Sunday, June 11, 2017

कुम्भलगढ़ का किला - दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार (Kumbhalgarh Fort, The Second Longest Wall of the World)

रविवार, 20 नवंबर 2016

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !

यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम माउंट आबू से चलकर कई परेशानियों को पार करते हुए कुम्भलगढ़ पहुँचे ! अब आगे, केलवाड़ा में रात को जब सोए थे तो मौसम ठीक था लेकिन आधी रात के बाद अचानक ठंड बढ़ गई, गनीमत थी कि कमरे में कंबल रखे थे, तो ज़्यादा परेशानी नहीं हुई ! हालाँकि, रात को कुत्तों के भौंकने की आवाज़ सुनकर एक बार नींद भी खुली लेकिन खिड़की बंद करने के बाद पता नहीं चला कब सुबह हो गई ! सुबह समय से सोकर उठे, आज हमारा उद्देश्य "कुम्भलगढ़ किला" (Kumbhalgarh Fort) देखने के बाद "हल्दी घाटी" होते हुए वापिस उदयपुर पहुँचने का था, जहाँ से हमारी दिल्ली वापसी के लिए रात्रि ट्रेन थी ! बिस्तर से निकलने के बाद सभी लोग बारी-2 से नित्य क्रम से फारिक होकर तैयार होने लगे ! लेकिन हॉल में एक ही बाथरूम होने के कारण दिक्कत हो रही थी और समय भी ज़्यादा लग रहा था ! समस्या हल करने के लिए कुछ लोग नीचे वाले तल पर स्थित बाथरूम में पहुँच गए, और अगले एक घंटे में सब लोग नहा-धोकर तैयार हो चुके थे ! 
कुम्भलगढ़ किले का प्रवेश द्वार 

थोड़ी देर बाद हम सब एक बार फिर से इस होटल के डाइनिंग हॉल में बैठे सुबह के भोजन का आनंद ले रहे थे ! साढ़े आठ बजे तक हम यहाँ से खा-पीकर फारिक हो गए, फिर होटल का बिल चुकाने के बाद हमने अपना-2 सामान गाड़ी में रखा और कुम्भलगढ़ का किला देखने के लिए निकल पड़े ! किला यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं था, लगभग 7 किलोमीटर की इस दूरी को तय करने में हमें मुश्किल से 10 मिनट ही लगे ! किले की ओर जाते हुए रास्ते में हमें सड़क के किनारे एक कृत्रिम झील भी दिखाई दी, जो काफ़ी दूर तक फैली हुई थी ! केलवाड़ा से किले की ओर जाते हुए हमें सड़क के किनारे हमें कई बड़े होटल, रेस्टोरेंट और रिज़ॉर्ट देखने को मिले जिसमें क्लब महिंद्रा का शानदार रिज़ॉर्ट भी शामिल है ! अरावली की सुनसान पहाड़ियों में इन होटलों की रौनक देखते ही बनती है ! किले से एक किलोमीटर पहले ही किले की दीवारें दिखाई देनी शुरू हो जाती है, बीच-2 में सड़क के किनारे कुछ पेड़ भी लगे हुए है, मुख्य सड़क किले के विशाल प्रवेश द्वार से होते हुए अंदर तक जाती है ! दक्षिण की ओर स्थित किले के बाहरी प्रवेश द्वार से होते हुए हम अंदर दाखिल हुए !

होटल से निकलते हुए लिया एक चित्र
दूर से दिखाई देती किले की विशाल दीवार
मार्ग से दिखाई देता किले का बाहरी प्रवेश द्वार
दूर से दिखाई देती किले की विशाल दीवार
किले की दीवार के बीच में बनी विशाल बुर्ज
किले में प्रवेश का राम पोल द्वार
यहाँ एक विशाल पार्किंग है, गाड़ी खड़ी करके हम सब नीचे उतरे और दूर तक दिखाई दे रही किले की विशाल दीवारों को देखने लगे ! वैसे तो अब तक मैने कई किले देखे है लेकिन इस किले की बनावट कुछ अलग थी, जो अपने आप में ख़ास थी ! किले की बाहरी दीवार के बीच-2 में बने गुंबद के आकार के बुर्ज इस दीवार को सुरक्षा प्रदान करते है, इन विशाल बुर्जो को देख कर कोई भी इस किले की विशालता का अंदाज़ा लगा सकता है ! हम यहाँ खड़े होकर आस-पास की फोटो खींचने लगे, जबकि दुष्यंत किले के अंदर जाने का प्रवेश टिकट लेने के लिए टिकट घर की ओर चल दिया, जो बाहरी प्रवेश द्वार के पास ही था ! सुबह-2 का समय होने के कारण अभी ज़्यादा भीड़ नहीं थी, हमारे अलावा गिनती के 5-7 लोग ही यहाँ खड़े थे ! चलिए, जब तक दुष्यंत टिकट लेकर आता है मैं आपको इस किले से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें बता देता हूँ ! अरावली की पहाड़ियों के पश्चिमी छोर पर राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित इस किले का निर्माण 15वीं सदी में "राणा कुम्भा" ने करवाया था, उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम भी पड़ा ! 

ये किला मेवाड़ के महान शासक "महाराणा प्रताप" की जन्मस्थली भी है ! 19वी सदी तक आम जनता के लिए बंद रहने वाले इस किले को वर्तमान में लोगों के लिए खोल दिया गया है ! प्रतिदिन शाम को यहाँ किले में कुछ समय के लिए रोशनी भी की जाती है ! चित्तौडगढ़ के बाद इस किले को मेवाड़ के सबसे महत्वपूर्ण किलों में गिना जाता है, इस किले की 36 किलोमीटर दूर तक फैली दीवार "चीन की दीवार" के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार है और राजस्थान में चित्तौडगढ़ के किले के बाद ये दूसरा सबसे बड़ा किला है ! किले को बनाने का निर्माण कार्य 1443 में शुरू हुआ और ये 1458 में बनकर तैयार हुआ, इस तरह इस किले को बनने में लगभग 16 वर्षों का समय लगा ! पौराणिक कथाओं के अनुसार किले के निर्माण में रात को काम करने वाले श्रमिकों को रोशनी मुहैया कराने के लिए के राणा कुम्भा ने बड़े पैमाने पर दीपक जलवाए, जिनमें रोजाना 50 किलो घी और 100 किलो कपास लग जाता था ! 

कहते है कि राणा कुम्भा ने अपने शासनकाल में 84 किलों का निर्माण करवाया था जिसमें से 32 किलों का खाका उन्होने खुद तैयार किया, ये किला उन 32 किलों में से सबसे बड़ा है ! 13 ऊँची-2 पहाड़ियों से घिरे इस किले का निर्माण भी एक ऊँची पहाड़ी पर ही किया गया है जिसकी समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 1100 मीटर है ! किले के प्रांगण में कई इमारतें, मंदिर, बगीचे और पानी को संरक्षित करने के लिए कई बावलिया और कुंड भी बनाए गए थे ! एक अनुमान के मुताबिक किले परिसर में 350 से भी ज़्यादा मंदिर बने है, इन सभी मंदिरों में से भगवान शिव का "नीलकंठ महादेव मंदिर" (Neelkanth Mahadev Temple) सबसे सुंदर और प्रसिद्ध है ! इसलिए यहाँ आने वाले लोगों के लिए किले के बाद ये मंदिर भी आकर्षण का केंद्र रहता है ! बाहरी प्रवेश द्वार से अंदर जाते ही दाईं ओर स्थित ये एक भव्य मंदिर है जिसमें एक "विशाल शिवलिंग" भी स्थापित है ! ये किला अपने शानदार पैलेस के लिए भी प्रसिद्ध है जोकि किले के बीचों बीच ऊँचाई पर स्थित है इस पैलेस को “बादल महल” के नाम से भी जाना जाता है ! 



इस लेख में मैं आपको धीरे-2 किले परिसर में मौजूद हर जगह के बारे में बताता रहूँगा, फिलहाल दुष्यंत टिकट लेकर आ चुका है और हम "राम पोल" (Ram Pole) से होते हुए किले में प्रवेश करने जा रहे है ! जैसे ही हम अंदर दाखिल हुए, यहाँ कुछ स्थानीय लोग फल बेच रहे थे, दस कदम की दूरी पर बाईं ओर एक दुकान भी था, यहाँ से हमने पीने के लिए पानी और कुछ चोकलेट ले ली ! इस समय जहाँ हम खड़े थे, वहाँ एक बड़े पत्थर पर पूरे किले का मानचित्र भी दिया गया था ! हमारे बाईं ओर तो चारभुजा मंदिर था जबकि हमारी दाईं ओर नीलकंठ महादेव मंदिर जाने का मार्ग था ! सीधे जाने वाला मार्ग किले की मुख्य इमारत की ओर जा रहा था, सबसे पहले हम ये किला देखना चाहते थे इसलिए सीधे जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! इस किले के निर्माण को लेकर भी कई कहावते है, कहते है कि शुरुआत में जब राणा कुम्भा ने किले का निर्माण शुरू करवाया तो कई कोशिशें बेकार गई, फिर जब एक आध्यात्मिक सलाहकार से इस मामले में पूछा गया तो उन्होनें राणा कुम्भा को सलाह दी कि किले के निर्माण में जो भी बाधा आ रही है वो एक स्वैच्छिक मानव बलिदान से हल हो जाएगी ! 

आध्यात्मिक सलाहकार ने कहा कि बलिदान देने वाले व्यक्ति का सिर जहाँ गिरे वहाँ एक मंदिर का निर्माण किया जाए और जहाँ बाकी का शरीर रहे वहाँ किले का निर्माण करवाया जाए ! हालाँकि, कटे हुए सिर के ऊपर एक मंदिर का निर्माण मुझे थोड़ा अटपटा लग रहा है, लेकिन कहा तो यही जाता है ! शुरुआत में तो स्वैच्छिक बलि के लिए कोई आगे नहीं आया लेकिन कुछ दिन बाद एक सैनिक ने स्वैच्छा से अपनी बलि स्वीकार की ! कुछ लोग ये भी कहते है कि स्वैच्छिक बलि के लिए एक तीर्थयात्री ने अपना बलिदान दिया ! दोनों में से चाहे किसी ने भी बलिदान दिया हो, लेकिन अपनी मातृभूमि के लिए ये बलिदान सराहनीय था, क्योंकि इस बलिदान के बाद किले के निर्माण कार्य में कोई बाधा नहीं आई ! आज किले के प्रवेश द्वार हनुमान पोल के पास बलिदानी के नाम पर एक मंदिर स्थित है ! किले में दक्षिण से प्रवेश करने पर अरेट पोल, हल्ला पोल, और हनुमान पोल पड़ते है, यहाँ पोल का अर्थ द्वार से ही है ! किले के ऊपरी भाग में बने महलों तक जाने के लिए आपको भैरव पोल, निम्बो पोल, और पागड़ा पोल से होकर जाना होता है ! 

इस किले के पूर्व में भी एक प्रवेश द्वार है जिसे “दानीबिट्टा” के नाम से जाना जाता है, ये मेवाड़ को मारवाड क्षेत्र से जोड़ता है, हालाँकि, वर्तमान में इस किले में प्रवेश के लिए आधिकारिक तौर पर केवल दक्षिणी द्वार ही खुला है ! संकट के समय इस किले को मेवाड़ के तत्कालीन शासकों के लिए शरणगाह के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता था ! गुजरात के शासक अहमद शाह प्रथम ने एक बार 1457 में इस किले पर आक्रमण भी किया, लेकिन उसकी कोशिश बेकार गई, 1458 और 1467 में इस किले पर फिर से आक्रमण हुए, इस बार आक्रमणकारी था महमूद खिलजी, लेकिन ये कोशिश भी बेकार गई ! ये किले की मजबूत नींव और निर्माण का ही परिणाम था कि सीधे हमले से तो ये किला सदैव ही अभेद्य रहा ! जब 1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने "चित्तौड" पर हमला करके "चित्तौडगढ़ के किले" को अपने कब्ज़े में ले लिया था तो मेवाड़ के नवजात राजकुमार "उदय सिंह" को चित्तौड से लाकर यहाँ इसी किले में छुपाकर रखा गया था ! 




किले के ऊपर जाते हुए दिखाई देती किले की दीवार







इसी राजकुमार उदय सिंह ने आगे चलकर राजगद्दी संभाली और बाद में उदयपुर शहर भी स्थापना भी की ! जैसे-2 हम किले में आगे बढ़ते जा रहे थे, चढ़ाई भी बढ़ती जा रही थी और बढ़े भी क्यों ना, ये किला इतनी ऊँचाई पर जो स्थित है ! किले में चलते हुए हम धीरे-2 काफ़ी ऊँचाई पर पहुँच गए, ऊपर चढ़ते हुए हम रास्ते में रुक-रुककर फोटो भी खींच रहे थे ! यहाँ एक ऊँची जगह से दूर तक फैली किले की चौड़ी दीवार साफ दिखाई दे रही थी ! जहाँ तक नज़र जा रही थी, दीवार ही दिखाई दे रही थी ! किले की बाहरी दीवार इतनी चौड़ी है कि इसपर एक साथ 8 घोड़ो को क्रमबद्ध तरीके से खड़ा किया जा सकता है ! यहाँ से आगे बढ़े तो हम एक अन्य द्वार से होते हुए किले के ऊपरी भाग में पहुँच गए, यहाँ एक खुले मैदान को पार करने के बाद हम "तोपखाने" (Canon House) में पहुँच गए ! तत्कालीन दौर में यहाँ तोपख़ाना हुआ करता था, प्रदर्शनी स्वरूप कुछ तोपें यहाँ एक कक्ष में रखी गई है, बगल में ही चित्रों के माध्यम से उस दौर की जीवन शैली को दिखाने का प्रयास भी किया गया है ! 





यहाँ हमें कुछ उपकरणों के अवशेष भी देखने को मिले, इन उपकरणों को तोप में प्रयोग होने वाले बारूद की पिसाई और गोले बनाने के काम में प्रयोग में लाया जाता था ! तोपखाने के पास ही एक छोटा कुंड भी था, जिसे शायद तोपखाने में काम करने वाले श्रमिक उपयोग में लाते होंगे ! तोपखाने के पीछे किले की बाहरी दीवार में हथियारबंद सैनिकों के खड़े होने की व्यवस्था थी जो किले पर हमले के समय सुरक्षा की दृष्टि से काफ़ी महत्वपूर्ण था ! तोपखाने को देखकर वापिस आने के बाद हम आगे बढ़े तो महल के सबसे ऊपरी भाग में पहुँच गए, यहाँ कुछ हिस्सों में हाल-फिलहाल में ही मरम्मत कार्य किया गया था, लेकिन फिलहाल ये काम रुका हुआ लग रहा था ! धीरे-2 घूमते हुए हम "बादल महल" में पहुँच गए, ये इस किले की सबसे खूबसूरत इमारतों में से एक है ! यहाँ भी एक मंदिर बना है, प्रार्थना करने के बाद हम सीढ़ियों से होते हुए महल की छत पर पहुँच गए ! कुछ सीढ़ियाँ महल के गुप्त दरवाज़ों की ओर जाती है, हालाँकि, वर्तमान में इन दरवाज़ों को बंद कर दिया गया है !

तोपखाने के पीछे किले की दीवार









महल की छत से दिखाई देता एक दृश्य

मेरे अनुमान से ये गुप्त द्वार विपत्ति के समय मेवाड़ के शासकों द्वारा किले से बाहर जाने के लिए उपयोग में लाए जाते होंगे ! यहाँ घूमने के बाद हम महल से नीचे की ओर चल दिए, जब हम नीचे आ रहे थे तो हमें रास्ते में कई देसी-विदेशी लोग किले में घूमने जाते हुए दिखे ! नीचे पहुँचने के बाद हमने राम पोल के पास स्थित एक दुकान से थोड़ा खाने-पीने का सामान लिया और फिर नीलकंठ महादेव मंदिर को देखने चल दिए, जिसका मार्ग मुख्य प्रवेश द्वार के पास से ही था ! दूर से देखने पर ही इस मंदिर की भव्यता का अंदाज़ा हो जाता है, एक बड़े क्षेत्र में बने शिवजी के इस मंदिर में एक "विशाल शिवलिंग" भी स्थापित है ! मंदिर के बाहर जूते उतारकर हम सब अंदर दाखिल हुए और बारी-2 से यहाँ प्रार्थना की ! फिर मंदिर की परिक्रमा करने के बाद मंदिर के ऊपरी भाग में भी गए, बाहर धूप के कारण बहुत तेज गर्मी लग रही थी, लेकिन मंदिर के भीतरी भाग में बढ़िया ठंडक थी ! 

मंदिर की संरचना ही कुछ ऐसी है कि बाहर कितनी ही धूप हो, यहाँ अंदर हमेशा ठंडक ही बनी रहती है ! यहाँ से देखने पर किले का शानदार दृश्य दिखाई दे रहा था, इस लेख में पहला चित्र नीलकंठ महादेव मंदिर से ही लिया हुआ है ! कुछ समय यहाँ बिताने के बाद हम वापिस जाने के लिए अपनी गाड़ी की ओर चल दिए, इस किले को देखना बड़ा सुखद अनुभव रहा ! अगले कुछ ही पलों में हम गाड़ी में सवार होकर उदयपुर की ओर प्रस्थान कर चुके थे !
प्रवेश द्वार के पास से दिखाई देता महल



नीलकंठ महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार

नीलकंठ महादेव मंदिर 
मंदिर में स्थापित विशाल शिवलिंग



क्यों जाएँ (Why to go Kumbhalgarh): अगर आप किले और ऐतिहासिक इमारतें देखने का शौक रखते है तो आपको यहाँ ज़रूर जाना चाहिए क्योंकि इस किले की दीवार को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवार होने का दर्जा प्राप्त है ! इसके अलावा भी कुम्भलगढ़ और इसके आस-पास घूमने के लिए काफ़ी कुछ है !

कब जाएँ (Best time to go Kumbhalgarh): वैसे तो आप साल के किसी भी महीने में घूमने के लिए माउंट आबू जा सकते है लेकिन सितंबर से मार्च यहाँ घूमने जाने के लिए सबसे बढ़िया मौसम है ! गर्मियों में तो यहाँ बुरा हाल रहता है !

कैसे जाएँ (How to reach Kumbhalgarh): दिल्ली से कुम्भलगढ़ की दूरी लगभग 614 किलोमीटर है ! यहाँ जाने का सबसे बढ़िया साधन रेल मार्ग है और यहाँ का नज़दीकी रेलवे स्टेशन "रानी" है जिसकी दूरी कुम्भलगढ़ से महज 35 किलोमीटर है, जिसे आप बस या जीप से तय कर सकते है ! दिल्ली से रानी के लिए नियमित रूप से एक ट्रेन चलती है, जो रात को दिल्ली से चलकर सुबह रानी पहुँचा देती है ! ट्रेन से दिल्ली से कुम्भलगढ़ जाने में 12 घंटे का समय लगता है जबकि अगर आप सड़क मार्ग से जाना चाहे तो दिल्ली से कुम्भलगढ़ के लिए बसें तो नहीं चलती लेकिन आप टैक्सी से जा सकते है ! अगर आप निजी वाहन से कुम्भलगढ़ जाने की योजना बना रहे है तो दिल्ली जयपुर राजमार्ग से अजमेर होते हुए कुम्भलगढ़ जा सकते है निजी वाहन से आपको 12-13 घंटे का समय लगेगा ! इसके अलावा अगर आप हवाई यात्रा का आनंद लेना चाहते है तो यहाँ का सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा उदयपुर जिसकी दूरी यहाँ से 115 किलोमीटर के आस पास है ! हवाई यात्रा में आपको सवा घंटे का समय लगेगा !

कहाँ रुके (Where to stay in Kumbhalgarh): कुम्भलगढ़ राजस्थान का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है यहाँ रोजाना हज़ारों देशी-विदेशी सैलानी घूमने के लिए आते है ! सैलानियों के रुकने के लिए यहाँ होटलों की भी कोई कमी नहीं है कई बड़े होटल और रिज़ॉर्ट है ! जबकि छोटे होटल तो गिनती के ही है, जहाँ छोटे होटलों के लिए आपको 800-900 रुपए खर्च पड़ेंगे वहीं रिज़ॉर्ट में प्रतिदिन रुकने का खर्च 3000 से ऊपर ही आएगा !

क्या देखें (Places to see in Kumbhalgarh): कुम्भलगढ़ और इसके आस-पास देखने के लिए वैसे तो बहुत जगहें है लेकिन यहाँ का मुख्य आकर्षण "कुम्भलगढ़ का किला" (Kumbhalgarh Fort) है जिसे देखने के लिए लोग देश-विदेश से आते है ! कुम्भलगढ़ वन्यजीव उद्यान भी यहाँ देखने लायक जगह है, कुम्भलगढ़ से उदयपुर जाते हुए रास्ते में हल्दी घाटी नामक एक जगह पड़ती है जहाँ महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का स्मारक बना है ! घूमने आने वाले लोग ये स्मारक देखने भी ज़रूर जाते है ! उदयपुर यहाँ से 102 किलोमीटर दूर है, और वहाँ देखने के लिए सिटी पैलेस, लेक पैलेस, सहेलियों की बाड़ी, पिछोला झील, फ़तेह सागर झील, रोपवे, एकलिंगजी मंदिर, जगदीश मंदिर, जैसमंद झील, चित्तौडगढ़ किला और सज्जनगढ़ वन्य जीव उद्यान है ! इसके अलावा माउंट आबू जोकि यहाँ से 170 किलोमीटर दूर है वहाँ भी देखने के लिए कई जगहें है जिसमें दिलवाड़ा मंदिर, नक्की झील, गुरु शिखर, ट्रेवर टेंक वन्य जीव उद्यान प्रमुख है !

अगले भाग में जारी...

उदयपुर - कुम्भलगढ़ यात्रा
  1. उदयपुर में पहला दिन – स्थानीय भ्रमण (Local Sight Seen in Udaipur)
  2. उदयपुर का सिटी पैलेस, रोपवे और पिछोला झील (City Palace, Ropeway and Lake Pichola of Udaipur)
  3. उदयपुर से माउंट आबू की सड़क यात्रा (A Road Trip from Udaipur to Mount Abu)
  4. दिलवाड़ा के जैन मंदिर (Jain Temple of Delwara, Mount Abu)
  5. माउंट आबू से कुम्भलगढ़ की सड़क यात्रा (A Road Trip From Mount Abu to Kumbhalgarh)
  6. कुम्भलगढ़ का किला - दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार (Kumbhalgarh Fort, The Second Longest Wall of the World)
  7. हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध और महाराणा प्रताप संग्रहालय (The Battle of Haldighati and Maharana Pratap Museum)

6 comments:

  1. आपके माध्यम से इतना शानदार किला पहली बार देख़ रहा हूँ, लाजवाब।

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    1. जानकर अच्छा लगा कि लेख के माध्यम से किले का भ्रमण करके आपको अच्छा लगा !

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  2. कुम्भल गढ किले की दीवार की प्रसन्शा बहुत सुनी है। देखते है कब दीदार होता है?

    आपके लेख में ( । ) ये वाला फुल स्टाफ दिखायी नहीं देता, क्या समस्या है भाई, जहाँ भी देखा ये ! मिला।

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  3. पता नहीं संदीप भाई, बटन तो शिफ्ट के साथ 1 नंबर वाला ही दबाया था !

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    1. धन्यवाद जतिन भाई !

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