Friday, June 5, 2015

मक्लॉडगंज का एक यादगार सफ़र (A Memorable Trip to Mcleodganj)

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

अपनी अन्य यात्राओं की तरह मेरी इस यात्रा की शुरुआत भी अचानक ही हुई, हुआ कुछ यूँ कि अभी पिछले दिनों एक हिन्दी दैनिक पत्रिका में धर्मशाला के बारे में पढ़ने को मिला ! जानकारी इतनी विस्तृत और चित्र इतने सुंदर थे कि पढ़ते हुए मन में इच्छा हुई कि समय निकालकर क्यों ना कभी धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) जाया जाए ! मेरी किस्मत देखिए कि एक महीने के भीतर ही इस यात्रा पर जाने का संयोंग भी बनने लगा और मैने भी इस मौके को जाने देना उचित नहीं समझा ! यात्रा का दिन निर्धारित करके कुछ मित्रों को अभी इस यात्रा में शामिल कर लिया ! मेरे अलावा शशांक और विपुल ने भी इस यात्रा पर मेरे साथ चलने की इच्छा दिखाई, और जुलाई 2011 के मध्य में 15 तारीख को इस यात्रा पर जाना तय हुआ ! यात्रा का दिन निर्धारित होने के बाद अगले ही दिन मैं धर्मशाला के बारे में और आवश्यक जानकारी जुटाने में लग गया ताकि यात्रा के दौरान हमें कोई दिक्कत ना हो ! इसी बीच मैने धर्मशाला जाने के लिए दिल्ली से चंडीगढ़ के लिए जनशताब्दी एक्सप्रेस की तीन टिकटें भी आरक्षित करवा ली ! 

वैसे तो धर्मशाला जाने के लिए अनेकों साधन है, पर हम लोग अपनी सुविधा अनुसार दिल्ली से चंडीगढ़ तक ट्रेन से और फिर आगे का सफ़र बस से तय करने वाले थे ! यात्रा की तैयारियाँ ज़ोरों से चलने लगी, हम लोगों ने इस यात्रा के लिए कुछ ज़रूरी सामान जैसे एक नई टॉर्च, चाकू, कलाई घड़ी, शॉर्ट्स, और कई टी-शर्ट्स भी खरीद लिए ! सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा था, कि अचानक यात्रा से तीन दिन पहले विपुल ने कुछ निजी कारणों से इस यात्रा पर हमारे साथ चलने से मना कर दिया, इसलिए अब उसका आरक्षण रद्द करवाना पड़ा ! उसके मना करने से हमारी इस यात्रा पर कुछ ख़ास असर नहीं पड़ने वाला था, पर फिर भी अब तैयारियाँ दो लोगों के हिसाब से करने लगे क्योंकि अब इस यात्रा पर जाने के लिए मैं और शशांक ही रह गए थे ! उन दिनों में नोयडा की एक निजी कंपनी में कार्यरत था और अपनी इस यात्रा पर जाने के लिए 3 दिन की छुट्टी ले चुका था ! 

अगर चाहता तो मैं यात्रा वाले दिन यहीं नोयडा से सीधे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँच सकता था, लेकिन जब घर पर बात की तो पता चला कि घर पर मेरी शादी के सिलसिले में मुझे देखने के लिए लड़की वाले आए हुए थे, इसलिए मैं शाम को नोयडा से सीधे घर चला आया ताकि सुबह घर से ही धर्मशाला के लिए प्रस्थान कर सकूँ ! हमारी ट्रेन ऊना जनशताब्दी एक्सप्रेस नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से दोपहर 2 बजकर 35 मिनट पर थी, इसलिए निर्धारित दिन हम लोग समय से ही अपने घर से नई दिल्ली के लिए चल दिए ! दोपहर 1 बजे हम दोनों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बैठे अपनी ट्रेन के आने का इंतज़ार कर रहे थे ! ये ट्रेन देहरादून से सुबह 5 बजे चलकर दोपहर साढ़े ग्यारह बजे नई दिल्ली पहुँचती है और फिर यही ट्रेन यहाँ से चंडीगढ़ होते हुए ऊना (हिमाचल प्रदेश) तक जाती है ! आज ये ट्रेन देरी से चल रही थी इसलिए अभी तक यहाँ प्लेटफॉर्म पर नहीं पहुँची थी ! 

ट्रेन 2 बजे आकर प्लेटफॉर्म पर खड़ी हो गई, हम दोनों प्लेटफॉर्म पर बैठे-2 काफ़ी परेशान हो गए थे इसलिए ट्रेन के आते ही अंदर जाकर अपनी-2 सीटों पर विराजमान हो गए ! हमारी ट्रेन ऊना जनशताब्दी एक्सप्रेस नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से दोपहर 2 बजकर 35 मिनट पर थी, इसलिए निर्धारित दिन हम लोग समय से ही अपने घर से नई दिल्ली के लिए चल दिए ! दोपहर 1 बजे हम दोनों नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बैठे अपनी ट्रेन के आने इंतज़ार कर रहे थे ! ये ट्रेन देहरादून से सुबह 5 बजे चलकर दोपहर साढ़े ग्यारह बजे नई दिल्ली पहुँचती है और फिर यही ट्रेन यहाँ से चंडीगढ़ होते हुए ऊना (हिमाचल प्रदेश) तक जाती है ! आज ये ट्रेन देरी से चल रही थी इसलिए अभी तक यहाँ प्लेटफॉर्म पर नहीं पहुँची थी ! ट्रेन 2 बजे आकर प्लेटफॉर्म पर खड़ी हो गई, हम दोनों प्लेटफॉर्म पर बैठे-2 काफ़ी परेशान हो गए थे इसलिए ट्रेन के आते ही अंदर जाकर अपनी-2 सीटों पर विराजमान हो गए ! 

ट्रेन अपने निर्धारित समय से दस मिनट की देरी से चली, इस समय ट्रेन के सभी डिब्बों में लगभग बराबर ही भीड़ थी, आरक्षित सीटों पर बैठे यात्रियों के अलावा काफ़ी यात्री खड़े भी थे, इसलिए काफ़ी गर्मी हो रही थी, प्लेटफॉर्म छोड़ते-2 ट्रेन ने ठीक-ठाक रफ़्तार भी पकड़ ली ! इस ट्रेन का चंडीगढ़ पहुँचने का समय सायँ 7 बजे का था, हालाँकि, यही ट्रेन आगे ऊना तक भी जाती है पर हमारा आरक्षण चंडीगढ़ तक ही था ! अब ट्रेन बढ़िया रफ़्तार से चल रही थी, और सोनीपत, पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र होते हुए अंबाला स्टेशन पर अपने निर्धारित समय से 15 मिनट की देरी से पहुँची, जिसे हम ज़्यादा विलंब नहीं कह सकते, कम से कम भारतीय रेल के हिसाब से तो नहीं ! अब तक मेरे मन में ये विचार चल रहा था कि चंडीगढ़ उतर कर कुछ खाने-पीने के बाद चंडीगढ़ बस अड्डे से धर्मशाला जाने के लिए हिमाचल परिवहन की कोई बस पकड़ लेंगे ! 

लेकिन अंबाला रेलवे स्टेशन पर जब ट्रेन को खड़े-2 काफ़ी देर हो गई, तो मुझे चिंता होने लगी, और हो भी क्यों ना, आख़िर चंडीगढ़ समय पर नहीं पहुँचते तो अपनी योजना में बदलाव जो करना पड़ता ! हमने कहा कि अगर ये ट्रेन यहीं पर ऐसे ही रुकी रही तब तो हम पहुँच चुके धर्मशाला ! काफ़ी देर इंतज़ार करने के बाद भी जब ट्रेन नहीं चली तो प्लेटफॉर्म पर उतरकर एक स्थानीय फेरी वाले से पूछने पर पता चला कि दूसरे मार्ग से एक और ट्रेन आ रही है, जिसके कुछ डिब्बे हमारी ट्रेन के साथ जुड़कर चंडीगढ़ तक जाएँगे ! वो दूसरी ट्रेन विलंब से चल रही है इसलिए हमारी ट्रेन को यहाँ उसका इंतज़ार करना पड़ रहा है, मैने कहा क्या व्यवस्था है यार ऐसा थोड़े ना होता है, कि अगर एक ट्रेन देरी से चल रही है तो उसका ख़ामियाजा दूसरी ट्रेन के हज़ारों यात्री भी भुगते ! भाई अगर वो ट्रेन लेट है तो हमें यहाँ रोक कर क्यों परेशान किया जा रहा है ! उस समय जिन लोगों को जल्दी थी वो लोग ट्रेन से उतरकर बस के माध्यम से अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर गए ! 

एक बार तो मेरे मन में भी बस से जाने का विचार आया, फिर यही सोच कर विचार बदल लिया कि हो सकता है कि वो दूसरी ट्रेन आने ही वाली हो ! खैर, इसी उठा-पटक में आधा घंटा बीत गया और तब वो ट्रेन दूसरे प्लेटफॉर्म पर आती हुई दिखाई दी ! अगले दस मिनट में उसके कुछ डिब्बों को हमारी ट्रेन में जोड़ कर हमारी ट्रेन को आगे के लिए रवाना किया गया ! चंडीगढ़ पहुँचते-2 अंधेरा होने लगा था, बातचीत के दौरान अन्य यात्रियों से पूछने पर पता चला धर्मशाला की बसें तो हमें ऊना से भी मिल जाएँगी ! हमने भी सोचा कि चंडीगढ़ उतरकर पेट-पूजा करने और फिर बस अड्डे जाकर धर्मशाला की बस पकड़ने में तो काफ़ी समय बर्बाद हो जाएगा ! इस से तो अच्छा है कि चंडीगढ़ स्टेशन पर उतरकर इसी ट्रेन का आगे ऊना तक का टिकट ले लिया जाए, और फिर इसी ट्रेन से आगे ऊना तक का सफ़र जारी रखा जाए ! प्राप्त जानकारी के मुताबिक ये ट्रेन चंडीगढ़ 5 मिनट तो रुकने ही वाली थी, फिर जैसे ही हमारी ट्रेन चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन पर पहुँची, मैं फटाक से गाड़ी से नीचे उतरा और टिकट खिड़की की तरफ भागा ! 

वहाँ पहुँच कर देखा तो टिकट लेने वालों की तो काफ़ी लंबी लाइन लगी हुई थी, थोड़ी देर तो मैं भी लाइन में खड़ा रहा, पर जब हमारी ट्रेन ने चलने का सायरन दिया तो मैं टिकट लिए बिना ही दौड़ कर फिर से ट्रेन में चढ़ गया ! शशांक ने जब पूछा, "टिकट मिल गई क्या ?" तो मैने उसे टिकट खिड़की के हालात बता दिए ! हम दोनों ने आपस में विचार बना लिया कि अगर कोई टिकट चेक करने आया तो उसे सारा माजरा बताकर जो भी जुर्माना होगा, भर देंगे ! खैर, जब बिना टिकट यात्रा करो तो दिल में एक अजीब सी धक-धक तो होती ही है, उस समय तो हमें भी कुछ ऐसा ही महसूस हो रहा था ! काफ़ी देर तक हम दोनों ट्रेन के दरवाजे पर ही खड़े रहे, फिर जब थक गए तो अंदर आकर एक सीट पर बैठ गए और आपस में यहाँ-वहाँ की बातें करने लगे ! चंडीगढ़ से ऊना जाते हुए हमारी ट्रेन रास्ते में कई जगह रुकी, इस बीच कोई भी टिकट चेक करने नहीं आया ! 

4-5 स्टेशनो पर रुकने के बाद हमारी गाड़ी ऊना रेलवे स्टेशन पहुँच गई, घड़ी में समय देखा तो रात के साढ़े दस बज रहे थे ! मतलब चंडीगढ़ से ऊना पहुँचे में हमें 3 घंटे लग गए थे ! बिना टिकट यात्रा करने का डर यहाँ भी बना रहा और काफ़ी यात्रियों के उतर जाने के बाद हम दोनों भी ट्रेन से उतरे ! हम ये सोच रहे थे कि जब सभी यात्री चले जाएँगे, तो टीटी भी चला जाएगा ! पर फिर सोचा कि क्या होगा, अगर टीटी वहीं बैठा रहा ! हमने दिमाग़ लगाया कि अगर बच सकते है तो इस भीड़ में ही बच सकते है, अकेले जाने पर तो ख़तरा काफ़ी बढ़ जाएगा ! जब ट्रेन से उतरकर प्लेटफॉर्म से होते हुए स्टेशन से बाहर की ओर निकलने लगे तो निकास द्वार से थोड़ा पहले ही टीटी को टिकट चेक करते देखा ! इसके बाद तो हमारा डर और भी बढ़ गया, हमने सोचा कि आज तो गए काम से ! दरअसल, चलती ट्रेन में बिना टिकट यात्रा करते हुए पकड़े जाने पर अगर जुर्माने के तौर पर टीटी को पैसे देने पड़े तो और बात है ! 

लेकिन सफ़र ख़त्म हो जाने पर स्टेशन से बाहर निकलते हुए अगर जुर्माना भरना पड़े तो बहुत बुरा लगता है और ये बात एक बेटिकट यात्रा करने वाले यात्री से ज़्यादा अच्छा कौन समझ सकता है ! हम दोनों सोचने लगे कि आज तो अच्छे फँसे यार, एक तो वैसे ही लेट हो गए है और अब यहाँ भी कुछ पंगा होने वाला है ! डरते हुए हम दोनों टीटी से नज़रें बचाते हुए बाहर जाने वाले द्वार की ओर बढ़ने लगे कि तभी एक बेटिकट यात्री पकड़ा गया ! फिर हमने सोचा अगर ऐसे ही डरते रहे तो ना चाहते हुए हम भी धरे जाएँगे, इसलिए फिर हम दोनों बेफिकर होकर बाहर की ओर चल दिए ! हमारी किस्मत देखिए कि हम टीटी के एकदम नज़दीक से गुज़रे और उसने हमारा टिकट तक चेक नहीं किया ! खैर, यहाँ पर मैं बेटिकट यात्रा करने को बढ़ावा नहीं देना चाहता, ये तो हम लोगों की मजबूरी थी कि आज हम बिना टिकट के यात्रा कर रहे थे वरना तो हम सदा ही टिकट लेकर यात्रा करते रहे है ! 

स्टेशन से बाहर निकलते ही एक ऑटो में बैठे और उसे सीधे ऊना के बस अड्डे चलने को कहा, लेकिन रास्ते में उस ऑटो वाले की एक अन्य वाहन चालक से झड़प भी हुई ! इस झड़प की वजह ऑटो का एक अन्य वाहन से टकरा जाना था, हालाँकि, ग़लती उस दूसरे वाहन वाले की ही थी, पर फिर भी वो उल्टा ऑटो वाले पर ही पिल पड़ा ! हमने और इसी ऑटो में बैठे कुछ अन्य यात्रियों ने बीच-बचाव करके मामला शांत करवाया, हमारे ऑटो वाले के तो सिर में चोट भी लग गई थी ! फिर अगले दस मिनट में हम दोनों ऊना बस अड्डे के अंदर पहुँच चुके थे ! बस अड्डे में एक अधिकारी से पूछने पर पता चला कि धर्मशाला जाने की एक हिमाचल परिवहन की बस तैयार खड़ी है और अगले 15 मिनट में यहाँ से चल देगी ! बस के अंदर घुसे तो देखा कि एक भी सीट खाली नहीं है, हताश होकर बस से नीचे उतर आए, सोचा जब सीट ही नहीं है तो बस के चलने पर ही लटक लेंगे, तब तक थोड़ी पेट-पूजा कर लेते है ! अभी हम लोग उस बस से उतर कर बाहर की ओर चले ही थे कि हरियाणा परिवहन की एक और बस आकर खड़ी हुई, ये झज्जर डिपो की बस थी 

इस हरियाणा रोडवेज बस का परिचालक धर्मशाला-2 की आवाज़ें लगाने लगा ! पूछने पर उसने बताया कि बस धर्मशाला ही जाएगी और ये बस यहाँ से कुछ ही देर में चलने वाली है, हमारे अलावा उस दूसरी बस से भी कुछ यात्री आकर इस बस में बैठ गए ! थोड़ी देर में ही ये बस भर गई और फिर बस अड्डे से बाहर निकलकर ऊना-धर्मशाला मार्ग पर दौड़ने लगी ! हालाँकि, शुरू में तो ये मार्ग थोड़ा संकरा है पर आगे बढ़ने पर ये मार्ग चौड़ा होता चला गया ! आधे घंटे बाद लगभग सवा ग्यारह बजे बस जाकर एक ढाबे पर रुक गई, परिचालक ने आवाज़ लगाई की यहाँ बस 15 मिनट के लिए रुकेगी, अगर कुछ खाना-पीना हो तो खा-पी लो ! पहाड़ी क्षेत्र में अगर बस से यात्रा करनी हो तो मैं ज़्यादा खाता-पीता नहीं हूँ, शशांक ने यहाँ रात्रि भोजन कर लिया और मैने खाने के लिए एक नमकीन का पैकेट ले लिया ! 15-20 मिनट बाद हमारी बस फिर से चल दी, हरियाणा परिवहन के ड्राइवर तो वैसे ही बसें तेज चलाने के लिए जाने जाते है, पहाड़ी रास्ते पर भी हमारी बस तेज़ी से दौड़ रही थी, इतने घुमावदार रास्ते आए कि मुझे उल्टी होने लगी ! 

मैं दौड़ कर बस के दरवाजे पर पहुँचा, और वहीं दरवाजे के पास सीढ़ियों पर बैठ गया ! ड्राइवर को शीशे में दिखाई दे दिया कि मैं दरवाजा खोल के बैठा हूँ, फिर उसने एक सवारी से कह कर मेरे लिए खिड़की वाली सीट खाली करवाई ! मैं खिड़की वाली सीट पर बैठ गया और अपना सिर बस से बाहर निकाल लिया ताकि ताजी हवा में साँस लेकर कुछ आराम मिल सके ! रास्ते में बीच-2 में जब कभी आँख खुलती तो बाहर के नज़ारे भी देख लेता, और थोड़ा उल्टी भी कर लेता ! अंधेरा होने के बावजूद कहीं-2 रोशनी के कारण आस-पास के क्षेत्र के नज़ारे दिखाई दे रहे थे ! शुरुआत में थोड़ी देर तो शशांक भी जागता रहा, फिर वो बोला कि भाई मैने तो खाना भी खाया है और तेरी बिना खाए ही ऐसी हालत हो रही है ! मैं यहाँ बैठा रहा तो तेरी हालत देख कर मेरी भी हालत खराब हो जाएगी, इसलिए बेहतर होगा कि मैं पिछली सीट पर जाकर सो लूँ ! इसके बावजूद वो बीच-2 में आकर मेरा हाल भी लेता रहा ! 

हमारी बस लगातार चलती रही और सुबह 4 बजे हम लोग धर्मशाला बस अड्डे पर पहुँच चुके थे ! बस से उतरे तो बाहर अभी तक अंधेरा ही था, हम दोनों बस अड्डे पर ही बने एक पत्थर की सीट पर जाकर बैठ गए ! हमारे अलावा कुछ अन्य सवारियाँ भी वहीं बस अड्डे पर सुबह होने की प्रतीक्षा कर रही थी ! बैठे-2 जब नींद की झपकी आने लगी तो हमने सोचा यहाँ बैठने से तो अच्छा है कि यहीं बस अड्डे के आस-पास जाकर किसी होटल में एक कमरा लेकर वहीं आराम किया जाए ! लेकिन सारा सामान लेकर घूमना भी समझदारी भरा निर्णय नहीं लग रहा था, फिर आपसी सहमति से इस बात पर विचार बना कि हम दोनों में से एक आदमी तो वहीं बस अड्डे पर सारा सामान लेकर इंतज़ार करे और दूसरा आदमी जाकर आस-पास किसी होटल में कमरा ढूँढे ! दोनों की सहमति से शशांक वहीं बस अड्डे पर रुककर सामान की देखभाल करने लगा और मैं बस अड्डे से बाहर निकलकर अपने लिए होटल ढूँढने के लिए चल पड़ा ! 

रात होने के कारण अभी लगभग सारे होटल बंद थे, हालाँकि, कई होटलों के मुख्य द्वार के पास लगे बोर्ड पर लिखे हुए नंबरों पर मैने फोन भी किया, पर किसी से बात नहीं हो पाई ! अंत में जब कई होटलों में घूमने के बाद भी मुझे कोई कमरा नहीं मिला तो थक-हार कर मैं वापस बस अड्डे पर ही आ गया !

क्यों जाएँ (Why to go Dharmshala): अगर आप दिल्ली की गर्मी और भीड़-भाड़ से दूर सुकून के कुछ पल पहाड़ों पर बिताना चाहते है तो आप धर्मशाला-मक्लॉडगंज का रुख़ कर सकते है ! यहाँ घूमने के लिए भी कई जगहें है, जिसमें झरने, किले, चर्च, स्टेडियम, और पहाड़ शामिल है ! ट्रेकिंग के शौकीन लोगों के लिए कुछ बढ़िया ट्रेक भी है !

कब जाएँ (Best time to go Dharmshala): वैसे तो आप साल के किसी भी महीने में घूमने के लिए धर्मशाला जा सकते है लेकिन झरनों में नहाना हो तो बारिश से बढ़िया कोई मौसम हो ही नहीं सकता ! वैसे अगर बर्फ देखने का मन हो तो आप यहाँ दिसंबर-जनवरी में आइए, धर्मशाला से 10 किलोमीटर ऊपर मक्लॉडगंज में आपको बढ़िया बर्फ मिल जाएगी !

कैसे जाएँ (How to reach Dharmshala): दिल्ली से धर्मशाला की दूरी लगभग 478 किलोमीटर है ! यहाँ जाने का सबसे बढ़िया साधन रेल मार्ग है दिल्ली से पठानकोट तक ट्रेन से जाइए, जम्मू जाने वाली हर ट्रेन पठानकोट होकर ही जाती है ! पठानकोट से धर्मशाला की दूरी महज 90 किलोमीटर है जिसे आप बस या टैक्सी से तय कर सकते है, इस सफ़र में आपके ढाई से तीन घंटे लगेंगे ! अगर आप सड़क मार्ग से जाना चाहे तो दिल्ली से धर्मशाला के लिए हिमाचल टूरिज़्म की वोल्वो और हिमाचल परिवहन की सामान्य बसें भी चलती है ! आप निजी गाड़ी से भी धर्मशाला जा सकते है जिसमें आपको दिल्ली से धर्मशाला पहुँचने में 9-10 घंटे का समय लगेगा ! इसके अलावा पठानकोट से बैजनाथ तक टॉय ट्रेन भी चलती है जिसमें सफ़र करते हुए धौलाधार की पहाड़ियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है ! टॉय ट्रेन से पठानकोट से कांगड़ा तक का सफ़र तय करने में आपको साढ़े चार घंटे का समय लगेगा !

कहाँ रुके (Where to stay in Dharmshala): धर्मशाला में रुकने के लिए बहुत होटल है लेकिन अगर आप धर्मशाला जा रहे है तो बेहतर रहेगा आप धर्मशाला से 10 किलोमीटर ऊपर मक्लॉडगंज में रुके ! घूमने-फिरने की अधिकतर जगहें मक्लॉडगंज में ही है धर्मशाला में क्रिकेट स्टेडियम और कांगड़ा का किला है जिसे आप वापसी में भी देख सकते हो ! मक्लॉडगंज में भी रुकने और खाने-पीने के बहुत विकल्प है, आपको अपने बजट के अनुसार 700 रुपए से शुरू होकर 3000 रुपए तक के होटल मिल जाएँगे !

क्या देखें (Places to see in Dharmshala): धर्मशाला में देखने के लिए वैसे तो बहुत जगहें है लेकिन अधिकतर जगहें ऊपरी धर्मशाला (Upper Dharmshala) यानि मक्लॉडगंज में है यहाँ के मुख्य आकर्षण भाग्सू नाग मंदिर और झरना, गालू मंदिर, हिमालयन वॉटर फाल, त्रिऊँड ट्रेक, नड्डी, डल झील, सेंट जोन्स चर्च, मोनेस्ट्री और माल रोड है ! जबकि निचले धर्मशाला (Lower Dharmshala) में क्रिकेट स्टेडियम (HPCA Stadium), कांगड़ा का किला (Kangra Fort), और वॉर मेमोरियल है !

7 comments:

  1. हम धर्मशाला अमृतसर से पालमपुर फिर पालनपुर से धर्मशाला आये थे फिर वहां से पठानकोट आये वहां से डलहोजी गए।प्रदीप तुम सफ़र शुरू होने से पहले एक उल्टी की गोली खा लिया करो उसका 8 घण्टे असर रहता है । पहाड़ी रास्तो पर मेरे मिस्टर को भी उल्टिया होती है वी तो अपने मुंह में माचिस की तीली जीवान के निचे( जहां थर्मामीटर लगता है) वहा रखने से ओल्डी नहीं होती । हा उसको खाने का नहीं ।

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    1. दवा तो खा लेता हूँ पर फिर भी कम्बख़्त आ ही जाती है उल्टी, और आती भी सिर्फ़ प्राइवेट सवारी बस या जीप में ही है ! निजी गाड़ी में कोई परेशानी नहीं होती ! माचिस की तीली ने कहीं मुँह में आग पकड़ ली तो ! हा हा हा

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  2. तूम आगे का टिकिट TT से भी बनवा सकते हो उसमें तुमको कोई पेनल्टी नशि लगती





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    1. जी ये बात मुझे मालूम थी पर कम्बख़्त टीटी आया ही नहीं चंडीगढ़ से गाड़ी चलने पर, वो तो हमें ऊना रेलवे स्टेशन पर ही मिला !

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  3. Namaskar..... aap bahut ghume..... hame bhi ghumaya.... bada maza aaya.... ek bat ki request karata hu..... aap jaha jaha jate ho... vaha KHARIDDARI (purchasing) kaya kaya karane jesi hoti hai... or hotel ke - rahane ke thikane ke name bata diya karo.. taki hamare jese jis ko bhi jana ho badi sahuliyat rahe ho... achchi chiz mile evam rahane-khane ka achcha mil sake to aap ka aabhar ..... plz.

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    1. Apne aagami lekhon mein aapki is baat par zarur dhyan dunga ! Sujhaav ke liye aabhaar !

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  4. Very nice info about Una to Dharamshala. You can also travel from Una to Dharamshala by bus. its also available from Delhi to Dharamshala by bus.

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