Thursday, July 14, 2016

सारनाथ का थाई मंदिर और चौखंडी स्तूप (Tourist Attractions in Sarnath, Thai Temple and Chaukhandi Stoop)

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मेरा पिछला लेख तो आप पढ़ ही चुके होंगे जिसमें मैं चाइना मंदिर घूमने के बाद म्यूज़ीयम पहुँचा और म्यूज़ीयम में ना जाकर इसके सामने बनी एक झोपड़ीनुमा इमारत में चल दिया ! अब आगे, तो जिस इमारत को मैं चर्च समझ कर अंदर चला आया था असल में वो सारनाथ में स्थित थाई मंदिर है ! इस मंदिर का प्रवेश द्वार शानदार बना है, प्रवेश द्वार से लेकर मंदिर के मुख्य भवन की आकृति में थाईलैंड संस्कृति की झलक साफ दिखाई देती है ! एक खुले मैदान के बीचों-बीच बना ये मंदिर बहुत सुंदर लगता है, मंदिर परिसर में मुख्य भवन के अलावा भी कई मूर्तियाँ और आकृतियाँ बनी हुई है ! थाई मंदिर के मुख्य भवन के ऊपरी भाग में महात्मा बुद्ध के चित्र बने हुए है इन चित्रों में उन्हें अलग-2 क्रिया-कलाप करते हुए दिखाया गया है ! पहला चित्र उनके बाल रूप को दर्शाता है तो दूसरे चित्र में महात्मा बुद्ध ध्यान लगाते हुए दिखाई देते है, अगले चित्र में वो अपने शिष्यों को ज्ञान दे रहे है, तो एक अन्य चित्र में उन्हें विश्राम करते हुए भी दिखाया गया है !

थाई मंदिर का एक दृश्य

Sunday, July 10, 2016

सारनाथ का चाइना मंदिर (China Temple, Sarnath)

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मूलगंध कूटी विहार से निकलकर बाईं ओर जाने पर एक चौराहा आता है, चौराहे से सीधे जाने पर सड़क के बाईं ओर ही चाइना मंदिर है ! साड़ी उद्योग देखने के बाद हम एक सहायक मार्ग से होते हुए 5 मिनट का सफ़र तय करके चौराहे पर पहुँचे ! इस चौराहे से 2 मिनट की पद यात्रा करने के बाद ही हम चाइना मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने खड़े थे ! इस मंदिर में पिछले मंदिर की अपेक्षा ज़्यादा लोग थे ! मंदिर के प्रवेश द्वार के किनारे दो विशाल स्तंभ है, इस मंदिर की दीवारें लाल और पीले रंग से रंगी गई है और मंदिर की छत को झोपड़ीनुमा आकृति दी गई है ! जाहिर सी बात है चीनी वास्तुकारों ने इस मंदिर की रूप-रेखा तैयार की होगी ! मंदिर परिसर में प्रवेश करने के बाद एक खुला बरामदा है, जो काफ़ी बड़ा है ! थोड़ी आगे बढ़ने पर एक हाल है जिसमें महात्मा बुद्ध के जीवन से संबंधित बहुत से चित्र और अन्य जानकारियों को प्रदर्शनी की तरह लगाया गया है ! यहाँ एक बड़े चार्ट पर दर्शाया गया है कि पूरे विश्व में महात्मा बुद्ध की विशाल मूर्तियाँ कहाँ-2 पर है ! हालाँकि, इस चार्ट पर धूल तो काफ़ी जम गई है लेकिन बहुत उपयोगी जानकारी दी गई है !


चाइना मंदिर के प्रवेश द्वार पर लगी सुंदर लाइट

Wednesday, July 6, 2016

धूमेख स्तूप, बोधिवृक्ष और मूलगंध कूटी विहार (Tourist Attractions in Sarnath, Dhumekh Stoop, Mulgandh Kuti Vihar Temple)

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शनिवार, 7 मई 2016

पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह मैं नई दिल्ली से वाराणसी का सफ़र तय करके सारनाथ पहुँचा, अब आगे ! ऑटो से उतरते ही मैं मूलगंध कूटी विहार के प्रवेश द्वार पर खड़ा होकर फोटो खींचने लगा, कि तभी किसी की आवाज़ सुनकर मेरी एकाग्रता टूटी ! मुड़कर देखा तो एक व्यक्ति मेरे पीछे खड़ा था, मेरे मुड़ते ही वो बोला, सर गाइड कर लो, आपको अच्छे से मंदिर घुमा दूँगा ! फोटो खींचते-2 ही मैने पूछा अच्छे से घूमना क्या होता है भाई, मेरी आँखें भी सलामत है और पैर भी, मैं अपने आप ज़्यादा अच्छे से घूम सकता हूँ ! अब ये मंदिर पहाड़ी पर तो है नहीं कि तुम मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर ले जाओगे ! दरअसल, मेरे हाथ में कैमरा और पीठ पर बैग देखकर वो ये सोचकर चला आया था कि शहर से आए इस मुसाफिर से सुबह-2 कुछ पैसे ही कमा लिए जाएँ ! मेरे मना करने के बावजूद भी वो व्यक्ति मेरे आगे-पीछे घूमता रहा, अंत में मैने उसे अपने साथ चलने को कह ही दिया ! पूछने पर वो बोला कि आपको मंदिर परिसर में 5 पॉइंट घुमा दूँगा और बदले में केवल 30 रुपए लूँगा ! 

मूलगंध कूटी विहार मंदिर का एक दृश्य

Saturday, July 2, 2016

दिल्ली से वाराणसी की रेल यात्रा (A train trip to Varanasi from Delhi)

शुक्रवार, 6 मई 2016

बात है मई के प्रथम सप्ताह की, जब मुझे एक निजी काम के सिलसिले में बनारस जाने का मौका मिला ! अब क्योंकि ये यात्रा घुमककड़ी के लिए तो थी नही, इसलिए काम से इतर मेरे पास घूमने के लिए बहुत ही सीमित समय था ! मैने सोचा क्यों ना समय का सदुपयोग करते हुए इस बार सारनाथ घूम लेता हूँ, गंगा आरती को अगली बार के लिए छोड़ दिया ! वैसे, सारनाथ में घूमने के लिए काफ़ी जगहें है जैसे चौखंडी स्तूप, जापानी मंदिर, नेपाली मंदिर, मुलगंध कुटी विहार, चाइना मंदिर और भी बहुत कुछ ! सारनाथ के बारे में मैने अपने घुमक्कड़ मित्रों और इंटरनेट के माध्यम से काफ़ी कुछ पढ़ रखा था इसलिए यहाँ घूमने का बड़ा मन था ! मैने सोचा कि इस यात्रा के दौरान जितना घूम सकूँगा घूमूंगा और जो रह जाएगा उसे अगली बार के लिए छोड़ दूँगा, वैसे भी वाराणसी में ससुराल होने के कारण साल में यहाँ एक बार तो आना होता ही है ! इस यात्रा के लिए मेरा नई दिल्ली से मंडुवाडीह तक का शिवगंगा एक्सप्रेस से आरक्षण था, ये गाड़ी इस लाइन पर चलने वाली सबसे बढ़िया गाड़ियों में गिनी जाती है ! शाम 6:55 पर चलकर सुबह 7 बजे मंडुवाडीह उतार देती है, और फिर यहाँ से वाराणसी रह ही कितना जाता है, स्टेशन के बाहर निकलते ही आपको आसानी से वाराणसी कैंट जाने के लिए ऑटो मिल जाएँगे !

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का एक दृश्य

Friday, April 29, 2016

भानगढ़ के किले से वापसी (Bhangarh to Delhi – Return Journey)

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किले से निकलकर हम पार्किंग स्थल पर पहुँचे, जो प्रवेश द्वार के ठीक सामने था, जब हम किले से बाहर निकल रहे थे तो काफ़ी लोग एक साथ किले में जा रहे थे ! जैसे-2 दिन बढ़ता जाएगा, यहाँ आने वाले लोगों की तादात भी बढ़ती जाएगी और फिर शाम होते-2 सब अपने घर लौट जाएँगे ! बाहर आते हुए ध्यान आया कि किले से थोड़ी दूरी पर एक बावली और कुछ अन्य इमारतें भी है गाड़ी पार्किंग में ही छोड़कर हम लोग मुख्य मार्ग से हटकर एक कच्चे मार्ग पर चल दिए ! जिस इमारत की मैं बात कर रहा हूँ वो किसी का मकबरा था, कहते है ये किसी हिंदू शासक का मकबरा है जिसने बाद में इस्लाम धर्म अपना लिया था ! मुख्य मार्ग से हटकर कच्चे रास्ते से होते हुए हम इस मक़बरे की ओर चल दिए ! दूर से देखने पर ही ये मकबरा बहुत सुंदर लग रहा था, थोड़ी देर बाद हम मक़बरे के पास पहुँच गए ! ये मकबरा एक ऊँचे चबूतरे पर बना है और अंदर जाने के लिए पत्थर की सीढ़ियाँ भी बनी है ! जिस समय हम मक़बरे पर पहुँचे, वहाँ कुछ स्थानीय बच्चे खेल रहे थे !

मक़बरे का एक दृश्य

Tuesday, April 26, 2016

भानगढ़ के किले में दोस्तों संग बिताया एक दिन (A Day in Bhangarh Fort)

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पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कैसे हम पाराशर धाम की यात्रा करने के बाद वापिस अपने होटल आकर नाश्ते के लिए रुके, नाश्ता करने के बाद हम लोग भानगढ़ के लिए निकल पड़े ! मुख्य मार्ग पर कुछ किलोमीटर चलकर हम उस तिराहे पर पहुँचे जहाँ से भानगढ़ जाने का मार्ग अलग होता है ! इस तिराहे से बाएँ मुड़कर हम भानगढ़ जाने वाले मार्ग पर हो लिए, कुछ दूर जाकर एक सहायक मार्ग दाएँ मुड़ता है ! इसी मार्ग पर आधा किलोमीटर चलने के बाद भानगढ़ का किला है, सुबह जब इस मार्ग से आए थे तो चारों तरफ सन्नाटा था लेकिन अब सड़क के किनारे वाली दुकानें खुल चुकी थी और इस मार्ग पर वाहनों का आवागमन भी था ! एक दुकान से खाने-पीने का थोड़ा सामान लिया और किले की ओर चल दिए ! किले से थोड़ा पहले ही मार्ग पर एक रस्सी से बैरियर लगाकर पार्किंग शुल्क वसूला जा रहा था, वैसे आप इस पार्किंग से थोड़ी पहले गाड़ी खड़ी करके भी किले में जा सकते है, तब आपको पार्किंग शुल्क नहीं देना होगा ! सुरक्षा के लिहाज से हमने 50 रुपए देकर पार्किंग में ही गाड़ी खड़ी करना उचित समझा !


गोपीनाथ मंदिर का एक दृश्य

Saturday, April 23, 2016

भानगढ़ का नारायणी माता मंदिर और पाराशर धाम (Parashar Dham and Narayani Temple in Bhangarh)

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भानगढ़ यात्रा के मेरे पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कैसे हम भानगढ़ के किले की दीवार फांदकर खंडहर बन चुकी बस्ती से होते हुए किले के दूसरे प्रवेश द्वार तक पहुँच गए ! अब आगे, इस बात से तो सब वाकिफ़ होंगे कि डर में शायद ही किसी का दिमाग़ ठीक ढंग से काम करता हो, हममें से भी किसी एक के दिमाग़ ने ही काम किया और बाकी सब तो बस उसके पीछे-2 हो लिए ! फिलहाल तो किले में जाने की हमारी हिम्मत इस दरवाजे पर ही जवाब दे गई थी, इसलिए यहाँ से वापसी की राह पकड़ना ही बेहतर लगा ! हमने सोचा, उजाला होने के बाद आराम से भानगढ़ का किला देखने आएँगे ! जितना समय हमें यहाँ तक पहुँचने में लगा था उससे आधे समय में ही हम वापिस किले की बाहरी दीवार के पास पहुँच गए ! एक-दूसरे को सहारा देते हुए हम सब दीवार कूदकर किले से बाहर निकल गए और अपनी गाड़ी की ओर तेज कदमों से चल दिए ! गाड़ी में सवार होने की देर थी फिर तो पता ही नहीं चला कि कब अपने होटल के सामने पहुँच गए, होटल से थोड़ी आगे ही एक मंदिर था, जहाँ टहलते हुए हम रात को भी आए थे ! यहाँ एक-दो चाय की दुकानें खुल चुकी थी, 4 चाय का आदेश देकर वहीं रखे एक तख्त पर हम चारों बैठ गए !


पाराशर धाम जाने का मार्ग

Wednesday, April 20, 2016

भानगढ़ की वो यादगार रात (A Scary Night in Bhangarh)

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अब तक आपने पढ़ा कि किस तरह हम एक लंबा सफ़र तय करके भानगढ़ पहुँचे और एक होटल में जाकर रात्रि भोजन के लिए रुके ! हम लोगों का मन तो रात को ही किले में जाने का था, इसलिए खाना खाने के लिए रसोई के बगल में बने डाइनिंग हाल में आकर बैठ गए ! हमसे पहले कुछ अन्य लोग भी भोजन करने के लिए यहाँ बैठे हुए थे, हमारे बैठते ही रसोइया बोला कि आप लोगों को खाना परोसने में थोड़ा समय लगेगा क्योंकि आपसे पहले ये लोग बैठे है ! इन्हें खिला लेने के बाद ही आपके लिए खाना तैयार करूँगा ! दरअसल, सुनसान जगह होने के कारण यहाँ ज़्यादा लोग नहीं आते, इसलिए ये होटल वाला ऑर्डर पर ही खाना बनाता है ! हमारा खाना तैयार होने में अभी समय था, और यहाँ बैठकर करने के लिए कुछ नहीं था इसलिए हमने सोचा यहाँ बैठने से अच्छा है कि होटल के आस-पास कहीं घूम लेते है, शायद इसी बहाने कोई ज़रूरी जानकारी भी मिल जाए ! टहलते हुए हम सब होटल से थोड़ी दूरी पर स्थित एक मंदिर के सामने पहुँचे !


हमारे होटल से दिखाई देता एक नज़ारा

Sunday, April 17, 2016

भानगढ़ की एक सड़क यात्रा (A road trip to Bhangarh)

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

शायद ही कोई शख्स होगा जिसने भानगढ़ के बारे में ना सुना हो, आख़िर ये जगह मशहूर ही इतनी है कि लोगों ने इसके बारे में जाने-अंजाने सुन ही रखा होगा ! वैसे अगर आप इस जगह के बारे में नहीं जानते तो आपको बता दूँ कि भारत की सबसे डरावनी जगहों में से एक है राजस्थान के अलवर में स्थित भानगढ़ का किला ! यही कारण है कि यहाँ रोजाना हज़ारों लोग घूमने और किले परिसर में मौजूद मंदिर में पूजा करने के लिए आते है ! तो चलिए इस यात्रा को शुरू से बताता हूँ, भानगढ़ जाने की इच्छा काफ़ी समय से मन में थी, लेकिन अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए किसी का साथ ढूँढ रहा था ! जब तक किसी का साथ नहीं मिल रहा था इस यात्रा को मैं आगे खिसकाते जा रहा था लेकिन संयोग देखिए कि जो यात्रा पिछले 1 साल से लटकी हुई थी उसपर जाने का विचार मात्र 10 मिनट में बन गया ! इस बार भी ये यात्रा ना हो पाती, लेकिन होली से अगले दिन एकदम से कुछ ऐसा घटित हुआ कि आनन-फानन में इस यात्रा पर निकल पड़े ! हुआ कुछ यूँ कि होली पर 4 छुट्टियों का संयोग बन रहा था, इसलिए हम 3-4 मित्रों का कहीं घूमने जाने का विचार था ! होली आकर चली भी गई लेकिन किसी ने भी यात्रा पर जाने के बाबत बात नहीं की !

अलवर की सिलिसढ़ झील का एक दृश्य 

Thursday, April 14, 2016

लोधी गार्डन - सिकंदर लोदी का मकबरा (Lodhi Garden - Lodhi Road, New Delhi)

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सफ़दरजंग के मक़बरे से निकलते हुए धूप काफ़ी तेज हो गई थी, लेकिन अभी तो आधा दिन भी नहीं गुजरा था ! मैने सोचा, क्यों ना पास में ही स्थित लोधी गार्डन भी घूम लिया जाए, क्या पता इधर आने का मौका फिर कब लगे ! लोधी गार्डन इस मक़बरे से बहुत ज़्यादा दूर नहीं है बमुश्किल 200-300 मीटर की दूरी पर होगा ! मक़बरे के प्रवेश द्वार के ठीक सामने जाने वाला मार्ग लोधी रोड ही है, जो इस पार्क के किनारे से होता हुए आगे दयाल सिंह कॉलेज की ओर चला जाता है ! वैसे तो इस मार्ग पर बसें भी खूब चलती है लेकिन दूरी ज़्यादा ना होने के कारण मैं इस मार्ग पर पैदल ही चल दिया ! लोधी रोड पर स्थित ये पार्क ऐतिहासिक दृष्टि से भी काफ़ी महत्वपूर्ण है, 90 एकड़ में फैले इस पार्क में कई मुगल शासकों के मक़बरे है जिसमें मोहम्मद शाह, और सिकंदर लोदी के मक़बरे प्रसिद्ध है ! सुबह-शाम स्थानीय लोग इस पार्क में टहलने के लिए आते है तो दोपहर होते-2 यहाँ प्रेमी-युगलों के अलावा पर्यटक भी आने लगते है ! इस पार्क में मुगल शासकों के मकबरों के अलावा शीश-गुंबद और बड़ा-गुंबद भी है, पार्क में स्थित इन मकबरों और अन्य इमारतों को पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित घोषित किया जा चुका है !


मुहम्मद शाह का मकबरा

Sunday, April 10, 2016

सफ़दरजंग के मक़बरे की सैर (Safdarjung Tomb, New Delhi)

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दिल्ली घूमते हुए आज मैं आपको दिल्ली की एक और ऐतिहासिक इमारत को घुमाने लेकर चल रहा हूँ, ये इमारत भी दिल्ली के एक व्यस्त इलाक़े में स्थित है ! ज़ोर बाग मेट्रो स्टेशन के पास स्थित इस इमारत से लोधी गार्डन भी बहुत ज़्यादा दूर नहीं है ! अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि मैं सफ़दरजंग के मक़बरे की बात कर रहा हूँ, जो दिल्ली का एक ऐतिहासिक स्थल है ! 1754 में बने इस मक़बरे का निर्माण नवाब शुजा-उद्-दौला ने अपने पिता मिर्ज़ा-मुकीम-अबुल-मंसूर-ख़ान के सम्मान में करवाया था ! मुगल शासक मुहम्मद शाह के शासन काल में मिर्ज़ा साहब अवध प्रांत के गवर्नर थे और उन्होने अवध प्रांत पर स्वतंत्र शासक की तरह राज किया ! इस दौरान उन्हें सफ़दरजंग की उपाधि से नवाजा गया था, वे काफ़ी धनवान और ताकतवर शासक थे ! मुहम्मद शाह का शासनकाल 1719 से 1748 तक रहा, 1748 में मुगल शासक की मृत्यु के बाद मिर्ज़ा साहब अवध से दिल्ली चले आए ! फिर जब अहमद शाह ने दिल्ली की कमान संभाली तो मिर्ज़ा साहब को दिल्ली की सल्तनत का मुख्य मंत्री (वज़ीर) बनाया गया !


सफ़दरजंग के मक़बरे का एक दृश्य


Wednesday, April 6, 2016

बहाई उपासना केंद्र - कमल मंदिर - (Lotus Temple in Delhi)

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दिल्ली भ्रमण के दौरान आज हम दक्षिणी दिल्ली के नेहरू प्लेस इलाक़े में आ पहुँचे है ! आज हम जिस इमारत को देखने जा रहे है वो दक्षिणी दिल्ली में स्थित एक धार्मिक स्थल है ! ऐतिहासिक नगरी दिल्ली में वैसे तो कई धार्मिक स्थल है लेकिन जो जगह आज मैं आपको दिखाने वाला हूँ उसका दिल्ली में अपना अलग ही महत्व है ! नेहरू प्लेस का नाम सुनते ही काफ़ी लोग तो इस जगह के बारे में जान चुके होंगे, बाकी लोगों को बता दूँ कि मैं दिल्ली के कमल मंदिर की बात कर रहा हूँ ! नेहरू प्लेस के पास स्थित कमल मंदिर खूबसूरती की एक मिसाल है, इसलिए लोग दूर-2 से इस मंदिर को देखने के लिए आते है ! नेहरू प्लेस से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर का निर्माण बहाई समुदाय द्वारा करवाया गया है ! ये मंदिर दिल्ली के मुख्य आकर्षण केंद्रों में से एक है इसलिए  दिल्ली घूमने आने वाले अधिकतर लोग इस मंदिर में भी ज़रूर जाते है ! ये मंदिर की खूबसूरती ही है कि कुछ लोग धार्मिक कारणों से तो अन्य लोग मंदिर की बनावट को देखने के लिए इसकी ओर खिंचे चले आते है ! मंदिर तक पहुँचने के लिए यातायात के वैसे तो कई विकल्प मौजूद है, लेकिन सबसे सस्ता और बढ़िया साधन दिल्ली मेट्रो ही है ! नेहरू प्लेस और कालकाजी मंदिर मेट्रो स्टेशन से इस मंदिर की दूरी मात्र 300 मीटर ही है इसलिए इन दोनों स्टेशनो में से आप कहीं भी उतर कर मंदिर तक पैदल भी जा सकते है ! 

कमल मंदिर का एक दृश्य 

Sunday, April 3, 2016

अग्रसेन की बावली - एक ऐतिहासिक धरोहर (Agrasen ki Baoli, New Delhi)

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आज मैं आपको दिल्ली के दिल कहे जाने वाले कनॉट प्लेस में स्थित एक छोटी लेकिन ऐतिहासिक जगह की सैर पर लेकर चल रहा हूँ ! इस ऐतिहासिक इमारत के पास से रोजाना हज़ारों लोग गुज़रते है लेकिन इस भीड़ में से गिनती के कुछ लोग ही इस खूबसूरत जगह को देखने जाते है ! जी हाँ, जिस ऐतिहासिक धरोहर की मैं बात कर रहा हूँ वो बाराखंबा रोड और मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन से बराबर दूरी पर स्थित एक बावली है ! अगर आप अभी भी इस जगह का अनुमान नहीं लगा पाए है तो आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं अग्रसेन की बावली की बात कर रहा हूँ ! वैसे इस बावली तक जाने का रास्ता बहुत आसान है लेकिन ऊँची-2 इमारतों से घिरी होने के कारण दूर से इस बावली का पता ही नहीं चलता ! कई बार तो लोग इसके पास से निकल जाते है और जानकारी के अभाव में इस जगह को नहीं देख पाते ! मैं लोकल ट्रेन में बैठकर शिवाजी ब्रिज रेलवे स्टेशन पहुँचा, फिर स्टेशन से बाहर आकर पैदल ही बाराखंबा मेट्रो स्टेशन की ओर चल दिया ! बाराखंबा मेट्रो स्टेशन से मंडी हाउस की ओर चलने पर आगे जाकर दाई ओर एक मार्ग हैली रोड के लिए अलग होता है ! इसी मार्ग पर 200 मीटर चलने के बाद फिर दाईं ओर एक मार्ग अंदर गली में जाता है, इसी गली में ये बावली स्थित है !

अग्रसेन की बावली का एक दृश्य (A Glimpse of Agrsen ki Baoli, New Delhi)

Saturday, March 19, 2016

जयपुर का सिटी पैलेस और हवा महल (City Palace and Hawa Mahal of Jaipur)

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

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खाना खा-पीकर रात को होटल पहुँचने के बाद आराम करने के लिए अपने कमरे में चल दिए, मन में शंका तो थी कि कहीं पुलिस वाले ने गाड़ी का नंबर ना नोट कर लिया हो ! लेकिन जैसे-2 नींद आने लगी, ये शंका भी चली गई, सुबह नींद खुली तो सबसे पहले होटल के बाहर जाकर अपनी गाड़ी देखी ! भाई, राजस्थान पुलिस अकादमी के सामने होटल था, क्या पता ढूँढते-2 यहाँ पहुँच ही गए हो ! खैर, गाड़ी अपनी जगह पर खड़ी थी, वापिस अपने कमरे में जाकर नहाने-धोने में लग गए, आज हमें जयपुर का सिटी पैलेस और हवा महल जो घूमना था ! पिछले दो दिनों में मैं जयपुर के काफ़ी रास्तों पर घूम चुका था इसलिए मुझे अब यहाँ के रास्तों का थोड़ा-बहुत अंदाज़ा हो गया था ! तैयार होने के बाद हल्का नाश्ता करके हम अपनी गाड़ी लेकर सिटी पैलेस की ओर चल दिए ! आज भी हम उसी मार्ग से जाने वाले थे जिससे कल आमेर गए थे ! आज इस होटल में भी हमारा आख़िरी दिन था इसलिए सिटी पैलेस के लिए निकलने से पहले ही होटल वाले का भुगतान भी कर दिया ! सारा सामान गाड़ी में रखकर सवा नौ बजे तक हम सिटी पैलेस के लिए निकल लिए, हमारा विचार घूमने के बाद दोपहर बाद या शाम को नए होटल में जाने का था ! जयपुर में हम घूमने वाली जगहों के हिसाब से अलग-2 होटलों में रुके थे, बाबा हवेली जयपुर में स्थित तीनों किलों से पास पड़ता है, जबकि हमारा दूसरा होटल जयपुर के मध्य में था जहाँ से अन्य दर्शनीय स्थल पास में थे !


जयपुर का सिटी पैलेस

Wednesday, March 16, 2016

नाहरगढ दुर्ग और जयपुर के बाज़ार (Nahargarh Fort and Jaipur Markets)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

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ज़यगढ़ का किला देखकर जब हम बाहर निकले तो नाहरगढ़ जाने से पहले किले के बाहर खड़े एक फेरी वाले से राजस्थानी मटका कुल्फी का स्वाद चखा ! यहाँ से नाहरगढ़ का किला लगभग 7 किलोमीटर दूर है और किले तक जाने का रास्ता खूबसूरत दृश्यों से भरा पड़ा है ! कुल्फी ख़त्म करने के साथ ही हमने नाहरगढ़ के लिए प्रस्थान कर दिया, इस पहाड़ी मार्ग से जाते हुए दोनों ओर जंगल है ! सड़क के किनारे फैले इन जंगलों में थोड़ी अंदर जाने पर जंगली जानवर भी मिल जाते है, रात के समय तो ये जानवर इस मार्ग पर भी आ जाते है ! इसलिए रात में इस मार्ग पर आवागमन कम ही रहता है, स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार अंधेरा होने पर इस मार्ग पर लूट-पाट भी हो जाती है ! इस मार्ग पर चलते हुए रास्ते में एक जगह हमें सड़क के किनारे कई मोर दिखाई दिए, इनकी फोटो खींचने के लिए मैने अपनी गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी कर दी ! लेकिन मोर भी कहाँ रुकने वाले थे, गाड़ी रुकते ही वो भी जॅंगल में भाग गए, बड़ी मुश्किल से एक-दो मोर कैमरे की पकड़ में आए ! थोड़ी देर यहाँ रुकने के बाद हम फिर से आगे बढ़ गए, वैसे फोटोग्राफी के लिए ये बढ़िया जगह है !

नाहरगढ़ किले से दिखाई देता जयपुर शहर

Sunday, March 13, 2016

जयगढ़ किले में बिताया एक दिन (A Day in Jaigarh Fort, Jaipur)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

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मेरी इस यात्रा में अब तक आप बिरला मंदिर और आमेर का किला देख चुके है, किले से बाहर आकर हम अपनी गाड़ी में सवार हुए और गाँव की गलियों से घूमते हुए आमेर से जयपुर जाने वाले मार्ग पर पहुँच गए ! जैसे-2 दिन चढ़ता जा रहा था गर्मी भी बढ़ती जा रही थी, फ़रवरी के महीने में ही ये हाल है तो आने वाले समय में जयपुर की क्या हालत होगी? इस गर्मी के बीच भी यहाँ आने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ ही रही थी, ये जयपुर के प्रति लोगों का प्यार ही है जो किसी मौसम की भी परवाह नहीं करता ! हम अभी आमेर से जयपुर जाने वाले मार्ग पर थोड़ी दूर ही चले थे कि सड़क के बाईं ओर हमें एक रेस्टोरेंट दिखाई दिया ! रेस्टोरेंट देखते ही अपने आप भूख भी लगने लगी, फिर क्या था? सड़क किनारे गाड़ी खड़ी करके रेस्टोरेंट में पेट पूजा करने चल दिए ! ऑर्डर देने के 15 मिनट बाद ही हमारे लिए खाना परोस दिया गया, यहाँ का खाना स्वादिष्ट था इसलिए सबने पेट भरकर खाया ! रेस्टोरेंट से निकलते समय हमने माज़ा और पानी की बोतलें भी ले ली, जयपुर जाने वाले मार्ग पर कुछ दूर जाने के बाद हम अपनी दाईं ओर मुड़ गए ! ये रास्ता थोड़ी आगे जाकर फिर से दो हिस्सों में बँट जाता है, जिसमें से दाएँ जाने वाला मार्ग जयगढ़ और बाएँ जाने वाला रास्ता नाहरगढ़ किले तक जाता है !

जयगढ़ किले की दीवार 

Thursday, March 10, 2016

आमेर के किले में बिताए कुछ पल (A Memorable Day in Amer Fort, Jaipur)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

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अगले दिन सुबह जब सोकर उठे तो मैं शौर्य को लेकर अपने होटल की छत पर सुबह के नज़ारों का आनंद लेने पहुँच गया ! होटल की छत से दूर पहाड़ी पर जयगढ़ का किला दिखाई दे रहा था, लेकिन हल्की-2 धुन्ध होने के कारण किला साफ नहीं दिखाई दिया ! थोड़ी देर बाद हम दोनों वापिस अपने कमरे में आ गए और घूमने जाने के लिए तैयार होने लगे ! कल शाम को तो सिर्फ़ बिरला मंदिर ही देख पाए थे, इसलिए आज ज़्यादा से ज़्यादा जगहें देखना चाहते थे, कम से कम तीनों किलों को देखने का विचार था ! जयपुर में ही मेरा एक मित्र मोहित चौहान भी रहता है, कल शाम को जब उस से फोन पर बात की तो वो भी हमारे साथ घूमने जाने के लिए तैयार हो गया ! तय हुआ कि सुबह 9 बजे वो हमारे होटल आ जाएगा और फिर हम सब एक साथ घूमने निकल पड़ेंगे ! हम साढ़े आठ बजे तक तैयार हो चुके थे, नाश्ते के लिए जाने से पहले मोहित को फोन किया तो पता चला कि वो अभी सोकर उठा है और तैयार होकर यहाँ आने में ही उसे एक घंटे का समय लग जाएगा ! फोन रखने के बाद हम नाश्ता करने के लिए अपने होटल के डाइनिंग हाल में आ गए, आलू-प्याज के पराठे से सुबह का नाश्ता किया !

आमेर पैलेस का दीवान-ए-आम (Diwan-E-Aam of Amer Palace)

Monday, March 7, 2016

दिल्ली से जयपुर की सड़क यात्रा (A Road Trip to Jaipur)

वीरवार, 25 फ़रवरी 2016

तुंगनाथ की यात्रा से वापिस आने के बाद ज़्यादा दिन नहीं हुए थी कि तभी अगली यात्रा पर जाने का विचार बनने लगा ! चोटिल पैर ठीक होने में 10-12 दिन का समय लगा, इस दौरान दिमाग़ में यही चलता रहा कि अगली यात्रा कहाँ की होगी ! इस बार परिवार संग यात्रा पर जाने का मन था, वैसे भी फ़रवरी में शादी की सालगिरह आ रही थी इसी बहाने अगर कहीं घूमने को मिल जाए तो क्या कहने ? पारिवारिक यात्रा पर जाने की योजना पर मैने काम करना शुरू कर दिया, काफ़ी खोज-बीन के बाद उत्तराखंड में स्थित कौसानी जाने का विचार बना ! इसलिए कौसानी और इसके आस-पास की जगहों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी ! इस यात्रा पर मैं नैनीताल से होता हुए रानीखेत, कौसानी, और मुक्तेश्वर जाने वाला था, जैसे-2 यात्रा का दिन पास आने लगा, एक मित्र ने सलाह दी कि छोटे बच्चों के साथ ठंड के मौसम में पहाड़ी पर जाना ठीक नहीं रहेगा ! इस बात से प्रभावित होकर मुझे भी लगा कि घूमने के चक्कर में परिवार की सेहत से समझौता ठीक नहीं है ! इसलिए मैने अब जयपुर जाने का विचार बना लिया और आनन-फानन में ही जयपुर में रुकने के लिए एक होटल में कमरा भी आरक्षित करवा लिया !

जयपुर का बिरला मंदिर (Birla Mandir in Jaipur)

Thursday, March 3, 2016

ऊखीमठ से रुद्रप्रयाग होते हुए दिल्ली वापसी (Ukimath to New Delhi via Rudrprayag)

सोमवार, 25 जनवरी 2016

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देवरिया ताल से वापिस आने के बाद हमने होटल हिमांशु में दोपहर का भोजन किया और होटल वाले से ही कह दिया कि हमारे ऋषिकेश जाने के लिए एक टैक्सी का इंतज़ाम करवा दे ! उसने अपने एक परिचित को फोन लगाया तो वो सिर्फ़ ऊखीमठ तक जाने के लिए ही तैयार हुआ ! सारी गाँव से ऊखीमठ जाने के लिए 500 रुपए में सौदा तय हुआ, सारा सामान लेकर जब हम ऊखीमठ के लिए रवाना हुए तो पौने पाँच बजने वाले थे ! सारी से ऊखीमठ के 15 किलोमीटर के इस सफ़र को तय करने में हमें पौने घंटे लग गए ! ऊखीमठ के मुख्य चौराहे पर जब साढ़े पाँच बजे जीप से उतरे तो यहाँ कई जीप वाले खड़े थे, हम यहाँ से ऋषिकेश या रुद्रप्रयाग जाने के लिए कोई जीप या बस ढूँढने लगे ! पूछताछ पर पता चला कि ऋषिकेश के लिए यहाँ से सुबह 6 बजे एक बस चलती है, फिर पूरे दिन यहाँ से ऋषिकेश के लिए कुछ नहीं मिलता !दिन में यहाँ से रुद्रप्रयाग के लिए शैयर्ड जीपें चलती है लेकिन इस समय यहाँ से शैयर्ड में कुछ भी नहीं मिलने वाला ! इसलिए अगर इस समय हमें रुद्रप्रयाग या ऋषिकेश जाना है तो टैक्सी बुक करवानी पड़ेगी ! 2-3 जीप वालों से जब किराए का पता किया तो ऋषिकेश के लिए 5 हज़ार और रुद्रप्रयाग के लिए 2200 रुपए माँग रहे थे ! काफ़ी मोल-भाव करके एक टैक्सी वाला 1500 रुपए में रुद्रप्रयाग जाने के लिए तैयार हुआ !


रुद्रप्रयाग में अलकनंदा-मंदाकिनी का संगम (Alaknanda and Mandakini in Rudrprayag)

Monday, February 29, 2016

चोपता से सारी गाँव होते हुए देवरिया ताल (Chopta to Deoria Taal via Saari Village)

सोमवार, 25 जनवरी 2016

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सुबह जब सोकर उठे तो कमरे में अंधेरा था, नियम के मुताबिक बिजली जा चुकी थी ! वैसे ये सही भी है वरना मैने अक्सर देखा है कि होटलों में लोग दिन भर बल्ब जला कर रखते है ! जहाँ सीमित संसाधन हो वहाँ इन संसाधनों का तरीके से ही प्रयोग करना चाहिए ! बिस्तर में सोते हुए ही मैने मोबाइल उठाकर समय देखा तो सुबह के 8 बजने वाले थे, खिड़की-दरवाजे बंद होने के कारण कमरे में अंधेरा था इसलिए समय का अंदाज़ा ही नहीं लग रहा था ! बगल वाले कमरे से अभी तक भी लोगों की तेज आवाज़ें सुनाई दे रही थी, पता नहीं ये लोग रात को सोए भी थे या नहीं ? चोट के कारण मेरे घुटने में अभी तक भी दर्द था, हिम्मत करके जैसे-तैसे करके मैं उठा और कमरे में ही धीरे-2 टहलने लगा ! मैं ये अनुमान लगाने की कोशिश कर रहा था कि आज देवरिया ताल जाने के लिए मेरे पैर साथ देंगे या नहीं ! मैं दर्द से कराह रहा था, संकट की इस घड़ी में भले ही मेरे पैर मेरा साथ नहीं दे रहे थे लेकिन दोस्तों ने भरपूर साथ दिया ! मैने भी हिम्मत करके सबके साथ देवरिया ताल जाने की घोषणा कर दी, सोचा सारी गाँव जाते हुए रास्ते में कहीं रुककर घुटनों की पट्टी बदलवाकर दर्द निवारक दवा ले लूँगा, तो देवरिया ताल की चढ़ाई आराम से हो जाएगी !


देवरिया ताल का एक दृश्य (A Glimpse of Deoria Taal)

Friday, February 26, 2016

तुंगनाथ से चोपता वापसी (Tungnath to Chopta Trek)

रविवार, 24 जनवरी 2016

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पिछले लेख में आपने पढ़ा कि कैसे हम चोपता से तुंगनाथ मंदिर पहुँचे, मंदिर के बाहर से ही दर्शन करने के बाद आस-पास के खूबसूरत दृश्यों को अपने कैमरों में लेते हुए हमने वापसी की राह पकड़ी ! हम जानते थे कि तुंगनाथ से वापसी की राह चढ़ाई के मुक़ाबले काफ़ी आसान है, इसलिए उतरते समय हमें चढ़ाई के मुक़ाबले काफ़ी कम समय लगेगा ! शाम होने लगी थी और सूरज की लालिमा में सफेद बर्फ से लदी पहाड़ियाँ बहुत सुंदर लग रही थी ! जहाँ सूर्य देव अपनी लालिमा लिए डूबने की ओर अग्रसर थे और वहीं हम भी सूर्यास्त की प्रतीक्षा में ही थे ताकि पहाड़ी से सूर्यास्त के बेहतरीन नज़ारे का दीदार कर सके ! इस बीच हम तेज़ी से उतरते हुए काफ़ी नीचे आ गए, थोड़ी देर बाद हम उन दो झंडो तक पहुँच गए, जिन्हें जयंत मंदिर परिसर में बता रहा था ! थोड़ी ओर नीचे आए तो यहाँ से सूर्यास्त का शानदार नज़ारा दिखाई दे रहा था, सब अपना-2 कैमरा चालू करके इन यादगार पलों को सहेजने में लग गए ! यहाँ से कुछ दृश्य तो बिल्कुल ऐसे लग रहे थे जैसे कैलेंडर या कंप्यूटर में वॉलपेपर पर देखने को मिलते है ! हालाँकि, वो चित्र भी किसी ने तो खींचे ही होते है लेकिन अगर आपको अपनी आँखों से ऐसे दृश्य देखने को मिले तो क्या कहने !


तुंगनाथ से वापस आने का मार्ग

Tuesday, February 23, 2016

विश्व का सबसे ऊँचा शिव मंदिर – तुंगनाथ (Tungnath - Highest Shiva Temple in the World)

रविवार, 24 जनवरी 2016

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मेरे पिछले लेखों में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दिल्ली से हरिद्वार होते हुए चोपता पहुँचे ! दिन-रात के इस सफ़र से हम सब थक गए थे इसलिए रात को खूब अच्छी नींद आई ! सुबह जब आँख खुली तो स्लीपिंग बैग में सोते-2 ही मैने अपनी घड़ी में समय देखा, सुबह के साढ़े सात बज गए थे, लेकिन ठंड की वजह से बिस्तर से बाहर निकलने का मन नहीं हो रहा था ! मैं 6 बजे से पहले उठने वाला इंसान हूँ, अपनी हर यात्रा पर अमूमन सुबह समय से उठ ही जाता हूँ, लेकिन यहाँ की ठंड वाकई जबरदस्त थी जिसने मुझे स्लीपिंग बैग के अंदर सिमटकर रहने को मजबूर कर दिया था ! वैसे यहाँ जयंत के अलावा बाकी सबको अच्छी नींद आई थी, जयंत की परेशानी की वजह थी टेंट में पर्याप्त जगह का ना होना ! वैसे तो हमारा टेंट 4 लोगों के रुकने के लिए पर्याप्त था लेकिन सामान ज़्यादा होने के कारण टेंट में जगह थोड़ी कम थी, इसलिए जयंत को ठीक से नींद नहीं आई और वो सारी रात परेशान ही रहा, सुबह होते ही उसने एलान कर दिया कि आज कुछ भी हो जाए, टेंट में नहीं किसी होटल में रुकेंगे ! सारी रात वो सुबह होने का ही इंतजार करता रहा, जैसे ही मैं हिम्मत करके टेंट से बाहर निकला, जयंत को सोने के लिए जगह मिल गई !


दुनिया का सबसे ऊँचा शिव मंदिर (Highest Shiv Temple of the world, Tungnath)

Saturday, February 20, 2016

हरिद्वार से चोपता की बस यात्रा (A Road Trip to Chopta)

शनिवार, 23 जनवरी 2016

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मेरे पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दिल्ली से रात्रि का सफ़र करके हरिद्वार पहुँचे ! हरिद्वार से जब हमारी बस ने चलना शुरू किया तो सुबह के 6 बज रहे थे, बाहर अभी भी अंधेरा ही था ! पहाड़ी मार्ग पर बस में सफ़र करते हुए मुझे उल्टी की परेशानी रहती है, मेरे अलावा इस यात्रा पर मेरे अन्य साथियों को भी ये परेशानी थी ! इसलिए बस में बैठने से पहले ही हमने उल्टी से बचने की दवा खा ली थी ! कृत्रिम रोशनी से हरिद्वार चमक रहा था, इस जगमगाहट की वजह था हरिद्वार में अर्ध-कुंभ का आयोजन ! अगले 3 माह यानि अप्रैल तक यहाँ अर्ध-कुंभ की छटा बिखरी रहेगी, इस दौरान हरिद्वार में गंगा स्नान के लिए करोड़ों श्रद्धालु आएँगे ! रंग-बिरंगे इस कृत्रिम प्रकाश में हरिद्वार शहर बहुत वाकई बहुत खूबसूरत लग रहा था ! भोर का समय होने के कारण अभी सड़क पर ज़्यादा भीड़ भी नहीं थी, वरना दिन के समय तो इस मार्ग पर काफ़ी भीड़-भाड़ रहती है ! इस मार्ग पर रास्ते में एक-दो जगह सड़क निर्माण का काम भी चल रहा था ! काफ़ी देर तक इस मार्ग पर चलने के बाद देहरादून से आने वाला एक मार्ग भी आकर इसी मार्ग में मिल गया !


चोपता जाने का मार्ग (Snow Covered way to Chopta)

Wednesday, February 17, 2016

दिल्ली से हरिद्वार की ट्रेन यात्रा (A Train Journey to Haridwar)

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

चोपता यात्रा बहुत दिनों बाद हमारी कोई ऐसी यात्रा थी, जिसकी योजना काफ़ी पहले बन गई थी और अंत में ये यात्रा सफलतापूर्वक संपन्न भी हुई ! इस यात्रा से पहले ऐसी कई यात्राओं की योजनाएँ बनी, लेकिन कोई भी अपना अंतिम रूप नहीं ले पाई ! लैंसडाउन यात्रा के दौरान भी जब एक मित्र ने अंतिम समय में साथ चलने से मना कर दिया था तो हम 3 मित्रों ने ही वो यात्रा पूरी की ! उसके बाद रेणुकाजी झील जाने की योजना तो बनी लेकिन मेरी वजह से वो यात्रा होते-2 रह गई ! ऐसी और भी कई यात्राएँ थी जो सिर्फ़ योजनाओं में ही रह गई, अगर मैं यहाँ सबका ज़िक्र करने बैठ गया तो इस लेख का उद्देश्य ही बदल जाएगा ! वैसे किसी ने सही कहा है "देर आए दुरुस्त आए" ! चोपता यात्रा की सफलता के बाद शायद हमारे पुराने दिन लौट आए और दोस्तों संग ऐसी यात्राओं पर जाने के द्वार शायद खुल जाएँ ! चलिए, इस यात्रा की शुरुआत करते है, चोपता यात्रा पर हम चार मित्र जयंत कौशिक, सौरभ वत्स, जतिन सोलंकी (जीतू) और मैं जा रहे थे ! सामूहिक यात्रा होने के कारण किसी एक को इस यात्रा के सफल होने का श्रेय देना ठीक नहीं होगा, लेकिन फिर भी सौरभ वत्स ने अगर इस यात्रा की पहल ना की होती तो शायद चोपता जाने के लिए हमें अभी और इंतजार करना पड़ता !


nanda devi express
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का एक दृश्य (A view from New Delhi Railway Station)

Sunday, February 14, 2016

लखनऊ का कुकरैल वन - घड़ियाल पुनर्वास केंद्र (Kukrail Reserve Forest – A Picnic Spot in Lucknow)

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लखनऊ में स्थित कुकरैल वन के बारे में शायद गिनती के लोगों को ही जानकारी होगी, अगर आप भी उन लोगों में से एक है तो आप इस जगह से अच्छी तरफ वाकिफ़ होंगे ! जिन्हें जानकारी नहीं है उन्हें बता दूँ कि मुख्य शहर की भीड़-भाड़ से दूर इंदिरा नगर में स्थित ये घड़ियाल केंद्र यहाँ आने वाले लोगों को खूब पसंद आता है ! अधिकतर लोग यहाँ छुट्टी वाले दिन परिवार संग फ़ुर्सत के कुछ पल बिताने आते है ! बच्चे भी यहाँ आकर काफ़ी रोमांचित हो जाते है और अच्छी यादों के साथ-2 घड़ियालों से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी भी अपने साथ ले जाते है ! लखनऊ भ्रमण के बाद दिल्ली वापसी से पहले मुझे भी कुकरैल वन जाने का अवसर मिला ! दरअसल, दिल्ली वापसी की मेरी ट्रेन रात्रि 10 बजे की थी, और बुआजी के घर से इस वन की दूरी भी ज़्यादा नहीं थी ! शाम के समय जब उदय ने कहा कि चलो भैया आपको कुकरैल वन भी घुमा लाता हूँ तो मैं जाने के लिए फटाफट तैयार हो गया ! कैमरे की बैटरी ख़त्म हो चुकी थी इसलिए अपना मोबाइल लेकर ही कुकरैल वन देखने चल दिया ! अगले 10 मिनट में हम दोनों मोटरसाइकल लेकर कुकरैल वन जाने वाले मार्ग पर थे !

kukrail van
कुकरैल वन का प्रवेश द्वार (Entrance to Kukrail Van, Lucknow)

Thursday, February 11, 2016

लखनऊ का अंबेडकर पार्क - सामाजिक परिवर्तन स्थल (A Visit to Ambedkar Park, Lucknow)

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अपने पिछले लेख में मैने अंबेडकर पार्क का ज़िक्र किया था तो सोचा क्यों ना आपको ये पार्क भी घुमा ही दूँ ! अंबेडकर पार्क के बारे में अपनी इस लखनऊ यात्रा पर जाने से पहले मैने काफ़ी सुन रखा था, उम्मीद है कि आपने भी इस पार्क के बारे में सुन ही रखा होगा ! इस बार जब मैं लखनऊ पहुँचा तो मेरे पास समय भी था और मौका भी, इसलिए तय किया कि क्यों ना लगे हाथ इस पार्क को भी देख ही लिया जाए ! ना जाने अगली बार कब लखनऊ आना हो और अगली बार यहाँ आने पर पर्याप्त समय भी मिले या ना ! दरअसल, मैं लखनऊ काम के सिलसिले में तो आता ही रहता हूँ पर हर बार समय की कमी के कारण लखनऊ में घूमना नहीं हो पाता ! आज सुबह नहा धोकर तैयार होने के बाद मैं और उदय मोटरसाइकल पर सवार होकर अंबेडकर पार्क की ओर चल दिए ! घर से 15-20 मिनट का सफ़र तय करके हम दोनों पार्क के सामने पहुँच गए, पार्क के सामने वाली सड़क पर हमेशा वाहनों का आवागमन लगा ही रहता है ! इस पार्क तक आने के लिए बस की सुविधा भी है, पार्क के सामने एक विशाल पार्किंग स्थल है जहाँ आप अपने वाहन खड़े कर सकते है ! इसी पार्किंग स्थल में हमने अपनी मोटरसाइकल खड़ी की जिसका शुल्क 10 रुपए था और पार्क के प्रवेश स्थल की ओर चल दिए यहाँ सड़क पार करने के बाद पार्क के प्रथम द्वार से हमने अंदर प्रवेश किया !


ambedkar park, lucknow
अंबेडकर पार्क का एक दृश्य (A Glimpse of Ambedkar Park, Lucknow)

Monday, February 8, 2016

लखनऊ का खूबसूरत जनेश्वर मिश्र पार्क (The Beauty of Janeshwar Mishr Park, Lucknow)

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लखनऊ के अंबेडकर पार्क का नाम तो आप सबने ही सुना होगा, ये पार्क अपने शुरुआती दिनों में काफ़ी चर्चा में भी रहा था ! लेकिन वो अब पुरानी बात हो गई, लखनऊ में वैसे तो अनेको छोटे-बड़े पार्क है, या अगर यूँ कहें कि लखनऊ पार्कों का गढ़ है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी ! लखनऊ के इन पार्कों की श्रेणी में अब एक नाम और जुड़ गया है, जी हाँ, ये है लखनऊ का जनेश्वर मिश्र पार्क ! 376 एकड़ में फैले इस पार्क की नींव उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने सत्ता संभालने के बाद 6 अगस्त 2012 को रखी ! ये पार्क समाजवादी पार्टी के मुखिया श्री मुलायम सिंह यादव का सपना था जिसे उनके बेटे ने पूरा किया ! 168 करोड़ रुपए की लागत से बने इस पार्क को एशिया का सबसे बड़ा पार्क होने का रुतबा भी हासिल है ! 2 साल में तैयार हुए इस पार्क को आम जनता के लिए 5 अगस्त 2014 को खोल दिया गया ! लखनऊ के गोमती नगर एक्सटेंशन में बने इस पार्क में जाने का मौका मुझे इस नए साल पर अपनी लखनऊ यात्रा के दौरान मिला !


janeshwar mishr park
जनेश्वर मिश्र पार्क का प्रवेश द्वार (Entrance to Janeshwar Mishr Park, Lucknow)

Friday, February 5, 2016

नवाब शादत अली ख़ान और बेगम मुर्शीदज़ादी का मकबरा (Tomb of Saadat Ali Khan and Begam Murshid Zadi)

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नवाब शादत अली ख़ान का मकबरा

लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क के बारे में तो आपने सुना ही होगा, अगर नहीं सुना तो आपको बता दूँ कि ये पार्क लखनऊ में धरना देने और रेलियों के आयोजन के लिए मशहूर है ! परिवर्तन चौक के पास स्थित इस पार्क को पहले विक्टोरिया पार्क के नाम से जाना जाता था, लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर बेगम हज़रत महल पार्क कर दिया गया ! इस पार्क के बगल से जाने वाले मार्ग के उस पार एक बड़े मैदान में दो प्राचीन इमारतें है ! मुख्य मार्ग से जाने पर ये दोनों इमारतें अपनी सुंदरता की वजह से अक्सर लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच ही लेती है ! परिवर्तन चौक से निकलते समय मैं भी इन इमारतों की सुंदरता से बच नहीं सका और पहली नज़र पड़ते ही इन इमारतों को देखने की इच्छा होने लगी ! मोटरसाइकल चला रहे उदय को जब मैने अपनी इच्छा से अवगत कराया तो उसने मोटरसाइकल इन इमारतों के मुख्य द्वार की ओर मोड़ दी ! इस मैदान के प्रवेश द्वार के सामने पहुँचे तो पता चला कि मोटरसाइकल अंदर ले जाने की व्यवस्था नहीं है, और हमें बाहर भी कोई पार्किंग नहीं दिखाई दी !

shadat ali khan mosque
नवाब शादत अली ख़ान का मकबरा

Tuesday, February 2, 2016

लखनऊ के अलीगंज का प्राचीन हनुमान मंदिर (Ancient Temple of Lord Hanuman in Aliganj, Lucknow)

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लखनऊ भ्रमण के दौरान एक दिन जब मैं अलीगंज में स्थित हनुमान मंदिर के सामने से निकला तो सोचा भगवान के दर्शन ही कर लूँ ! वैसे भी बिना दर्शन किए तो यहाँ से आगे बढ़ने का सवाल ही नहीं था, क्योंकि लखनऊ आने से पहले इस मंदिर के बारे में मैने काफ़ी पढ़ और सुन रखा था ! इसलिए इस मंदिर को भी घूमने जाने वाली जगहों की लिस्ट में स्थान दे ही रखा था ! हनुमान जी का ये मंदिर बड़े मंगल उत्सव के लिए पूरे लखनऊ में प्रसिद्ध है ! बड़ा मंगल उत्सव ज्येष्ठ माह के प्रथम मंगलवार को यहाँ लखनऊ में मनाया जाता है, इस दिन यहाँ एक बड़े मेले का आयोजन होता है ! मेले में आने वाले लोगों की संख्या भी हज़ारों में होती है ! लखनऊ के अधिकतर नवाबों की भगवान हनुमान में खूब आस्था थी इसका प्रमाण इसी बात से मिलता है कि वे लोग इस मेले के आयोजन से लेकर पूजा-पाठ तक में भरपूर सहयोग देते थे ! मंदिर के प्रति नवाबों की आस्था ये दर्शाती है कि नवाब किसी एक धर्म तक सीमित नहीं थे, अपने समय में उन्होनें हर धर्म को बराबरी का दर्जा दिया !


hanuman temple aliganj
लखनऊ के अलीगंज का हनुमान मंदिर (Hanuman Temple of Aliganj, Lucknow)

Saturday, January 30, 2016

गोमती नदी के कुड़ीया घाट की सैर (Kudiya Ghaat of Gomti River, Lucknow)

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अपनी लखनऊ यात्रा से पहले मैने कुड़ीया घाट से संबंधित इंटरनेट पर जो फोटो देखे थे उनके आधार पर ही इस जगह को मैने लखनऊ में देखने वाली जगहों की अपनी सूची में डाल लिया था ! वैसे कई बार कुछ जगहों का दिखावा बहुत होता है पर असल में जाने पर वहाँ कुछ ख़ास नहीं मिलता ! कुड़ीया घाट पर जाने का अपना अनुभव मैं इस लेख के माध्यम से साझा कर रहा हूँ, इस घाट को लेकर मेरी प्रतिक्रिया मिली-जुली है ! लखनऊ भ्रमण के दौरान जब मैने अधिकतर जगहें घूम ली तो एक शाम को रेजीडेंसी घूमने के बाद थोड़ा समय निकाल कर कुड़ीया घाट पर बिताने के लिए चल दिया ! रेजीडेंसी से इस घाट की दूरी मुश्किल से 3 किलोमीटर है, जहाँ जाने में हमें 10 मिनट का समय लगा ! शहर की भीड़-भाड़ से होते हुए हम मुख्य मार्ग से अलग निकलकर इस घाट तक जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! मेरे और उदय के अलावा आदिल भी हमारे साथ था, 2 मोटरसाइकिलों पर सवार होकर एक बड़े से प्रवेश द्वार से होते हुए हम कुड़ीया घाट की पार्किंग में पहुँचे !


boating in gomti
कुड़ीया घाट का एक दृश्य (A view of Kudiya Ghaat)

Wednesday, January 27, 2016

लखनऊ की रेजीडेंसी में बिताई एक शाम (An Evening in the Residency, Lucknow)

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रेजीडेंसी, नाम सुनकर ही किसी के लिए भी ये अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होगा कि ये इमारत कभी किसी का निवास स्थान रही होगी, पर किसका ? ये सोचने वाली बात है ! अगर आपके मन में आ रहा है कि अवध के किसी नवाब का, तो आप ग़लत है ! दरअसल, ये इमारत लखनऊ में रहने वाले ब्रिटिश जनरल और उनके सहयोगियों का निवास स्थान थी ! ब्रिटिश जनरल उस समय अवध के नवाबों की अदालत में ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधित्व किया करते थे, यही कारण है कि लखनऊ के बीचों-बीच गोमती नदी के किनारे स्थित इस इमारत को ब्रिटिश रेजीडेंसी के नाम से भी जाना जाता है ! पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित घोषित हो चुकी इस इमारत का लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों में काफ़ी महत्वपूर्ण स्थान है ! असल में रेजीडेंसी कई ऐसी इमारतों का एक समूह है जो कभी इस परिसर में मौजूद थी, वर्तमान में इनमें से अधिकतर इमारतें तो खंडहर में तब्दील हो चुकी है लेकिन जो बची है उन्हें देखने आने वालों की तादात अभी कम नहीं हुई ! वैसे अपने दौर में रेजीडेंसी में खूब चहल-पहल हुआ करती थी !


lucknow residency
रेजीडेंसी का प्रवेश द्वार (Entrance of Residency)

Sunday, January 24, 2016

खूबसूरत रूमी दरवाजा और हुसैनाबाद क्लॉक टावर (History of Rumi Darwaja and Husainabad Clock Tower)

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रूमी दरवाजा


छोटे इमामबाड़े से बाहर आने के बाद हमने पार्किंग में खड़ी अपनी मोटरसाइकल ली और मुख्य सड़क पर चल दिए ! यहाँ मैं आपको एक जानकारी देना चाहूँगा कि लखनऊ में अधिकतर जगहों पर मोटरसाइकल की पार्किंग का शुल्क 10 रुपए था, एक-दो जगहों पर ये ज़रूर 20 रुपए था ! वैसे लखनऊ की भीड़-भाड़ वाली जगहों पर घूमने के लिए बाइक सबसे बढ़िया साधन है, जो भीड़-भाड़ और संकरी गलियों से भी आसानी से निकल जाती है ! अगर गाड़ी में घूमना हो तो अतिरिक्त समय लेकर चलना होगा क्योंकि यहाँ के मुख्य चौराहों पर अक्सर जाम लगा रहता है ! छोटा इमामबाड़ा आते समय रास्ते में हम रूमी दरवाजे से होकर आए थे, ये भी लखनऊ की खूबसूरत धरोहरों में से एक है ! चलिए, इस लेख के माध्यम से आप लोगों को रूमी दरवाजे के बारे में ही बता देता हूँ !



rumi darwaja
रूमी दरवाजे का एक दृश्य (A Glimpse of Rumi Darwaja)

Thursday, January 21, 2016

लखनऊ की शानदार शाही बावली और छोटा इमामबाड़ा (A visit to Shahi Baoli and Chota Imambara)

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भूल-भुलैया से बाहर आकर हम शाही बावली देखने के लिए चल दिए, इमामबाड़े के पास बने चबूतरे से नीचे उतरकर दोनों बावली के प्रवेश द्वार पर पहुँच गए ! यहाँ मौजूद एक अधिकारी को अपना टिकट दिखाकर हमने अंदर प्रवेश किया, सलीम अभी भी हमारे साथ ही चल रहा था ! आगे बढ़ने से पहले थोड़ी जानकारी इस बावली के बारे में दे देता हूँ ! शाही बावली का निर्माण भी अवध के नवाब आसिफ़-उद्-दौला ने ही करवाया था ! बावली के निर्माण से पहले यहाँ एक कुआँ खोदा गया, जिसका पानी बाद में बावली और इसके आस-पास की इमारतों के निर्माण कार्य में प्रयोग हुआ ! सबसे पहले बावली का निर्माण हुआ, फिर आसिफी मस्जिद का और आख़िर में बड़े इमामबाड़े का ! कुछ लोगों की धारणा थी कि बावली में मौजूद कुआँ नीचे-2 गोमती नदी से जुड़ा हुआ था, जिस कारण कुएँ में हमेशा पानी रहता था ! वैसे अगर कुआँ गहरा हो तो इसमें सदा ही पानी रहता है, हाँ, गोमती नदी के पास में ही होने के कारण रिस कर ज़रूर पानी आता होगा ! लेकिन कुएँ के गोमती नदी से जुड़े होने वाली बात की पुष्टि नहीं हुई !


shahi baoli
शाही बावली का एक दृश्य (A Glimpse of Shahi Baoli, Lucknow)

Monday, January 18, 2016

लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा और भूल-भुलैया (A visit to Bada Imambada and Bhool Bhullaiya)

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नहा-धोकर तैयार होने के बाद मैने नाश्ता किया और उदय के साथ एक मोटरसाइकल पर सवार होकर लखनऊ भ्रमण के लिए चल दिया ! तहज़ीब वाले इस शहर की आबो-हवा कुछ ऐसी है कि यहाँ आने के बाद आप भी इसके रंग में ही रंग जाते है ! लखनऊ भ्रमण से पहले थोड़ी जानकारी इस शहर के इतिहास के बारे में दे देता हूँ ! लखनऊ मुगल काल में अवध प्रदेश के अंतर्गत आता था, मुगल शासक हुमायूँ ने अवध के अधिकतर हिस्से को जीतकर अपनी सल्तनत में मिला लिया था ! मुगल काल में अवध का संचालन दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत होता था ! 1719 तक अवध प्रदेश मुगल सल्तनत का एक हिस्सा था जिसकी देखरेख मुगल सम्राट द्वारा चुने गए नवाब या नज़ीम के द्वारा की जाती थी ! समय के साथ जब मुगलों की ताक़त कम होने लगी तो उनके द्वारा स्थापित इन प्रदेशों के नवाब और नज़ीम मजबूत हो गए ! इस बीच अवध भी पहले से काफ़ी मजबूत और स्वतंत्र हो गया, फिर 1722 में शादत ख़ान अवध के पहले नवाब बने !

bada imambara
बड़ा इमामबाड़ा (A view from Bada Imambara, Lucknow)

Friday, January 15, 2016

लखनऊ की ट्रेन यात्रा (Train Journey to Lucknow)

मेरा लखनऊ जाने का विचार तो काफ़ी पहले अक्तूबर के तीसरे सप्ताह में ही बन गया था, लेकिन दशहरा, दीवाली और छठ का त्योहार होने के कारण रेल में टिकटों की खूब मारा-मारी चल रही थी ! ऐसे में मुझे लखनऊ आने-जाने के लिए कन्फर्म टिकट मिलना मुश्किल था, इसलिए अपनी इस यात्रा को मैने आगे के लिए टाल दिया ! दीवाली बीतने के बाद जब एक बार फिर से लखनऊ जाने का खुमार मुझपर चढ़ने लगा तो मैने नए साल पर इस यात्रा पर जाने के लिए अपनी टिकटें आरक्षित करवा ली ! वैसे भी बहुत दिनों से लखनऊ में रहने वाला मेरा भाई उदय प्रताप सिंह भी ज़ोर दे रहा था कि भैया अबकी बार घूमने के लिए लखनऊ आ जाओ ! वैसे इस यात्रा के लिए मुझे कोई ख़ास तैयारी तो करनी नहीं थी, घूमने वाली जगहों की क्रमबद्ध तरीके से एक लिस्ट बना ली ! धीरे-2 दिन बीतते गए और दिसंबर का महीना भी ख़त्म होने लगा ! अंत में 31 दिसंबर का वो दिन भी आ गया जब मुझे इस यात्रा के लिए निकलना था, इस यात्रा पर ले जाने का सामान मैं पिछली रात को ही एक बैग में रख चुका था !


lucknow railway station
लखनऊ रेलवे स्टेशन (A glimpse of Lucknow Railway Station)

Tuesday, January 12, 2016

माँ वैष्णो देवी धाम – वृंदावन (Maa Vaishno Devi Temple, Vrindavan)

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माता वैष्णो देवी का नाम आते ही सबका ध्यान जम्मू के कटरा में स्थित भवन की और चला जाता है, पर क्या आप जानते है कि मथुरा में भी माता वैष्णो देवी का एक मंदिर है ! गोविंद देव मंदिर से बाहर आकर मैने अपनी मोटरसाइकल उठाई और वृंदावन-मथुरा मार्ग से होता हुआ प्रेम मंदिर को पार करने के बाद माँ वैष्णो देवी के मंदिर पहुँच गया ! प्रेम मंदिर से निकलने के बाद इसी मार्ग पर थोड़ा आगे बढ़ने पर दूर से ही माँ शेरावाली की एक विशाल प्रतिमा मुख्य सड़क के बाईं ओर दिखाई देती है ! शेर पर सवार माँ शेरावाली की ये प्रतिमा माँ वैष्णो देवी के धाम में है और इस प्रतिमा में माँ के चरणों में हनुमान जी भी विराजमान है ! अगर इस मंदिर के इतिहास के बारे में बात करे तो मंदिर का निर्माण कार्य मई 2003 में शुरू हुआ था और अगले सात साल बाद मई 2010 में ये बनकर तैयार हुआ ! इस मंदिर का भी हिंदू धर्म में बहुत महत्व है, हर वर्ष लाखों भक्त यहाँ माता के दर्शन के लिए आते है !

vaishno devi vrindavan
माँ वैष्णो देवी मंदिर वृंदावन (Vaishno Devi Temple, Vrindavan)

Friday, January 8, 2016

हिंदू-मुस्लिम शिल्पकला का प्रतीक - गोविंद देव मंदिर (Beauty of Govind Dev Temple, Vrindavan)

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रंगनाथ मंदिर से बाहर आकर अपनी मोटरसाइकल पर सवार होकर जैसे ही मैं मथुरा-वृंदावन मार्ग पर जाने के लिए आगे बढ़ा, सड़क के दाईं ओर मुझे एक भव्य इमारत दिखाई दी ! पहली ही झलक में इस इमारत की तस्वीर मेरे दिमाग़ में ऐसी छप गई कि इसे देखने की इच्छा मेरे मन में हिलोरे लेने लगी ! इच्छा इतनी तीव्र थी कि चाहकर भी इस इमारत को देखने का मोह में त्याग ना सका ! फिर सड़क के किनारे ही एक उपयुक्त जगह देख कर मैने अपनी मोटरसाइकल खड़ी की और पैदल ही इस इमारत की ओर जाने वाले एक सहायक मार्ग पर चल दिया ! 20-25 कदम चलने के बाद मैं इमारत के ठीक सामने खड़ा था, यहाँ आकर मुझे आभास हुआ कि मोटरसाइकल यहाँ तक भी लाई जा सकती थी ! पर सोचा कोई बात नहीं, इस समय भी वो जहाँ भी खड़ी है, सुरक्षित है ! मंदिर के बाहर लगे एक सूचना पट्ट को पढ़कर पता चला कि ये भव्य इमारत असल में गोविंद देव मंदिर है !

govind dev temple
गोविंद देव मंदिर, वृंदावन (Govind Dev Temple, Vrindavan)

Tuesday, January 5, 2016

भगवान विष्णु को समर्पित रंगनाथ मंदिर (A Temple, Dedicated to Lord Vishnu)

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वृंदावन में स्थित रंगनाथ मंदिर को लोग रंगजी मंदिर के नाम से भी जानते है, इस मंदिर में आने का मेरा विचार तो सुबह प्रेम मंदिर जाने से पहले का ही था ! फिर सोचा कि रास्ते में पड़ने वाले मंदिरों से देखता हुआ चलता हूँ ताकि बाद में कोई हड़बड़ी ना रहे ! पागल बाबा मंदिर से रंगनाथ मंदिर की दूरी मात्र साढ़े तीन किलोमीटर है, जिसे तय करने में वैसे तो 10 मिनट से भी कम का समय लगता है लेकिन अगर जाम में फँस गए तो फिर बताना मुश्किल है कि कितना समय लग जाए ! मथुरा-वृंदावन मार्ग से जाने पर मंदिर तक जाने का मार्ग सीधा और काफ़ी चौड़ा है इसलिए जाम कम ही लगता है ! मंदिर तक जाने के लिए वृंदावन का बस अड्डा पार करने के बाद आपको अपने बाईं ओर मुड़ना होता है ! रंगनाथ मंदिर के खुलने का समय सुबह साढ़े 5 बजे से लेकर साढ़े दस बजे तक और फिर शाम को 4 बजे से लेकर रात्रि के 9 बजे तक है ! मंदिर में प्रवेश करने के दो द्वार है और दोनों द्वार एक जैसे ही लगते है ! मुख्य द्वार के सामने एक खुला मैदान है, जहाँ पूजा सामग्री से लेकर अन्य वस्तुओं की कुछ दुकानें है ! यहाँ गाड़ी खड़ी करने की भी पर्याप्त व्यवस्था है, लेकिन इसके बदले में आपको कुछ शुल्क अदा करना होता है !

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रंगनाथ मंदिर का प्रवेश द्वार (Entrance of Rangnath Temple)

Saturday, January 2, 2016

वृंदावन का पागल बाबा मंदिर (Pagal Baba Temple of Vrindavan)

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अब तक आपने पढ़ा कि कैसे बिरला मंदिर देखने के बाद मैं श्री कृष्ण जन्मभूमि और द्वारकाधीश मंदिर देखे बिना बेरंग ही लौट आया ! अब आगे, द्वारकाधीश मंदिर से पागल बाबा के मंदिर तक की 8 किलोमीटर की दूरी तय करने में मुझे ज़्यादा समय नहीं लगा ! मैं 10-12 मिनट में ही पागल बाबा मंदिर के मुख्य द्वार के सामने पहुँच गया, इस मंदिर की खूबसूरती भी देखते ही बनती है, सफेद संगमरमर का बना ये मंदिर भी यहाँ आने वाले लोगों में काफ़ी लोकप्रिय है ! मथुरा से वृंदावन आने पर बिरला मंदिर से 4 किलोमीटर चलने पर सड़क के बाईं ओर ये मंदिर स्थित है, जबकि प्रेम मंदिर से आने पर पुल से उतरकर तिराहे से दाएँ मुड़कर आधा किलोमीटर दूर ये मंदिर है ! लोग दूर-2 से इस मंदिर में दर्शन के लिए आते है, मैने मंदिर के अंदर वाली दीवारों पर लोगों की लिखी हुई मन्नतें भी देखी जो इस मंदिर के महत्व को प्रमाणित करती है ! नौ मंज़िला इस मंदिर में भगवान को विभिन्न झाँकियों द्वारा उनके विराट रूप और क्रियाकलाप दर्शाएँ गए है ! इस मंदिर का निर्माण ब्रज के प्रमुख संत श्री लीलानंद जी ठाकुर (पागल बाबा) द्वारा करवाया गया है, और इस मंदिर की गिनती उत्तर भारत के कुछ विशाल मंदिरों में की जाती है !

Pagal Baba Temple Vrindavan