Wednesday, April 20, 2016

भानगढ़ की वो यादगार रात (A Scary Night in Bhangarh)

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अब तक आपने पढ़ा कि किस तरह हम एक लंबा सफ़र तय करके भानगढ़ पहुँचे और एक होटल में जाकर रात्रि भोजन के लिए रुके ! हम लोगों का मन तो रात को ही किले में जाने का था, इसलिए खाना खाने के लिए रसोई के बगल में बने डाइनिंग हाल में आकर बैठ गए ! हमसे पहले कुछ अन्य लोग भी भोजन करने के लिए यहाँ बैठे हुए थे, हमारे बैठते ही रसोइया बोला कि आप लोगों को खाना परोसने में थोड़ा समय लगेगा क्योंकि आपसे पहले ये लोग बैठे है ! इन्हें खिला लेने के बाद ही आपके लिए खाना तैयार करूँगा ! दरअसल, सुनसान जगह होने के कारण यहाँ ज़्यादा लोग नहीं आते, इसलिए ये होटल वाला ऑर्डर पर ही खाना बनाता है ! हमारा खाना तैयार होने में अभी समय था, और यहाँ बैठकर करने के लिए कुछ नहीं था इसलिए हमने सोचा यहाँ बैठने से अच्छा है कि होटल के आस-पास कहीं घूम लेते है, शायद इसी बहाने कोई ज़रूरी जानकारी भी मिल जाए ! टहलते हुए हम सब होटल से थोड़ी दूरी पर स्थित एक मंदिर के सामने पहुँचे !


हमारे होटल से दिखाई देता एक नज़ारा

यहाँ कुछ दुकानें भी थी लेकिन यहाँ चाय के अलावा हल्का-फुल्का जलपान ही उपलब्ध था ! 3 चाय बनाने का आदेश देकर हम काफ़ी देर तक दुकान के बाहर रखे तख्त पर बैठकर बातें करते रहे ! मुझे छोड़कर बाकी लोग चाय का स्वाद लेते रहे, इस दौरान आगे के कार्यक्रम पर भी चर्चा चलती रही ! चाय ख़त्म होते ही सब वापिस अपने होटल की ओर चल दिए, यहाँ थोड़ी देर इंतजार करने के बाद हमारा खाना तैयार हो गया, फिर भी खाते-पीते रात के ग्यारह बज गए ! डाइनिंग हाल से बाहर निकले तो मौसम खराब होने लगा था, तेज हवाएँ आँधी में तब्दील हो गई, और आसमान भी बादलों से घिर चुका था, बारिश की भी संभावना लगने लगी थी ! भानगढ़ के बारे में काफ़ी पढ़ और सुन रखा था, मैं भूत-प्रेत को नहीं मानता लेकिन इस यात्रा के दौरान हमें कई बार ऐसा महसूस हुआ कि वहाँ के वातावरण में ऐसा कुछ तो है, जो हमें रात को किले में जाने से रोक रहा था ! वरना सब कुछ अचानक से ऐसे घटित हो रहा था जैसे कोई किसी योजना के तहत करता है ! मौसम खराब होने के बाद रात को तो हमारा किले में जाना लगभग मुश्किल हो गया, इसलिए रात्रि को इसी होटल में कमरा लेकर रुकने का निश्चय किया ! 

अपना सारा सामान गाड़ी में ही छोड़कर हम होटल के एक कमरे में आ गए, इस होटल में कुल 5 कमरे थे और इस समय सारे खाली थे ! हमने जो कमरा लिया उसमें टेलीविज़न भी था, या यूँ कह लीजिए कि टेलीविज़न होने के कारण हमने ये कमरा पसंद किया ! इस कमरे में ही एक अतिरिक्त गद्दा भी लगवा दिया ताकि सभी लोग उसी कमरे में आ सके ! बातें करते हुए ही शशांक ने अपने मोबाइल में एक वीडियो चालू किया जो यहाँ आते हुए रास्ते में हमने बनाया था ! वीडियो देखने के बाद सभी लोग अचंभित थे, किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर ऐसा क्यों हुआ? दरअसल, भानगढ़ वाले तिराहे से आगे बढ़ने पर मैने शशांक को गाड़ी की रोशनी में सड़क का एक वीडियो बनाने को कहा ! गाड़ी के शीशे और म्यूज़िक बंद करने के बाद हमने वीडियो बनानी शुरू कर दी, वीडियो में हम बारी-2 से मार्ग से संबंधित जानकारी भी दे रहे थे ! होटल में बैठे हुए जब हमने ये वीडियो चलाई तो इसमें हमारी आवाज़ नहीं थी, लेकिन इस वीडियो में जॅंगल से आने वाली आवाज़ ज़रूर सुनाई दे रही थी ! 

किसी को भी ये नहीं समझ नहीं आया कि गाड़ी के शीशे बंद होने के बावजूद जंगल की आवाज़ वीडियो में कैसे आई, और अगर जंगल की आवाज़ आई तो गाड़ी में बैठे होने के बावजूद हमारी आवाज़ क्यों नहीं आई ! काफ़ी देर तक जाँच-पड़ताल की, लेकिन कुछ समझ नहीं आया, कमरे में बैठे हुए ही हमने शशांक के मोबाइल में बिना कुछ छेड़खानी किए उसी मोड में फिर से एक वीडियो बनाई जिस मोड़ में पहले वाली वीडियो बनाई गई थी ! इस बार वीडियो में हमारी आवाज़ भी साफ सुनाई दी, इस घटना से चारों लोग प्रभावित हुए, काफ़ी देर तक इस बात पर चर्चा भी चलती रही ! थोड़ी देर की बातचीत के बाद सभी लोग सोने की तैयारी करने लगे, लेकिन हमारा बिस्तर ख़टमल से भरा पड़ा था ! लेटते ही इस बात का एहसास हो गया, थोड़ी देर में ही ख़टमलों ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया ! परेशान होकर हमने दूसरे कमरे का रुख़ किया, लेकिन यहाँ भी ठीक से नींद नहीं आई ! 

इस होटल का रसोईघर सड़क के बिल्कुल किनारे था जबकि कमरे होटल के दूसरे किनारे पर थे, बीच में एक बड़ा मैदान था जहाँ हमने अपनी गाड़ी खड़ी की थी ! हालाँकि, होटल की चारदीवारी तो थी लेकिन इतनी ऊँची नहीं कि किसी जंगली जानवर को अंदर आने से रोक सके ! हम जिस कमरे में रुके थे, उसकी खिड़की से सड़क तक का नज़ारा एकदम साफ दिखाई दे रहा था, वैसे तो बाहर अभी अंधेरा था लेकिन सड़क से गुजरने वाले इक्का-दुक्का वाहनों की रोशनी से सब कुछ जगमगा जा रहा था ! कमरा बदलते-2 ही रात के बारह बज चुके थे, किला देखने के लिए सुबह जल्दी निकलना था, जैसे-तैसे करके नींद तो आई, लेकिन वो भी थोड़ी-2 देर में खुल जा रही थी ! मेरा पीछा तो ख़टमलों ने यहाँ भी नहीं छोड़ा, या पता नहीं मेरे मन में वहम हो गया था ! जब होटल वाले को आधी रात को जगाकर बिस्तर में ख़टमल होने की शिकायत की तो वो मुझे ऑल आउट देता हुआ बोला, इसे लगा लेना ! साला मुझे यही नहीं समझ आया कि ऑल आउट खुद को लगाना है या ख़टमल को ! अपने जीवन में मैं पहली बार सुन रहा था कि ऑल आउट से ख़टमल भी भागते है, मच्छर तो जाते नहीं है ! 

खैर, बार-2 नींद खुलने के कारण मुझे झुंझलाहट हो गई और थक-हारकर मैं रात को 3 बजे उठकर बैठ गया ! मेरे बाकी साथी भी जाग ही रहे थे, शायद किसी को भी नींद नहीं आई थी, लेकिन फिर भी जाने क्यों ऐसा लग रहा था जैसे इन्हीं कुछ घंटो में हमारी नींद पूरी हो गई थी ! पहली बार मुझे कोई रात इतनी लंबी लगी थी, समय तो शायद जैसे थम सा गया था ! मैने बिस्तर पर बैठे हुए ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर झाँककर देखा तो बाहर अभी अंधेरा ही था, मैं अपना कैमरा लेकर नाइट मोड में कमरे की खिड़की से ही बाहर के कुछ चित्र खींचने लगा ! बिजली तो रात को सोने के थोड़ी देर बाद ही चली गई थी, और अभी तक नहीं आई थी ! थोड़ी देर बाद मोबाइल का टॉर्च जलाकर हम लोग बारी-2 से नहाने-धोने में लग गए ! चार बजे तक हम सब नहा-धोकर तैयार हो चुके थे, फिर कमरे से बाहर आकर होटल के मैदान में टहलने लगे ! अब तक चाँद आसमान में आ चुका था और चाँद की रोशनी में दूर तक एकदम साफ दिखाई दे रहा था ! मुझे ये बात बड़ी अजीब सी लगी, कि रात को सोने से पहले तो चाँद दिखाई नहीं दे रहा था और थोड़ी देर पहले तक भी ये नहीं था फिर एकदम से ये कहाँ से आ गया ! 

थोड़ा सोच-विचार करने के बाद ये लगा कि हो सकता है खराब मौसम की वजह से चाँद बादलों के बीच कहीं छुपा हो और अब बादल छँटने के बाद ये दिखाई दे रहा हो ! बस फिर थोड़ी देर में ही हम अपनी गाड़ी लेकर भानगढ़ के किले की ओर चल दिए ! आधिकारिक तौर पर तो ये किला सुबह सूर्योदय के बाद ही खुलता है और सूर्यास्त से पहले बंद भी हो जाता है लेकिन अगर इरादे मजबूत हो तो भला आपको कौन रोक सकता है? होटल से वापिस उसी मार्ग पर चल दिए, जिससे रात को यहाँ आए थे, तिराहे पर पहुँचकर हम बाएँ मुड़े, और थोड़ी दूर जाने के बाद मुख्य मार्ग से एक रास्ता दाएँ जाता है ! इसी मार्ग पर ये किला है, हमने अपनी गाड़ी किले से थोड़ी पहले खड़ी कर दी और मोबाइल का टॉर्च जलाकर पैदल ही किले के प्रवेश द्वार की ओर चल दिए ! चारों और सन्नाटा पसरा हुआ था, दूर-2 तक किसी के होने का आभास नहीं हो रहा था ! थोड़ी देर में ही हम लोग किले के बाहरी प्रवेश द्वार पर पहुँच गए, यहाँ लोहे का एक बड़ा गेट लगा हुआ है, ऊँचाई शायद 10 फीट से भी ज़्यादा रही होगी ! 

द्वार के उस पार दाईं ओर हनुमान जी का एक मंदिर है, सलाखों से बना होने के कारण द्वार से आर-पार दिखाई दे रहा था ! निर्णय लिया गया कि किले की बाहरी दीवार फांदकर अंदर जाएँगे ! हम सब किले की बाहरी दीवार के साथ-2 थोड़ी दूर तक चलते रहे, थोड़ी दूरी पर एक जगह दिखाई दी, जहाँ से किले की दीवार पर चढ़ा जा सकता था ! बारी-2 से सभी लोग यहाँ से दीवार फांदकर किले में दाखिल हुए, हालाँकि, मैं दीवार फाँदने की सलाह किसी को नहीं दूँगा ! अंदर जाकर किले की दीवार के साथ-2 चलते हुए हम कुछ खंडहरों के पास पहुँच गए, अंधेरे में भी पता चल रहा था कि ये खंडहर कभी रिहयशी इलाक़े रहे होंगे, जो अब पूर्ण रूप से खंडहर में तब्दील हो चुके है ! थोड़ी दूर ही गए थे कि हमें इन खंडहरों में कोई उछल-कूद करता हुआ दिखाई दिया, हालाँकि, अंधेरा होने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था कि ये कौन है ! सबको जैसे साँप सूंघ गया, ऐसा लग रहा था जैसे सबकी आवाज़ गले में अटक गई हो, चाहकर भी हम चिल्ला नहीं पा रहे थे, हालत ऐसी हो गई थी कि जो जहाँ खड़ा था वहीं जैसे जम सा गया ! 

इतने में ही वो जीव थोड़ी और पास आ गया, अगले कुछ ही पलों में हम सबको आभास हो गया कि ये एक बंदर था, जो शायद हमें देखकर उछल-कूद करने लगा था ! वैसे किसी को भी डराने के लिए तो एक पल ही काफ़ी होता है, और यहाँ तो लगभग आधा मिनट बीत चुका था ! इतनी देर में डर अपना काम कर चुका था, क्योंकि कोई माने या ना माने लेकिन उस बंदर से भयभीत तो सभी हो चुके थे ! वो अलग बात है कि कोई भी अपने डर को वहाँ दिखाना नहीं चाह रहा था, हिम्मत करके हम थोड़ी ओर आगे बढ़े ! खंडहर में तब्दील हो चुकी ये बस्ती भी काफ़ी दूर तक फैली हुई है, शायद आधे किलोमीटर तक ! हम अपनी मोबाइल की रोशनी में आगे बढ़े जा रहे थे, बीच-2 में रुककर आस-पास भी एक नज़र दौड़ा लेते, फिर तेज कदमों से आगे बढ़ जाते ! डर क्या होता है इसका एहसास मुझे उन कुछ ही पलों में हो गया था, हमारे डर का मुख्य कारण था भानगढ़ के बारे में सुने किस्से-कहानियाँ ! अगर इस किले के बारे में इतना ना पढ़ा होता तो शायद हम नहीं डरते, लेकिन अब हमारा मन हर बात को यहाँ की कहानियों से जोड़कर देखने लगता और यही हमारे डर का कारण भी था ! 

फिर मार्ग के किनारे कुछ बड़े-2 पेड़ भी दिखाई दिए, यहाँ से 10-20 कदम चलकर हम जहाँ पहुँचे, वहाँ एक बड़ा सा गेट था, जिसे कूदकर पार करना मुमकिन नहीं था ! यहाँ भी दीवार कूदकर अंदर जा सकते थे लेकिन अगले ही पल ये ख्याल आया कि अगर अंदर कुछ ऊँच-नीच हो गई तो वापिस कैसे आएँगे? अभी तो हालात सामान्य है, यहाँ से हम वापिस भी जा सकते है, लेकिन अगर अंदर कुछ गड़बड़ हुई तो मामला बिगड़ जाएगा ! अभी हम खड़े होकर सोच ही रहे थे कि अंदर जाया जाए या नहीं? कि तभी वो पेड़ जिनके पास से होकर हम आए थे बड़ी तेज़ी से हिलने लगे ! ये विशाल पेड़ थे और इस पेड़ की ऊपरी शाखाओं को कोई ज़ोर-2 से हिला रहा था, हमें अंदाज़ा तो था कि ये किसी बंदर का काम होगा ! लेकिन उस सन्नाटे में पेड़ के हिलने की आवाज़ें इतनी तेज सुनाई दे रही थी कि सबकी हालत लगभग एक जैसी हो गई ! जी हाँ, सबकी हालत खराब थी, बहुत खराब ! मन ही मन शायद सभी ये ठान चुके थे कि आगे क्या करना है, फिर तो एक साथी के बोलने की देर थी और सभी लोग बिना कोई सवाल किए उसके साथ चल पड़े !


होटल के अंदर लिया एक चित्र
रात के अंधेरे में लिया एक चित्र
आती-जाती गाड़ियों की रोशनी में लिया एक और चित्र
भानगढ़ के लिए निकलते हुए
होटल के बाहर का एक दृश्य
होटल के बाहर का एक दृश्य
होटल के बाहर का एक दृश्य
क्यों जाएँ (Why to go Bhangarh): अगर आपको रहस्यमयी और डरावनी जगहों पर घूमना अच्छा लगता है तो भानगढ़ आपके लिए उपयुक्त स्थान है ! भानगढ़ का किला दुनिया की डरावनी जगहों में शुमार है !

कब जाएँ (Best time to go Bhangarh): वैसे तो आप साल के किसी भी महीने में भानगढ़ जा सकते है लेकिन बारिश के मौसम में यहाँ की हरियाली देखने लायक होती है ! इस मौसम में हरे-भरे पहाड़ों के बीच भानगढ़ का किले की खूबसूरती देखने लायक होती है ! हर मौसम में यहाँ अलग ही आनंद आता है गर्मी के दिनों में भयंकर गर्मी पड़ती है तो सर्दी भी कड़ाके की रहती है ! क्योंकि ये किला एक डरावनी जगह है इसलिए रात को इस किले में ना ही जाएँ तो सही रहेगा !


कैसे जाएँ (How to reach Bhangarh): दिल्ली से भानगढ़ की दूरी मात्र 250 किलोमीटर है भानगढ़ रेल और सड़क मार्ग से अच्छे से जुड़ा हुआ है यहाँ का नज़दीकी रेलवे स्टेशन दौसा है जिसकी दूरी भानगढ़ के किले से 29 किलोमीटर है ! दौसा से भानगढ़ जाने के लिए आपको जीपें और अन्य सवारियाँ आसानी से मिल जाएँगी ! जबकि आप सीधे दिल्ली से भानगढ़ निजी गाड़ी से भी जा सकते है, इसके लिए आपको दिल्ली-जयपुर राजमार्ग से होते हुए जयपुर से पहले मनोहरपुर नाम की जगह से आपको बाएँ मुड़ना है ! एक मार्ग अलवर-सरिस्का से होकर भी है वैसे तो इस मार्ग की हालत बहुत लेकिन सरिस्का के बाद थोड़ा खराब और सँकरा मार्ग है !


कहाँ रुके (Where to stay in Bhangarh): भानगढ़ में रुकने के लिए बहुत कम विकल्प है, अधिकतर होटल यहाँ से 15 से 20 किलोमीटर की दूरी पर है ! शुरुआती होटल तो आपको 1000-1200 में मिल जाएँगे लेकिन अगर किसी पैलेस में रुकना चाहते है तो आपको अच्छी ख़ासी जेब ढीली करनी पड़ेगी !


क्या देखें (Places to see in Bhangarh): वैसे तो भानगढ़ और इसके आस-पास देखने के लिए काफ़ी जगहें है लेकिन भानगढ़ का किला, नारायणी माता का मंदिर, पाराशर धाम, सरिस्का वन्य जीव उद्यान, सरिस्का पैलेस, और सिलिसढ़ झील प्रमुख है ! 


अगले भाग में जारी...

भानगढ़ यात्रा
  1. भानगढ़ की एक सड़क यात्रा (A road trip to Bhangarh)
  2. भानगढ़ की वो यादगार रात (A Scary Night in Bhangarh)
  3. भानगढ़ का नारायणी माता मंदिर और पाराशर धाम (Parashar Dham and Narayani Temple in Bhangarh)
  4. भानगढ़ के किले में दोस्तों संग बिताया एक दिन (A Day in Bhangarh Fort)
  5. भानगढ़ के किले से वापसी (Bhangarh to Delhi – Return Journey)

8 comments:

  1. बहुत बढिया प्रदीप जी, मन में डर हो तो हवा की आवाज से भी डर लगने लगता है, पर आपको किले में दिन के समय जाना था, कुछ बेहतरीन फोटो खिंचने थे। चलो कोई नही, आगे की यात्रा का इंतजार रहेगा।

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    1. आगे देखिए क्या होता है परत दर परत खुलेगी !

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  2. bahut acha likha...hotel bhi haunted place par tha..nice pics :)

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    1. एक अलग ही अनुभव रहा भाई !

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  3. मैं तो blog पढ़ते-पढ़ते ही डर गया भाई।

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    1. क्यों डरा रहे हो मुझे फिर से ? वैसे कहते है डर के आगे जीत है, पता नहीं सच है या झूठ !

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  4. हम भी लगभग 6 am के आस पास किले में गए थे उस समय वहा कोई नही था।हलकी सी आवाज से ऐसा लगता की कोई है।और वहा पता नही क्या है पर लगता ज़ुरूर है की कोई है।।।हम भी बहुत डर गए थे।

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    1. सचिन भाई, आप लोग 6 बजे गए थे हमारा सोचो हम तो 4 बजे गए थे !

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