Monday, January 1, 2018

सोनप्रयाग का संगम स्थल और त्रियुगीनारायण मंदिर (TriyugiNarayan Temple in Sonprayag)

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

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वासुकी गंगा और मन्दाकिनी नदी का संगम

यात्रा के पिछले लेख में आपने केदारनाथ से सोनप्रयाग वापसी के बारे में पढ़ा, अब आगे, होटल से अपने कपडे  लेकर हम सोनप्रयाग में बने घाट की ओर नहाने के लिए चल दिए ! होटल वाले ने हमसे कहा कि नदी का पानी काफी ठंडा रहता है इसलिए हम होटल में ही नहाकर घूमने के लिए घाट पर जाएँ ! लेकिन हमने ठान लिया था कि आज सोनप्रयाग में नहाकर ही वापिस जाना है इसलिए ठण्ड की परवाह किए बिना ही हम होटल से निकलकर घाट की ओर चल दिए ! सोनप्रयाग से गौरीकुंड जाने वाले मार्ग पर 100-150 मीटर चलने के बाद ही दाईं ओर संगम स्थल है, जिस दिन हम सोनप्रयाग आए थे तो यहाँ पहुँचते हुए ही अँधेरा हो गया था इसलिए हम संगम नहीं देख पाए थे ! आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि सोनप्रयाग में वासुकी ताल से आने वाली वासुकी गंगा और केदारनाथ से आने वाली मन्दाकिनी नदी का संगम होता है ! संगम स्थल मुख्य मार्ग से काफी नीचे है, जहाँ जाने के लिए कुछ सीढियाँ बनी है, और सीढियाँ ख़त्म होते ही झाड-झंझाड़ है ! इस समय नदी में पानी काफी कम था, इसलिए नदी के किनारे दूर तक बिखरे छोटे-बड़े पत्थर दिखाई दे रहे थे ! बारिश के समय जब जलस्तर बढ़ जाता है तो पानी नदी के किनारे तक आ जाता है !


सोनप्रयाग में घाट के पास का एक दृश्य (A view of Sangam in Sonprayag)


खैर, ज्यादा समय गँवाए बिना हम सीढ़ियों से उतरकर नदी के किनारे पड़े पत्थरों पर जाकर बैठ गए ! कुछ देर इधर-उधर घूमकर हमने नदी का मुआयना किया और फिर स्नान करने के लिए एक उपयुक्त स्थान ढूंढ लिया जहाँ पानी का बहाव ज्यादा तेज नहीं था ! इस समय हम जहाँ खड़े थे वहां से दोनों नदियाँ दिखाई दे रही थी, हमारी बाईं ओर से वासुकी गंगा आ रही थी तो दाईं ओर से मन्दाकिनी ! मुझे पक्के से तो नहीं पता लेकिन मेरे अनुमान के मुताबिक वासुकी गंगा के उद्गम स्थल वासुकी ताल जाने के लिए त्रियुगीनारायण मंदिर के पास से कोई रास्ता जाता है ! संगम स्थल पर नदी का जल एकदम साफ़ था, इतना साफ़ कि नदी की तलहटी में पड़े पत्थर भी साफ़ दिखाई दे रहे थे और पानी इतना ठंडा कि कुछ ही पलों में शरीर को सुन्न कर दे ! एक पत्थर पर बैठकर जैसे ही मैंने अपना पैर पानी में डाला, मेरे पैर की नसें झनझना उठी, लेकिन इसका एक फायदा भी हुआ कि सफ़र की थकान भी कुछ ही देर में चली गई ! नदी के बीच में पानी का बहाव काफी तेज था, इसलिए हम ज्यादा अन्दर नहीं गए, किनारे ही बैठकर नहाते रहे ! थोड़ी देर बाद जब नदी में डुबकी लगाईं तो खोपड़ी सुन्न हो गई, ऐसा लगा जैसे किसी ने सिर में एक साथ सैकड़ों पिन चुभा दिए हो, लेकिन फिर थोड़ी देर में सब सामान्य हो गया !


सोनप्रयाग में संगम स्थल का एक दृश्य (A View of Sangam in Sonprayag)

नदी के जल में दिखाई देते पत्थर 

sonprayag ghat
संगम स्थल का एक और दृश्य
देवेन्द्र भी नदी के किनारे कुछ दूरी पर स्नान कर रहा था, इस बीच अनिल और मेरे पिताजी भी यहाँ आ गए, पिताजी तो होटल में ही नहा आए थे लेकिन अनिल काफी देर से अपने साथ गंगाजल ले जाने के लिए पानी की बोतल ढूँढने में लगा था, आखिरकार जब उसे बोतल मिल गई तो वो भी स्नान करने के लिए घाट पर आ गया ! काफी देर तक हम सब यहाँ नहाते रहे, दो दिन से नहाये नहीं थे इसलिए नहाकर बड़ा आनंद आया, नहाकर निबटे तो फोटोग्राफी का सिलसिला शुरू हो गया, जो काफी देर तक चला ! फिर कुछ देर घाट पर बिताने के बाद हम सीढ़ियों से होते हुए वापिस अपने होटल की ओर चल दिए, रास्ते में पुलिस चौकी से थोडा पहले किसी की अंतिम यात्रा निकल रही थी, ये सब नदी की तरफ ही जा रहे थे ! शायद किसी बुजुर्ग की अंतिम यात्रा थी, जिसके पार्थिव शरीर को नदी के किनारे मुखाग्नि देकर अस्थियाँ नदी में ही बहा दी जाएगी ! खैर, थोड़ी देर में हम अपने होटल पहुंचे, यहाँ कमरे से अपना सामान निकालकर नीचे एक होटल में खाना-खाने के लिए चल दिए, 15-20 मिनट में खाना खाकर फारिक हुए तो होटल वाले को कमरे और खाने का भुगतान किया और अपने गाडी लेने पार्किंग स्थल की ओर चल दिए !


घाट के पास का एक दृश्य
त्रियुगीनारायण मंदिर

गाडी लेकर पार्किंग से निकले तो हम त्रियुगीनारायण मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए, सोनप्रयाग से गुप्तकाशी जाने वाले मार्ग पर थोडा आगे बढ़ते ही एक मार्ग ऊपर पहाड़ी पर जाता है ! इस मार्ग पर 13 किलोमीटर चलने के बाद त्रियुगीनारायण गाँव आता है, इसी गाँव में ये मंदिर स्थित है, सोनप्रयाग से मंदिर तक जाने के लिए वैसे तो शानदार मार्ग बना है, लेकिन बीच में एक-दो जगह ये मार्ग टूटा भी हुआ है ! घुमावदार पहाड़ी मार्ग है, अच्छी-खासी चढ़ाई भी है इसलिए गाडी से जाने पर भी आधा घंटा लग ही जाता है ! हालाँकि, सोनप्रयाग से त्रियुगीनारायण मंदिर जाने के लिए एक पैदल मार्ग भी है जिसपर अच्छी खासी चढ़ाई है, इस मार्ग से मंदिर की ये दूरी घटकर 5 किलोमीटर रह जाती है, स्थानीय लोग तो मंदिर जाने के लिए इसी मार्ग का प्रयोग करते है ! चलिए, आगे बढ़ने से पहले इस मंदिर के बारे में आपको कुछ जानकारी दे देता हूँ, समुद्रतल से 1980 मीटर की ऊँचाई पर बना ये मंदिर भगवान् विष्णु को समर्पित है इसी मंदिर में भगवान् शिव का माता पार्वती से विवाह हुआ था ! एक कहावत के अनुसार इस मंदिर में प्रज्वलित अग्नि तीन युगों से जल रही है इसलिए इस स्थान का नाम त्रियुगी पड़ा, इसी अग्नि कुंड में शिव-पार्वती ने विवाह के फेरे लिए थे !


त्रियुगीनारायण गाँव से दिखाई देता एक दृश्य (A view from Triyuginarayan village)

त्रियुगीनारायण गाँव से दिखाई देता एक दृश्य (A view from Triyuginarayan village)
शिव-पार्वती के विवाह के साक्षी कई ऋषि-मुनि बने, भगवान् विष्णु ने तो माता पार्वती का भाई बनकर विवाह में सभी रीतियों का पालन किया था जबकि ब्रह्मा जी इस विवाह में पुरोहित बने थे ! मंदिर में विवाह के समय जिस पत्थर पर शिव-पार्वती बैठे थे उसे ब्रहम शिला के नाम से जाना जाता है जो मुख्य भवन के ठीक सामने है ! सभी देवी-देवताओं ने विवाह में शामिल होने से पूर्व यहाँ बने कुंडों में स्नान किया था, यहाँ 3 कुंड बने है जिन्हें रूद्र कुंड, विष्णु कुंड, और ब्रह्मा कुंड के नाम से जाना जाता है ! विष्णु कुंड में भगवान् विष्णु ने, ब्रह्मा कुंड में ब्रह्मा जी ने और रूद्र कुंड में अन्य देवी-देवताओं ने स्नान किया था ! हालांकि, इन तीनों कुंडों में जल सरस्वती कुंड से ही आता है, वही सरस्वती कुंड जिसका निर्माण भगवान् विष्णु की नाभि से हुआ था ! ऐसी मान्यता है कि इस कुंड में स्नान करने से संतानहीनता से मुक्ति मिल जाती है ! मंदिर में आने वाले अधिकतर श्रद्धालु यहाँ प्रज्वलित अखंड अग्निकुंड की भभूत अपने साथ ले जाते है ताकि उनका वैवाहिक जीवन हमेशा मंगलमय बना रहे ! शिवजी को विवाह में उपहार स्वरुप एक गाय भी मिली थी, इस गाय को जिस स्तम्भ से बाँधा गया था वो स्तम्भ आज भी मंदिर परिसर में विद्दमान है !

इन मान्यताओं को प्रमाणित करने के लिए मेरे पास कोई साक्ष्य तो नहीं है, लेकिन लोगों की धार्मिक भावनाएं इनसे जुडी है तो मैंने आपको बता दिया ! ये भी कहा जाता है कि माँ पार्वती ने शंकर जी को पाने के लिए त्रियुगीनारायण मंदिर से 5 किलोमीटर दूर गौरीकुंड में कठिन तपस्या की थी, जहाँ माँ पार्वती को समर्पित एक मंदिर बना है ! केदारनाथ जाने वाले अधिकतर श्रद्धालु इस मंदिर में भी दर्शन के लिए जाते है ! चलिए, वापिस अपनी यात्रा पर लौटते है, जहाँ हम सोनप्रयाग से निकलकर पहाड़ी घुमावदार मार्ग से होते हुए मंदिर की ओर बढे जा रहे थे ! मार्ग के शुरुआत में तो ज्यादा चढ़ाई नहीं है लेकिन जैसे-2 आगे बढ़ते जाते है, चढ़ाई भी बढती जाती है और रास्ते में इक्का-दुक्का जीप ही दिखाई देती है ! बीच में एक-दो जगह मार्ग टूटा हुआ भी है, एक जगह तो भूमि कटाव के कारण मार्ग धंस भी गया है, लेकिन फिर भी यहाँ गाडी चलाते हुए बड़ा आनंद आता है ! इस मार्ग पर चलते हुए मुझे ताडकेश्वर मंदिर की यात्रा याद आ गई, लैंसडाउन से ताडकेश्वर मंदिर जाते हुए भी हमें कुछ ऐसा ही मार्ग मिला था जो घने जंगल के बीच से निकलता है और जहाँ लोगों का आवागमन ना के बराबर था ! मंदिर से कुछ पहले एक रिहायशी इलाका आता है, हमें सड़क के किनारे एक लाल रंग की ईमारत दिखाई दी, मुझे लगा शायद यही त्रियुगीनारायण मंदिर है !


मुझे ये ईमारत ही त्रियुगीनारायण मंदिर लगी थी

त्रियुगीनारायण गाँव से दिखाई देता एक दृश्य (A view from Triyuginarayan village)
गाडी सड़क के किनारे खड़ी करके हम इमारत के पास गए तो पता चला ये मंदिर नहीं, कोई आश्रम था, सड़क के किनारे काम कर रहे एक व्यक्ति से पूछने पर पता चला कि मंदिर यहाँ से 200 मीटर आगे है ! गाडी मंदिर से थोड़ी पहले खड़ी करके हम, मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार की ओर चल दिए ! यहाँ सड़क के बीचों-बीच त्रियुगीनारायण और इसके आस-पास स्थित दर्शनीय स्थलों के नाम और उनकी दूरी एक बोर्ड पर अंकित थी ! यहाँ त्रियुगीनारायण मंदिर के अलावा गौरी गुफा, कृष्ण सरोवर, और शकुम्भरी देवी मंदिर प्रमुख दर्शनीय स्थल है जिनकी दूरी क्रमश: 2, 5, और 2.5 किलोमीटर है ! प्रसिद्द पंवाली कांठा बुग्याल का ट्रेक भी यहीं से शुरू होता है जिसकी दूरी यहाँ से 20 किलोमीटर है ! कुछ ही देर में हम मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के सामने खड़े थे, यहाँ से अन्दर जाते ही मार्ग के किनारे हमारी बाईं ओर दीवार पर शिव-पार्वती का एक सुन्दर चित्र बनाया हुआ था ! थोड़ी आगे बढे तो मार्ग के किनारे एक कतार में पूजा सामग्री की दुकानें सजी थी, हम तो गाडी से उतरते ही एक दुकान से पूजा की थाली ले आए थे ! प्रसाद देते हुए दुकानदार ने कहा था कि पूजा करके थाली मंदिर में ही छोड़ देना, हमारा लड़का बाद में जाकर थाली ले आएगा ! प्रथम दृष्टि में ये मंदिर केदारनाथ मंदिर की तरह ही लगता है, सीढ़ियों से नीचे उतरकर हम मंदिर परिसर में दाखिल हुए !


मंदिर के आस-पास स्थित अन्य जगहों की जानकारी छोटे बोर्ड पर अंकित है 


triyuginarayan temple entrance
त्रियुगीनारायण मंदिर का बाहरी प्रवेश द्वार

मंदिर जाते हुए दीवार पर बना शिव-पार्वती का एक चित्र

मंदिर जाने का मार्ग
triyuginarayan temple
त्रियुगीनारायण मंदिर का एक दृश्य
मंदिर परिसर में अंकित एक बोर्ड पर लिखी जानकारी के अनुसार इस मंदिर से एक रास्ता गुटठुर से होता हुए केदारनाथ धाम को जाता है ! प्राचीन काल में तीर्थ यात्री इस मार्ग से होकर केदारनाथ मंदिर जाते होंगे, लेकिन वर्तमान में शायद ही कोई इस मार्ग से केदारनाथ जाता होगा ! ये मार्ग काफी कठिन है और घने जंगलों से होकर निकलता है ! मंदिर परिसर में कई पुजारी खड़े रहते है ऐसे ही एक पुजारी ने हमारे पास आकर पूजा करवाने की बात कही, जिसे हमने सहर्ष स्वीकार कर लिया ! हमने यहाँ तसल्ली से 20-25 मिनट पूजा की, इसके बाद पुजारी ने हमें मंदिर से सम्बंधित कुछ ज़रूरी जानकारी भी दी, और हमारी जानकारी भी एक रजिस्टर में दर्ज की ! इस मंदिर में प्रतिदिन सांय को एक भव्य आरती भी होती है, जिसमें यहाँ आने वाले भक्त और स्थानीय लोग शामिल होते है ! पूजा करने के बाद हम कुछ देर यहाँ घूमने के बाद मंदिर परिसर से बाहर आ गए और अपनी गाडी में सवार होकर हमने वापसी की राह पकड़ी ! यहाँ से चले तो देवप्रयाग पहुँचते-2 रात हो गई, एक रात हमने देवप्रयाग में बिताई और अगली सुबह गंगा नदी में स्नान करने के बाद 8 बजे तक देवप्रयाग से निकल पड़े, दिनभर सफ़र करने के बाद शाम 5 बजे हम घर पहुंचे ! इसी के साथ ये सफ़र ख़त्म होता है, जल्द ही एक नए सफर पर लेकर चलूँगा !


मंदिर के प्रवेश द्वार पर बंधी घंटियाँ 


मंदिर परिसर का एक दृश्य

मंदिर परिसर का एक दृश्य


ब्रहम कुंड का एक दृश्य

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इसी शिला पर बैठकर शिवजी और माँ पार्वती का विवाह हुआ था

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विष्णु कुंड का एक दृश्य



देवप्रयाग में होटल संचालक के साथ एक चित्र

देवप्रयाग में संगम का एक दृश्य


ऋषिकेश से पहले का एक दृश्य
क्यों जाएँ (Why to go Triyuginarayan): अगर आपको धार्मिक स्थानों पर जाना अच्छा लगता है तो निश्चित तौर पर उत्तराखंड के सोनप्रयाग में स्थित त्रियुगीनारायण आपके लिए एक बढ़िया जगह है ! सोनप्रयाग से ही केदारनाथ जाने के लिए पैदल मार्ग शुरू होता है और यहाँ जाते हुए रास्ते में घूमने के लिए अनेकों जगहें है, शहर की भीड़-भाड़ से दूर 2-3 दिन आप यहाँ आराम से बिता सकते है ! 

कब जाएँ (Best time to go 
Triyuginarayan): त्रियुगीनारायण जाने के लिए सितम्बर अक्तूबर का समय सर्वोत्तम है ! बारिश के मौसम में उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएँ अक्सर होती रहती है इसलिए इन दिनों यहाँ ना ही जाएँ ! अगर फिर भी इस दौरान जाने का विचार बने तो अतिरिक्त सावधानी बरतें !

कैसे जाएँ (How to reach Triyuginarayan): दिल्ली से त्रियुगीनारायण मंदिर की कुल दूरी लगभग 473 किलोमीटर है, निजी वाहन है तो आप मंदिर तक ले जा सकते है अगर बस या अन्य किसी साधन से जा रहे है तो सोनप्रयाग से त्रियुगीनारायण जाने के लिए जीपें चलती है ! दिल्ली से त्रियुगीनारायण जाने में आपको लगभग 15 से 16 घंटे का समय लगेगा, दिल्ली से सोनप्रयाग जाने के लिए सबसे बढ़िया मार्ग हरिद्वार-देवप्रयाग-रुद्रप्रयाग होते हुए है ! दिल्ली से हरिद्वार तक 4 लेन राजमार्ग बना है जबकि ऋषिकेश से आगे पहाड़ी मार्ग शुरू हो जाता है और सिंगल मार्ग है ! आप चाहे तो हरिद्वार तक का सफ़र ट्रेन से कर सकते है और हरिद्वार से आगे का सफ़र बस या जीप से तय कर सकते है ! इसमें आपको थोडा अधिक समय लगेगा !


कहाँ रुके (Where to stay near 
Triyuginarayan): त्रियुगीनारायण मंदिर के पास रुकने के लिए कई होटल है, जहाँ आपको 500-600 रूपए में कमरा मिल जायेगा ! मई-जून में ये किराया बढ़कर दुगुना भी हो जाता है ! दुर्गम क्षेत्र होने के कारण यहाँ खान-पान के बहुत ज्यादा विकल्प नहीं है इसलिए सुख सुविधाओं की बहुत ज्यादा उम्मीद ना करें !

क्या देखें (Places to see near 
Triyuginarayan): त्रियुगीनारायण मंदिर के आस-पास घूमने के लिए काफी जगहें है, जिसमें गौरी गुफा, कृष्ण सरोवर, और शकुम्भरी देवी मंदिर प्रमुख है ! पंवाली कांठा बुग्याल का ट्रेक भी यहीं से शुरू होता है जो यहाँ से 20 किलोमीटर दूर है ! इसके अलावा सोनप्रयाग में वासुकी गंगा और मन्दाकिनी नदी का संगम स्थल भी है !

समाप्त...

केदारनाथ यात्रा

  1. दिल्ली से केदारनाथ की एक सड़क यात्रा (A Road Trip from Delhi to Kedarnath)
  2. उत्तराखंड के कल्यासौड़ में है माँ धारी देवी का मंदिर (Dhari Devi Temple in Uttrakhand)
  3. रुद्रप्रयाग में है अलकनंदा और मन्दाकिनी का संगम (Confluence of Alaknanda and Mandakini Rivers - RudrPrayag)
  4. रुद्रप्रयाग में है कोटेश्वर महादेव मंदिर (Koteshwar Mahadev Temple in Rudrprayag)
  5. रुद्रप्रयाग से अगस्त्यमुनि मंदिर होते हुए सोनप्रयाग (A Road Trip from Rudrprayag to Sonprayag)
  6. गौरीकुंड से रामबाड़ा की पैदल यात्रा (A Trek from Gaurikund to Rambada)
  7. रामबाड़ा से केदारनाथ की पैदल यात्रा (A Trek from Rambada to Kedarnath)
  8. केदार घाटी में स्थित भैरवनाथ मंदिर (Bhairavnath Temple in Kedar Valley)
  9. केदारनाथ धाम की संध्या आरती (Evening Prayer in Kedarnath)
  10. केदारनाथ से वापसी भी कम रोमांचक नहीं (A Trek from Kedarnath to Gaurikund)
  11. सोनप्रयाग का संगम स्थल और त्रियुगीनारायण मंदिर (TriyugiNarayan Temple in Sonprayag)

6 comments:

  1. सोनप्रयाग संगम की बाते और फोटो ज्यादातर कही देखी नही...त्रियुगीनारायण सोनप्रयाग के साथ बढ़िया यात्रा...हर हर महादेव...

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    1. धन्यवाद प्रतीक भाई, हर हर महादेव !

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  2. Replies
    1. हर हर महादेव, अनिल भाई !

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  3. पंवाली कांठा भी होकर आना था।

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    1. बिलकुल संदीप भाई, मन तो था लेकिन पिताजी के पैरों में काफी दर्द था जिसका ज़िक्र उन्होंने रामबाड़ा में किया था !

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