Monday, April 10, 2017

रामनगर फ़ोर्ट और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (A Visit to Ramnagar Fort and BHU)

रविवार, 14 अगस्त 2016

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लंबे सफ़र की थकान के कारण रात को बढ़िया नींद आई और सुबह समय से सोकर उठे ! हमारा कमरा होटल की दूसरी मंज़िल पर था, कमरे की खिड़की गैलरी में खुल रही थी इसलिए बाहर के मौसम के बारे में कुछ भी नहीं पता चल रहा था ! बिस्तर से उठकर दोनों नित्य क्रम में लग गए, बाथरूम कमरे के बाहर गैलरी में था ! थोड़ी देर में बारी-2 से हम दोनों नहा धोकर तैयार हो गए ! आज शाम को ही हमारी वापसी की ट्रेन थी, मतलब घूमने ले लिए आज का पूरा दिन अभी भी हमारे था ! वापिस जाने से पहले हम रामनगर किला और बीएचयू घूम लेना चाहते थे, तो कार्यक्रम कुछ इस तरह था कि पहले चलकर रामनगर का किला देख लेते है दोपहर तक वापिस आकर बीएचयू चले जाएँगे और फिर शाम होते-2 मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन पहुँच जाएँगे ! होटल के काउंटर पर जाकर देखा तो कोई नहीं था, आवाज़ लगाई, एक कर्मचारी बगल वाले कमरे से निकलकर आया ! मैने कहा, दो चाय मिलेगी, वो बोला बाज़ार से दूध लाना पड़ेगा, आधा घंटा लगेगा ! इतना समय नहीं है हमारे पास, ऐसा कर हमारा हिसाब कर दे, हम अभी निकल रहे है !


बनारस में गंगा किनारे स्थित रामनगर किले का एक दृश्य

आँखें मसलते हुए उसने यात्री रजिस्टर निकाला और मेरा हिसाब बनाकर दे दिया, बकाया राशि का भुगतान करने के बाद मैं वापिस अपने कमरे में सामान लेने आ गया ! यहाँ आकर सत्प्रकाश को सारी स्थिति से अवगत कराया, फिर हम दोनों अपना-2 बैग लेकर नीचे आ गए ! जब कमरे से निकलकर नीचे आ रहे थे तो हमने प्रथम तल पर विदेशी लड़के-लड़कियों का एक समूह देखा ! ये कॉलेज के विद्यार्थी लग रहे थे शायद यहाँ छुट्टियाँ बिताने आए थे, प्रथम तल पर सभी कमरों में ये विदेशी ही रुके थे, ये सब आपस में खूब मस्ती कर रहे थे ! होटल से बाहर निकले तो थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद हमें बीएचयू जाने के लिए एक ऑटो मिल गया ! सुबह का समय था, तो बनारस की अधिकतर सड़कें खाली पड़ी थी, बीएचयू पहुँचने में हमें ज़्यादा समय नहीं लगा ! यहाँ एक दुकान पर जाकर चाय संग कचोरियाँ और जलेबी खाई और फिर रामनगर बाइपास जाने के लिए एक ऑटो पकड़ लिया ! गनीमत रही कि इस समय ये मार्ग भी खाली मिला, साढ़े आठ बज रहे थे जब हम रामनगर बाइपास पर ऑटो से उतरे ! 

यहाँ से रामनगर किला जाने के लिए दूसरा ऑटो पकड़ना पड़ा ! किले की ओर जाने वाला मार्ग नारायणपुर जाने वाले मार्ग के विपरीत दिशा में है, थोड़ी दूर जाकर हम अपनी बाईं ओर मुड़कर गए ! ये एक रिहायशी इलाक़ा था, साथ में ही एक अच्छा-ख़ासा बाज़ार भी था, यहाँ कुछ सवारियाँ ऑटो से उतरी और कुछ नई चढ़ी ! यहाँ से चले तो थोड़ी देर में ही किले के सामने पहुँच गए, यहाँ अन्य सवारियों के साथ हम भी ऑटो से उतर गए ! किले के सामने खाने-पीने का सामान बेचते हुए कई ठेले वाले खड़े थे, किले का प्रवेश द्वार खुलने में अभी समय था, इसलिए अन्य लोगों की तरह हम ही वहीं एक पेड़ के नीचे खड़े होकर द्वार खुलने की प्रतीक्षा करने लगे ! आज बढ़िया धूप खिली थी, जिसके कारण अच्छी-ख़ासी उमस भी हो गई थी, पेड़ के नीचे खड़े एक नींबू-पानी वाले से दो गिलास नींबू पानी बनाने के लिए कहा ! पानी पीकर थोड़ी राहत मिली, फिर जब 10 बजे किले का द्वार खुला तो हम सब अंदर दाखिल हुए ! 

जब तक हम टिकट खिड़की पर पहुँचे, टिकट लेने के लिए काफ़ी लंबी कतार हो चुकी थी, गर्मी के कारण लोग तौलिए से मुँह ढक-2 कर कतार में खड़े थे ! मैं सत्प्रकाश से बोला, थोड़ी देर में ये भीड़ ख़त्म हो जाएगी तब आराम से टिकट लेंगे, तब तक हम आस-पास की फोटो खींच लेते है ! किले में प्रवेश करते ही बाईं ओर टिकट घर है, टिकट घर से सटा हुआ ही म्यूज़ीयम का प्रवेश द्वार है ! किले के मुख्य द्वार से अंदर जाने पर ठीक सामने एक बड़ा गोल-चक्कर बना है, जिसके चारों तरफ जंजीर लगी है ! इसी गोल-चक्कर के किनारे म्यूज़ीयम से बाहर आने का द्वार है ! किले के एक हिस्से में इस समय मरम्मत का कार्य चल रहा था, इसलिए निर्माण सामग्री बिखरी पड़ी थी ! हम चारों तरफ घूमते हुए फोटो खींचने लगे, 15 मिनट में जब टिकट खिड़की से भीड़ ख़त्म हो गई तो हमने भी 20 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से म्यूज़ीयम देखने के दो टिकट ले लिए ! 

चलिए, आगे बढ़ने से पहले थोड़ी जानकारी इस किले के बारे में दे देता हूँ, गंगा नदी के किनारे बने इस किले का निर्माण सन 1750 में राजा बलवंत ने करवाया था ! ये किला हमेशा से ही काशी के राजाओं का निवास स्थान रहा है, वर्तमान में भी काशी नरेश अनंत नारायण सिंह यहाँ रहते है ! किले के जिस भाग में वर्तमान काशी नरेश रहते है वहाँ आम लोगों के जाने पर पाबंदी है ! किले के मुख्य प्रवेश द्वार से अंदर के भवनों के बीच एक बड़ा खुला मैदान है ! कहा जाता है कि माँ अन्नपूर्णा द्वारा काशी से निकाले जाने के बाद वेद व्यास जी यहाँ आकर रहे थे और यहीं पर उन्होनें महाभारत की रचना की ! काशी का इतिहास बड़ा ही रोमांचक है, बहुत ज़्यादा यहाँ नहीं लिखूंगा वरना लेख की दिशा ही बदल जाएगी ! म्यूज़ीयम के प्रवेश द्वार पर टिकट दिखाकर हम दोनों अंदर दाखिल हुए, अंदर जाते ही सबसे पहले बग्गियों का संग्रह है ! इन बग्गियों में हाथ और घोड़ों से चलने वाली बग्गियाँ शामिल है, हाथ से चलने वाली बग्गियाँ तो बहुत सामान्य है, ये लकड़ियों को काटकर बनाई गई है, इनके पहिए भी बैलगाड़ी वाले है ! 

जबकि घोड़ों से चलने वाली बग्गियाँ शाही अंदाज की है, ये लोहे की बनी हुई है और सुंदर साजो-सामान से सुसज्जित है ! रात को इन बग्गियों में चलने में कोई दिक्कत ना हो इसके लिए इनके हर कोनों पर लैंप लगाने की जगहें है ! बैठने की सीट गद्देदार है और काफ़ी ऊँचाई पर बनी है, बग्गी के पहिए आधुनिक है और भार वहाँ क्षमता बढ़ाने के लिए कमानी भी लगी है ! वाकई, जब दो घोड़े इस बग्गी को खींचते होंगे, तो इसमें बैठना शाही अनुभव रहता होगा ! हर बग्गी पर एक वर्ष लिखा हुआ था संभवत ये बग्गी उस वर्ष बनी होगी ! कुछ बग्गियाँ तो विदेशों से मंगाई गई थी जबकि कुछ अन्य बग्गियाँ अंग्रेज़ो द्वारा काशी नरेश को भेंट स्वरूप दी गई थी ! काश, इस म्यूज़ीयम में फोटोग्राफी वर्जित ना होती तो आप लोगों को इन बग्गियों की एक-2 झलक भी दिखा देता ! बग्गियों के बाद नंबर आया विंटेज कारों का, इस म्यूज़ीयम में नामी-गिरामी विदेशी कंपनियों की गाड़ियों का भी अच्छा संग्रह है ! फिर चाहे वो कार रोल्स रॉयस की हो, कॅडिलाक की, फ़ोर्ड की, या मिनेरवा की, हर कार इस म्यूज़ीयम में रखी थी ! 

कुल 8-9 कारें यहाँ रखी थी, अधिकतर कारों पर काशी लिखा था, तत्कालीन काशी नरेश इन सभी विदेशी गाड़ियों को उपयोग में लाते थे ! बग्गियों की तरह कुछ गाड़ियाँ भी काशी नरेश को भेंट स्वरूप विदेशी मेहमानों और अँग्रेज़ों से मिली थी ये जानकारी गाड़ियों के पास लगे बोर्ड पर अंकित थी ! यहाँ इस म्यूज़ीयम में गाड़ियों और बग्गियों का संग्रह तो काफ़ी अच्छा है लेकिन म्यूज़ीयम में इनका रख-रखाव ठीक ढंग से नहीं किया जा रहा ! अधिकतर गाड़ियों पर धूल की मोटी परत जम चुकी है, मेरे विचार में म्यूज़ीयम की टिकट का मूल्य बढ़ाकर रख-रखाव का खर्च निकल सकता है ! गाड़ियाँ देखने के बाद हम इस हाल से बाहर निकलकर कुछ कदम चलने के बाद दूसरी इमारत में पहुँच गए ! यहाँ कुछ अन्य वस्तुएँ संग्रहालय में सहेज कर रखी गई थी, जिनमें हथियार, वस्त्र, और चित्र शामिल थे ! यहाँ अलग-2 कमरों में राजा द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली वस्तुएँ रखी गई थी, एक जगह एक सिंहासन रखा था जिसपर काशी नरेश कभी बैठा करते थे ! अलग-2 आकार की पालकियाँ भी रखी गई थी, जिसमें बैठकर राज घराने की महिलाएँ कहीं आया-जाया करती थी ! 

एक अन्य कक्ष अश्त्र-शश्त्र से भरा हुआ था, इसी कक्ष में कुछ तत्कालीन सिक्के भी रखे गए थे जिनपर गोलियों के निशान थे ! सिक्कों के पास अंकित जानकारी से पता चला कि काशी नरेश को निशानेबाज़ी का बड़ा शौक था, समय-2 पर वो निशानेबाज़ी का अभ्यास भी किया करते थे ! इन्हीं सिक्कों को हवा में उछाल कर वो इनपर निशाना लगाया करते थे, कुछ सिक्कों के तो बीचों-बीच गोली के निशान थे जिन्हें देखकर कोई भी कहेगा, कि वाकई काशी नरेश ग़ज़ब के निशानेबाज़ थे ! यहाँ से आगे बढ़े तो हमने एक ज्योतिष् घड़ी देखी, इस घड़ी का निर्माण रामनगर के ज्योतिष् बी मूलचंद ने 1872 में किया था ! इस घड़ी की ख़ासियत ये थी कि ये वर्ष, महीना, सप्ताह, दिन, और समय तो बताती ही है साथ में सूर्य, चंद्रमा, तारे, और ग्रहों की स्थिति को भी बखूबी दर्शाती है ! इस घड़ी को समझने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश भी यहाँ दिए हुए थे, वाकई ये घड़ी उस समय के हिसाब से बहुत नायाब अविष्कार रही होगी ! यहाँ से आगे दूसरे हाल में गए तो वहाँ काशी नरेशों के चित्रों से दीवार भरा पड़ा था, इसमें इन राजाओं के विदेश दौरों और विदेशी मेहमानों के काशी दौरे को बखूबी दिखाया गया है ! 

फोटो देखकर पता चलता है कि उस समय राजा-महाराजा कितनी बड़ी-2 मूँछे रखा करते थे ! इस हाल के बाद ये प्रदर्शनी ख़त्म हो गई और हम सीढ़ियों से होते हुए नीचे आ गए ! यहाँ किले में एक सूर्य चक्र भी है, कहा जाता है कि ये यहाँ महाभारत काल से ही मौजूद है, हालाँकि हम इस सूर्य चक्र को नहीं देख पाए ! नीचे आने के बाद एक गलियारे से होते हुए हम किले के पिछले भाग से निकलकर गंगा नदी के पास पहुँच गए, यहाँ हमारे अलावा भी काफ़ी लोग भी थे ! किले के पिछले भाग के अधिकतर द्वारों को बंद कर दिया गया है, एक ही द्वार खुला हुआ था जिससे हम गए ! यहाँ भी मरम्मत का काम चल रहा था, किले के इस भाग में मंदिर भी बने है, ऐसे ही विष्णु जी के एक मंदिर में जाकर हमने भी पूजा की ! किले की दीवार की वजह से यहाँ छाया थी और नदी के ऊपर से बहकर आती हवा भी ठंडी लग रही थी, कुछ देर तक हम यहीं बैठे रहे ! फिर यहाँ से किले के बाहर आकर हम बीएचयू जाने के लिए चल पड़े, एक ऑटो में सवार होकर रामनगर बाइपास होते हुए हम बीएचयू के सामने आकर रुके ! 

ये विश्वविद्यालय एक बड़े क्षेत्र में फैला है, अंदर घूमने के लिए ऑटो भी चलते है ! हमने भी विश्वविद्यालय के प्रवेश द्वार से विश्वनाथ मंदिर जाने के लिए एक ऑटो पकड़ लिया, किराया 10 रुपए प्रति सवारी था ! बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना पंडित मदन मोहन मालवीय ने सन 1916 में की थी, इस विश्वविद्यालय के दो परिसर है ! मुख्य परिसर बनारस में है और ये 1300 एकड़ में फैला है, इस परिसर में 3 संस्थान, 14 संकाय, और 124 विभाग है ! इस परिसर के प्रांगण में विश्वनाथ जी का एक मंदिर भी है, जहाँ दर्शन करने के लिए देश-विदेश से लोग आते है, हम भी आज इसी परिसर में घूमने जा रहे है ! जबकि इस विश्वविद्यालय का दूसरा परिसर मिर्ज़ापुर में है जोकि 2700 एकड़ में फैला है ! ये एशिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है ! ऑटो में बैठने के 15 मिनट में ही हम मंदिर के सामने पहुँच गए, बढ़िया मार्ग बना है ! ऑटो से उतरकर हम दोनों मंदिर के प्रवेश द्वार की ओर बढ़े, यहाँ एक अच्छा-ख़ासा बाज़ार है खाने-पीने से लेकर किताबें, और साज़-सज्जा का सामान इस बाज़ार में आसानी से मिल जाएगा ! 

मुख्य प्रवेश द्वार से थोड़ी पहले फल-फूल और प्रसाद की दुकानें है ! जूते मंदिर के बाहर रखकर, हम दोनों मंदिर में दाखिल हुए, अंदर ठीक-ठाक भीड़ होने के बावजूद ज़्यादा मारा-मारी नहीं थी इसलिए आराम से दर्शन हो गए ! भूमिगत तल पर दर्शन करने के बाद हम प्रथम तल पर गए, यहाँ भी देवी-देवताओं की कुछ प्रतिमाएँ थी ! बहुत से लोग प्रथम तल पर जगह-2 डेरा जमाए हुए थे, और हो भी क्यों ना ? बाहर भयंकर उमस थी लेकिन यहाँ ठंडक थी इसलिए जो भी प्रथम तल पर पूजा करने आता, यहीं जम जाता ! हम भी पूजा करने के बाद एक कोने में अपना सामान रखकर बैठ गए, संगमरमर का फर्श था, थोड़ी देर में ही सारी थकान दूर हो गई ! घंटे भर तक ऐसे ही बैठे रहे, फिर यहाँ से उठे तो मंदिर परिसर की कुछ फोटो खींची, अब तक भूख लगने लगी थी ! मंदिर से बाहर आकर बीएचयू परिसर में ही एक रेस्टोरेंट में पेट-पूजा की, खा-पीकर फारिक हुए तो बारिश शुरू हो गई ! रेस्टोरेंट में बैठकर ही बारिश के रुकने का इंतजार किया, आधे घंटे में बारिश रुकी, लेकिन बादल अभी भी थे ! 

पता नहीं दोबारा कब बारिश शुरू हो जाए इसलिए ऑटो पकड़कर मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन जाना ही मुनासिब समझा ! कम से कम स्टेशन पर रहेंगे तो ना जाम में फँसने का डर रहेगा और ना दूसरी कोई दिक्कत ! मंदिर से बाहर निकलते ही सामने कई ऑटो खड़े थे, एक ऑटो में सवार होकर हम दोनों बीएचयू से बाहर आए, फिर यहाँ से रेलवे स्टेशन जाने के लिए एक दूसरा ऑटो पकड़ लिया ! पौने घंटे बाद हम दोनों स्टेशन के पास खड़े थे, हमारी ट्रेन का समय शाम साढ़े सात बजे का था अभी 6 बजने वाले थे ! सोचा इतनी देर स्टेशन पर बोर हो जाएँगे, इसलिए स्टेशन के बाहर फल खरीदने चल दिए ! रास्ते में एक मिठाई की दुकान पर रसगुल्ले खाए, जिसे खाकर यही कहूँगा कि इस हलवाई को कम से कम रसगुल्ले बनाना तो नहीं आता था ! खैर, फल लेने के बाद वापिस स्टेशन पर पहुँचे, फिर निर्धारित समय पर शिवगंगा में सवार होकर सुबह दिल्ली पहुँचे ! दिल्ली पहुँचने के बाद तो घर जाने में समय ही कितना लगता है, यहाँ से पलवल जाने के लिए लोकल ट्रेन में सवार हो गए और डेढ़ घंटे में अपने घर ! तो दोस्तो ये सफ़र यहीं ख़त्म होता है जल्द ही मिलते है ऐसे ही किसी नए सफ़र पर !


किले के बाहर रखी एक तोप

टिकट खिड़की से दिखाई देता किले का एक दृश्य

टिकट खिड़की से दिखाई देता किले का एक दृश्य



किले के अंदर से दिखाई देता मुख्य द्वार


टिकट खिड़की का एक नज़ारा





किले के पिछले हिस्से का एक दृश्य

बीएचयू का प्रवेश द्वार 

बीएचयू परिसर में स्थित विश्वनाथ मंदिर

मंदिर के अंदर का एक दृश्य

मंदिर से दिखाई देता प्रवेश द्वार



क्यों जाएँ (Why to go Varanasi): धर्म नगरी होने के कारण वाराणसी हमेशा से ही देशी-विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है यहाँ के मुख्य आकर्षण गंगा नदी के किनारे बने घाट, काशी विश्वनाथ का मंदिर, और रामनगर का किला प्रमुख है ! दशावमेघ घाट पर रोज शाम को होने वाली गंगा आरती के तो कहने ही क्या, अगर आप बनारस आ रहे है तो गंगा आरती ज़रूर देखे ! बौद्ध धर्म में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए बनारस से थोड़ी दूरी पर स्थित सारनाथ से बढ़िया जगह भारत में शायद ही कहीं हो ! 

कब जाएँ (Best time to go Varanasi): आप साल के किसी भी महीने में वाराणसी जा सकते है हर मौसम में यहाँ अलग ही आनंद आता है गर्मी के दिनों में भयंकर गर्मी पड़ती है तो सर्दी भी कड़ाके की रहती है !

कैसे जाएँ (How to reach Varanasi): दिल्ली से वाराणसी की दूरी 800 किलोमीटर से थोड़ी अधिक है, यहाँ आने के लिए सबसे सस्ता और बढ़िया साधन भारतीय रेल है ! वैसे तो नई दिल्ली से वाराणसी के लिए प्रतिदिन कई ट्रेनें चलती है लेकिन शिवगंगा एक्सप्रेस (12560) इस मार्ग पर चलने वाले सबसे बढ़िया ट्रेन है जो शाम 7 बजे नई दिल्ली से चलकर सुबह 7 बजे वाराणसी उतार देती है !

कहाँ रुके (Where to stay in Varanasi): वाराणसी में रुकने के लिए सैकड़ों होटल है आप अपने बजट के अनुसार 500 रुपए से लेकर 4000 रुपए तक के होटल ले सकते है !

क्या देखें (Places to see in Varanasi): वाराणसी में देखने के लिए कई जगहें है यहाँ के मुख्य आकर्षण गंगा नदी के किनारे बने घाट, काशी विश्वनाथ का मंदिर, और रामनगर का किला है ! वाराणसी में गंगा नदी के किनारे बने हर घाट का एक अलग महत्व और कहानी है प्रतिदिन शाम को दशावमेघ घाट पर होने वाली गंगा आरती ज़रूर देखें ! सारनाथ भी वाराणसी से ज़्यादा दूर नहीं है, यहाँ आकर तो लगता ही नहीं कि आप भारत के किसी शहर में है, हर धर्म और देश के लोग आपको यहाँ मिल जाएँगे !

समाप्त...

2 comments:

  1. वर्ष 2014 में नेपाल से वापसी के दौरान मैं भी इस किले पर गया था। पुरानी यादें ताजा हो उठीं!
    # घुमक्कड़ी दिल से

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    1. प्रजापति जी, जानकार अच्छा लगा कि लेख पढ़कर आपको अपनी यात्रा याद आ गई !

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