Sunday, June 28, 2015

पिछोला झील में नाव की सवारी (Boating in Lake Pichhola)

बुधवार, 28 दिसंबर, 2011

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढने के लिये यहां क्लिक करें ! 

यात्रा के पिछले लेख में आपने दिल्ली से उदयपुर तक की ट्रेन यात्रा के बारे में पढ़ा, अब आगे, स्टेशन से घर पहुँचने के बाद हम दोनों नित्य-क्रम से फारिक होने लगे ! जब तक हम नहा-धोकर तैयार हुए, हमारे लिए नाश्ते में पराठे और आमलेट तैयार हो चुका था ! नाश्ते की मेज पर हमें खाने के साथ-2 उदयपुर के बारे में काफ़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी मिली ! अपनी योजना के मुताबिक मैने तो उदयपुर में घूमने के लिए जगहों की एक लंबी-चौड़ी सूची बना रखी थी ! इस जानकारी के मुताबिक आज हम लोग स्थानीय भ्रमण के लिए जाने वाले थे ! नाश्ता करने के बाद हमने अपने साथ ले जाने का ज़रूरी समान अपने बैग में रखा और आज के सफ़र के लिए निकल पड़े ! उदयपुर घूमने के लिए हम दोनों ने 500 रुपए में एक ऑटो कर लिया, जो हमें 12 जगहें दिखाने वाला था ! फिर भगवान का नाम लेकर हम दोनों ऑटो में बैठे और अपनी यात्रा की शुरुआत की ! पर ये क्या, अभी ब्मुश्किल 2 किलोमीटर ही चले होंगे कि ऑटो में कुछ तकनीकी खराबी आ गई ! 
pichhola lake
Boating in Lake Pichhola
ऑटो वाला इंजन का बक्सा खोल कर अपनी कारीगरी दिखाने लगा ! हम लोग थोड़ी देर तक तो ऑटो में ही बैठे रहे, फिर जब हमें लगा कि यहाँ काफ़ी समय लगने वाला है तो हम दोनों ऑटो से उतरकर बाहर आ गए ! जहाँ ऑटो खराब हुआ था वहीं सड़क के किनारे बड़े आलीशान बंगले थे, और थोड़ी दूर पर एक बड़ा मॉल भी दिखाई दे रहा था ! बातें करते हुए जब मेरा सब्र जवाब देने लगा तो मैं ऑटो वाले से बोला, भाई हमें उदयपुर घूमना है, यहाँ खड़े होकर टाइम पास नहीं करना ! इस पर उसने कहा कि भाई साहब बस हो गया काम, कल्च की तार टूट गई थी ! पर अब मैने वो ठीक कर दी है, बस पाँच मिनट और लगेंगे फिर हम चलते है यहाँ से, अपने कहे अनुसार 5 मिनट बाद वो हमें लेकर फिर से चल दिया ! ऑटो वाला हमें शहर के भीड़-भाड़ वाले इलाक़े से घुमाता हुआ आगे बढ़ रहा था, काफ़ी देर चलने के बाद वो हमें सहेलियों की बाड़ी से होता हुआ पिछोला झील लेकर पहुँचा ! 

कहते है कि उदयपुर शहर चारों ओर से झीलों से घिरा हुआ है, पुराने समय में यहाँ के राजाओं ने इस शहर की सुरक्षा के लिए ये झील खुद्वाए थे, ताकि कोई बाहरी दुश्मन आसानी से शहर पर हमला ना कर सके ! सहेलियों की बाड़ी में हमें बाहर से देखने पर कुछ ख़ास लगा नहीं, इसलिए हमने सोचा यहाँ समय व्यर्थ करने से अच्छा है दूसरी जगहों पर थोड़ा अधिक समय व्यतीत कर लेंगे ! पिछोला झील पहुँच कर ऑटो वाले ने हमसे कहा कि मैं ऑटो लेकर बाहर ही खड़ा हूँ, आप लोग नौकायान में बैठ कर झील में घूम आओ ! इस झील के पास ही रोपवे भी है, हमने सोचा पहले पिछोला झील में नौका का आनंद ले लेते है फिर रोपवे से पहाड़ी के ऊपर की सैर की जाएगी ! नाव में बैठ कर झील में घूमने का टिकट जोकि 50 रुपए का था लेकर हम लोग नाव की ओर चल दिए, अभी नाव में कोई और यात्री नहीं था और हमारे अनुमान के मुताबिक बिना सवारी बिठाए नाव वाला हमें लेकर झील में जाने वाला नहीं था ! 

हालाँकि, अतिरिक्त पैसे देकर आप अपने लिए एक नाव आरक्षित करवा कर नौकायान का आनंद ले सकते है, पर हमें ये विचार उचित नहीं लगा ! नौकायान का मज़ा तो अन्य यात्रियों के साथ ही यात्रा करने में है ! हमने सोचा जब तक और सवारी नहीं आ जाती, कुछ फोटो ही खींच लिए जाए ! नाव में जाकर देखा तो बहुत सारी सुरक्षा जैकट रखी हुई थी, वैसे इन्हें देखकर लग नहीं रहा था कि अगर कोई झील में गिर गया तो इन जैकट से कुछ मदद मिलेगी ! नाव में बैठ कर हम दोनों नाव के इंजन की कार्यप्रणाली देखने लगे, इस नाव के एक हिस्से में पेट्रोल से चलने वाला इंजन लगाया गया था, जोकि चलने पर उर्जा पैदा करता है और इस उर्जा से नाव को आगे बढ़ने के लिए गति मिलती है ! इंजन से थोड़ी दूरी पर ही पेट्रोल की टंकी रखी हुई थी, नाव की दिशा को नियंत्रित करने के लिए लोहे के पाइप का एक हैंड्ल दिया गया था जिसे दाएँ-बाएँ मोड़कर आप अपनी इच्छा अनुसार नौका की दिशा बदल सकते है ! गति को नियंत्रित करने के लिए तार के माध्यम से एक पंप को जोड़ा गया था, नाव को रोकने के लिए हैंड्ल को उपर की ओर दबाना था ! 

बहुत बढ़िया दिमाग़ लगाया है जिसने भी ये स्वचालित नौका बनाई होगी ! हमने सोचा जब तक हमारी नौका का चालक नहीं आ जाता तब तक एक चक्कर खुद ही मार लिया जाए, पर हम नाव को चलाते उस से पहले ही हमारी नौका का चालक आ गया ! वैसे इस नौका को चलाने के लिए ज़्यादा प्रशिक्षण की ज़रूरत नहीं है, कम से कम अपनी नौका के चालक को देख कर तो ऐसा ही लगा ! उसे देख कर लग नहीं रहा था कि उसने कहीं से कोई प्रशिक्षण लिया होगा, जैसे हमारे शहरों में बहुत बड़ी तादात में बस या ऑटो चालक मिल जाएँगे वैसे ही इस झील में हर नौका में छोटे-बड़े नौका चालक मिल जाएँगे ! थोड़ी देर बाद जब हमारी नाव में कई सवारियाँ आ गई, तो हमारी नौका के चालक ने निर्देश दिया कि सभी लोग नाव में रखी एक-2 जैकट पहन लो, सबने उसके निर्देश का पालन किया ! जब सभी लोगों ने जैकट पहन लिया तो चालक ने नाव को चालू किया और हमें घुमाना शुरू कर दिया ! 

थोड़ी देर बाद वो हमारी नौका को झील के बीच में ले गया, झील के बीचो-बीच एक महल बना हुआ है जिसे जल-महल के नाम से जाना जाता है ! ये महल एक बेहतरीन कारीगरी की मिसाल है क्योंकि ये इतनी गहरी झील में बना हुआ है, और फिर भी सुरक्षित खड़ा है ! ये महल देसी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी है, झील में से देखने पर सिटी पैलैस का भी बहुत ही सुंदर दृश्य दिखाई देता है ! पर हम लोग अकेले नहीं थे जो इस झील में घूमने का आनंद ले रहे थे, हमारे अतिरिक्त झील में और भी कई नौकाएँ चल रही थी, जिनमें से कुछ में तो विदेशी पर्यटक भी थे ! एक नौका तो हमारे इतने करीब से गुज़री कि मुझे लगा कहीं ये हमारी नौका से टकरा ना जाए, पर यहाँ के चालक रोज़ नौका चला-2 कर इतने परिपक्व हो गए है कि इन्हें पता होता है कब क्या करना है ! नौका चालक ने इस महल के चारों ओर हमारी नौका का एक चक्कर लगाया और थोड़ी देर झील में घुमाने के बाद वापस किनारे की ओर आ गया ! 

नाव से उतरकर हम दोनों बाहर आ गए और रोपवे की ओर चल दिए, रोपवे बिजली से चलने वाले झूले थे जो यहाँ पिछोला झील के पास से चलकर आपको दूसरी ओर पहाड़ी पर लेकर जा रहे थे ! पिछोला झील के पास कुछ स्थानीय लोग ऊँट लेकर भी घूम रहे थे जो 50 रुपए लेकर थोड़ी देर के लिए आपको ऊँट की सवारी करवा रहे थे ! कुछ झूले वाले छोटे बच्चों को रिझाने के लिए झूलों को खाली ही घुमा रहे थे, तो कुछ फेरी वाले खाने-पीने का सामान बेच रहे थे ! रोपवे की ओर जाते हुए हमने कुछ बच्चों को झूलों पर तो कुछ लोगों को ऊँट की सवारी करते हुए देखा ! सड़क पार करके हम दोनों रोपवे के प्रवेश द्वार पर पहुँच गए, रोपवे में सवारी करने का टिकट भी 50 रुपए प्रति व्यक्ति था ! टिकट लेने के बाद आपको एक अन्य द्वार से होकर अंदर जाना था, जहाँ से ये ट्रालियाँ चलती है ! हमने भी रोपवे में सवारी करने के 2 टिकट लिए और प्रवेश द्वार को पार करके एक खुले मैदान में पहुँच गए, जहाँ सभी लोग ट्रॉली में बैठने के लिए अपनी-2 बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे ! 

3 ट्रालियाँ पहाड़ी पर जाने की थी और 3 ही वहाँ से वापस आने की, हर ट्रॉली में 6 लोगों के बैठने की व्यवस्था थी ! प्रवेश टिकट पर ही एक नंबर अंकित होता है जिसके अनुसार ट्रॉली में बैठने का आपका नंबर लगाया जाता है, इस नंबर की उद्घोषणा होने पर आपको ट्रॉली में जाकर बैठना होता है ! हम लोगों ने अपनी सहूलियत के लिए पहले ही जाकर पता कर लिया कि अभी कौन सा नंबर चल रहा है और फिर आराम से आकर वहीं बैठ कर आती-जाती ट्रॉलियों को देखने लगे ! इन ट्रॉलियों को बहुत धीरे-2 और एक समान गति से चलाया जा रहा था ताकि किसी भी अप्रिय घटना को टाला जा सके ! रोपवे पर जाने की प्रतीक्षा करते हुए हम लोग मैदान में बैठे हुए सब नज़ारे देख रहे थे, मैदान के अंदर ही कुछ फेरी वाले खाने-पीने का समान भी बेच रहे थे ! थोड़ी देर प्रतीक्षा करने के बाद हमारा नंबर भी आ गया और हम लोग ट्रॉली की ओर चल दिए ! ट्रॉली में शीशे के दरवाजे थे जिसमें से बाहर का नज़ारा बिल्कुल साफ दिखाई दे रहा था ! 

जैसे-2 ट्रॉली उपर जा रही थी, एक अजीब सा डर मन में बढ़ता जा रहा था कि कहीं ट्रॉली टूट ना जाए ! भगवान की कृपा से हम लोग सही सलामत उपर पहाड़ी के दूसरे छोर पर पहुँच गए ! ट्रॉली में चढ़ने-उतरने के लिए दोनों छोर पर जगह व्यवस्थित की गई थी ! पहाड़ी के उपर जाकर जाकर जहाँ आप रोपवे से उतरते है वहाँ एक तरफ तो कैंटीन है जहाँ खाने-पीने की व्यवस्था है, और दूसरी ओर एक किला है ! कैंटीन के साथ ही एक चारदीवारी है, जहाँ से देखने पर पिछोला झील के बीचो-बीच दिखाई देता जल महल बहुत ही सुंदर लगता है ! यहीं इस चारदीवारी के पिछले हिस्से से देखने पर पूरा उदयपुर शहर दिखाई देता है, हम लोगों ने पहले तो यहाँ पर खड़े होकर बहुत सारे फोटो लिए और फिर वहीं बैठ कर बातें करने लगे ! समय देखा तो दोपहर के 12 बजकर 30 मिनट हो रहे थे, पर सुबह से अभी तक तो हम लोग सिर्फ़ 2 ही जगह घूमे थे और दोपहर हो गई थी ! 

मुझे ऑटो वाले से 500 रुपए का सौदा अब महँगा लगने लगा था ! हमने सोचा कि रोपवे के दूसरी ओर चल कर वहाँ के नज़ारे भी देख लिए जाए, वहाँ वैसे देखने को तो कुछ ख़ास नहीं है हाँ, एक मज़ार ज़रूर है जहाँ लोग हाथ जोड़ कर आगे बढ़ जा रहे थे ! थोड़ा आगे बढ़ने पर हमने देखा कि वहाँ मरम्मत का काम भी चल रहा था, रास्ते में बहुत से स्थानीय लोग कैमरा लेकर विभिन्न मुद्राओं में आपकी फोटो ले रहे थे ! मेरा भी मन हुआ एक फोटो करवाने का, पर वो फोटो साथ के साथ नहीं दे रहे थे, बोल रहे थे कि अपने होटल का पता लिखवा दो, आपके फोटो आपके होटल में ही भिजवा देंगे ! वैसे उनके फोटो का मूल्य भी कुछ ज़्यादा था इसलिए हम लोगों ने अपना कैमरा निकाला और फोटो खीचने में लग गए ! एक सज्जन ने तो एक उँची सी जगह देख कर टेलिस्कोप ही लगा दिया था और लोगों से 10-10 रुपए लेकर उस टेलिस्कोप के माध्यम से दूर दिखाई देती इमारतों को दिखा रहा था ! 

मज़ार के पास ही हमने पाकिस्तान का राष्ट्रीय ध्वज भी लहराता हुए देखा, देख कर पहली बार तो यकीन ही नहीं हुआ कि ना तो ये दूतावास है और ना ही हम पाकिस्तान में है, फिर ये झंडा यहाँ क्या कर रहा है ! मुझे अंत तक उस झंडे का रहस्य समझ नहीं आया, फिर बाद में किसी ने बताया कि ये झंडा इस्लाम धर्म को दर्शाता है, फिर भी मुझे ये बात पची नहीं ! थोड़ी देर बाद समय के महत्व को समझते हुए हम लोगों ने वापसी की योजना बनाई और रोपवे की ओर चल दिए ! यहाँ आकर हमने अपना टिकट दिखाया तो हमें जानकारी मिली कि हमारा नंबर 10 मिनट बाद आएगा ! हमने इस 10 मिनट का सदुपयोग किया और पेट पूजा में लग गए, ताकि दोबारा कहीं बैठ कर खाने-पीने में समय व्यर्थ ना हो ! अगले 30 मिनट में हम लोग रोपवे से होते हुए वापस मुख्य मार्ग पर पहुँच गए जहाँ ऑटो वाला भाई हमारा इंतज़ार कर रहा था ! हम दोनों जाकर ऑटो में बैठ गए और कहा कि भाई ले चल अब कहाँ चलना है, ऑटो वाले ने ऑटो चालू किया और हम लोग आगे बढ़ गए !


boating in pichhola
नाव चलाने के तैयारी करता शशांक
pichola lake boating
Getting Ready for a Ride
pichola lake
A view from Lake Pichhola
city palace udaipur
झील से दिखाई देता सिटी पैलेस (A view of City Palace from Lake)
boating in pichola
हमारी नाव का पाइलेट
boating
दूसरी नाव में कुछ विदेशी पर्यटक (Another boat in Lake Pichhola)
pichola lake
Boating in Lake Pichhola
lake pichola

ropeway udaipur
रोपवे जाते हुए शशांक (Way to Ropeway, Udaipur)
ropeway in udaipur
रोपवे की प्रतीक्षा में
in ropeway
ट्रॉली में बैठे हुए
jal mahal
पहाड़ी से दिखाई देता जल महल (View of Jal Mahal from the top)
ropeway udaipur

udaipur city
View of Udaipur City from the Hill
hills in udaipur

view of udaipur
पीछे दिखाई देता उदयपुर शहर
udaipur view

pichola view


ropeway to pichola

पहाड़ी पर दरगाह
क्यों जाएँ (Why to go Udaipur): अगर आपको किले और महल देखना पसंद है और आप राजस्थान में नौकायान का आनंद लेना चाहते है तो उदयपुर आपके लिए एक अच्छा विकल्प है ! यहाँ उदयपुर के आस-पास देखने के लिए कई झीले है !

कब जाएँ (Best time to go Udaipur): वैसे तो आप साल के किसी भी महीने में घूमने के लिए 
उदयपुर जा सकते है लेकिन सितंबर से मार्च यहाँ घूमने जाने के लिए बढ़िया मौसम है इस समय यहाँ बढ़िया मौसम रहता है ! गर्मियों में तो यहाँ बुरा हाल रहता है और झील में नौकायान का आनंद भी ठीक से नहीं ले सकते !

कैसे जाएँ (How to reach Udaipur): दिल्ली से 
उदयपुर की दूरी लगभग 663 किलोमीटर है ! यहाँ जाने का सबसे बढ़िया साधन रेल मार्ग है दिल्ली से उदयपुर के लिए नियमित रूप से कई ट्रेने चलती है, जो शाम को दिल्ली से चलकर सुबह जल्दी ही उदयपुर पहुँचा देती है ! ट्रेन से दिल्ली से उदयपुर जाने में 12 घंटे का समय लगता है जबकि अगर आप सड़क मार्ग से जाना चाहे तो दिल्ली से उदयपुर के लिए बसें भी चलती है जो 14 से 15 घंटे का समय लेती है ! अगर आप निजी वाहन से उदयपुर जाने की योजना बना रहे है तो दिल्ली जयपुर राजमार्ग से अजमेर होते हुए उदयपुर जा सकते है निजी वाहन से आपको 11-12 घंटे का समय लगेगा ! हवाई यात्रा का मज़ा लेना चाहे तो आप सवा घंटे में ही उदयपुर पहुँच जाओगे !

कहाँ रुके (Where to stay in Udaipur): 
उदयपुर राजस्थान का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है यहाँ रोजाना हज़ारों देशी-विदेशी सैलानी घूमने के लिए आते है ! सैलानियों के रुकने के लिए यहाँ होटलों की भी कोई कमी नहीं है आपको 500 रुपए से लेकर 8000 रुपए तक के होटल मिल जाएँगे !

क्या देखें (Places to see in Udaipur): 
उदयपुर और इसके आस-पास देखने के लिए वैसे तो बहुत जगहें है लेकिन यहाँ के मुख्य आकर्षण सिटी पैलेस, लेक पैलेस, सहेलियों की बाड़ी, पिछोला झील, फ़तेह सागर झील, रोपवे, एकलिंगजी मंदिर, जगदीश मंदिर, जैसमंद झील, हल्दीघाटी, कुम्भलगढ़ किला, कुम्भलगढ़ वन्यजीव उद्यान, चित्तौडगढ़ किला और सज्जनगढ़ वन्य जीव उद्यान है ! इसके अलावा माउंट आबू यहाँ से 160 किलोमीटर दूर है वहाँ भी घूमने के लिए कई जगहें है !

अगले भाग में जारी...

उदयपुर - माउंट आबू यात्रा
  1. दिल्ली से उदयपुर की रेल यात्रा (A Train Trip to Udaipur)
  2. पिछोला झील में नाव की सवारी (Boating in Lake Pichhola)
  3. उदयपुर की शान - सिटी पैलैस (City Palace of Udaipur)
  4. उदयपुर से माउंट आबू की बस यात्रा (Road Trip to Mount Abu)
  5. वन्य जीव उद्यान में रोमांच से भरा एक दिन (A Day Full of Thrill in Wildlife Sanctuary)
  6. झीलों के शहर उदयपुर में आख़िरी शाम (One Day in Beautiful Jaismand Lake)

2 comments:

  1. मैंने उदयपुर 1975 में अपनी स्कूली ट्रिप पर देखा था । तब रोप वे नहीं चलता था और हम सड़क मार्ग से ही ऊपर गए थे। तुम्हारे लिखने का अंदाज़ पसन्द आया प्रदीप ....

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    1. उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद दर्शन कौर जी !

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