Saturday, March 24, 2018

जैसलमेर के सोनार किले की सैर (A Visit to Jaisalmer Fort)

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें !


यात्रा के पिछले लेख में आप जोधपुर से जैसलमेर पहुँचने और यहाँ रुकने का इंतजाम करने के हमारे संघर्ष के बारे में पढ़ चुके है ! दोपहर का भोजन करने के बाद हम सदर बाज़ार से होते हुए जैसलमेर दुर्ग के अखय पोल के सामने पहुंचे, अब आगे, अखय पोल किले में जाने का एक बाहरी प्रवेश द्वार है इस द्वार से होते हुए महल तक जाने के लिए आपको 3 और द्वार पार करने होंगे जिनके नाम क्रमश: सूरज पोल, गणेश पोल और हवा पोल है ! जैसे-2 हम आगे बढ़ते जायेंगे, मैं इन द्वारों का वर्णन करता रहूँगा ! अखय पोल के ठीक सामने एक व्यस्त चौराहा है, जहाँ हमेशा ऑटो वालों का जमावड़ा लगा रहता है लेकिन फिर भी यातायात व्यवस्था को दुरुस्त बनाए रखने के लिए यहाँ पुलिस वाले भी तैनात किये गए है ! अखय पोल द्वार के दोनों तरफ शाही ध्वज के साथ ढाल और भाले लगाए गए है ! इस प्रवेश द्वार से अन्दर जाते ही एक खुला क्षेत्र है जहाँ दाईं ओर तो एक कतार में कई दुकानें है जबकि बाईं ओर एक पार्किंग स्थल है ! यहाँ खड़े होकर देखने से इस दुर्ग की विशालता का अंदाजा हो जाता है, कहते है जैसलमेर भारत का इकलौता दुर्ग है जिसमें वर्तमान में भी लोग निवास करते है ! पार्किंग स्थल से थोडा आगे बढ़ने पर बाईं ओर चबूतरे पर एक मंदिर बना है, जिसका वर्णन मैं इस यात्रा के अंतिम लेख में करूँगा !



जैसलमेर किले के अन्दर महल का एक दृश्य

फिल्हाल हम अपनी दाईं ओर स्थित दूसरे प्रवेश द्वार की ओर बढ़ रहे है, अन्दर जाने पर मार्ग भी चढ़ाई भरा होता जा रहा है ! दुर्ग में रहने वाले लोग बाहर आने-जाने के लिए निजी गाड़ियों से किले के इसी प्रवेश द्वार से होकर रोजाना निकलते है, लेकिन ये इन लोगों की समझदारी का ही प्रमाण है कि अन्दर कभी जाम की स्थिति नहीं बनती, कम से कम हमने अपने दो दिन की इस यात्रा में तो कभी ऐसा नहीं देखा ! चलिए, आगे बढ़ने से पहले आपको इस दुर्ग से सम्बंधित जानकारी दे देता हूँ,  दुनिया के सबसे बड़े किलों में शुमार इस किले का निर्माण 1156 में एक राजपूत शासक रावल जैसल ने करवाया था, उन्हीं के नाम पर इस दुर्ग का नाम भी रखा गया था ! हालांकि, जैसे-2 पीढियां आगे बढती गई, यहाँ के शासक अपने हिसाब से किले का विस्तार करवाते रहे ! राजस्थान के थार मरुस्थल के त्रिकुटा पर्वत पर बने इस दुर्ग की दीवारें पीले रंग की है जो दिन की रोशनी में हल्के सुनहरे रंग की लगती है, अपने सुनहरे रंग के कारण इस दुर्ग को "सोनार किला" या "गोल्डन फोर्ट" के नाम से भी जाना जाता है ! शहर के बीचों-बीच स्थित ये दुर्ग जैसलमेर की ऐतिहासिक धरोहर है जिसे देखने रोजाना हज़ारों लोग देश-विदेश से आते है !


अखय पोल के सामने का एक दृश्य

अखय पोल से अन्दर जाने पर दुर्ग का एक दृश्य

पार्किंग स्थल से दिखाई देता दुर्ग का एक दृश्य

अखय पोल से अन्दर जाने पर पार्किंग स्थल
मध्यकाल में पर्शिया, अरब, इजिप्ट, और अफ्रीका से व्यापार करने में इस शहर की मुख्य भूमिका रही थी, आज खुशहाल दिखाई दे रहा ये दुर्ग हमेशा से ऐसा नहीं रहा ! खुशहाली के अलावा जैसलमेर का ये दुर्ग कई ऐतिहासिक लड़ाइयों का भी गवाह रहा है, फिर चाहे वो 13वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा किले पर किया गया हमला हो या 16वीं शताब्दी में मुगलों द्वारा किया गया आक्रमण, ये किला सदैव यहाँ ऐसे ही खड़ा रहा ! खिलजी के आक्रमण के समय दुर्ग की घेराबंदी होने पर अन्दर मौजूद सभी राजपूत महिलाओं ने जौहर कर लिया ! वैसे, पद्मावती फिल्म आने के बाद शायद ही कोई होगा जिसे जौहर के बारे में ना पता हो, लेकिन फिर भी आपकी जानकारी के लिए बता देता हूँ कि प्राचीन काल में जब कोई हमलावर किला फतह करने की स्थिति में होता था या युद्ध में राजा की मृत्यु के पश्चात अधिकतर राजपूत महिलाएं अपनी आन की रक्षा के लिए एक बड़ा अग्नि कुंड जलाकर उसमें सामूहिक आत्मदाह कर लेती थी ! इसे ही जौहर कहा जाता था, प्राचीन काल में राजपूत समुदाय में जौहर की प्रथा काफी चलन में थी, लेकिन समय के साथ धीरे-2 ये प्रथा ख़त्म होती गई ! खिलजी ने जैसलमेर फतह के बाद 9 साल तक इस दुर्ग को अपने नियंत्रण में रखा !

इस दुर्ग की दूसरी लड़ाई 1541 में हुई, जब मुग़ल शासक हुमायूँ ने जैसलमेर पर हमला किया, तब तत्कालीन शासक रावल, मुगलों के इस हमले को सहन नहीं कर सका ! अंतत: वह मुगलों की शरण में चला गया और अपनी जान बचाने के लिए उसने अपनी पुत्री का विवाह अकबर से करके मुगलों से नाता जोड़ लिया ! इसके बाद इस किले में कहने को तो रावल रहे लेकिन असली स्वामित्व मुगलों का ही रहा, जिन्होनें 1762 तक इस दुर्ग को अपने नियंत्रण में रखा ! बाद में इस दुर्ग को महारावल मूलराज ने नियंत्रित किया, ईस्ट इंडिया कंपनी और मूलराज के बीच 12 दिसंबर 1818 को हुए एक समझौते के बाद राजा को ही इस दुर्ग का उत्तराधिकारी माना गया और किसी दुश्मन द्वारा आक्रमण किये जाने पर उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से सुरक्षा भी प्रदान की जाती थी ! फिर 1820 में मूलराज की मृत्यु के बाद उनके पोते गज सिंह ने यहाँ का शासन अपने हाथों में ले लिया, ब्रिटिश सरकार के नए नियमों के कारण बम्बई बंदरगाह पर समुद्री व्यापार की शुरुआत हुई ! इससे बम्बई का तो विकास हुआ लेकिन जैसलमेर की आर्थिक स्थिति कमजोर होती गई !

भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के बाद प्राचीन व्यापार प्रणाली पूरी तरह से बंद हो गई, लेकिन 1965 और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय जैसलमेर के इस दुर्ग ने अपने महत्त्व को फिर से प्रमाणित किया ! बताते है कि इस दुर्ग की खासियत है कि इसे बनाने में किसी भी प्रकार के सीमेंट, चूने या किसी अन्य वस्तु का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि इंटरलॉकिंग के जरिए पत्थरों को आपस में फंसाया गया है, मजबूती देने के लिए दुर्ग की दीवारों के ऊपरी भाग में लोहे की कीलें लगाईं गई है ! सुनने में ये बड़ा विचित्र लगता है लेकिन अगर ये सच है तो उस दौर के वास्तुकारों को नमन है जिनके मेहनत के परिणाम स्वरुप सदियों पुराना ये दुर्ग आज भी यहाँ विद्द्य्मान है ! आज भी इस दुर्ग में 5000 से ज्यादा लोग रहते है, ये लोग भाटी शासकों की निगरानी में काम करते थे और तभी से ये इस किले में रह रहे है ! लेकिन जैसे-2 जैसलमेर की जनसँख्या बढती गई वैसे-2 लोग त्रिकुटा पर्वत के नीचे भी रहने लगे, दुर्ग के कोनों पर तोपें लगाईं गई है इसे कैनन पॉइंट कहा जाता है यहाँ से खड़े होकर देखने पर आप इस दुर्ग का 80 प्रतिशत भाग देख सकते है ! दुर्ग में एक शानदार जल निकासी सुविधा भी है जिसे घुट नाली का नाम दिया गया है ये नाली बरसात के पानी को आसानी से चारों दिशाओं में किले से दूर ले जाता है !

इस दुर्ग के अन्दर राजस्थान के कई शहरों के धनी व्यापारियों ने सुन्दर और बड़ी-2 इमारतें बनवाई है, जिनमें से कुछ हवेलियाँ तो सदियों पुरानी है, इन हवेलियों में कई मंजिले और अनगिनत कमरे है, जिनकी बालकनी और दरवाजों पर विशेष कलाकृतियाँ बनाई गई है ! इनमें से कुछ हवेलियों को अब म्यूजियम का रूप दे दिया गया है लेकिन कई हवेलियों में आज भी लोग रहते है, इन हवेलियों का वर्णन मैं अगले लेख में करूँगा ! दुर्ग परिसर में मौजूद इन हवेलियों के अलावा एक जैन मंदिर भी है जिसमें छोटी-बड़ी 6600 प्रतामियां रखी गई है, ये जैन मंदिर लगभग 650 साल पुराना है ! इस मंदिर में मुख्य मूर्ति चिंतामणि पार्श्वनाथ जी की है, वैसे, ये थोडा जटिल प्रश्न है कि जब इस दुर्ग में जैन लोग रहते नहीं थे तो ये जैन मंदिर कहाँ से आया ! थोड़ी खोजबीन की तो पता चला कि जैन समुदाय में एक बापना परिवार था जो राजा को दान दिया करते थे, सोचने में बड़ा अजीब लगता है कि जिसने इतने बड़े दुर्ग का निर्माण करवाया उसे भी कोई दान देता होगा, पर ये हकीकत है, इन जैन समुदाय के लोगों ने ही इस मंदिर का निर्माण करवाया ! चलिए आगे बढ़ते है, अब तक हम सूरज पोल से होते हुए हम महल के तीसरे द्वार की ओर बढ़ रहे थे, रास्ता अभी भी हल्का-2 चढ़ाई भरा ही है !


सूरज पोल का एक दृश्य

दुर्ग में अन्दर जाते हुए दिखाई देता एक दृश्य

दुर्ग में अन्दर जाते हुए दिखाई देता एक दृश्य
इस मार्ग के किनारे बाईं ओर खान-पान की कई दुकानें है, दुर्ग के तीसरे द्वार गणेश पोल को पार करने के बाद हम हवा पोल पहुंचे ! ये इस दुर्ग का आखिरी प्रवेश द्वार है, इस द्वार का नाम अपनी कार्य प्रणाली के कारण पड़ा, हर मौसम में इस द्वार से ठंडी हवा होकर दुर्ग के अन्दर तक जाती है ! दुर्ग के सभी द्वारों के पास घुमावदार मोड़ है मैं मेहरानगढ़ किले का भ्रमण करते हुए पहले ही बता चुका हूँ कि इन दुर्गों के निर्माण में द्वार के पास घुमावदार मोड़ दिए जाते थे ताकि बाहरी हमलावरों के हमलों को नाकाम किया जा सके ! मुग़ल  शासक आक्रमण के दौरान दुर्ग के द्वारों को तोड़ने के लिए हाथियों का प्रयोग करते थे ! ये हाथी दुर्ग का बाहरी द्वार तो आसानी से तोड़ देते थे लेकिन अन्दर वाले द्वारों को तोड़ने के लिए इन हाथियों को अच्छी-खासी चढ़ाई करनी पड़ती थी, चढ़ाई करते हुए उनकी ताकत कमजोर पड़ने लगती थी ! फिर अन्दर के द्वारों के सामने पर्याप्त स्थान ना होने के कारण हाथी जोर भी नहीं लगा पाते थे ! अधिकतर दुर्गों को बनाने में हर बात के महत्त्व को ध्यान में रखा जाता था फिर वो चाहे द्वार की मजबूती हो या दुर्ग में बनाए गए गुप्त द्वार, हर चीज एक योजना के तहत बनाई जाती थी ! हवा पोल से आगे बढ़ते ही हम महल के सामने पहुँच गए !


महल के सामने लक्ष्मी नारायण मंदिर का एक दृश्य

महल के अन्दर जाने की सीढियाँ

रानी महल का एक दृश्य
राजा और रानी का महल अगल-बगल में ही है, शानदार दिखने वाले इन महलों को अब म्यूजियम का रूप दे दिया है ! महल के सामने ही एक लक्ष्मीनारायण मंदिर है, इस मंदिर के बगल से एक मार्ग जैन मंदिर के लिए भी निकलता है, वैसे, जैसलमेर दुर्ग में इन दोनों मंदिरों के अलावा कई अन्य मंदिर भी है ! हवा पोल से निकलकर हम जिस स्थान पर खड़े थे वहां से हमारे सामने ये लक्ष्मीनारायण मंदिर था, दाईं ओर महल के अन्दर जाने की सीढियाँ और बाईं ओर दो गलियां थी जो दुर्ग के रिहायशी इलाकों में जाती है ! सीढ़ियों से होते हुए हम एक बरामदे में पहुंचे, यहीं दाईं तरफ टिकट खिड़की थी ! छुट्टी का दिन होने के कारण आज यहाँ अच्छी-खासी भीड़ थी, टिकट लेने के लिए हमें थोड़ी मशक्कत करनी पड़ी ! वैसे इस दुर्ग की ऑडियो गाइड थोड़ी महंगी है, महल देखने के लिए आपको यहाँ 100 रूपए खर्च करने पड़ेंगे, तो ऑडियो गाइड लेने के लिए आपको 280 रूपए देने होंगे ! टिकट खिड़की के सामने बनी सीढ़ियों पर अपना प्रवेश टिकट दिखाते हुए हम महल देखने चल दिए, सीढ़ियों से ऊपर जाते ही नज़ारा एकदम बदल जाता है ! टिकट घर के सामने वाला बरामदा संकरा था जबकि ऊपर आने पर थोडा खुला स्थान है ! महल के अन्दर फोटो खींचने के लिए आपको 30 रूपए का शुल्क अलग से अदा करना होता है !


महल के अन्दर का एक दृश्य

महल के अन्दर का एक दृश्य

महल के अन्दर का एक दृश्य

महल के अन्दर का एक दृश्य
सुनहरे रंग के इस महल में जगह-2 जालीदार झरोखे बने है इन झरोखों से छनकर जब ठंडी हवा अन्दर आती है तो तन के साथ मन को भी बड़ी शीतलता मिलती है ! झरोखों से देखने पर बाहर का भी एक शानदार दृश्य दिखाई देता है, हम बीच-2 में आराम करने के लिए इन झरोखों के पास बने चबूतरों पर भी बैठ रहे थे ! हर तल पर एक खुला बरामदा बना है, जब ऊपर जाने वाली सीढ़ियों पर लम्बी कतार लग जाती तो लोग इसी बरामदे में रूककर इन्तजार करते है ! ऐसे ही घूमते हुए हम एक कक्ष में पहुंचे, यहाँ अलग-2 शीशों में बंद पत्थर की बनी मूर्तियों का एक अनूठा संग्रह था ! पत्थर को तराशकर इन मूर्तियों का निर्माण किया गया है जिसमें कुछ नृतकियों को विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करते हुए दिखाया गया है, वाकई, लाजवाब कारीगरी थी ! यहाँ से आगे बढे तो हम किले के सबसे ऊपरी भाग में पहुँच गए, ये एक छत थी जहाँ से पूरे जैसलमेर का एक शानदार दृश्य दिखाई देता है ! शहर से बाहर रेगिस्तान में लगी पवन चक्कियां भी यहाँ से दिखाई देती है, अगर तेज धूप ना हो तो मन करता है घंटो यहाँ बैठकर इस दृश्य को देखते रहो !
महल के अन्दर का एक दृश्य

महल में रखी एक हस्तनिर्मित मूर्ति

महल में रखी एक हस्तनिर्मित मूर्ति 

महल के अन्दर का एक दृश्य
किले की छत से दिखाई देता जैसलमेर शहर
दुर्भाग्य से आज तेज धूप थी और हमें इस किले के अलावा कुछ अन्य जगहें भी देखनी थी ! इसलिए कुछ समय यहाँ बिताने के बाद हम नीचे आ गए, एक गलियारे से होते हुए हम संगीत कक्ष में पहुंचे ! कुछ कक्ष तो बंद थे लेकिन जो खुले थे उनमें राजस्थानी वेशभूषाओं और वाद्य यंत्रों के चित्रों की प्रदर्शनी लगाईं गई थी, कुछ देर ये प्रदर्शनी देखने के बाद हम महल से बाहर आ गए ! बाद में मलाल भी हुआ कि महल घूमने के लिए हमें ऑडियो गाइड ले लेनी चाहिए थी, खैर, फिर भी हमने यहाँ अच्छा समय व्यतीत किया ! दोपहर का समय होने के कारण दुर्ग परिसर में बने अधिकतर मंदिर बंद थे इसलिए अगर आप कभी यहाँ आए तो सुबह या शाम के समय कुछ समय लेकर ये मंदिर देखने आइए ! महल से बाहर आने के बाद हम संकरी गलियों से होते हुए दुर्ग में बनी कालोनियों की ओर चल दिए ! इस लेख में फिल्हाल इतना ही, अगले लेख में मैं आपको जैसलमेर में बनी हवेलियों के बारे में बताऊंगा !


किले की छत से दिखाई देता जैसलमेर शहर

किले की छत से दिखाई देता जैसलमेर शहर

संगीत महल का एक दृश्य

संगीत महल का एक दृश्य

संगीत महल का एक दृश्य

संगीत महल का एक दृश्य
क्यों जाएँ (Why to go Jaisalmer): अगर आपको ऐतिहासिक इमारतें और किले देखना अच्छा लगता है, भारत में रहकर रेगिस्तान घूमना चाहते है तो निश्चित तौर पर राजस्थान में जैसलमेर का रुख कर सकते है !

कब जाएँ (Best time to go Jaisalmer): जैसलमेर जाने के लिए नवम्बर से फरवरी का महीना सबसे उत्तम है इस समय उत्तर भारत में तो कड़ाके की ठण्ड और बर्फ़बारी हो रही होती है लेकिन राजस्थान का मौसम बढ़िया रहता है ! इसलिए अधिकतर सैलानी राजस्थान का ही रुख करते है, गर्मी के मौसम में तो यहाँ बुरा हाल रहता है !


कैसे जाएँ (How to reach Jaisalmer): जैसलमेर देश के अलग-2 शहरों से रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा है, देश की राजधानी दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 980 किलोमीटर है जिसे आप ट्रेन से आसानी से तय कर सकते है ! दिल्ली से जैसलमेर के लिए कई ट्रेनें चलती है और इस दूरी को तय करने में लगभग 18 घंटे का समय लगता है ! अगर आप सड़क मार्ग से आना चाहे तो ये दूरी घटकर 815 किलोमीटर रह जाती है, सड़क मार्ग से भी देश के अलग-2 शहरों से बसें चलती है, आप निजी गाडी से भी जैसलमेर जा सकते है ! 


कहाँ रुके (Where to stay near 
Jaisalmer): जैसलमेर में रुकने के लिए कई विकल्प है, यहाँ 1000 रूपए से शुरू होकर 10000 रूपए तक के होटल आपको मिल जायेंगे ! आप अपनी सुविधा अनुसार होटल चुन सकते है ! खाने-पीने की सुविधा भी हर होटल में मिल जाती है, आप अपने स्वादानुसार भोजन ले सकते है !


क्या देखें (Places to see near 
Jaisalmer): जैसलमेर में देखने के लिए बहुत जगहें है जिसमें जैसलमेर का प्रसिद्द सोनार किला, पटवों की हवेली, सलीम सिंह की हवेली, नाथमल की हवेली, बड़ा बाग, गदीसर झील, जैन मंदिर, कुलधरा गाँव, सम, और साबा फोर्ट प्रमुख है ! इनमें से अधिकतर जगहें मुख्य शहर में ही है केवल कुलधरा, साबा फोर्ट, और सम शहर से थोडा दूरी पर है ! जैसलमेर का सदर बाज़ार यहाँ के मुख्य बाजारों में से एक है, जहाँ से आप अपने साथ ले जाने के लिए राजस्थानी परिधान, और सजावट का सामान खरीद सकते है !


अगले भाग में जारी...

जैसलमेर यात्रा

No comments:

Post a Comment