Thursday, June 25, 2015

दिल्ली से उदयपुर की रेल यात्रा (A Train Trip to Udaipur)

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

बात दिसम्बर 2011 के तीसरे सप्ताह की है जब मैं एक दिन शाम को अपना काम ख़त्म करके ऑफिस से घर निकलने की तैयारी में था ! सोचा कंप्यूटर बंद करने से पहले एक बार ईमेल चेक कर लूँ, जब इनबॉक्स खोला तो किसी ट्रैवल एजेन्सी की ओर से एक ईमेल आई हुई थी ! ईमेल पढ़ने पर पता चला कि एक ट्रैवल एजेन्सी ने अपनी ओर से भारत भ्रमण के लुभावने प्रस्ताव दे रखे थे ! सर्दियों के मौसम का पर्यटन पर बहुत बुरा असर पड़ता है और ट्रैवल एजेंसियों का तो लगभग सारा कारोबार ही चौपट हो जाता है ! गिनती के लोग ही इस मौसम में घूमना पसंद करते है इसलिए अपना खर्च निकालने के लिए ये एजेंसियाँ पर्यटकों को विभिन्न प्रकार के लुभावने प्रस्ताव देती है ! मैं तो अपनी यात्रा की तैयारी खुद ही करता हूँ वो अलग बात है कि ट्रेवल एजेंसियों की वेबसाइट पर जाकर किसी शहर में घूमने लायक जगहों की जानकारी ज़रूर ले लेता हूँ ! वैसे घूमने जाने का मन तो मेरा हमेशा ही रहता है पर इस समय किसी का साथ ना मिलने के कारण मन को शांत कर रखा था ! ईमेल पढ़ने के बाद तो घूमने जाने का कीड़ा मन में चुलबुलाने लगा, सोचा, कोई तो होगा जो इस समय मेरे साथ घूमने जाने के लिए हाँ कहेगा ! 

train to udaipur
ट्रेन में लिया एक चित्र (Train Journey Delhi to Udaipur)
अगला दिन शनिवार (छुट्‌टी) होने के कारण घर जाने की कोई जल्दबाज़ी नहीं थी और फिर वैसे भी अभी तो घर के लिए निकलने में आधा घंटा बाकी था ! गूगल खोल कर भारत का नक्शा खंगालकर देखने लगा कि इस मौसम में कहाँ घूमने जाया जा सकता है ! सर्दी कड़ाके की पड़ रही थी और इस मौसम में पहाड़ो पर घूमने जाने की मेरी कतई इच्छा नहीं थी ! वैसे भी समाचार के माध्यम से जानकारी हो गई थी कि सर्दी की वजह से पहाड़ो पर जन-जीवन अस्त-व्यस्त हुआ पड़ा है ! सर्दी के कारण हालात तो उत्तर भारत में किसी भी जगह के अच्छे नहीं थे, पर यहाँ मैदानी इलाक़ों में पहाड़ों जैसे हालात नहीं थे जहाँ बर्फ़बारी के कारण रास्ते भी बंद थे ! इसलिए पहाड़ो पर जाने का तो विचार बन नहीं रहा था, तो सोचा क्यूँ ना मैदानी इलाक़ों में ही भ्रमण किया जाए ! मैदानी इलाक़ों में घूमने के लिए मेरे पास ज़्यादा विकल्प तो थे नहीं ! या तो मथुरा-आगरा जा सकता था या फिर राजस्थान में किसी जगह ! 

मथुरा-आगरा तो मैं कई बार जा चुका था तो सोचा क्यों ना इस बार राजस्थान का रुख़ किया जाए ! जब बात राजस्थान पर आकर रुक गई तो उसमें भी काफ़ी दुविधा थी क्योंकि राजस्थान में तो घूमने की बहुत सारी जगहें है अब ये नहीं समझ आ रहा था कि राजस्थान में कहाँ जाया जाए ! काफ़ी सोच-विचार के बाद उदयपुर जाने का निश्चय किया, यहाँ की झीलों के बारे बहुत सुन रखा था तो सोचा क्यों ना इस बार इन्हें ही देख लिया जाए ! फिर उदयपुर जाने की दूसरी वजह ये भी थी कि माउंट-आबू जोकि एक हिल-स्टेशन के रूप में विख्यात है, उदयपुर के पास ही है ! इस तरह उदयपुर की यात्रा में ही थोड़ा अतिरिक्त समय लेकर माउंट-आबू भी जाया जा सकता था ! बस फिर तो उदयपुर के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी ! अगले आधे घंटे में मैं गूगल से उदयपुर के बारे में काफ़ी जानकारी इकट्ठी कर चुका था ! समय देखा तो शाम के 6:15 बज रहे थे, ऑफिस से घर निकलने का समय हो चुका था ! फटाफट से अपना सामान समेटा और घर जाने के लिए निकल पड़ा 

रास्ते में यही सोचता हुआ घर आया कि अपने साथ चलने के लिए किस से पूछा जाए ! घर पहुँचने के बाद रात्रि का भोजन करके सो गया ! अगले दिन जब मैं शशांक से मिला तो उसे अपने उदयपुर घूमने जाने की इच्छा के बारे में बताया ! इस पर वो भी मेरे साथ जाने के लिए तैयार हो गया ! इस यात्रा के लिए अब हम दो लोग तैयार हो चुके थे, अब बात आकर रुक गई छुट्टी पर ! सारी योजना तो तैयार हो चुकी थी पर अभी तक अपने दफ़्तर में छुट्टी की बात तो की ही नहीं थी ! वैसे मुझे इस बात का अंदाज़ा था कि क्रिसमस के वक़्त ज़्यादातर यूरोपियन पूरे सप्ताह छुट्टी पर ही रहते है और जिस कंपनी के लिए मैं काम करता था उसका ज़्यादातर काम यूरोप के देशों के लिए ही था ! 27 दिसम्बर का दिन यात्रा शुरू करने के लिए निश्चित हुआ जिसके लिए छुट्टी लेने में मुझे ज़्यादा परेशानी नहीं हुई, इसलिए ट्रेन की टिकट तो मैने शनिवार को ही करवा ली ! 

सर्दियों का मौसम था तो टिकटों के लिए इतनी मारामारी भी नहीं थी और मुझे आसानी से हज़रत निज़ामुद्दीन से उदयपुर के लिए दो टिकटें मिल गई ! सोमवार दफ़्तर पहुँच कर सबसे पहले तो मैने छुट्टी के लिए आवेदन डाला, दफ़्तर में काम ज़्यादा ना होने की वजह से शाम तक मेरी छुट्टियों की भी पुष्टि हो गई ! उसी शाम को मैने उदयपुर से वापसी की 31 दिसम्बर की तारीख की टिकट भी करवा ली ! बस फिर तो यात्रा की तैयारियाँ शुरू कर दी, और एक सप्ताह कब गुज़र गया पता ही नहीं चला ! हमारी ट्रेन हज़रत निज़ामुद्दीन से शाम को 7 बजे थी इसलिए योजना के मुताबिक मैं 27 तारीख को नोयडा से अपने दफ़्तर का काम निबटा कर सीधे स्टेशन पर ही आने वाला था ! निर्धारित दिन मैने शाम 5 बजे तक अपना सारा काम ख़त्म कर लिया, और अपना ट्रैवल बैग लेकर मोटरसाइकल पर सवार होकर रेलवे स्टेशन के लिए चल दिया ! वैसे तो मोटरसाइकल पर नोयडा से हज़रत निज़ामुद्दीन पहुँचने में 45-50 मिनट लगते है ! पर किसी भी अप्रिय स्थिति से बचने के लिए मैं अतिरिक्त समय लेकर चल रहा था ! 

5 बजकर 40 मिनट हो रहे थे जब मैं अपोलो हास्पिटल मेट्रो स्टेशन के पास वाली लाल बत्ती के पास अपनी मोटरसाइकल पर बैठा सोच रहा था कि अच्छा है कहीं ट्रैफिक नहीं मिला ! 10-15 मिनट और लगेंगे स्टेशन पहुँचने में ! सिग्नल होने पर जैसे ही मैं आगे बढ़ा, मेरी मोटरसाइकल का टायर फुस्स ! वो तो सिग्नल से निकला ही था इसलिए स्पीड ज़्यादा तेज़ नहीं थी वरना कुछ अनहोनी भी हो सकती थी ! अब मोटरसाइकल से उतर कर पैदल चलने लगा, आस-पास कोई पंचर की दुकान होने की उम्मीद कम ही लग रही थी ! पर फिर भी एक ठेले वाले से पूछ लिया, पूछने पर उसने बताया कि 100 मीटर आगे चलकर एक पंचर वाले की दुकान है ! तेज़ कदमों से आगे बढ़कर जब मैं पंचर वाले के पास पहुँचा तो वो किसी ट्रक के टायर का पंचर लगा रहा था ! मैने सोचा चलो इसके बाद मेरा ही नंबर आएगा, पर फिर भी उसे बता दिया कि मुझे 7 बजे निज़ामुद्दीन से ट्रेन पकड़नी है इसलिए जल्दी से मेरी गाड़ी का भी पंचर लगा दे ! 

जब उसने मेरी गाड़ी का पंचर लगाना शुरू किया तो उस समय 6 बजकर 5 मिनट हो रहे थे मुझे लगा कि 10-15 मिनट में ये पंचर का काम निबटा देगा और फिर में समय से स्टेशन पहुँच जाउगा ! पर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि एक तो वो बहुत आलसी इंसान था और दूसरा मेरी किस्मत खराब थी ! वो काम कम कर रहा था और खाने पीने में ज़्यादा लगा हुआ था, पहले बिस्कुट, फिर समोसे और अंत में चाय लेकर बैठ गए जनाब ! जैसे-तैसे कर के पंचर लगाया, फिर जब ट्यूब में हवा भरकर चेक किया तो पता चला कि उसने पंचर ग़लत जगह लगा दिया है ! मैने गुस्सा दिखाते हुए कहा कि तरीके से और जल्दी काम निबटा, वरना अगर मेरी ट्रेन छूटी तो तेरी खैर नहीं है ! भाई साब उल्टे मुझ पर ही पिल पड़े, कहने लगे कि मैं तस्सली से काम करता हूँ, तुम्हारी जल्दबाज़ी की वजह से ही ये ग़लत जगह पंचर लग गया है ! मैने सोचा एक तो वैसे ही लेट हो रहा हूँ उपर से ये महारथी मिल गए ! जब मैने देखा कि फिलहाल उससे बहस करने में कोई समझदारी नहीं है तो मैने कहा ठीक है भाई, तस्सली से कर ले पर इस बार ग़लती मत करियो ! 

जैसे-2 समय बीतता जा रहा था वैसे-2 मेरी धड़कनें भी बढ़ती जा रही थी ! एक पल तो मेरी उम्मीद भी टूट गई जब मुझे लगने लगा कि मैं ये ट्रेन नहीं पकड़ पाउगा ! इसी बीच मैने शशांक को आपबीती सुना दी और ये भी कह दिया कि मेरा इस ट्रेन को पकड़ पाना मुश्किल लग रहा है इसलिए वो उदयपुर घूमने के लिए अकेला ही चला जाए, हालाँकि, वो अकेला नहीं जाने वाला था ! फिर मैने अपने एक मित्र हेमंत को फोन लगाया जोकि नोयडा में कार्यरत है, वो अपनी मोटरसाइकल निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर बने स्टैंड पर खड़ी करता है ! मैने उसे सारी घटना से अवगत कराया, तो उसने मुझसे कहा कि इस वक़्त तो वो घर निकल चुका है ! उसने सुझाव दिया कि मैं अपनी मोटरसाइकल स्टैंड पर खड़ी करके वहाँ बैठे आदमी से उसकी बात करवा दूँ, और अपनी मोटरसाइकल की चाबी उसे दे दूँ ! ऐसा करने से अगले दिन ऑफिस आने पर वो मेरी मोटरसाइकल को अपने ऑफिस ले जाएगा ! जैसे ही मैने देखा कि एक बार फिर पंचर लग चुका है तो मैने फोन काट दिया ! 

इस बार उसने चेक करके देखा तो पंचर सही जगह लगा था ! जितनी देर में उसने मोटरसाइकल का टायर कसा, मैने अपना बैग अपनी पीठ पर लाद लिया और फिर उसके पैसे देकर मैं बाइक पर सवार हो गया ! समय देखा तो 6 बजकर 40 मिनट हो रहे थे, एक बार फिर से मैं तेज़ी से स्टेशन की ओर चल दिया ! स्टेशन पर पहुँचा तो 7 बज रहे थे, मैने अपनी मोटरसाइकल निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन के बाहर स्टैंड पर लगाई और हेमंत के कहे अनुसार वहाँ बैठे आदमी से हेमंत की बात करवा कर मोटरसाइकल की चाबी उसे दे दी ! गाड़ी के चलने का समय लगभग हो चुका था इसलिए स्टैंड से बाहर आकर मैं दौड़ लगा कर प्लेटफॉर्म पर पहुँचा ! मेवाड़ एक्सप्रेस की उद्घोषणा हो रही थी, गाड़ी 7 नंबर प्लेटफॉर्म से चलने के लिए तैयार थी ! मैं फटाफट गाड़ी में चढ़ा और अगले कुछ ही मिनटों में ट्रेन चल दी ! किसी ने कहा है अंत भला तो सब भला, मतलब अंत में अगर सारे काम सही हो जाए तो रास्ते में आई दिक्कतों की फ़िक्र नहीं करनी चाहिए ! 

मैने शशांक को फोन करके बता दिया कि मुझे ट्रेन मिल गई है, शशांक, जोकि बल्लभगढ़ से इस ट्रेन में चढ़ने वाला था स्टेशन पर खड़ा इस ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहा था ! अगले बीस मिनट में जब ट्रेन बल्लभगढ़ पहुँची तो शशांक भी ट्रेन में चढ़ गया और हम दोनों बैठ कर बातें करने लगे ! जब गाड़ी अपने अगले पड़ाव मथुरा में रुकी तो हमने खाने के लिए खाना निकाल लिया, जोकि शशांक अपने घर से लाया था ! कुछ खाने-पीने का सामान हमने मथुरा स्टेशन से भी लिया जोकि बहुत ही घटिया था ! मुझे तो बहुत दुख हुआ कि इस खराब खाने को लेने में पैसे खराब हो गए ! खाना खाने के बाद बहुत देर तक बैठ कर हम दोनों ने बातें की और फिर आराम करने अपनी-2 उपर वाली सीटों पर चले गए ! रास्ते में कई स्टेशनो पर गाड़ी रुकी, रात में ठंड भी खूब लगी, वो तो गनीमत थी कि हमारे पास पर्याप्त गरम कपड़े थे इसलिए दिक्कत नहीं हुई ! रात को सोने से पहले मैने सुबह उठने के लिए अलार्म भी लगा दिया था, सुबह जब अलार्म बजने पर नींद खुली तो देखा कि ट्रेन सरपट दौड़ रही है ! 

उदयपुर आने में अब ज़्यादा देर नहीं थी, 25-30 मिनट में हमारी ट्रेन उदयपुर के स्टेशन पर पहुँच गई ! समय देखा तो सुबह के 7:25 हो रहे थे, यहाँ हमारा स्वागत कड़कड़ाती ठंड ने किया ! खून जमा देने वाली ठंड यहाँ भी अपना कहर बरपा रही थी ! हम दोनों स्टेशन से बाहर निकले और मैं ऑटो-रिक्शा वालों से मोल-भाव करने में लग गया ! पर्यटकों को देख कर तो ऑटो-रिक्शा वाले भी औने-पौने पैसे माँगते है पर मेरा उसूल है कि बिना मोल भाव के खरीददारी नहीं करता, चाहे खाने-पीने का सामान हो, होटल का कमरा या फिर ऑटो-रिक्शा ! थोड़ी देर की मशक्कत के बाद एक ऑटो वाला निर्धारित स्थान पर जायज़ पैसे में जाने के लिए तैयार हो गया ! मेरा ये मानना है कि अगर आप पर्यटक बनकर मोल-भाव करोगे तो कोई भी आपसे ज़्यादा पैसे माँगेगा ! ऐसा व्यवहार करो जैसे आप यहाँ अक्सर आते रहते हो और आपको यहाँ के बारे में अच्छे से पता है ! 

यही हमने यहाँ भी किया, शशांक सारा सामान लेकर थोड़ा दूर खड़ा हो गया और मैने सारा-मोल भाव कर लिया ! फिर क्या था, मैने आवाज़ लगा कर शशांक को बुलाया जोकि थोड़ी दूरी पर खड़ा था, हम लोग ऑटो में बैठे और अपने गंतव्य की ओर चल दिए ! उदयपुर में हम लोग शशांक की मौसी के घर रुके थे, हमारी यात्रा शुरू होने से पहले ही उन्होनें फोन करके कह दिया था कि उदयपुर आओगे तो होटल में रुकने की ज़रूरत नहीं है तुम दोनों मेरे यहीं रुकना ! अब उन्होनें इतने स्नेह से कहा तो हम मना नहीं कर पाए ! आधे घंटे में हम लोग घर पहुँच चुके थे, समय देखा तो सुबह के 8 बज रहे थे !


view from train
ट्रेन से बाहर का दृश्य (A view appearing from Train)
view from train
ट्रेन से बाहर का दृश्य
in train

way to udaipur
रास्ते में स्टेशन का एक दृश्य (Somewhere before Udaipur)
station near udaipur
रास्ते में स्टेशन का एक दृश्य
क्यों जाएँ (Why to go Udaipur): अगर आपको किले और महल देखना पसंद है और आप राजस्थान में नौकायान का आनंद लेना चाहते है तो उदयपुर आपके लिए एक अच्छा विकल्प है ! यहाँ उदयपुर के आस-पास देखने के लिए कई झीले है !

कब जाएँ (Best time to go Udaipur): वैसे तो आप साल के किसी भी महीने में घूमने के लिए 
उदयपुर जा सकते है लेकिन सितंबर से मार्च यहाँ घूमने जाने के लिए बढ़िया मौसम है ! गर्मियों में तो यहाँ बुरा हाल रहता है और झील में नौकायान का आनंद भी ठीक से नहीं ले सकते !

कैसे जाएँ (How to reach Udaipur): दिल्ली से 
उदयपुर की दूरी लगभग 663 किलोमीटर है ! यहाँ जाने का सबसे बढ़िया साधन रेल मार्ग है दिल्ली से उदयपुर के लिए नियमित रूप से कई ट्रेने चलती है, जो शाम को दिल्ली से चलकर सुबह जल्दी ही उदयपुर पहुँचा देती है ! ट्रेन से दिल्ली से उदयपुर जाने में 12 घंटे का समय लगता है जबकि अगर आप सड़क मार्ग से जाना चाहे तो दिल्ली से उदयपुर के लिए बसें भी चलती है जो 14 से 15 घंटे का समय लेती है ! अगर आप निजी वाहन से उदयपुर जाने की योजना बना रहे है तो दिल्ली जयपुर राजमार्ग से अजमेर होते हुए उदयपुर जा सकते है निजी वाहन से आपको 11-12 घंटे का समय लगेगा ! हवाई यात्रा का मज़ा लेना चाहे तो आप सवा घंटे में ही उदयपुर पहुँच जाओगे !

कहाँ रुके (Where to stay in Udaipur): 
उदयपुर राजस्थान का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है यहाँ रोजाना हज़ारों देशी-विदेशी सैलानी घूमने के लिए आते है ! सैलानियों के रुकने के लिए यहाँ होटलों की भी कोई कमी नहीं है आपको 500 रुपए से लेकर 8000 रुपए तक के होटल मिल जाएँगे !

क्या देखें (Places to see in Udaipur): 
उदयपुर और इसके आस-पास देखने के लिए वैसे तो बहुत जगहें है लेकिन यहाँ के मुख्य आकर्षण सिटी पैलेस, लेक पैलेस, सहेलियों की बाड़ी, पिछोला झील, फ़तेह सागर झील, रोपवे, एकलिंगजी मंदिर, जगदीश मंदिर, जैसमंद झील, हल्दीघाटी, कुम्भलगढ़ किला, कुम्भलगढ़ वन्यजीव उद्यान, चित्तौडगढ़ किला और सज्जनगढ़ वन्य जीव उद्यान है ! इसके अलावा माउंट आबू यहाँ से 160 किलोमीटर दूर है वहाँ भी घूमने के लिए कई जगहें है !

अगले भाग में जारी...

उदयपुर - माउंट आबू यात्रा
  1. दिल्ली से उदयपुर की रेल यात्रा (A Train Trip to Udaipur)
  2. पिछोला झील में नाव की सवारी (Boating in Lake Pichhola)
  3. उदयपुर की शान - सिटी पैलैस (City Palace of Udaipur)
  4. उदयपुर से माउंट आबू की बस यात्रा (Road Trip to Mount Abu)
  5. वन्य जीव उद्यान में रोमांच से भरा एक दिन (A Day Full of Thrill in Wildlife Sanctuary)
  6. झीलों के शहर उदयपुर में आख़िरी शाम (One Day in Beautiful Jaismand Lake)

3 comments:

  1. कभी कभी बड़ी जटील समस्या आ जाती है इसलिए पहले से 1 घण्टे का डिफ़रेंस बनाकर चलना चाहिए । हम तो यही करते है । और राजस्थान में तो वैसे भी काफी ठंडी होती है ठंडियो में बॉम्बे या गोवा क्व प्रोग्राम बनाना चाहिए

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    1. जी बिल्कुल सही कहा आपने दर्शन कौर जी, इस यात्रा से सबक लेते हुए अब किसी भी यात्रा पर अतिरिक्त समय लेकर चलता हूँ ! रही बात सर्दियों में घूमने की तो वो अपनी-2 इच्छा पर निर्भर करता है, मुझे तो मुंबई और गोआ के लिए 4-5 छुट्टियाँ कम ही लगती है !

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  2. Very nice journey about Delhi to Udaipur. Many trains are plying between Delhi and Udaipur. Bus from Delhi to Udaipur is also available and can be booked online.

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