौभाग्य मिल गया ! कुछ समय मंदिर परिसर में बिताने के बाद हमने वापसी की राह पकड़ी और रोपवे से होते हुए नीचे आ गए ! 

यहाँ से गाड़ी में सवार होकर अपने होटल चल दिए, अगले आधे घंटे में हम होटल पहुँच चुके थे ! होटल में कुछ देर बैठकर बातें की और दिनभर की यात्रा पर चर्चा करते रहे ! कुछ साथियों का रात्रि भोजन का मन नहीं था इसलिए उन्हें होटल में ही छोड़कर बाकि लोग 9 बजे के आस-पास भोजन करने के लिए होटल से बाहर चल दिए ! अपने होटल में खाने का ऑर्डर तो दिया नहीं था इसलिए यहाँ खाने का इंतज़ाम नहीं हो सका था, टहलते हुए हम अपने होटल से थोड़ी दूरी पर एक अन्य होटल में पहुँचे ! अगले पौने घंटे में यहाँ से खा-पीकर फारिक हुए और फिर काफ़ी देर तक बाज़ार में ही घूमते रहे ! जब नींद आने लगी तो 11 बजे के आस-पास अपने होटल में आ गए और रात्रि विश्राम के लिए अपने-2 बिस्तर पर चले गए !

रोपवे से दिखाई देती पिछोला झील
रात के समय पिछोला झील का एक दृश्य
क्यों जाएँ (Why to go Udaipur): अगर आपको किले और महल देखना पसंद है और आप राजस्थान में नौकायान का आनंद लेना चाहते है तो उदयपुर आपके लिए एक अच्छा विकल्प है ! यहाँ उदयपुर के आस-पास देखने के लिए कई झीले है !

कब जाएँ (Best time to go Udaipur): वैसे तो आप साल के किसी भी महीने में घूमने के लिए 
उदयपुर जा सकते है लेकिन सितंबर से मार्च यहाँ घूमने जाने के लिए बढ़िया मौसम है ! गर्मियों में तो यहाँ बुरा हाल रहता है और झील में नौकायान का आनंद भी ठीक से नहीं ले सकते !

कैसे जाएँ (How to reach Udaipur): दिल्ली से 
उदयपुर की दूरी लगभग 663 किलोमीटर है ! यहाँ जाने का सबसे बढ़िया साधन रेल मार्ग है दिल्ली से उदयपुर के लिए नियमित रूप से कई ट्रेने चलती है, जो शाम को दिल्ली से चलकर सुबह जल्दी ही उदयपुर पहुँचा देती है ! ट्रेन से दिल्ली से उदयपुर जाने में 12 घंटे का समय लगता है जबकि अगर आप सड़क मार्ग से जाना चाहे तो दिल्ली से उदयपुर के लिए बसें भी चलती है जो 14 से 15 घंटे का समय लेती है ! अगर आप निजी वाहन से उदयपुर जाने की योजना बना रहे है तो दिल्ली जयपुर राजमार्ग से अजमेर होते हुए उदयपुर जा सकते है निजी वाहन से आपको 11-12 घंटे का समय लगेगा ! हवाई यात्रा का मज़ा लेना चाहे तो आप सवा घंटे में ही उदयपुर पहुँच जाओगे !

कहाँ रुके (Where to stay in Udaipur): 
उदयपुर राजस्थान का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है यहाँ रोजाना हज़ारों देशी-विदेशी सैलानी घूमने के लिए आते है ! सैलानियों के रुकने के लिए यहाँ होटलों की भी कोई कमी नहीं है आपको 500 रुपए से लेकर 8000 रुपए तक के होटल मिल जाएँगे !

क्या देखें (Places to see in Udaipur): 
उदयपुर और इसके आस-पास देखने के लिए वैसे तो बहुत जगहें है लेकिन यहाँ के मुख्य आकर्षण सिटी पैलेस, लेक पैलेस, सहेलियों की बाड़ी, पिछोला झील, फ़तेह सागर झील, रोपवे, एकलिंगजी मंदिर, जगदीश मंदिर, जैसमंद झील, हल्दीघाटी, कुम्भलगढ़ किला, कुम्भलगढ़ वन्यजीव उद्यान, चित्तौडगढ़ किला और सज्जनगढ़ वन्य जीव उद्यान है ! इसके अलावा माउंट आबू यहाँ से 160 किलोमीटर दूर है वहाँ भी घूमने के लिए कई जगहें है !

अगले भाग में जारी...

उदयपुर - कुम्भलगढ़ यात्रा
  1. उदयपुर में पहला दिन – स्थानीय भ्रमण (Local Sight Seen in Udaipur)
  2. उदयपुर का सिटी पैलेस, रोपवे और पिछोला झील (City Palace, Ropeway and Lake Pichola of Udaipur)
  3. उदयपुर से माउंट आबू की सड़क यात्रा (A Road Trip from Udaipur to Mount Abu)
  4. दिलवाड़ा के जैन मंदिर (Jain Temple of Delwara, Mount Abu)
  5. माउंट आबू से कुम्भलगढ़ की सड़क यात्रा (A Road Trip From Mount Abu to Kumbhalgarh)
  6. कुम्भलगढ़ का किला - दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार (Kumbhalgarh Fort, The Second Longest Wall of the World)
  7. हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध और महाराणा प्रताप संग्रहालय (The Battle of Haldighati and Maharana Pratap Museum)

2 comments:

  1. Udaipur is very beautiful...When i have seen Mera Saaya and Guide...at that time i fell in with Udaipur...

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