Saturday, July 2, 2016

दिल्ली से वाराणसी की रेल यात्रा (A train trip to Varanasi from Delhi)

शुक्रवार, 6 मई 2016

बात है मई के प्रथम सप्ताह की, जब मुझे एक निजी काम के सिलसिले में बनारस जाने का मौका मिला ! अब क्योंकि ये यात्रा घुमककड़ी के लिए तो थी नही, इसलिए काम से इतर मेरे पास घूमने के लिए बहुत ही सीमित समय था ! मैने सोचा क्यों ना समय का सदुपयोग करते हुए इस बार सारनाथ घूम लेता हूँ, गंगा आरती को अगली बार के लिए छोड़ दिया ! वैसे, सारनाथ में घूमने के लिए काफ़ी जगहें है जैसे चौखंडी स्तूप, जापानी मंदिर, नेपाली मंदिर, मुलगंध कुटी विहार, चाइना मंदिर और भी बहुत कुछ ! सारनाथ के बारे में मैने अपने घुमक्कड़ मित्रों और इंटरनेट के माध्यम से काफ़ी कुछ पढ़ रखा था इसलिए यहाँ घूमने का बड़ा मन था ! मैने सोचा कि इस यात्रा के दौरान जितना घूम सकूँगा घूमूंगा और जो रह जाएगा उसे अगली बार के लिए छोड़ दूँगा, वैसे भी वाराणसी में ससुराल होने के कारण साल में यहाँ एक बार तो आना होता ही है ! इस यात्रा के लिए मेरा नई दिल्ली से मंडुवाडीह तक का शिवगंगा एक्सप्रेस से आरक्षण था, ये गाड़ी इस लाइन पर चलने वाली सबसे बढ़िया गाड़ियों में गिनी जाती है ! शाम 6:55 पर चलकर सुबह 7 बजे मंडुवाडीह उतार देती है, और फिर यहाँ से वाराणसी रह ही कितना जाता है, स्टेशन के बाहर निकलते ही आपको आसानी से वाराणसी कैंट जाने के लिए ऑटो मिल जाएँगे !

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का एक दृश्य
यात्रा वाले दिन सुबह दफ़्तर के लिए निकलते समय मैने इस यात्रा पर अपने साथ ले जाने वाला एक बैग भी ले लिया क्योंकि शाम को दफ़्तर से घर आने का समय नहीं था ! दिन भर काम में व्यस्त रहा और शाम को लगभग पौने पाँच बजे मैं इस यात्रा के लिए निकल लिया ! गुड़गाँव से नई दिल्ली तक मेट्रो से जाने में घंटे भर से अधिक का समय लग जाता है, कभी-कभार भीड़ ज़्यादा हो तो ये समय और भी बढ़ जाता है ! दफ़्तर से निकलकर मैं एम जी रोड मेट्रो स्टेशन पहुँचा, स्टेशन परिसर में प्रवेश किया तो 5 से ऊपर का समय हो रहा था ! लखनऊ यात्रा से सीख लेते हुए मैं अपने साथ अतिरिक्त समय लेकर चल रहा था ! उस यात्रा के दौरान तो ट्रेन चलने से 10 मिनट पहले ही पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँचा था ! खैर, एक बार फिर से अपने कार्ड पर किए ऑनलाइन रीचार्ज को सत्यापित करने के लिए मेट्रो परिसर में लगी एक मशीन पर कार्ड रखा, लेकिन कुछ तकनीकी परेशानी के कारण सत्यापन नहीं हो सका, पता नहीं ये मशीने लगा क्यों रखी है ! वैसे इस यात्रा के लिए मेरे कार्ड में पर्याप्त राशि थी इसलिए सत्यापन को आगे के लिए टाल कर मैं चेकिंग काउंटर से होता हुआ प्लेटफार्म की ओर बढ़ गया ! 

प्लेटफार्म पर थोड़ी देर खड़े रहने के बाद ही दिल्ली जाने वाली अगली मेट्रो आ गई, जिसमें सवार होकर मैं नई दिल्ली के लिए निकल पड़ा ! घंटे भर के सफ़र के बाद मैं नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर उतरकर गेट नंबर 1 से बाहर की ओर चल दिया, इस द्वार से बाहर निकलकर सामने ही नई दिल्ली का रेलवे स्टेशन है ! स्वचालित सीढ़ियों से होता हुआ मैं प्लॅटफॉर्म नंबर 12 पर जाने वाली सीढ़ियों के पास पहुँचा, तो एक गाड़ी प्लेटफार्म पर खड़ी थी ! मेरी जानकारी के अनुसार शिवगंगा इसी प्लेटफार्म से जाने वाली थी लेकिन अभी जो गाड़ी इस प्लेटफार्म पर खड़ी थी वो शिवगंगा नहीं लग रही थी ये तो कोई राजधानी या स्पेशल गाड़ी लग रही थी ! वैसे भी गर्मियों के मौसम में पूर्वोतर राज्यों के लिए रेलवे द्वारा कई स्पेशल गाड़ियाँ चलाई जाती है ! पता नहीं क्या सोच कर मैं ऊपर सीढ़ियों पर ना खड़ा रहकर नीचे प्लेटफार्म की ओर उतरने लगा ! सीढ़ियों से नीचे उतरकर जब मैं प्लेटफार्म पर पहुँचा, तो ट्रेन पर लगे बोर्ड से मुझे पता चला कि ये तो शिवगंगा ही है ! हालाँकि, इस गाड़ी के चलने में अभी आधा घंटा बाकी था, इसलिए चिंता वाली कोई बात नहीं थी ! मेरी सीट कन्फर्म थी, मोबाइल में अपनी सीट की जानकारी देखकर मैने अपना सामान अपनी सीट पर रख दिया और गाड़ी से नीचे आकर प्लेटफार्म पर ही टहलने लगा !

अमूमन ये गाड़ी अपने निर्धारित समय से आधे घंटे पहले ही प्लेटफार्म पर आती है लेकिन आज शायद प्लेटफार्म खाली रहा होगा, इसलिए ये ट्रेन काफ़ी पहले ही आ गई थी ! वैसे इस गाड़ी का तो अब रंग-रूप ही बदल गया है इसलिए पहली नज़र में तो मैं भी इसे देखकर धोखा खा गया, पिछली बार जब मैं इस ट्रेन से गया था तो ये नीले रंग की थी ! शाम के साढ़े छह बज रहे थे फिर भी गर्मी से बुरा हाल था, प्लेटफार्म पर भी ज़्यादा राहत नहीं थी, इसलिए थोड़ी देर बाद मैं वापिस आकर अपनी सीट पर ही बैठ गया ! ट्रेन अपने निर्धारित समय पर चल दी, धीरे-2 ट्रेन प्लेटफार्म को छोड़कर आगे बढ़ने लगी ! मेरे आस-पास की सभी सीटों पर सवारियाँ आ चुकी थी, वैसे तो मेरी सीट ऊपर वाली थी लेकिन फिलहाल तो मैं खिड़की वाली सीट पर ही बैठा रहा ! घर पर ट्रेन चलने की सूचना देने के साथ ही मैने अपने बैग में से खाने-पीने का सामान निकाल लिया ! सफ़र के दौरान में हल्का-फुल्का ही खाना पसंद करता हूँ, आज भी अपने साथ खाने-पीने का थोड़ा सामान मैं लेकर चला था ! अब तक ट्रेन के बाहर चारों तरफ अंधेरा हो चुका था, इसलिए खिड़की से कुछ भी दिखाई नहीं दिखाई दे रहा था ! 

हाँ, अक्षरधाम का मंदिर कृत्रिम रोशनी में ज़रूर जगमगा रहा था, शानदार दृश्य था लेकिन चलती गाड़ी में बढ़िया फोटो नहीं आई ! थोड़ी देर खिड़की वाली सीट पर बैठने के बाद मैं ऊपर वाली सीट पर चला गया, दिन भर का थका हुआ था इसलिए लेटने के थोड़ी देर बाद ही नींद भी आ गई ! रात को जो एक बार आँख लगी तो सुबह जाकर 5 बजे ही नींद खुली, इस समय करने के लिए कुछ था, इसलिए नींद खुल जाने के बाद भी लेटा ही रहा ! फिर उठकर नित्य क्रम में लग गया, बाद में इसके लिए भी नंबर लगाना पड़ता है ! गनीमत थी कि इस समय बहुत ज़्यादा लोग नहीं उठे थे, जब तक लोग उठे, मैं सब कामों से फारिक होकर अपना बैग तैयार कर चुका था वैसे भी अब 7 बजने में ज़्यादा समय नहीं था ! ट्रेन अपने निर्धारित समय से 10 मिनट की देरी से मंडुवाडीह स्टेशन पर पहुँची, ट्रेन रुकते ही लोग नीचे उतरने लगे ! मैं भी ट्रेन से उतरकर स्टेशन से बाहर की ओर चल दिया, मंडुवाडीह का स्टेशन ज़्यादा बड़ा तो नहीं है लेकिन साफ सुथरा और शांत है ! वाराणसी कैंट पर ट्रेनों के दबाव को कम करने के लिए दिल्ली से जाने वाली कुछ गाड़ियों को मंडुवाडीह तक कर दिया गया है ! वैसे ये सही भी है दिल्ली रेलवे स्टेशन का दबाव कम करने के लिए भी पूर्वोतर में जाने वाली कई ट्रेनों को आनंद विहार, और पुरानी दिल्ली, जबकि दक्षिण में जाने वाली ट्रेनों को हज़रत निज़ामुद्दीन से कर दिया गया है ! 

स्टेशन से बाहर आकर मैने देखा कि इसके मुख्य प्रवेश द्वार पर कुछ सुंदर कलाकृतियाँ बनाई गई है ! इन कलाकृतियों में वाराणसी के मंदिरों के अलावा वाराणसी के घाटों की भी बढ़िया जानकारी दी गई है ! एक-दो फोटो स्टेशन के लेने के बाद मैं स्टेशन के बाहर खड़े ऑटो की तरफ चल दिया, यहाँ से वाराणसी कैंट जाने के लिए ऑटो वाले ने 20 रुपए लिए ! इन दोनों स्टेशनो के बीच की दूरी मात्र 3-4 किलोमीटर है लेकिन कई बार जाम लगने के कारण इस दूरी को तय करने में ही काफ़ी समय लग जाता है ! इस समय भी स्टेशन के बाहर हालात जाम वाले ही थे, इस ट्रेन से एक साथ इतने यात्री उतरे कि स्टेशन के बाहर वाले मार्ग पर जाम लग गया ! खैर, जैसे-तैसे करके हमारा ऑटो वाला इस जाम से निकला और रेलवे लाइन के किनारे बने सर्विस मार्ग से होता हुआ कैंट की ओर चल दिया ! फिर एक फ्लाइओवर के नीचे से निकलकर जब मुख्य मार्ग पर पहुँचे तो वहाँ ट्रकों की लंबी कतार लगी हुई थी ! हालाँकि, ट्रकों का शहर में प्रवेश करने का एक निर्धारित समय होता है लेकिन ये ट्रक काफ़ी देर के यहाँ फँसे हुए थे ! धीरे-2 हम भी इस जाम में आगे बढ़ते रहे !

वाराणसी कैंट पहुँचते-2 आधा घंटा लग गया, स्टेशन के सामने वाले मार्ग पर काफ़ी लंबा जाम लगा हुआ था ! मैं ऑटो से उतरा और सारनाथ जाने के लिए किसी दूसरे साधन का इंतज़ाम करने लगा, सारनाथ के लिए अक्सर यहाँ से मिनी बसें चलती है लेकिन आज कोई बस दिखाई नहीं दे रही थी ! फिर एक ऑटो वाले से पूछा तो उसने 30 रुपए में सारनाथ छोड़ने की बात कही, लेकिन बोला कि जब तक पूरा ऑटो नहीं भर जाएगा वो नहीं जाएगा ! मुझे कोई परेशानी नहीं थी, मैं उस से बोला कि तुम सवारी ढुंढ़ो तब तक मैं एक कप चाय पी लेता हूँ ! स्टेशन के बाहर वैसे तो चाय की कई दुकानें थी, लेकिन मैं एक ऐसी दुकान पर गया जहाँ कुल्हड़ वाली चाय भी थी ! अमूमन मैं चाय नहीं पीता लेकिन अगर कहीं कुल्हड़ वाली चाय दिख जाए तो पी लेता हूँ ! चाय ख़त्म करके वापिस ऑटो वाले के पास पहुँचा तो ऑटो में 3 सवारियाँ बैठ चुकी थी, मैं भी जाकर ऑटो में बैठ गया, मेरे बैठते ही ऑटो वाला चल दिया और बोला एक सवारी तो आगे से भी मिल जाएगी ! वाराणसी से सारनाथ जाने वाले मार्ग पर भी ट्रकों का ताँता लगा हुआ था, रेलवे लाइन के साथ-2 जाने के थोड़ी देर बाद हम एक रेलवे फाटक से होते हुए मुख्य मार्ग से निकलकर लखनऊ-वाराणसी मार्ग पर पहुँच गए !

रेलवे फाटक पार करते ही एक नदी के पुल से हम गुज़रे, ये वरुणा नदी है ! वाराणसी का नाम इसी नदी के नाम पर पड़ा है ! अब यहाँ से गुजर ही रहे है तो थोड़ी जानकारी इस नदी की भी दे ही देता हूँ, दरअसल, वाराणसी शहर वरुणा और अस्सी नदी के किनारे पर बसा हुआ है ! प्राचीन समय में यहाँ के लोग वरुणा नदी के जल पर ही पूरी तरह से निर्भर थे, इस नदी के पानी को यहाँ के लोग खेती और अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में उपयोग में लाते थे ! वरुणा नदी इलाहाबाद से निकलकर भदोही, जौनपुर होते हुए 162 किलोमीटर का सफ़र तय करके वाराणसी पहुँचती है और वाराणसी के सराय मोहना इलाक़े में आकर गंगा नदी में समाहित हो जाती है ! अस्सी नदी ज़्यादा दूर से नहीं आती और ये संत रविदास घाट (जोकि अस्सी घाट के पास ही है) के पास आकर गंगा में मिल जाती है ! धीरे-2 जब यहाँ की आबादी बढ़ी तो आस-पास के शहरों की गंदगी इस नदी में गिरने लगी और ये धीरे-2 संकरी होने लगी ! आज हालात ये हो चुके है कि ये नदी सूखकर एक नाले का रूप ले चुकी है ! जिस दौरान मैं सारनाथ यात्रा पर था वरुणा नदी की सफाई का काम चल रहा था, उम्मीद करता हूँ आने वाले समय में हालात सुधरे और ये नदी फिर से अपनी खोई हुई सुंदरता को पा सके ! 

कहते है कि अस्सी घाट का नाम अस्सी नदी के कारण ही पड़ा ! वैसे बनारस में सौ से भी अधिक घाट है लेकिन उनका वर्णन मैं किसी और लेख में करूँगा ! अस्सी घाट का उल्लेख तो मतस्य पुराण, अग्नि पुराण, और पद्मा पुराण में भी किया गया है, इन पुराणों के अनुसार माँ दुर्गा ने शुंभ-निशुम्भ का वध करने के बाद अपना कृपाण धरती पर फेंक दिया ! जिस स्थान पर आकर ये कृपाण गिरा वहाँ एक बड़ी जलधार फूट पड़ी जो बाद में अस्सी नदी के नाम से जानी गई ! इन दोनों नदियों की वर्तमान स्थिति दयनीए है, काफ़ी लोगों को तो इन नदियों के बारे में जानकारी भी नहीं होगी, आज वाराणसी को अधिकतर लोग गंगा नदी के लिए जानते है ! मैं पिछले 4-5 साल से वाराणसी आ रहा हूँ, पहले और अब में मुझे तो कोई ख़ास फ़र्क नज़र नहीं आता ! हाँ, मोदी का लोकसभा क्षेत्र होने के बाद से यहाँ जगह-2 निर्माण कार्य ज़रूर चल रहे है कहीं फ्लाइओवर बन रहे है तो कहीं सड़क विस्तारीकरण का काम चल रहा है ! ज़मीनी सच्चाई जानने के लिए अपनी हर यात्रा पर यहाँ के स्थानीय लोगों से इस बारे में ज़रूर जानकारी ले लेता हूँ ! 

अधिकतर लोग शहर के विकास से खुश ही है, आज भी ऑटो में बैठे हुए जब एक सज्जन से बातचीत शुरू हुई तो उन्होनें बताया कि शहर का काफ़ी विकास हो रहा है, अगले 3-4 शहर में तो शहर का नक्शा ही बदल जाएगा ! लखनऊ-वाराणसी मार्ग पर 4 लेन का काम चल रहा है, शहर के बीचों-बीच कई फ्लाइओवर भी बन रहे है और सबसे अच्छी बात कि वरुणा नदी की सफाई का काम भी शुरू हो चुका है ! मैने कहा, चलिए अच्छा ही है किसी बहाने ही सही, शहर का विकास तो होगा ! वैसे भी हर वर्ष यहाँ लाखों विदेशी सैलानी भी भ्रमण के लिए आते है, शहर की हालत सुधरेगी तो उनके मन में हमारे प्रति एक अच्छी छवि बनेगी ! बातों-2 में ही हम कहाँ पहुँच गए, चलिए वापिस अपनी यात्रा की ओर चलते है जहाँ हमारा ऑटो वरुणा नदी पार करने के बाद लखनऊ-वाराणसी मार्ग को छोड़कर पहाड़िया मार्ग पर बढ़ चुका है ! आगे बढ़ने पर हम पहाड़िया मार्ग से होते हुए आशापुर चौराहे पर पहुँच गए, इस चौराहे से पहले ही वो सज्जन ऑटो से उतर गए जिनसे मैं शहर से संबंधित जानकारी ले रहा था ! आशापुर चौराहे से बाएँ जाने वाले मार्ग पर सारनाथ है जबकि सीधा जाने वाले मार्ग आशापुर, चौबेपुर होते हुए रेलवे लाइन के समानांतर चलता रहता है ! 

ये मार्ग औंडिहार में जाकर गाज़ीपुर के लिए निकल जाता है ! सारनाथ वाले मार्ग पर थोड़ी दूर चलने के बाद ही सड़क के किनारे लगे बोर्ड यहाँ स्थित मंदिरों से संबंधित जानकारी देने लगे ! इस मार्ग पर यातायात ना के बराबर है और यहाँ चलते हुए लगता ही नहीं है कि आप बनारस के इतने करीब घूम रहे हो ! बनारस में तो हमेशा ही जाम की स्थिति बनी रहती है जबकि बनारस से मात्र 10 किलोमीटर दूर ये इलाक़ा इतना शांत है कि मन को बड़ा सुकून मिलता है ! थोड़ी देर में ही मुझे सड़क के किनारे चौखंडी स्तूप दिखाई दिया, थोड़ी और आगे बढ़ने पर बाईं ओर ही महात्मा बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा भी दिखाई दी ! इसके बगल में ही कुछ अन्य खूबसूरत इमारतें भी है जिनकी जानकारी में अगले लेख में दूँगा ! सारनाथ म्यूजियम के सामने पहुँचकर कुछ सवारियाँ ऑटो से उतर गई, लेकिन मैं बैठा ही रहा ! मेरा विचार था कि एक किनारे पर उतरकर क्रमबद्ध तरीके से सारनाथ के सारे दर्शनीय स्थल देखूँगा ! यहाँ से आगे बढ़ने पर सड़क के किनारे बहुत से फेरी वाले साज़-सज्जा का सामान बेचते रहते है, यहाँ आपको सजावट का एक से बढ़कर एक सामान मिलेगा ! 

इन दुकानों को बहुत अच्छे से सजाया जाता है, हालाँकि, यहाँ पर मिलने वाला सामान काफ़ी महँगा था क्योंकि दिल्ली में लगने वाले तिब्बत मार्केट (मजनू का टीला) में यही सामान सस्ते दाम में मिल जाता है ! यहाँ से आगे बढ़ने पर सड़क के दोनों ओर कुछ पक्की दुकानें भी है जहाँ खाने-पीने का सामान मिलता है ! सारनाथ में कई देशों के नाम पर मंदिर बने हुए है जैसे चाइना मंदिर, जापानी मंदिर, नेपाली मंदिर, तिब्बत मंदिर, मुलगंध कूटी विहार, और भी ना जाने क्या क्या ! मुलगंध कूटी विहार मंदिर के सामने पहुँचकर मैं ऑटो से उतर गया, ऑटो वाले को 30 रुपए देकर उसका हिसाब चुकता किया और अपना बैग उतारकर मंदिर में जाने वाले प्रवेश द्वार की ओर बढ़ गया ! यात्रा के अगले लेख में आपको इस मंदिर के अंदर लेकर चलूँगा !

मेट्रो स्टेशन जाते हुए रास्ते में लिया चित्र
मेट्रो स्टेशन जाते हुए रास्ते में लिया चित्र
मेट्रो स्टेशन जाते हुए रास्ते में लिया चित्र
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का एक चित्र
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का एक चित्र
मंडुवाडीह रेलवे स्टेशन का एक चित्र 
वाराणसी की कुल्हड़ वाली चाय
क्यों जाएँ (Why to go Sarnath): अगर आपकी बौद्ध धर्म में आस्था है या आप बौद्ध धर्म से संबंधित अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाना चाहते है तो भारत में सारनाथ से उत्तम शायद ही कोई दूसरी जगह हो ! इसके अलावा वाराणसी में गंगा नदी के किनारे बने घाट, काशी विश्वनाथ का मंदिर, और रामनगर का किला भी देखने के लिए प्रसिद्ध जगहें है ! अगर आप वाराणसी में है तो गंगा नदी के किनारे बने दशावमेघ घाट पर रोज शाम को होने वाली गंगा आरती में ज़रूर शामिल हो !

कब जाएँ (Best time to go Sarnath): आप साल के किसी भी महीने में सारनाथ जा सकते है हर मौसम में यहाँ अलग ही आनंद आता है गर्मी के दिनों में भयंकर गर्मी पड़ती है तो सर्दी भी कड़ाके की रहती है !


कैसे जाएँ (How to reach Sarnath): दिल्ली से सारनाथ जाने के लिए आपको वाराणसी होकर जाना पड़ेगा, वाराणसी दिल्ली से 800 किलोमीटर दूर है, जहाँ जाने के लिए सबसे सस्ता और बढ़िया साधन भारतीय रेल है ! वैसे तो नई दिल्ली से वाराणसी के लिए प्रतिदिन कई ट्रेनें चलती है लेकिन शिवगंगा एक्सप्रेस (12560) इस मार्ग पर चलने वाले सबसे बढ़िया ट्रेन है जो शाम 7 बजे नई दिल्ली से चलकर सुबह 7 बजे वाराणसी उतार देती है ! वाराणसी से सारनाथ जाने के लिए नियमित अंतराल पर ऑटो और बसें चलती रहती है दोनों जगहों के बीच की दूरी महज 10 किलोमीटर है !


कहाँ रुके (Where to stay in Sarnath): सारनाथ में रुकने के लिए कई होटल है लेकिन अगर आप थोड़ी सुख-सुविधाओं वाला होटल चाहते है तो वाराणसी में रुके सकते है ! वाराणसी में 500 रुपए से लेकर 4000 रुपए तक के होटल मिल जाएँगे !


क्या देखें (Places to see in Sarnath): सारनाथ घूमते हुए तो ऐसा लगता है जैसे आप एक अलग ही दुनिया में आ गए हो ! हर तरफ महात्मा बुद्ध से संबंधित मंदिर और दर्शनीय स्थल है ! सारनाथ में घूमने के लिए वैसे तो कई जगहें है लेकिन चौखंडी स्तूप, थाई मंदिर, म्यूज़ीयम, अशोक स्तंभ, तिब्बत मंदिर, मूलगंध कूटी विहार, धूमेख स्तूप, बौधि वृक्ष और डियर पार्क प्रमुख है ! 


अगले भाग में जारी...

सारनाथ भ्रमण
  1. दिल्ली से वाराणसी की रेल यात्रा (A train trip to Varanasi from Delhi)
  2. धूमेख स्तूप, बोधिवृक्ष और मूलगंध कूटी विहार (Tourist Attractions in Sarnath, Dhumekh Stoop, and Mulgandh Kuti Vihar Temple) 
  3. सारनाथ का चाइना मंदिर (China Temple in Sarnath)
  4. सारनाथ का थाई मंदिर और चौखंडी स्तूप (Tourist Attractions in Sarnath, Thai Temple and Chaukhandi Stoop)

1 comment:

  1. Very nice article glad to read about my Home town Varanasi. Today Many people from all over India and worlds come to worship in Varanasi. Varanasi is well connected by road, rail and air to India. There are a International airport. The distance between Delhi to Varanasi is 794 kilometre and can be reached in 10 to 11 hours from Delhi.

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