Sunday, April 22, 2018

कुलधरा – एक शापित गाँव (Kuldhara – A Haunted Village)

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप लोद्रवा से वापिस आते हुए रास्ते में पड़ने वाले चुंधी-गणेश मंदिर में दर्शन कर चुके है, जैसलमेर पहुंचकर रात्रि में जैसलमेर दुर्ग के कुछ चित्र लेने के बाद हम भोजन करके आराम करने के लिए वापिस अपनी धर्मशाला पहुंचे ! अब आगे, दिनभर सफ़र की थकान होने के कारण रात को बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई, सुबह अपने नियमित समय पर सोकर उठे ! हजूरी सेवा सदन में चाहे खान-पान की सुविधा नहीं थी लेकिन गर्म पानी की बढ़िया व्यवस्था थी, सुबह-2 नहाने के लिए 15 रूपए प्रति बाल्टी के हिसाब से बढ़िया गर्म पानी मिल जाता था ! बिस्तर से निकलकर हम दोनों बारी-2 से नित्य-क्रम से निवृत होने में लग गए, वैसे तो रात भर आराम करने से सारी थकान दूर हो चुकी थी, लेकिन रही-सही कसर गर्म पानी से स्नान ने दूर कर दी ! धर्मशाला में खान-पान की कोई दुकान ना होने के कारण चाय पीने के लिए भी हमें बाज़ार का रुख करना पड़ता था, आज भी नहा-धोकर चाय पीने के लिए हमने बाज़ार का ही रुख किया ! यहाँ से निकलने से पहले हमने एक बैग में खाने-पीने का कुछ सामान रख लिया, और एक बार फिर से हम जैसलमेर की गलियों से होते हुए दुर्ग की ओर जाने वाले मार्ग पर चल पड़े !

कुलधरा गाँव का एक दृश्य

सुबह का समय होने के कारण अभी बाज़ार में अधिकतर दुकानें बंद पड़ी थी, इसलिए ज्यादा भीड़-भाड़ भी नहीं थी ! बाज़ार से निकलकर हम दुर्ग के पास एक कचोरी की दुकान पर जाकर रुके, यहाँ गर्मा-गर्म कचोरियाँ बन रही थी, बगल में ही एक चाय की दुकान भी थी ! कचोरियाँ लेकर हम चाय की दुकान पर पहुंचे, यहाँ 2 कप चाय का आदेश देकर हम कचोरी निबटाने में लग गए, कचोरियाँ स्वादिष्ट थी, खाकर मजा आ गया ! जब तक चाय बनकर तैयार हुई हम 1-1 कचोरी खा चुके थे, बची हुई कचोरियाँ चाय के साथ निबटा दी ! पेट-पूजा के बाद बारी थी घूमने की, लेकिन कहाँ घूमा जाए, जब धर्मशाला से निकले थे तो भूरा राम से बात हुई थी और उसने हमें 11 बजे किले के पास ही मिलने का कहा था, 11 बजने वाले थे लेकिन अभी तक उसका कोई अता-पता था ! आज कहाँ घूमने जाया जाए, पहले क्या देखा जाए, मन में यही उठा-पटक चल रही थी, इस बीच दिमाग में एक तरकीब सूझी ! मैंने सोचा जब तक भूरा राम नहीं आता, किसी से मगजमारी ही कर ली जाए, दुर्ग के प्रवेश द्वार के सामने कई ऑटो वाले खड़े थे इनमें से ही एक ऑटो वाले से सर खपाने के लिए हम चल दिए ! 
कुलधरा गाँव की दिशा दर्शाता एक बोर्ड

कुलधरा गाँव जाने का मार्ग

कुलधरा गाँव का बाहरी प्रवेश द्वार

कुलधरा गाँव में बना पार्किंग स्थल
एक ऑटो वाले से हमने सम जाने का किराया पूछा, उसने 1300 रूपए बताया, जिसमें सम में ऊँट सफारी भी शामिल था, मैंने सोचा मोल-भाव करके 1000 रूपए तक बात बन जाएगी ! बातचीत से पता चला इस किराये में वो हमें कुलधरा गाँव नहीं दिखायेगा, कुलधरा जाने के लिए हमें उसे 300 रूपए अलग से देने पड़ेंगे, मैंने सोचा, मतलब अब तो 1300 देने ही पड़ेंगे ! चलो कोई बात नहीं, भूरा राम के साथ जायेंगे तो 2000 रूपए से ऊपर ही खर्च होंगे, क्योंकि 3000 रूपए में सौदा तय हुआ था जिसमें घूमने का सारा खर्च शामिल था ! लेकिन कल जैसलमेर घुमाते हुए उसने अधिकतर उन जगहों से बचने की कोशिश की थी जहाँ प्रवेश शुल्क देना था ! हवेलियों का टिकट भी हमने ही लिया था और बोटिंग के लिए भी हमने अलग से पैसे दिए थे, इसी चक्कर में उसने हमें कठपुतली का शो भी नहीं दिखाया, इस हिसाब से आज भी सफारी का खर्च हमें अलग से ही देना होगा ! कल शाम को हम उसे 1000 रूपए का भुगतान कर चुके थे, और आज जिस हिसाब से वो हमें लेट कर रहा था मुझे अंदेशा था कि वो हमें सम के लिए दोपहर बाद ही लेकर निकलेगा ! 

लेकिन हम अपना आधा दिन खराब करने के मूड में नहीं थे और पैसे बचाने का लालच भी अब मन में आने लगा था ! ऑटो वाले को थोडा और कुरेदा तो वो बोला अगर सम जाना हो तो शाम को 3 बजे मुझे फ़ोन करना, आप जहाँ कहीं भी रहोगे, मैं आपको लेने आ जाऊंगा ! मैंने पूछा, 3 बजे ही क्यों ? अभी क्यों नहीं, इसपर वो बोला, सम में शाम को ही रौनक होती है दिन में वहां करने को कुछ नहीं है, इसलिए अभी वहां जाने का कोई फायदा नहीं है ! सम जाने में 30-35 मिनट का समय लगेगा, यहाँ से 3 बजे निकलकर भी मैं आपको आराम से घुमा दूंगा ! फिर ऑटो वाला बोला, अगर आपको सम में रात्रि भोजन भी करना है और राजस्थानी नृत्य भी देखना है तो उसके लिए 3000 रूपए प्रति व्यक्ति खर्च होंगे, किराया भी इसी में शामिल होगा ! हमें तो आज रात ही ट्रेन पकडनी थी जिसके लिए हम समय से वापिस आना चाहते थे, इसलिए हमें पहला सौदा ही सही लग रहा था जिसमें खाली किराया शामिल था, लेकिन घूम-फिर कर बात वहीँ आ गई कि 3 बजे तक क्या किया जाए ! फिल्हाल के लिए ऑटो वाले से उसका नंबर लेकर उसे ये कहकर जाने दिया कि ज़रूरत पड़ी तो फ़ोन कर लेंगे !

अब हम दोनों इस बात पर विचार कर रहे थे कि भूरा राम के साथ जाया जाए या इस ऑटो वाले के साथ, देवेन्द्र भूरा राम के साथ जाने के पक्ष में था, जबकि मेरे मन में इस ऑटो के अलावा भी किसी अन्य विकल्प पर खोजबीन जारी थी ! देवेन्द्र की बात रखने के लिए मैं बोला, चलो एक बार भूरा राम को फ़ोन लगाकर पूछो कि वो कितनी देर में आ रहा है ? देवेन्द्र ने उसे फ़ोन लगाया लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं मिला, दोबारा फ़ोन लगाया लेकिन फिर भी नतीजा वही ! थक-हार कर उसे मेसेज डाल दिया, कि मेसेज पढ़ते ही फ़ोन करना, फिर दुर्ग के सामने से होते हुए थोडा आगे बढे तो हमें सड़क के किनारे किराये पर मिलने वाली मोटरसाइकिल की एक दुकान दिखाई दी ! मेरे मन में इसी विकल्प पर खोजबीन चल रही थी और देखो दस कदम चलते ही दुकान भी मिल गई, यहाँ एक कतार में बाइक की 2-3 दुकानें थी ! यहाँ एवेंजर, बुलेट, केटीएम, और डिस्कवर खड़ी थी हमने एक दुकानदार से डिस्कवर लेने की बात की तो उसने 800 रूपए मांगे, लेकिन मोल-भाव करके 700 रूपए में सौदा तय हो गया ! कुछ कागजी कार्यवाही पूरी करके हमने अपनी एक आईडी जमा की और मोटरसाइकिल लेकर अपनी धर्मशाला की ओर चल दिए !
कुलधरा गाँव का एक दृश्य

गाँव में बना एक मकान

कुलधरा गाँव का एक दृश्य

मकान की खिड़की से दिखाई देता एक दृश्य

कुलधरा गाँव में उजड़े पड़े मकान

एक मकान की छत से दिखाई देता एक दृश्य
जो डिस्कवर हमने ली थी वो एकदम नई थी, सिर्फ 2500 किलोमीटर चली थी, दमदार पिकअप थी, चलाने में भी खूब आनंद आ रहा था ! धर्मशाला से अपने-2 जैकेट लेकर हम इस यात्रा के लिए निकल पड़े, जैसलमेर से निकलते हुए ही एक पेट्रोल पम्प से हमने 300 रूपए का पेट्रोल भी डलवा लिया, कुछ ही देर में शहर की भीड़-भाड़ से निकलकर हम एक खुले मार्ग पर पहुँच गए ! रास्ते में एक जगह तनोट-लोंगेवाला जानेवाला मार्ग भी अलग हो रहा था, लेकिन हम सम जाने वाले मार्ग पर ही चलते रहे ! यहाँ सड़क के किनारे दूर-2 तक पवन चक्कियां लगी हुई थी, जैसलमेर में सड़क के किनारे खुले मैदानों में ऐसी सैकड़ों पवन चक्कियां दिखाई देंगी ! कुछ दूर चलने पर थार विलेज़ रिसोर्ट पार करने के बाद एक चौराहे से हम अपनी बाईं ओर मुड गए, ये मार्ग कुलधरा होते हुए खाबा फोर्ट चला जाता है ! इस मार्ग पर एक किलोमीटर चलने के बाद मुख्य मार्ग से बाईं ओर जैसलकोट नाम का एक पांच सितारा होटल है हमने कुछ समय इस होटल में भी बिताया जिसका वर्णन मैं बाद में करूँगा ! इसी मार्ग पर 5 किलोमीटर चलने के बाद बाईं ओर कुलधरा गाँव जाने का मार्ग अलग हो जाता है, जबकि सीधा मार्ग खाबा फोर्ट को चला जाता है !

हम कुलधरा गाँव देखने के बाद खाबा फोर्ट जाने वाले थे इसलिए कुलधरा जाने वाले मार्ग पर मुड गए, थोड़ी दूर जाने पर इस गाँव का बाहरी प्रवेश द्वार बना है, यहाँ 60 रूपए का प्रवेश शुल्क देकर हम गाँव परिसर में दाखिल हुए, बाइक का प्रवेश शुल्क शायद 10 रूपए था ! वैसे तो आप लोगों ने इस गाँव के बारे में सुन ही रखा होगा और जो लोग जैसलमेर गए है उन्होंने तो निश्चित तौर पर ये देखा भी होगा ! भानगढ़ की तरह कुलधरा भी एक शापित स्थान माना जाता है और इसे देश की डरावनी जगहों में शामिल किया गया है ! सैकड़ों वर्षों से वीरान पड़ा ये गाँव हमेशा से ऐसा नहीं था, कभी इस गाँव में पालीवाल समुदाय के लोग रहा करते थे ! दरअसल, इस क्षेत्र में पालीवाल समुदाय के लोगों के 84 गाँव थे और कुलधरा उनमें से एक था ! यहाँ स्थित घरों को देखकर लगता है कि यहाँ स्थित सभी घरों को योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया था, ईंट-पत्थर से बने इन घरों की बनावट ऐसी थी कि इनमें गर्मी का एहसास नहीं होता था ! ये इस कोण में बनाए गए थे कि हवा सीधे घर के अन्दर से होकर निकलती थी, इसलिए ये घर रेगिस्तान में भी वातानुकूलन का एहसास देते थे ! भयंकर गर्मी में भी वीरान पड़े इन मकानों में शीतलता का एहसास होता है ! 
मकान की छत से दिखाई देता एक दृश्य

मकान की छत से दिखाई देता एक दृश्य

मकान की छत से दिखाई देता एक दृश्य

गाँव में बना एक मंदिर

देवेन्द्र की भी एक फोटो तो बनती है
इस गाँव के तमाम घर झरोखों के जरिये आपस में जुड़े थे इसलिए गाँव के लोग इन झरोखों के माध्यम से अपनी बात दूसरे लोगों तक आसानी से पहुंचा सकते थे, अधिकतर घरों के अन्दर पानी के कुंड और सीढियाँ भी बनी हुई थी ! गाँव के अन्दर बने मार्ग भी काफी चौड़े है और इन्हें भी योजनाबद्ध तरीके से बनाया गया है ! पालीवाल समुदाय के लोग बहुत मेहनती थे, पाली से कुलधरा आने के बाद इन लोगों ने अपनी बुद्दिमता, कौशल और मेहनत से उस रेगिस्तान में खेती कर दी, जहाँ इसकी कल्पना करना भी बेमानी लगता है ! यही कुशलता पालीवालों के समृद्धि का रहस्य भी थी, रेगिस्तान में जिप्सम की परत वाली ज़मीन को पहचानना आसान काम नहीं था लेकिन पालीवाल समुदाय के लोग इस काम में माहिर थे ! जिप्सम की परत बारिश के पानी को ज़मीन में अवशोषित होने से रोकती है और एक सतह पर जाकर ये पानी जमा हो जाता है, इसी पानी से पालीवाल लोग खेती करते थे, ये लोग आमतौर पर खेती और मवेशी पालन पर निर्भर थे ! एक समय था जब पालीवालों ने यहाँ के रेगिस्तान को अपनी हरियाली के लिए दुनियाभर में चर्चा में ला दिया था ! अब बात आती है जब ये गाँव इतना विकसित था तो फिर ये वीरान कैसे हो गया ? 
मकान की छत से दिखाई देते उजड़े मकान

मकान की छत से दिखाई देता एक दृश्य

कुलधरा गाँव के रास्ते

कुलधरा के उजड़े मकान

कुलधरा गाँव के अन्दर बने मार्ग
ऐसी मान्यता है इसकी वजह था गाँव का दीवान सालम सिंह जिसकी बुरी नज़र गाँव की एक खूबसूरत लड़की पर थी ! उसे पाने के लिए दीवान ने गाँव के लोगों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया, अंत में उसने गाँव में सन्देश भिजवाया कि अगर उसे लड़की नहीं मिली तो वो उसे बलपूर्वक उठा ले जायेगा ! गाँव वालों के लिए मुश्किल घडी थी, इस विषय पर निर्णय लेने के लिए आस-पास के सभी गाँव वाले एक मंदिर पर इक्कट्ठा हुए और आपसी सहमति से ये निर्णय लिया गया कि किसी भी कीमत पर लड़की दीवान को नहीं दी जायेगी ! तत्पश्चात, आस-पास के सभी 84 गाँव वाले एक ही रात में अपने-2 घर छोड़कर यहाँ से चले गए और जाते हुए उन्होंने ये श्राप भी दिया कि इन घरों में अब कोई नहीं बस पायेगा, तब से अब तक गाँव की हालत ऐसी ही है ! हालांकि, गाँव में बने घरों को देखकर ऐसा नहीं लगता कि ये सैकड़ों वर्ष पुराने है ! आसपास के स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ परिवारों ने यहाँ दोबारा बसने की कोशिश की थी लेकिन वो सफल नहीं हो सके, कुछ लोगों का तो ये भी कहना है कि लोग यहाँ बसने तो आए थे लेकिन उसके बाद वो दोबारा कहीं नहीं दिखे, कोई नहीं जानता कि वे लोग कहाँ गए, इस गाँव के बारे में ऐसी अनगिनत कहानियां है !  
कुलधरा गाँव में बने मार्ग

एक घर में रखी पुरानी बैलगाड़ी

मकान की बाहरी दीवार पर बने चित्र

मकान की छत से दिखाई देता एक दृश्य

गाँव के पिछले भाग में बना मार्ग

झाड़ियों में लगे फूल 

गाँव में मार्ग के किनारे बना बैठने की एक सीट
सैकड़ों वर्षों से वीरान पड़े इस गाँव को पर्यटकों की नज़र में लाने का श्रेय निश्चित तौर पर राजस्थान पर्यटन विभाग को जाता है जिसने यहाँ पर्यटन को बढाने के लिए पूरा जोर लगा दिया और प्रचार-प्रसार भी खूब किया ! वर्तमान में राजस्थान पर्यटन विभाग इस गाँव को सजाने-संवारने में लगा है ताकि अगले कुछ वर्षो या फिर महीनों में यहाँ आने वाले पर्यटक रात्रि विश्राम के लिए रुक भी सके ! कम से कम यहाँ हो रहे निर्माण कार्य को देखकर तो ऐसा ही लगता है, गाँव में जगह-2 नए कमरे बनाए गए है, कुछ कक्ष बनकर तैयार हो चुके है तो कुछ का निर्माण कार्य प्रगति पर है ! इस बात की पुष्टि हमें वहां रखे एक पत्थर पर अंकित कैफेटेरिया को देखकर हुई, वैसे इन कमरों की बनावट और गाँव की अन्य इमारतों को देखकर लगता नहीं है कि ये उतनी पुरानी है जितना इन्हें बताया जाता है ! या फिर हो सकता है कि संरक्षण के काम की वजह से गाँव का मूल रूप कहीं खो सा गया है ! इस गाँव में बनी इमारतों के पत्थर भी सुनहरे रंग के है और दरवाजों पर बढ़िया कारीगरी की गई है ! वैसे इस बात का अनुमान लगाकर भी मन रोमांचित हो जाता है कि जल्द ही जब यहाँ रुकने की व्यवस्था हो जाएगी तो रात को यहाँ की वीरान पड़ी गलियों में घूमने में आनंद आएगा, वैसे वर्तमान में तो यहाँ रात को आने पर पाबन्दी है !
गाँव में स्थित एक मंदिर

गाँव में बने कुछ नए मकान

मकान की छत से दिखाई देता एक दृश्य

गाँव में बना एक नया मकान 
वैसे ये देखना भी काफी रोमांचक होगा कि जिस गाँव को डरावना बता कर अभी लोगों को रात को यहाँ आने नहीं दिया जाता वहां होटल बन जाने के बाद राजस्थान पर्यटन विभाग क्या कहकर लोगों को रुकने के लिए आमंत्रित करेगा ! गाँव में बनी इमारतों की छत पर खड़े होकर पूरे गाँव का नज़ारा दिखाई देता है, दूर तक उजड़े मकानों के मलवे दिखाई देते है, और कई किलोमीटर तक का दृश्य एकदम साफ़ दिखाई देता है ! इस गाँव के बीचों-बीच एक मंदिर भी है, घूमते हुए हम इस मंदिर में भी गए और फिर गाँव के घुमावदार मार्ग से होते हुए काफी दूर तक निकल गए, वैसे तो अधिकतर मकान खाली पड़े है लेकिन कुछ मकानों में फिर भी कुछ पुरानी वस्तुएं दिखाई दे जाती है ! गाँव में प्रवेश करते ही सामने के कुछ मकानों में तो तहखाने भी बने है और लकड़ी के छत वाले मकान भी, यहाँ घूमते हुए उस समय की कल्पना कीजिये जब यहाँ लोग रहते होंगे ! गाँव में आधा-पौना घंटा घूमने के बाद हमने एक जगह बैठकर हल्का जलपान किया, तेज भूख लगी थी और प्यास भी जोरों की लगी थी ! साइकिल से आए कुछ लोगों का ग्रुप भी हमें यहाँ मिला, महाराष्ट्र से आए ये लोग जैसलमेर से यहाँ साइकिल पर ही आए थे और आज दिनभर ये साइकिल पर ही घूमने वाले थे ! 
कैफ़ेटिरिया का एक बोर्ड 

गाँव की चौपाल से लिया एक दृश्य
इनका जज्बा देखकर वाकई अच्छा लगा, कुछ देर इनसे बातचीत करने के बाद हम पार्किंग की ओर चल दिए ! कुल मिलाकर हमने यहाँ लगभग घंटे भर से अधिक का समय बिताया ! जब हम यहाँ आए थे तो गिनती की कुछ गाड़ियाँ खड़ी थी, लेकिन अब पार्किंग स्थल भर चुका था ! भरी दोपहर में यहाँ से चलने का मन तो नहीं हो रहा था लेकिन हमें अभी भी कई जगहें देखनी थी, वैसे यहाँ खड़े होकर दूर तक का नज़ारा एकदम साफ़ दिखाई दे रहा था ! कुछ देर बाद हम कुलधरा परिसर से निकलकर मुख्य मार्ग पर पहुँच चुके थे, अब हमारा अगला पड़ाव खाबा फोर्ट था जो यहाँ से लगभग 16 किलोमीटर दूर था ! कुछ ही देर में हम खाबा फोर्ट जाने वाले मार्ग पर पहुँच गए, रास्ता ज्यादा चौड़ा नहीं था लेकिन शानदार बना था, यहाँ भी सड़क के किनारे कंटीली झाड़ियों की भरमार थी ! खाबा फोर्ट और इसके आस-पास की जगहों का वर्णन मैं यात्रा के अगले लेख में करूँगा, फिल्हाल इस लेख पर यहीं विराम लगाते हुए आपसे विदा लेता हूँ जल्द ही आपसे अगले लेख में मुलाकात होगी ! 

क्यों जाएँ (Why to go Jaisalmer): अगर आपको ऐतिहासिक इमारतें और किले देखना अच्छा लगता है, भारत में रहकर रेगिस्तान घूमना चाहते है तो निश्चित तौर पर राजस्थान में जैसलमेर का रुख कर सकते है !

कब जाएँ (Best time to go Jaisalmer): जैसलमेर जाने के लिए नवम्बर से फरवरी का महीना सबसे उत्तम है इस समय उत्तर भारत में तो कड़ाके की ठण्ड और बर्फ़बारी हो रही होती है लेकिन राजस्थान का मौसम बढ़िया रहता है ! इसलिए अधिकतर सैलानी राजस्थान का ही रुख करते है, गर्मी के मौसम में तो यहाँ बुरा हाल रहता है !

कैसे जाएँ (How to reach Jaisalmer): जैसलमेर देश के अलग-2 शहरों से रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा है, देश की राजधानी दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 980 किलोमीटर है जिसे आप ट्रेन से आसानी से तय कर सकते है ! दिल्ली से जैसलमेर के लिए कई ट्रेनें चलती है और इस दूरी को तय करने में लगभग 18 घंटे का समय लगता है ! अगर आप सड़क मार्ग से आना चाहे तो ये दूरी घटकर 815 किलोमीटर रह जाती है, सड़क मार्ग से भी देश के अलग-2 शहरों से बसें चलती है, आप निजी गाडी से भी जैसलमेर जा सकते है !


कहाँ रुके (Where to stay near Jaisalmer): जैसलमेर में रुकने के लिए कई विकल्प है, यहाँ 1000 रूपए से शुरू होकर 10000 रूपए तक के होटल आपको मिल जायेंगे ! आप अपनी सुविधा अनुसार होटल चुन सकते है ! खाने-पीने की सुविधा भी हर होटल में मिल जाती है, आप अपने स्वादानुसार भोजन ले सकते है !

क्या देखें (Places to see near 
Jaisalmer): जैसलमेर में देखने के लिए बहुत जगहें है जिसमें जैसलमेर का प्रसिद्द सोनार किला, पटवों की हवेली, सलीम सिंह की हवेली, नाथमल की हवेली, बड़ा बाग, गदीसर झील, जैन मंदिर, कुलधरा गाँव, सम, और साबा फोर्ट प्रमुख है ! इनमें से अधिकतर जगहें मुख्य शहर में ही है केवल कुलधरा, खाभा फोर्ट, और सम शहर से थोडा दूरी पर है ! जैसलमेर का सदर बाज़ार यहाँ के मुख्य बाजारों में से एक है, जहाँ से आप अपने साथ ले जाने के लिए राजस्थानी परिधान, और सजावट का सामान खरीद सकते है !


अगले भाग में जारी...

जैसलमेर यात्रा

  1. जोधपुर से जैसलमेर की ट्रेन यात्रा (A Journey from Jodhpur to Jaisalmer)
  2. जैसलमेर के सोनार किले की सैर (A Visit to Jaisalmer Fort)
  3. जैसलमेर की शानदार हवेलियाँ (Beautiful Haveli’s of Jaisalmer)
  4. जैसलमेर की गदीसर झील (Gadisar Lake of Jaisalmer)
  5. जैसलमेर का बड़ा बाग (Bada Bagh of Jaisalmer)
  6. लोद्रवा के जैन मंदिर (Jain Temples of Lodruva)
  7. लोद्रवा का चुंधी-गणेश मंदिर (Chundhi Ganesh Temple of Lodruva)
  8. कुलधरा – एक शापित गाँव (Kuldhara – A Haunted Village)
  9. खाभा फोर्ट – पालीवालों की नगरी (Khabha Fort of Jaisalmer)
  10. खाभा रिसोर्ट और सम में रेत के टीले (Khabha Resort and Sam Sand Dunes)
  11. जैसलमेर के पांच सितारा होटल (Five Star Hotels in Jaisalmer)

4 comments:

  1. वाह भूरा राम की कार और रिक्षा से इतर आपको बढ़िया ऑप्शन bike का मिल गया....कुलधारा के सभी फोटो बढ़िया लगे...

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    1. बिलकुल सही कहा प्रतीक भाई, बाइक से घूमने का भी अलग ही आनंद है ! जानकर अच्छा लगा कि फोटो आपको पसंद आए !

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  2. अच्छी फोटो. शोर ज्यादा है कुलधरा का वैसे नाम बड़े और दर्शन छोटे ! वहां के किस्से भी भ्रमात्मक लगे. खाबा कुछ बेहतर लगा.

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    1. किस्से तो बनावटी लगे लेकिन आपको जगह में क्या कमी लगी ?

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