Thursday, April 6, 2017

परमहंस आश्रम, सिद्धनाथ दरी और चुनार के किले का भ्रमण (Visit to Siddhnath Dari, ParamHans Aashram and Chunar Fort)

शनिवार, 13 अगस्त 2016

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पिछले लेख में आपने लखनिया दरी और जरगो बाँध के बारे में पढ़ा, जरगो बाँध से चलकर हम परमहंस आश्रम के सामने पहुँच चुके थे ! ये आश्रम मिर्ज़ापुर के सक्तेषगढ़ में पड़ता है और आस-पास के इलाक़ों में इस आश्रम का बहुत नाम है ! मुख्य मार्ग को छोड़कर हम आश्रम की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए, आश्रम के प्रवेश द्वार से कुछ दूरी पर सड़क के किनारे गाड़ियाँ खड़ी करने की व्यवस्था है ! चंद्रेश भाई ने बताया यहाँ साल में एक बार मेला लगता है तब देश-विदेश से यहाँ हज़ारों लोग दर्शन के लिए आते है, मेले के दौरान तो यहाँ पैर रखने तक की जगह भी नहीं मिलती ! अपनी बाइक यहाँ खड़ी करके हम बगल में ही लगे एक नल पर हाथ-पैर धोने लगे ! हमारे अलावा कुछ अन्य लोग भी इस समय आश्रम में जाने की तैयारी कर रहे थे, ये लोग जीप से आए थे जिस पर पर बिहार का नंबर था ! इसके अलावा भी अलग-2 शहरों के रेजिस्ट्रेशन नंबर के वाहन आश्रम के बाहर खड़े थे ! ये आश्रम स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज को समर्पित है, यथार्थ गीता जोकि भगवान कृष्ण द्वारा रचित भगवत गीता का सरल रूप है की रचना इन्होनें ही की थी ! 


सिद्धनाथ दरी का एक दृश्य
कहा जाता है कि स्वामी अड़गड़ानंद जी अपने गुरु “संत परमानंद जी” के पास वर्ष 1955 में सत्य की खोज करते हुए आए थे, उस समय इनकी आयु महज 23 वर्ष थी। स्वामी परमानंद जी का आश्रम चित्रकूट अनुसूया, सतना, मध्य प्रदेश, के घने जंगलों में स्थित था ! वह जंगली जानवरों के घने जंगलों में बिना किसी सुविधा के रहते थे ! यह भी कहा जाता है कि अड़गड़ानंद जी ने अपने गुरु के सामीप्य में 15 वर्षों तक (बिना भोजन, पानी और आराम के) गहन ध्यान लगाया था ! आश्रम के अंदर फोटोग्राफी वर्जित है इसलिए आश्रम में प्रवेश करने से पहले ही हमने अपने-2 फोन जेब में रख लिए ! आश्रम में जाने का मुख्य द्वार बहुत ऊँचा है द्वार के बाहर मुख्य मार्ग पर एक शिवलिंग बना है जिसके पीछे मनुष्य के जीवन की चार अवस्थाओं को चित्रित किया गया है ! इसमें बाल, युवा, वृद्धा और मोक्ष अवस्थाओं को दिखाया गया है ! प्रवेश द्वार के पास ही एक छोटा कुंड बना है जिसमें भगवान शिव की प्रतिमा रखी गई है और कुंड के जल में उगे हुए कमल के फूल बहुत सुंदर लगते है ! 

आश्रम परिसर में एक जगह अमृत कलश का भी चित्रण किया गया है, सारी कलाकृतियाँ लाजवाब है ! मुख्य द्वार से होते हुए हम आश्रम में दाखिल हुए, यहाँ खूब बढ़िया बाग-बगीचे है ! रंग-बिरंगे फूल और हरे-भरे पेड़-पौधों से आश्रम भरा पड़ा है ! आश्रम के अंदर ही वो स्थान भी है जहाँ बैठकर स्वामी अड़गड़ानंद जी उपदेश दिया करते थे ! अंदर लोगों के बैठने की भी उत्तम व्यवस्था है, अधिकतर जगह पत्थर बिछे हुए है ! घूमते हुए हम आश्रम के रसोईघर, और गौशाला में भी गए, आश्रम से सटे हुए कुछ खेत है, जहाँ आश्रम के लिए खेती होती है ! फिलहाल खेतों से लाए गए आलू आश्रम के एक कौने में रखे हुए थे ! चारों तरफ घूम लिए तो हम एक बड़े पंडाल में पहुँचे, उत्सव के समय इसी पंडाल में बिठाकर एक साथ हज़ारों लोगों को भोजन कराया जाता है ! यहाँ बड़ा ही शांत माहौल था, ध्यान लगाने के लिए उत्तम स्थान, हमें यहाँ घूमने में बड़ा आनंद आ रहा था ! अभी हम आश्रम में टहल ही रहे थे कि बारिश शुरू हो गई, भागकर एक सुरक्षित स्थान पर पहुँचे ! 

यहाँ रुककर 15-20 मिनट बारिश के रुकने का इंतजार किया, फिर बारिश धीमी होते ही हम आश्रम परिसर से बाहर आ गए ! पार्किंग स्थल से अपनी बाइक उठाई और सिद्धनाथ दरी देखने के लिए चल दिए ! सिद्धनाथ दरी यहाँ से महज 3 किलोमीटर दूर है लेकिन रास्ता चढ़ाई भरा है, सड़क मरम्मत का काम चल रहा था इसलिए मार्ग पर रोड़ियाँ बिखरी पड़ी थी, हम बड़ी सावधानी से आगे बढ़े ! थोड़ी ऊँचाई पर पहुँचे तो एक जगह सड़क किनारे से झरने से गिरता पानी दिखाई दे रहा था, शानदार नज़ारा था ! कुछ देर यहाँ रुककर फिर आगे बढ़े, थोड़ी देर में ही हम चुनार रोड को छोड़कर अपने दाईं ओर जाते एक मार्ग पर मुड़ गए ! अंदर जाने पर कुछ दूरी पर एक पार्किंग स्थल बना था, यहाँ अपनी मोटरसाइकल खड़ी करके हम झरने की ओर पैदल चल दिए ! झरने से पहले तो पानी सामान्य रूप से बहता है, लेकिन आगे ढलान होने के कारण पानी का बहाव तेज होता जाता है फिर एक जगह जब पानी बहुत ऊँचाई से नीचे गिरता है तो ये झरने का रूप ले लेता है ! 

कुल मिलाकर मेरा कहने का उद्देश्य ये है कि झरने से पहले बहते पानी को देखकर आप कह नहीं सकते कि 20 कदम की दूरी पर ही इतना शानदार झरना भी देखने को मिलेगा ! झरने से पहले बहते पानी में बच्चे खेल रहे थे, इसे देखकर ऐसा ही लगता है जैसे बारिश में किसी मैदान में पानी जमा हो जाता है ! झरने के आस-पास खूब बड़े-2 पत्थर और घने पेध-पौधे है, थोड़ी दूरी पर एक रेल मार्ग भी जाता है ! हमने इस मार्ग पर रेल-गाड़ियाँ आती-जाती देखी, लेकिन रेल में बैठे यात्रिओं की बदक़िस्मती है कि रेलवे लाइन से काफ़ी नीचाई पर होने के कारण रेल के अंदर से ये झरना दिखाई नहीं देता ! यहाँ बंदरों का भी बड़ा आतंक है, स्थानीय लोग झरने की ओर जाने वाले मार्ग पर खाने-पीने का सामान बेचते रहते है ! ऐसे ही एक फेरी वाले से हमने भी खाने का थोड़ा सामान लिया और झरने के पास जाकर बैठ गए ! इस जल-प्रपात का नाम सिद्धनाथ बाबा के नाम पर पड़ा जो यहाँ साधना किया करते थे ! इस झरने को देखने के अलावा लोग यहाँ पुराने शैल चित्रों और नक्काशियों का अध्ययन करने भी आते है ! बारिश का मौसम होने के बावजूद आज का दिन उमस भरा था, लेकिन झरने के पास आधा घंटा कब बीत गया, पता ही नहीं चला ! 

यहाँ से चले तो वापिस परमहंस आश्रम के सामने से होते हुए चुनार का किला देखने के लिए चल दिए ! रास्ते में एक जगह रुककर भोजन भी किया, दाल-चावल, रोटी और आलू की सब्जी खाकर मज़ा आ गया, बिल्कुल घर जैसा खाना बना था, सबने जी भरकर खाया ! सिद्धनाथ की दरी से चुनार का किला 26 किलोमीटर दूर है, जिस होटल में हम खाना खा रहे थे वहाँ से ये किला 12 किलोमीटर के आस-पास था ! खा-पीकर फारिक हुए तो बाइक लेकर किले की ओर प्रस्थान किया ! थोड़ी देर में हम किले के प्रवेश द्वार पर खड़े थे, किले के अंदर प्रवेश किया तो सामने ही टेबल लगाकर एक सिपाही बैठा था ! यहाँ एक आगंतुक रजिस्टर रखा हुआ था, अपनी जानकारी देने के बाद हम किले के भीतरी भाग में जाने वाले द्वार की ओर चल दिए ! उस सिपाही ने हमें निर्देश दे दिए कि किले के कुछ हिस्सों में प्रवेश वर्जित है ! दरअसल, वर्तमान में यहाँ एक पुलिस ट्रैनिंग कैंप है इसलिए किले के कुछ हिस्सों में ही लोगों को जाने दिया जाता है ! बाकि जगहों पर पुलिस गतिविधियाँ चलती रहती है इसलिए आम लोगों को यहाँ जाने की अनुमति नहीं है !

चुनार के इस किले का निर्माण सौलहवीं शताब्दी में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने अपने भाई राजा भरथरी के लिए करवाया था ! ये भी कहा जाता है कि राजा भरथरी ने इस किले में ही समाधि ले ली थी ! बाद में मुगलकाल के दौरान भारत में मुगल वंश का संस्थापक बाबर यहाँ आया ! समय के साथ ये किला कई हाथों में गया, फिर अंत में इसपर ईस्ट इंडिया कंपनी ने कब्जा जमा लिया और इसे हथियार और गोला बारूद के लिए डिपो के रूप में इस्तेमाल करने लगे ! ये किला गंगा नदी के किनारे एक पहाड़ पर स्थित है, तीव्र ढलान के कारण इस किले तक पहुँचना काफ़ी कठिन है ! शायद यही वजह है कि ये किला वर्षों तक हमलों से बचा रहा ! किले के अंदर जाने पर हम सबसे पहले एक कुएँ पर पहुँचे, इस कुएँ के आस-पास खूब झाड़ियाँ उगी हुई थी, झाँककर कुएँ में देखा तो अंदर पानी था ! बगल में ही कुछ क्षतिग्रस्त कमरे भी थे, अधिकतर कमरों की छतें गिर चुकी थी और इनपर अब झाड़ियाँ उग चुकी थी ! यहाँ से चले तो घूमते हुए किले के पिछले भाग में पहुँच गए, जहाँ क़ैदखाना बना हुआ है ! 

कुछ क़ैदखाने तो ज़मीन की सतह पर है जबकि कुछ भूमिगत भी है, इन भूमिगत कैदखानों में हल्की रोशनी जाने के लिए और ऊपर से झाँकने के लिए जगह-2 मोखले बने हुए है ! एक दो जगह इन भूमिगत कैदखानों तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी है, हालाँकि अब इन सीढ़ियों को स्थाई रूप से लोहे के ग्रिल लगाकर बंद कर दिया है ! लेकिन उस दौर में इन सीढ़ियों से नीचे जाकर कैदियों को खाना वगेरह दिया जाता होगा ! मोखलों से क़ैदखानो में देखने पर एकदम गुप्प अंधेरे के अलावा कुछ नहीं दिखाई दे रहा था ! पुराने समय में ख़ूँख़ार कैदियों को इन भूमिगत कैदखानों में ही रखा जाता था, सोचकर ही दिल सहम जाता है कि बिना रोशनी के इन कैदियों का जीवन कैसा रहता होगा ! वैसे किले की भीतरी दीवारों और छतों पर बढ़िया कारीगरी की गई है, किले के इस भाग में जगह-2 छायदार पेड़ भी लगे थे ! टहलते हुए थोड़ा और आगे बढ़े तो किले के बगल में बहती गंगा नदी दिखाई दी ! बारिश का मौसम होने की वजह से नदी का जलस्तर बढ़ा हुआ था, थोड़ी दूरी पर एक निर्माणाधीन पुल भी दिखाई दिया ! आधा घंटा किले में घूमने के बाद हम सब बाहर आ गए ! 

किले से बाहर निकले तो अच्छी धूप थी लेकिन थोड़ी दूर ही गए थे कि उत्तर दिशा से बादल घिर आए ! बादलों को देखकर लग रहा था कि बहुत तेज बारिश होगी ! बादल इतने काले थे कि दोपहर 3 बजे ही चारों तरफ घना अंधेरा छा गया ! चंद्रेश भाई बोले, आप लोगों को छोड़कर मुझे वापिस इधर ही आना है ! हमने कहा, मौसम खराब हो रहा है, आप सुबह से ही हमारे साथ है, अब हम यहाँ से किसी भी ऑटो में बैठकर नारायणपुर होते हुए वापिस बनारस चले जाएँगे ! अगर आप हमें छोड़ने जाएँगे तो बेवजह परेशान ही होंगे, बात जायज़ थी इसलिए वो मान गए ! अभी तक हम एक सहायक मार्ग पर चल रहे थे, थोड़ी देर में ही जब हम इसे छोड़कर मुख्य मार्ग पर आ गए तो सड़क किनारे एक दुकान पर रुककर चाय पीने के बाद हमने चंद्रेश भाई से विदा ली ! आज का दिन बहुत अच्छा बीता था, अगर चंद्रेश भाई साथ ना रहते तो हम इतने कम समय में इतनी जगहें नहीं घूम पाते ! यहाँ से एक ऑटो में बैठकर नारायणपुर के लिए चले तो थोड़ी दूर जाते ही बारिश शुरू हो गई ! ये ऑटो नारायणपुर से आगे रामनगर बाइपास तक जा रहा था इसलिए अन्य सवारियाँ तो आती-जाती रही पर हम इसी में बैठे रहे ! 

रामनगर से दूसरे ऑटो में सवार होकर बीएचयू के लिए निकल पड़े, बारिश की वजह से रास्ते में जगह-2 जलभराव मिला ! इस जलभराव के कारण 20 मिनट के सफ़र को तय करने में हमें पौना घंटा लग गया, जैसे-तैसे करके बीएचयू पहुँचे ! यहाँ भी चौराहे के सामने भयंकर जाम लगा था, अगर हम ऑटो से जाते तो ऑटो हमें घाट से काफ़ी पहले उतार देता, इसलिए यहाँ से हम एक ई-रिक्शे में सवार होकर दशावमेघ घाट के लिए निकल पड़े ! इस मार्ग पर भी भयंकर जाम था, जाम से बचने के चक्कर में रिक्शे वाले ने पूरा बनारस घुमा दिया ! लेकिन फिर भी आगे जाकर जाम में फँस ही गए, जाम में खड़े-2 जब सब्र जवाब दे गया तो शिवाला घाट पर उतरकर पैदल ही दशावमेघ घाट की ओर चल दिए ! आरती का सही समय ना मालूम होने के कारण एक बार तो लगने लगा कि आरती शुरू होने से पहले शायद हम घाट तक नहीं पहुँच पाएँगे ! जैसे-तैसे करके घाट पर पहुँचे, तो वहाँ लगी भीड़ को देखकर दोनों की हिम्मत जवाब दे गई ! एक तो दिन-भर बाइक पर बैठे-2 कमर दर्द करने लगी थी, दूसरा हम कल से लगातार सफ़र किए जा रहे थे !

सफ़र में रहने के कारण अभी तक नहाए भी नहीं थे, और फिर उमस भरा मौसम होने के कारण तबियत नासाज थी ! बारिश के कारण गंगा का जलस्तर भी काफ़ी बढ़ गया था इसलिए गंगा आरती अपने नियमित स्थान पर ना होकर घाट के किनारे किसी मंदिर की छत पर हो रही थी ! नाव वाले घाट के आस-पास टहलते हुए भक्तों को 100 रुपए में नाव में बिठाकर गंगा आरती दिखाने का प्रलोभन दे रहे थे ! हमने एक नाव वाले को पकड़ा, जब उसने नाव दिखाई तो वो काफ़ी पीछे थी, गंगा आरती वहाँ से शायद ही दिखाई देती ! हाँ, अगर ये नाव आरती स्थल के सामने होती तो ज़रूर हम इसमें बैठ जाते ! लेकिन सामने वाली अधिकतर नावें तो पहले से ही भरी हुई थी, मैने सत्प्रकाश से पूछा तो उसने ऐसी स्थिति में आरती देखने से मना कर दिया ! फिर आपसी सहमति से अंत में निर्णय लिया कि सामान लेकर ऐसी भीड़-भाड़ में आरती नहीं देख पाएँगे ! आरती शुरू होने में अभी भी समय था हमने सोचा जब तक आरती शुरू होगी आस-पास कोई होटल देख लेते है ! 

अगर संभव हुआ तो आरती देख लेंगे वरना फिर कभी बनारस चक्कर लगेगा तब देखा जाएगा ! घाट से वापिस आकर आस-पास होटल ढूँढने निकले तो 100 कदम की दूरी पर ही हमें 800 रुपए में एक होटल मिल गया, होटल में आकर नहा-धोए तो हालत में थोड़ा सुधार आया ! होटल से निकलकर एक बार फिर हम दोनों घाट का जायजा लेने पहुँचे, भीड़ अभी भी जस-की-तस थी, आरती शुरू हो चुकी थी, बहुत से लोग गंगा में डुबकी लगा-लगाकर आ-जा रहे थे ! अब हमने गंगा आरती देखने का विचार त्याग दिया और वापिस बनारस की गलियों की ओर चल दिए ! बनारस तो मैं पहले भी आता रहा हूँ, इसलिए यहाँ के रास्तों से ठीक-ठाक वाकिफ़ हूँ ! बाज़ार में टहलते हुए थोड़ी बहुत पेट-पूजा भी करते रहे, फिर लगभग घंटा भर घूमने के बाद खा-पीकर वापिस अपने होटल पहुँचे और आराम करने के लिए अपने-2 बिस्तर पर चल दिए !


आश्रम की ओर जाने का मार्ग

आश्रम के सामने बनी कुछ आकृतियाँ


आश्रम के सामने बनी कुछ आकृतियाँ

आश्रम के बाहर का एक दृश्य

आश्रम के बाहर का एक दृश्य

दूर से दिखाई देता सिद्धनाथ दरी से गिरता जल

दूर से दिखाई देता सिद्धनाथ दरी से गिरता जल

दाएँ जाने वाला मार्ग सिद्धनाथ दरी जाता है

सिद्धनाथ दरी की ओर बहकर जाता जल

सिद्धनाथ दरी की ओर बहकर जाता जल

सिद्धनाथ दरी का एक दृश्य

सिद्धनाथ दरी का एक दृश्य

सिद्धनाथ दरी का एक दृश्य

सिद्धनाथ दरी से चुनार जाते हुए


चुनार के किले में एक कुआँ

किले से दिखाई देता गंगा नदी पर निर्माणाधीन पुल

किले का पिछला भाग




सामने फर्श पर दिखाई देते मोखले


बाईं ओर बने क़ैदखाने






क्यों जाएँ (Why to go Mirzapur): मिर्जापुर में स्थित परमहंस आश्रम और सिद्धनाथ दरी शानदार जगहें है इसके अलावा चुनार के किले का ज़िक्र तो आपने चंद्रकान्ता में भी सुना ही होगा ! अगर इन जगहों को देखना चाहते हो तो मिर्जापुर का रुख़ कर सकते है !

कब जाएँ (Best time to go Mirzapur): वैसे तो आप मिर्जापुर साल के किसी भी महीने में जा सकते है लेकिन यहाँ स्थित झरनों का मुख्य स्त्रोत बारिश का पानी ही है ! इसलिए अगर झरनों का असली मज़ा लेना है तो बारिश के मौसम में जाएँ !

कैसे जाएँ (How to reach Mirzapur): इन झरनों तक जाने के लिए सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन चुनार और वाराणसी है, चुनार रेलवे स्टेशन से ये झरना महज 21 किलोमीटर दूर है जबकि वाराणसी से ये दूरी बढ़कर 58 किलोमीटर हो जाती है ! दोनों ही रेलवे स्टेशन से आप टैक्सी ले सकते है जबकि शैयर्ड जीप या ऑटो से भी इन झरनों तक जा सकते है !

कहाँ रुके (Where to stay in Mirzapur): झरनों के पास तो रुकने के लिए कोई होटल उपलब्ध नहीं है आप चुनार या वाराणसी में किसी होटल में रात्रि विश्राम के लिए रुक सकते है !

क्या देखें (Places to see in Mirzapur): मिर्ज़ापुर में देखने के लिए कई जगहें है यहाँ विंध्यम फॉल, टांडा फॉल, लखनिया दरी, और सिद्धनाथ दरी के अलावा कई धार्मिक स्थल भी है ! इन धार्मिक स्थलों में विंध्यवासिनी देवी का मंदिर प्रमुख है ! इसके अलावा परमहंस आश्रम, जरगो बाँध, और चुनार का किला भी यहाँ आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहते है !

अगले भाग में जारी...

मिर्जापुर यात्रा
  1. मिर्जापुर यात्रा - लखनिया दरी (Trip to Lakhania Daari, Mirzapur)
  2. लखनिया दरी और जरगो बाँध भ्रमण (Visit to Lakhaniya Daari and Jargo Dam)
  3. परमहंस आश्रम, सिद्धनाथ दरी और चुनार के किले का भ्रमण (Visit to Siddhnath Dari, ParamHans Aashram and Chunar Fort)
  4. रामनगर फ़ोर्ट और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (A Visit to Ramnagar Fort and BHU)

4 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा है आपने , याद ताजा कर दी आपने । यहाँ आने के मजा बरसात के समय ही है । थोडा इसके साथ वाराणसी से दुरी या गूगल मैप जोड़ सकते है । ताकि उस छुपे हीरे तक पहुचने में लोगो को सुबिधा होगी ।
    #घुम्मकड़ी दिल से

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    1. सुझाव के लिए धन्यवाद किशन जी, पोस्ट के नीचे मैप जोड़ दिया है !

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  2. सिद्धनाथ दरी का दृश्य बहुत ही खूबसूरत है

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    1. जी, वाकई दरी का दृश्य लाजवाब था, अब तक आँखों में ज्यों का त्यों है !

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