Wednesday, December 30, 2015

श्रीकृष्ण जन्मभूमि और द्वारकाधीश मंदिर (Shri Krishna Janmbhoomi and Dwarkadheesh Temple, Mathura)

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बिरला मंदिर के बाहर पेट-पूजा करते हुए सोच रहा था कि अभी पागल बाबा का मंदिर तो खुला नहीं होगा ! इसलिए क्यों ना पहले श्री कृष्ण जन्मभूमि और द्वारकाधीश मंदिर देख लेता हूँ फिर रंगनाथ मंदिर जाते हुए रास्ते में थोड़ी देर रुककर पागल बाबा का मंदिर भी देख लूँगा ! ऐसा करने से मुझे दो फ़ायदे थे, एक तो कृष्ण जन्मभूमि देखने के लिए मुझे दोबारा वापिस नहीं जाना पड़ता क्योंकि ये दोनों स्थान बाकी मंदिरों से हटकर मथुरा की ओर थे ! दूसरा रंगनाथ मंदिर से वापसी करते हुए अगर समय बचा तो माँ वैष्णो देवी के मंदिर के दर्शन भी हो जाएँगे ! पेट-पूजा करके अपनी मोटरसाइकल उठाई और मथुरा-वृंदावन मार्ग पर मथुरा की तरफ चल दिया ! इस मार्ग पर डेढ़ किलोमीटर चलकर एक तिराहा आता है, कृष्ण जन्मभूमि जाने के लिए आपको इस तिराहे से दाएँ मुड़कर डेढ़ किलोमीटर सीधे चलना होता है, मैं इसी मार्ग पर हो लिया ! फिर एक पुलिस चौकी से आगे बढ़ते ही एक तिराहे से दाएँ मुड़कर मैं एक रिहायशी इलाक़े में पहुँच गया, यहाँ से बमुश्किल 5 मिनट की दूरी पर ही कृष्ण जन्मभूमि है !

krishna janmbhoomi
कृष्ण जन्मभूमि का प्रवेश द्वार (Shri Krishna Janmbhoomi Entrance)

Sunday, December 27, 2015

वृंदावन का खूबसूरत बिरला मंदिर (Birla Temple of Vrindavan)

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मेरे पिछले लेखों के माध्यम से आपने प्रेम मंदिर और जयपुर मंदिर के दर्शन किए थे ! जयपुर मंदिर से निकलकर मैं थोड़ी देर में ही मथुरा-वृंदावन मार्ग पर पहुँच गया, ये मार्ग मंदिर से 60 मीटर की दूरी पर है और मंदिर के बाहरी द्वार से दिखाई भी देता है ! इस मार्ग पर पहुँचते ही मैं अपनी दाईं ओर मुड़कर मथुरा की ओर चल दिया, बाईं ओर जाने वाला मार्ग वृंदावन जाता है इसी मार्ग पर रंगनाथ मंदिर भी है ! मथुरा की ओर जाने वाले मार्ग पर थोड़ी दूर जाने पर सड़क के बार्ईं तरफ ही पागल बाबा का मंदिर है, ऊँचा होने के कारण काफ़ी दूर से ही ये मंदिर दिखाई देता है ! फिर इसी मार्ग पर और आगे बढ़ने पर सड़क के दाईं ओर ही बिरला मंदिर भी आता है ! प्रेम मंदिर से आने पर आपको पुल से उतरकर तिराहे से दाएँ मुड़ना होता है, इस तिराहे से बिरला मंदिर की दूरी लगभग 4 किलोमीटर है जबकि जयपुर मंदिर यहाँ से 6 किलोमीटर दूर है ! 

temple entrance
मंदिर का प्रवेश द्वार (Main Entrance of Birla Temple)

Thursday, December 24, 2015

वृंदावन के जयपुर मंदिर की एक झलक (A View of Jaipur Temple in Vrindavan)

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मेरे पिछले लेख के माध्यम से आपने प्रेम मंदिर के दर्शन किए, प्रेम मंदिर से निकलने के बाद मैं जयपुर मंदिर जाने के लिए चल दिया ! वैसे तो 2-3 महीने में मेरा एक चक्कर वृंदावन का लग ही जाता है, और हर बार वृंदावन आने पर कई बार मैं इस मंदिर के सामने से गुजरा भी हूँ, पर कभी इस मंदिर में जाने का अवसर नहीं मिला ! हर बार कुछ ना कुछ बहाना रहता ही है इन मंदिरों को ना देख पाने का ! आप लोगों की जानकारी के लिए बता दूँ कि जयपुर मंदिर मथुरा-वृंदावन मार्ग पर मथुरा से 10 किलोमीटर दूर मुख्य सड़क के बाईं ओर स्थित है ! मुख्य सड़क से बाईं ओर जाने वाले एक मार्ग पर 60 मीटर के आस-पास चलने पर आप इस मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुँच जाओगे ! मंदिर तक जाने के लिए पक्का मार्ग बना है, और गाड़ी खड़ी करने के लिए भी यहाँ पर्याप्त व्यवस्था है ! मंदिर के सामने ही एक खुला मैदान है जहाँ हमेशा एक-दो बसें खड़ी ही रहती है ! प्रेम मंदिर से इस मंदिर की दूरी लगभग 3 किलोमीटर है और मुझे ये दूरी तय करने में 8 से 10 मिनट का समय लगा ! मंदिर के खुलने का समय सुबह 6 बजे से रात को 8 बजे तक है !

jaipur temple
जयपुर मंदिर वृंदावन (Main Entrance of Jaipur Temple)

Monday, December 21, 2015

वृंदावन के प्रेम मंदिर में बिताए कुछ पल (An Hour Spent in Prem Mandir, Vrindavan)

एक रविवार सुबह अपनी मोटरसाइकल उठाई और अकेला ही मथुरा घूमने के लिए चल दिया ! दरअसल, शनिवार को एक दो मित्रों से इस यात्रा पर साथ चलने के लिए पूछा भी था पर कोई भी साथ चलने के लिए सहमत नहीं हुआ इसलिए मैने किसी पर ज़्यादा ज़ोर भी नहीं दिया ! सुबह 8 बजे जब घर से निकला तो हल्की-2 धूप थी, आधा नवंबर बीत जाने के कारण मौसम में हल्की-2 ठंडक हो गई थी, फिर भी उतनी ठंड नही थी जितनी होनी चाहिए ! अपने शहर से बाहर निकलकर जैसे ही खाली सड़क मिली, तो मोटरसाइकल की रफ़्तार अपने आप बढ़ने लगी ! वैसे तो पूरे रास्ते मैने 65 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार बनाए रखी, फिर भी जहाँ कहीं भी बहुत अच्छी सड़क मिल जाती, तो रफ़्तार की सुई 70 को भी छू ले रही थी ! पलवल से मथुरा जाने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 2 है जिसका अभी विस्तारीकरण चल रहा है, आने वाले समय मैं ये 4 लाइन का राजमार्ग बढ़कर 6 लाइन का बन जाएगा ! पलवल से मथुरा तक विस्तारीकरण का अधिकतर काम तो पूरा हो गया है, बीच-2 में कुछ ऊपरगामी पुल है जो निर्माणाधीन है !

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प्रवेश द्वार से दिखाई देता प्रेम मंदिर (A view of Prem Mandir)

Thursday, December 17, 2015

श्रीनगर से दिल्ली वापसी (Return Journey to Delhi)

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वापसी का सफ़र भी श्रीनगर जाने से कम रोमांचक नहीं था, हुआ कुछ यूँ कि वापसी में भी मेरी और हितेश की अलग-2 विमानों में टिकटें थी ! हितेश का विमान सुबह 10:30 बजे उड़ान भरने वाला था जबकि मेरा विमान दोपहर पौने चार बजे उड़ान भर रहा था ! दोनों विमानों के उड़ान समय में 5 घंटे का अंतर होने के कारण हम दोनों का एक साथ हवाई अड्डे पर जाना मुमकिन नहीं था ! 5 घंटे हवाई अड्डे पर बैठ कर इंतजार करने से अच्छा है कि यहाँ होटल में ही रुककर आराम किया जाए ! एक-दो घंटो की बात होती तो अलग बात थी, पर 5 घंटे बहुत लंबा समय होता है ! अंत में ये निश्चय किया गया कि हितेश सुबह जल्दी उठकर हवाई अड्डे के लिए निकल जाएगा और मैं आराम से दोपहर को यहाँ से चलूँगा ! योजना के मुताबिक हितेश समय से सोकर उठा और सुबह साढ़े सात बजे तक नहा-धोकर तैयार हो गया ! नाश्ता करने बैठता तो देर हो जाती, इसलिए खाने-पीने का थोड़ा सामान उसने अपने साथ रख लिया !

dal lake srinagar
श्रीनगर की कुछ यादें - डल झील (Dal Lake in Srinagar)

Monday, December 14, 2015

श्रीनगर स्थानीय भ्रमण (Local Sight Seen of Srinagar)

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आज सुबह सोकर उठे तो ब्रश करके नहाने से पहले अपने होटल से बाहर निकलकर नाव की ओर चल दिए ! यहाँ से सूर्योदय का शानदार नज़ारा दिखाई दे रहा था, हमने थोड़ी देर यहीं बैठकर कुछ फोटो खींचे और डल झील में जाती हुई नावों को देखते रहे ! इस समय नावों में बैठकर कुछ बच्चे अपने स्कूल जा रहे थे तो कुछ अन्य नाव वाले अपनी दुकानदारी सजाने में लगे थे ! मैं अपने पिछले लेख में आपको बता चुका हूँ कि यहाँ डल झील में फेरी वाले नावों के माध्यम से ही ज़रूरत का सारा सामान बेचते रहते है ! इस झील में भाँति-2 की नावें थी, छोटी-बड़ी, रंग-बिरंगी नावों को डल झील में तैरते हुए देखना बहुत अच्छा लगता है, कभी-2 तो मन करता है घंटो बैठ कर इन नावों को ऐसे ही देखते रहो ! फिर हमने आवाज़ लगाकर बिलाल को बुलाया और उससे घाट के उस पार चलने को कहा ! इतना सुनते ही वो अपनी नाव का चप्पू लेकर आ गया और हमें लेकर घाट की ओर चल दिया !

dal lake ghat
घाट के पास लिया एक चित्र

Friday, December 11, 2015

सेब के बगीचों में बिताए कुछ पल (An Hour in Apple Orchard)

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बेताब-वैली तो हम दोनों जा नहीं पाए, लेकिन पहाड़ी पर चढ़ना और फिर पहलगाम में इस खड्ड के किनारे पानी में पैर डालकर बैठना अपने आप में एक सुखद अनुभव था ! चलिए बेताब वैली इस बार ना तो अगली बार ही सही, हमारे पास कोई तो बहाना होना चाहिए यहाँ दोबारा आने के लिए ! वैसे पहलगाम आते हुए हम जिस मार्ग से आए थे वापसी में उस मार्ग से नहीं गए ! हमारा ड्राइवर बहुत अनुभवी था और यहाँ पिछले कई सालों से टैक्सी चला रहा है, उसने बताया कि यात्रा सीजन में वो यहाँ यात्रियों को लेकर अक्सर आता है ! हर बार वो आता एक मार्ग से है और जाता दूसरे मार्ग से है ताकि सभी यात्री इस यात्रा के दौरान दोनों रास्तों के नज़ारों का आनंद ले सके ! हमने कहा सही कह रहे हो, आख़िर आदमी यहाँ घूमने ही आया है तो क्यों ना दोनों रास्तो का आनंद लिया जाए ! वापिस आते हुए थोड़ी दूर तक तो हम उसी मार्ग पर चलते रहे जिस से सुबह यहाँ आए थे, फिर रास्ते में एक तिराहे से दाएँ मुड़कर एक पहाड़ी के साथ-2 हो लिए !

apple orchard
फल से लदे सेब के पेड़ (Apple Tree in Srinagar)

Tuesday, December 8, 2015

श्रीनगर से पहलगाम की सड़क यात्रा (A Road Trip to Pehalgam)

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आज श्रीनगर में हमारी पहली सुबह थी, रुकने के लिए हितेश ने जिस हाउसबोट में हमारे लिए कमरा आरक्षित करवाया था सुख-सुविधाओं और साफ-सफाई के लिहाज से हमें वो अच्छा नहीं लगा ! हालाँकि, हम चाहते तो किसी दूसरे हाउसबोट में भी जा सकते थे पर यहाँ हम अग्रिम भुगतान कर चुके थे और दूसरे होटल में जाने का मतलब था पैसे की बर्बादी ! इस हाउसबोट में हमने दो दिन रुकने के लिए कमरा आरक्षित करवाया था, इसलिए हमारे पास यहाँ रुकने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था ! एक दिन तो हम यहाँ गुज़ार ही चुके थे, फिर आज दिनभर हम बाहर ही गुजारने वाले थे इसलिए बस आज की रात ही इस हाउसबोट में काटनी थी ! अगर मैं ये यात्रा परिवार संग कर रहा होता तो पहली बात तो रुकने के लिए मैं ऐसे हाउसबोट में कमरा आरक्षित करवाता ही नहीं ! अगर ग़लती से करवा भी लेता, तो यहाँ के हालात देख कर निश्चित तौर पर मैं कोई दूसरा हाउसबोट या होटल ढूँढ लेता ! हितेश ने शायद इस हाउसबोट के बारे में ज़्यादा जाँच-पड़ताल नहीं की थी, वैसे देखा जाए तो फ़र्क तो पड़ता ही है अकेले या मित्रों के साथ और परिवार के साथ यात्रा करने में !

view from houseboat
हाउसबोट से दिखाई देता सुबह का एक दृश्य (A view from Houseboat, Dal Lake, Srinagar)

Friday, December 4, 2015

श्रीनगर हवाई अड्डे से डल झील की बस यात्रा (A Road Trip to Dal Lake)

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अब तक आपने पढ़ा कि किस तरह हम दोनों (मैं और हितेश) अलग-2 विमानों से अलग-2 समय अंतराल पर श्रीनगर पहुँचे ! वैसे हितेश तो 2 बजे से पहले ही यहाँ पहुँच गया था पर वो यहीं हवाई अड्डे पर रुककर मेरे आने की प्रतीक्षा कर रहा था ताकि आगे का सफ़र हम दोनों साथ में तय कर सके ! एयरपोर्ट से बाहर आते हुए मुझे हितेश भी वहीं खड़ा मिला, यहाँ से हम दोनों साथ हो लिए ! फिर हम दोनों मेरा बैग लेने एयरपोर्ट के उस हिस्से में आ गए जहाँ विमान से उतारकर यात्रियों का सामान लाया जाता है ! यहाँ एक अंडाकार आकृति की बेल्ट घूमती रहती है जिस पर यात्रियों का सारा सामान डाल दिया जाता है यात्री इस बेल्ट के चारों तरफ खड़े रहते है और पहचान कर अपना-2 सामान ले लेते है ! थोड़ी देर इंतजार के बाद मेरा बैग भी आ गया, जिसे लेकर हम दोनों एयरपोर्ट से बाहर की ओर चल दिए ! श्रीनगर अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, इसके बावजूद भी यहाँ बहुत ज़्यादा विमानों की आवाजाही नहीं है, फिर भी सुरक्षा कारणों से यहाँ हमेशा बहुत भीड़ रहती है !

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डल झील से दिखाई देता एक दृश्य (A view from Dal Lake, Srinagar)

Tuesday, December 1, 2015

दिल्ली से श्रीनगर की विमान यात्रा (Flying Delhi to Srinagar)

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पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दोनों ने अपने घर से दिल्ली एयरपोर्ट तक का सफ़र तय किया ! यहाँ प्रतीक्षालय में बैठे-2 जब बोरियत होने लगी तो सोचा कि क्यों ना समय का सदुपयोग करते हुए एयरपोर्ट परिसर में ही थोड़ा घूम लिया जाए ! अभी 11 बज रहे थे और बोर्डिंग पास के अनुसार हितेश का बोर्डिंग समय 12 बजे का था, मतलब अभी भी हमारे पास एक घंटा बचा था ! हम दोनों अपना-2 बैग बोर्डिंग पास लेते समय जमा करवा ही चुके थे इसलिए अब हमारे पास सिर्फ़ कैबिन बैग ही थे, जिन्हें लेकर घूमने में कोई परेशानी नहीं थी ! इसलिए हम दोनों प्रतीक्षालय से उठकर एयरपोर्ट परिसर में टहलने लगे, घूमते हुए जब हमने वहाँ मौजूद एक स्नैक्स पॉइंट से पता किया तो वहाँ चाय-कॉफी के अलावा ज़्यादातर सामान पहले का बनाकर रखा हुआ था, जिसमें पनीर पेटीज, बर्गर, केक, और कुछ अन्य वस्तुएँ थी ! वैसे भूख तो लग रही थी, पर वहाँ रखा ज़्यादातर सामान ताज़ा नहीं लग रहा था ! इस बीच हितेश ने सुझाव दिया कि चल यार बाहर चलकर कुछ खा लेते है, वैसे भी अभी तो हमारे पास काफ़ी समय है !

delhi airport
दिल्ली हवाई अड्डे का एक चित्र (A view from Delhi Airport)

Friday, November 27, 2015

श्रीनगर यात्रा - उड़ान भरने से पहले का सफ़र (Pre-Departure Journey)

सोच रहा हूँ इस यात्रा वृतांत की शुरुआत कैसे करूँ ? चलिए अपने पुराने अंदाज़ में ही शुरू करता हूँ ! हर बार की तरह इस यात्रा पर जाने की योजना भी काफ़ी पहले ही बन गई थी ! बात इसी साल जून की है जब अलग-2 कंपनियाँ प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए हवाई यात्राओं पर विभिन्न प्रकार के प्रलोभन देने में लगी थी ! ऐसी ही एक योजना के तहत पिछली बार मेरे कई मित्रों ने अलग-2 गंतव्यों के लिए हवाई टिकटें आरक्षित करवाई थी ! अब तक मैं यही सोचता था कि पता नहीं ये टिकटें सही होती भी है या इनमें कुछ झोल-झाल होता है और यात्रा के समय कुछ अतिरिक्त शुल्क देना होता है ! पर दोस्तों से मिली जानकारी के अनुसार इस योजना के तहत मिलने वाले टिकट काफ़ी सस्ते होते है, विमान कंपनिया खाली सीटों को भरने के लिए ऐसा करती है ! इनका मत होता है कि विमान में बची सीटों को खाली ले जाने से अच्छा है उन्हें सस्ते दाम पर बेच देना !

हवाई अड्डे जाते हुए रास्ते में लिया एक चित्र (Airport Link Metro)


Wednesday, November 18, 2015

पूरे देश में है छठ के त्योहार की धूम (Celebration of Chath Festival in India)

छठ पूजा का हिंदू धर्म में बहुत महत्व है, छठ के इस पर्व को भी दीवाली के बराबर ही माना जाता है ! बल्कि देश के कुछ हिस्सों (यूपी-बिहार) में तो इसे दीवाली से भी ज़्यादा महत्व दिया जाता है ! भले ही लोग दीवाली पर अपने घर परिवार के साथ ना हो, पर छठ मनाने के लिए वो देश के अलग-2 हिस्सों से अपने परिवार के पास पहुँच जाते है ! यही कारण है की दीवाली के बाद देश के अलग-2 हिस्सों से यूपी-बिहार जाने वाली अधिकतर रेलों में भीड़ बहुत बढ़ जाती है ! हालाँकि, किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए भारतीय रेल इस दौरान यूपी-बिहार के लिए कुछ अतिरिक्त रेलें भी चलाती है, बावजूद इसके हर साल इस मौके पर रेलों में भगदड़ की खबरें सुनने को मिलती रहती है ! वैसे तो इस त्योहार को यूपी-बिहार के लोग ज़्यादा मनाते है पर धीरे-2 ये त्योहार पूरे भारतवर्ष में मशहूर हो गया है इसलिए अब ये त्योहार देश के कई हिस्सों में मनाया जाता है ! इसकी भी कई वजहें है पहली वजह तो है यूपी-बिहार के लोगों का देश के अलग-2 हिस्सों में पलायन करना, और दूसरी वजह है लोगों की इस त्योहार के लिए बढ़ रही श्रद्धा !

ghat of chath
छठ पूजा के लिए बनाया गया घाट (A ghat decorated for the festival of Chath)

Thursday, October 1, 2015

A Day Spent with Friends at Qutub Minar

How do you refresh your mind? Have you ever noticed that we need a quick break from our daily routine to get our mind refreshed? Our daily routine is so repetitive that time comes when we get bore and need a break. To overcome this boredom, people often play games, listen music, watch movies, read books, go on trips, and get involved in some other activities as per their interest. I choose different activities depending on the situation. Sometimes, I watch movies and if weather is really very good then I go out for an outing. It can be a day outing or it can also be a well-planned 4-5 days trip. Generally, I prefer group tours but never hesitate to go on solo trips as well. 

It was almost 4-5 months when I last went on a trip. On a weekend, I decided to spend a day with friends somewhere in Delhi. It was an instant decision so we decided to go out for Qutub Minar. Our journey begin at 11 AM when three of us Hitesh, Vipul and I started from our home. As it was Sunday, we did not get much traffic on the highway. As a result, we crossed Faridabad and entered Delhi in next 35-40 minutes. The weather was cloudy and pleasant when we started from home but the time we reached Delhi, it was very hot. We crossed Badarpur toll plaza and turned left on Badarpur-Mehrauli road. 

Qutub Minar is hardly 10 kilometers away from here but due to a traffic jam in Khanpur and Sangam Vihar, it took us 15-20 minutes to reach there. This road ends to a T-point in Mehrauli, from here left turn leads to Gurgaon while right turn connects you to Aurobindo road. We turned right, then first left and reached to the entrance of Qutub Minar. Here is an ample space for parking, but due to holiday, the parking was almost packed. It took us 15-20 minutes to find a parking space for our car. We bought our entry passes from the ticket counter situated within the parking area. With these entry passes, we headed towards entrance of Qutub Minar. 

A man at entry point checked our tickets and allowed us to go inside the minar premises. Qutub Minar was constructed by Qutub-ud-din Aibak in 12th century. The Minar is made up of red sandstone and white marble. Best time to visit this place is from February to April. During this time, people from across the world comes India to see this Minar. An entry fee of Rs 10 is charged from Indians and Rs. 250 is charged from foreigners. Photography is allowed free of cost inside the Minar premises but for videography you need to pay some extra bucks. This Minar contains seven storeys and overall height of entire Minar is 72 meters. The Minar is regarded as tallest individual tower in the world. 

Earlier till 1981, people were allowed to go inside the Minar and on the top of this tower. But in 1981, due to a stampede, 45 people were killed and more than 100 were injured. After that incidence, people access to the inside of the Minar has been banned. Inside the Minar premises, there is an iron pole which is considered to be made up of non-resistant material. Height of this pole is 7 meters and it weighs around 6000 kilograms. This place is famous among Indian filmmakers, scenes of many bollywood movies are shoot here. 

There is another Minar beside the Qutub Minar named as Alai Minar. Alauddin Khilji started building the Alai Minar, first storey of this Minar was completed by the time he dead. Height of first storey is around 24.5 meters which is almost double of Qutub Minar's first storey. The construction of Alai Minar was abandoned just after the death of Alauddin Khilji in 1316. Only first Minar was completed by the time and construction work was never taken up by his successor. If Alai Minar was completed by Alauddin Khilji's successor then no doubt it would be considered as the highest Minar in the world. 

We stayed almost two hours inside the Minar premises and enjoyed a lot. We were feeling hungry and decided to go out and have some food. We stepped out from the exit door, picked up our car and headed toward a food junction. In next half an hour, we were sitting in Dominos. We ordered pizza's for all of us which was served in a while. By 5 PM in the evening, we reached back at our home. It was a great day with friends and everyone enjoyed a lot.

Monday, September 14, 2015

सिलिसढ़ झील के पास बिताए कुछ पल (Moments spent near Siliserh Lake)

रविवार, 2 अगस्त 2015

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हम लोग जब गाड़ी मोड़ कर वापस अलवर की तरफ आने लगे तो फिर से सड़क के किनारे कुछ अन्य जीव खड़े दिखाई दिए ! दोनों तरफ घना जंगल था और सड़क के किनारे दूर तक फैले सूखे पेड़ बहुत ही सुंदर दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे ! वन्य जीव उद्यान बंद होने की बात सुनकर थोड़ा दुख तो था इसलिए सड़क के किनारे मौजूद इन जानवरों को देखना अच्छा लग रहा था ! अक्सर बारिश में सारे ही वन्य जीव उद्यान बंद ही रहते है क्योंकि उद्यान में अंदर जाने वाले मार्ग फिसलन भरे हो जाते है ! इससे किसी भी अप्रिय घटना के घटित होने का ख़तरा बढ़ जाता है, इसलिए इस दौरान उन उद्यानों को बंद ही रखा जाता है ! सरिस्का में भी इस मौसम में काफ़ी कम लोग ही घूमने आते है और जो आते भी है वो अक्सर सिलिसढ़ झील, भृतहरि या आस-पास मौजूद धार्मिक जगहों पर घूमने आते है ! इस समय हम असमंजस में थे, कि अब आगे क्या किया जाए, इतनी दूर से गाड़ी चला कर जिस उद्यान को देखने आए थे वो तो बंद है ! सरिस्का से आगे यही मार्ग जयपुर को चला जाता है, एक बार तो मन हुआ कि अगले दिन का अवकाश लेकर जयपुर ही चला जाए, पर इस बात पर अन्य साथी सहमत नहीं हुए !

sariska alwar road
सरिस्का से वापिस आते हुए (Sariska Alwar Road)

Thursday, September 10, 2015

सरिस्का में दोस्तों संग मस्ती (A Road Trip to Sariska)

रविवार, 2 अगस्त 2015

बहुत दिनों से सरिस्का मेरी घूमने जाने वाली जगहों की सूची में था, पर हर बार ये जगह रह ही जाती थी ! इस बार जब एक रविवार को हितेश का फोन आया कि सरिस्का घूमने चले क्या, तो मैने बिना समय गँवाए हाँ कर दी ! छुट्टी का दिन होने के कारण कोई परेशानी भी नहीं थी, इस यात्रा पर हितेश के साथ उसके दफ़्तर के कुछ सहकर्मी भी जा रहे थे ! क्योंकि ये एक दिन की ही यात्रा थी जिसमें हमें यहाँ से सुबह चलकर दिनभर सरिस्का घूमकर शाम तक वापिस आ जाना था इसलिए यात्रा के लिए ज़्यादा तैयारी करने की ज़रूरत नहीं थी ! जब हितेश से बात करके फोन बंद किया तो सुबह के 7 बज रहे थे, अपनी योजना के मुताबिक हम 8 बजे घर से निकलने वाले थे ! मैं नहा-धोकर समय से तैयार हुआ और नाश्ता करने के बाद एक बैग में अपना कैमरा लेकर घर से निकल लिया ! प्रोग्राम इतनी जल्दी बना था कि सरिस्का के बारे में कुछ जानकारी भी नहीं जुटा पाए ! बस इतना पता था कि वहाँ वन्य जीव उद्यान के अलावा अलवर में सिलिसढ़ झील भी है !

हमारे पायलट हितेश शर्मा

Monday, September 7, 2015

क़ुतुब-मीनार में बिताए कुछ यादगार पल (A Day with Friends in Qutub Minar)

रविवार, 21 जून 2015

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बहुत दिन हो गए थे किसी भी यात्रा पर गए हुए, हर बार यात्रा का विचार बनता फिर किसी ना किसी वजह से रह जाता ! किसी यात्रा पर ना जा पाने के कारण मन काफ़ी तनाव में था, अक्सर ऐसा होता है जब आप रोजाना एक ही तरह की जीवन शैली में रहते है तो थोड़े बदलाव की ज़रूरत होती है ! अगर समय रहते आप ये बदलाव कर लेते है तो जीवन अच्छा चलता रहता है वरना आप तनाव से घिर जाते है ! लोग इस बदलाव के लिए अलग-2 तरीके अपनाते है कोई फिल्में देखने जाते है तो कुछ क्लब की सदस्यता लेकर अपना समय वहाँ बिताते है ! मैं अपनी जीवन शैली में बदलाव के लिए समय-2 पर यात्राएँ करता रहता हूँ, समय और परिस्थिति अनुसार मेरी यात्राएँ कभी छोटी होती है तो कभी बड़ी ! अब क्योंकि किसी लंबी यात्रा पर जाने का संयोग तो बन नहीं पा रहा था इसलिए छोटी यात्रा करके इस जीवन शैली में थोड़ा बदलाव लाना ज़रूरी था ! ऐसे ही एक रविवार को खा-पीकर सुबह घर पर बैठा टेलीविज़न देख रहा था कि तभी मेरा फोन बजा जो इस समय चार्जिंग में लगा था !


सफ़र की शुरुआत

Wednesday, September 2, 2015

पठानकोट से दिल्ली की रेल यात्रा (A Journey from Pathankot to Delhi)

शनिवार, 21 जुलाई 2012

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यात्रा के पिछले लेख में आपने हिमालयन वॉटर फॉल के बारे में पढ़ा, अब आगे, शनिवार सुबह जब मेरी नींद खुली तो मैं बिस्तर में लेटे-2 यही सोच रहा था कि यहाँ हिमाचल में मस्ती भरे 8 दिन कैसे बीत गए पता भी नहीं चला ! अक्सर हमें ऐसा लगता है कि अच्छे पल बहुत जल्दी बीत जाते है और बुरा वक़्त तो ऐसा लगता है मानो कटता ही नहीं ! पर ऐसा नहीं है ये तो हमारे सोचने का नज़रिया है वरना वक़्त तो लगातार एक ही रफ़्तार से चलता रहता  है ! आज सच्चाई का सामना करते हुए काफ़ी दुख हो रहा था, क्योंकि सच्चाई ये थी कि आज यहाँ मक्लोड़गंज में 
हमारा आख़िरी दिन था और हम में से किसी का भी वापिस जाने का बिल्कुल मन नहीं हो रहा था ! मन को बहुत समझाया, पर मन कहाँ मानने वाला था, रह-2 कर यही विचार मन में आ रहे थे कि काश कुछ दिन और यहाँ रह लेते ! वैसे हम यहाँ मक्लॉडगंज से अकेले नहीं जा रहे थे बल्कि हम अपनी यादों में इस खूबसूरत शहर की खूबसूरती को समेट कर अपने साथ ले जा रहे थे ! यहाँ के खूबसूरत पहाड़, कल-कल करते झरने, हरी-भरी वादियाँ और दूर तक दिखाई देती हिमालय पर्वतमाला हमारी आँखों में बस गई थी ! यहाँ बिताए गए हर एक पल की यादें बहुत लंबे समय तक हमारे मन में रहने वाली थी !
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मोनेस्ट्री में विपुल (A view of Monestary, Mcleodganj)

Thursday, August 27, 2015

हिमालयन वाटर फाल - एक अनछुआ झरना (Untouched Himachal – Himalyan Water Fall)

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

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यात्रा के पिछले लेख में मैने आपको मक्लॉडगंज का स्थानीय भ्रमण करवाया, अब आगे, सुबह समय से सोकर उठे, अपनी इस ग्रीष्मकालीन यात्रा के दौरान आज हमारा 7वाँ दिन था ! अब तक हम भाग्सू नाग झरने पर तो 2 बार जा चुके थे, पर मक्लोडगंज में भाग्सू नाग ही अकेला झरना नहीं है, एक और झरने के बारे में हमें त्रिउंड की ट्रेकिंग के दौरान पता चला 
था ! जब हम त्रिउंड जा रहे थे तो हमने गालू मंदिर के पास एक बोर्ड पर हिमालयन वॉटर फॉल के बारे में पढ़ा था ! स्थानीय लोगों से पूछताछ के बाद हमें पता चला कि गालू मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर एक प्राकृतिक झरना है ! स्थानीय लोगों ने हमें ये भी बताया कि दुर्गम मार्ग होने के कारण बहुत कम लोग ही इस झरने तक जा पाते है और इसलिए इस झरने के आस-पास भीड़-भाड़ और गंदगी भी कम है ! झरने तक जाने के लिए इतनी जानकारी हमारे लिए पर्याप्त थी, जानकारी मिलने के साथ ही हम लोगों के मन में इस झरने को देखने की इच्छा प्रबल हो गई थी ! पर क्योंकि उस दिन तो हम त्रिउंड जा रहे थे इसलिए हमने सोचा कि हिमालयन वॉटर फॉल किसी और दिन आएँगे ! 
galu temple
गालू मंदिर के पास लिया एक चित्र (A view from Galu Temple, Mcleodganj)

Monday, August 24, 2015

मोनेस्ट्री में बिताए सुकून के कुछ पल (A Day in Mcleodganj Monastery)

वीरवार, 19 जुलाई 2012

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यात्रा के पिछले लेख में आपने त्रिऊंड के बारे में पढ़ा, ट्रेकिंग के कारण अच्छी-ख़ासी थकान हो गई थी ! इसलिए वापिस आने के बाद थोड़ी देर मक्लॉडगंज बाज़ार में घूमने के बाद खा-पीकर हम वापिस अपने होटल पहुँच गए ! अब आगे, सुबह थोड़ा देरी से सोकर उठे, रात को बढ़िया नींद आई तो त्रिऊंड के सफ़र की सारी थकान दूर हो गई हम सब बिस्तर से निकलकर अपने होटल ही छत पर सुबह का नज़ारा देखने के लिए पहुँच गए ! धौलाधार की पहाड़ियों पर जब सुबह-2 सूरज की किरणें पड़ती है तो ये पहाड़ियाँ सुनहरे रंग में नहा कर और भी सुंदर दिखाई देती है ! पहाड़ भी हर मौसम में अपना रंग बदलते है, सर्दियों में बर्फ पड़ने पर सफेद, बारिश होने पर हरे-भरे, और सूर्य की किरणें पड़ने पर सुनहरे रंग के हो जाते है ! बहुत देर तक हम लोग अपने होटल की छत पर बैठ कर इस सुंदर दृश्य को देखते रहे ! त्रिउंड की यात्रा करने के बाद आज हम आराम के साथ-2 मस्ती करने के मूड में थे, इसलिए आज हमारा कहीं दूर जाने का विचार नहीं था, सबने सोचा कि आज का दिन यहीं मक्लॉडगंज के आस-पास ही घूम लिया जाए ! 

A view of our hotel room, Mcleodganj

Thursday, August 20, 2015

दोस्तों संग त्रिउंड में बिताया एक दिन (An Awesome Trek to Triund)

बुधवार, 18 जुलाई 2012 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम डलहौजी से बस यात्रा करके धर्मशाला पहुँचे, और फिर हम सब शाम तक भाग्सू नाग झरने में नहाते रहे ! अब आगे, दिन भर सफ़र की थकान और झरने में नहाने के कारण रात को बढ़िया नींद आई ! सुबह जल्दी सोकर उठे, और नित्य-क्रम में लग गए ! आज हम त्रिउंड घूमने जाने वाले थे ये मक्लॉडगंज में एक शानदार ट्रेक है हर साल मक्लॉडगंज आने वाले हज़ारों लोग इस ट्रेक को करते है ! त्रिऊंड के बारे में हमने स्थानीय लोगों से काफ़ी जानकारी एकत्रित कर ली थी ! पिछली साल धर्मशाला यात्रा के दौरान समय के अभाव में त्रिउंड नहीं जा पाए थे, पर आज इस यात्रा पर जाने के लिए सभी लोग उत्साहित थे ! नाश्ता तो सुबह 9 बजे से पहले मिलने वाला नहीं था, ये जानकारी हम होटल वाले से पिछली रात को ही ले चुके थे ! हमने सोचा अगर नाश्ते के इंतज़ार में यहाँ बैठे रहे, तो पहुँच लिए त्रिउंड ! बस फिर क्या था, रास्ते में अपने साथ ले जाने के लिए ज़रूरी सामान अपने बैग में रखा, और त्रिउंड की चढ़ाई के लिए निकल पड़े ! 

mcleodganj market
त्रिऊंड - सफ़र की शुरुआत (A view of Mcleodganj Market)

Monday, August 17, 2015

डलहौज़ी से धर्मशाला की बस यात्रा (A Road Trip to Dharmshala)

मंगलवार, 17 जुलाई 2012 

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तीन दिन डलहौज़ी घूमने के बाद चौथे दिन सुबह हम लोग अपने होटल से निकलकर धर्मशाला जाने के लिए डलहौज़ी के बस स्टैंड पर पहुँच चुके थे ! सुबह के सात बजने में दस मिनट शेष थे, और डलहौज़ी के बस स्टैंड पर धर्मशाला जाने की पहली बस तैयार खड़ी थी ! हम सब इस बस में चढ़ गए, अन्दर जाने पर हमने देखा कि कुछ सवारियाँ पहले से ही बस में मौजूद थी, हमने भी अपने लिए एक-2 सीट ले ली ! सुबह सात बजकर पंद्रह मिनट पर हमारी बस डलहौज़ी से चली ! यहाँ से बमुश्किल 5-6 किलोमीटर ही आगे गए होंगें कि बस एक चौराहे पर आकर रुक गई, ये वही चौराहा था, जहाँ दिल्ली से डलहौज़ी आते समय हम पहली बस को छोड़ कर दूसरी बस में बैठे थे ! कंडक्टर से पूछने पर पता चला कि बस यहाँ नाश्ता-पानी के लिए रुकी थी, जिस किसी को भी कुछ खाना-पीना था वो यहाँ से ले सकता था क्योंकि बस यहाँ पंद्रह-बीस मिनट रुकने वाली थी ! अब इतनी सुबह हमारा तो कुछ खाने-पीने का मन नहीं था, पर हमने सोचा कि जब तक बस यहाँ रुकी है रास्ते में खाने के लिए कुछ सामान खरीद लिया जाए ! 

bus travel
ड़लहौजी में बस में बैठे हुए

Friday, August 14, 2015

कालाटोप के जंगलों में दोस्तों संग बिताया एक दिन (A Walk in Kalatop Wildlife Sanctuary)

सोमवार, 16 जुलाई 2012 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने खाज़ियार के बारे में पढ़ा, अब आगे, आज डलहौज़ी में हमारा आखिरी दिन था, कहने को तो हम पिछले दो दिनों से लगातार डलहौज़ी में घूम रहे थे, पर फिर भी अभी तक हम यहाँ की सभी जगहें नहीं घूम पाए थे ! अभी भी डलहौज़ी और इसके आस-पास घूमने के लिए काफी जगहें बाकी थी ! हमने मन ही मन सोचा कि आज के दिन जितना घूम सके उतना घूमेंगे, और जो रह जायेगा वो अगली बार डलहौज़ी आने पर घूम लेंगे ! सभी लोग सुबह की दिनचर्या में लगे हुए थे, नहा-धोकर तैयार हुए, अपनी ज़रूरत का सामान लिया, और फिर से गाँधी चौक की तरफ अपनी बस के इंतज़ार में चल दिए ! आज हम कालाटोप वाइल्डलाइफ सेंचुरी जा रहे थे, और यहाँ जाने के लिए भी बस गाँधी चौक से होकर ही जाती है ! अपना तो नियम है कि अगर पहाड़ों पर कहीं दूर घूमने जाना हो तो अपनी यात्रा की शुरुआत सुबह जल्दी कर लो, ताकि आपके पास घूमने का पर्याप्त समय रहे ! इस तरह अगर आप रास्ते में कहीं प्रकृति के नजारों का आनंद लेने के लिए थोड़ी देर रुकना चाहे, तो भी आपको समय की कमी ना महसूस हो ! 

hotel bhandari
अपने होटल की छत पर शशांक और मैं (A view from our Hotel Terrace, Dalhousie)

Tuesday, August 11, 2015

खजियार – देश में विदेश का एहसास (Natural Beauty of Khajjar)

रविवार, 15 जुलाई 2012 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पॅंच-पुला के बारे में पढ़ा, अब आगे, डलहौज़ी की रात इतनी ठंडी थी, कि सुबह बिस्तर से बाहर निकलने का मन ही नहीं हो रहा था ! बिस्तर पर लेटे-2 ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर झाँक कर देखा, तो सूर्योदय हो चुका था ! फिर तो आलस को एक तरफ रखकर फटाफट बिस्तर से बाहर निकले, और अपने कमरे की छत पर सुबह की खूबसूरती का नज़ारा देखने के लिए पहुँच गए ! उस समय हमारे होटल की छत पर कुछ बंदर घूम रहे थे, हमें देखते ही सारे बंदर भाग खड़े हुए ! यहाँ छत पर से बहुत सुन्दर नज़ारा दिखाई दे रहा था, हल्की-2 लालिमा लिए दूर लाल रंग का सूर्य दिखाई दे रहा था, और सूरज की किरणें घने पेड़ों को चीर कर हम तक आ रही थी ! हम लोग वहीँ छत पर एक किनारे बैठ कर प्रकृति की सुन्दरता को निहारने लगे, मोबाइल में समय देखा तो सुबह के सात बज रहे थे ! डलहौज़ी में आज हमारे पास घूमने जाने के लिए तीन जगहें थी, कालाटोप वाइल्डलाइफ सेंचुरी, डायन कुण्ड, और खजियार ! इन जगहों में हमारे होटल से सबसे दूर खजियार था, जिसकी दूरी यहाँ से करीब 22 किलोमीटर थी !
gandhi chowk dalhousie
गाँधी चौक पर बस का इंतजार करते हुए शशांक (Gandhi Chowk in Dalhousie)

Friday, August 7, 2015

पंज-पुला की बारिश में एक शाम (An Evening in Panch Pula)

शनिवार, 14 जुलाई 2012 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दिल्ली से ट्रेन का लंबा सफ़र तय करके पठानकोट होते हुए यहाँ डलहौजी पहुँचे ! अब आगे, होटल पहुँचने के बाद तैयार होकर खाने-पीने के बाद हम लोग पंच-पुला घूमने निकल पड़े, दोपहर के तीन बज चुके थे, इसलिए हमने आज का दिन डलहौज़ी में आस-पास घूमना ही उचित समझा ! पंच-पुला, डलहौज़ी के मुख्य बाज़ार (गाँधी चौक) से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर है, जहाँ जाने के लिए वैसे तो आप गाँधी चौक से बस या टैक्सी ले सकते है, पर पहाड़ों पर घुमक्कड़ी का असली मजा तो पैदल ही आता है ! पहाड़ों पर प्रकृति के जो नज़ारे आप पैदल चल कर देख सकते है वो बस या कार में बैठ कर शायद ही कभी दिखाई दे ! पंज-पुला जाने के लिए हम चारों गाँधी चौक से तीन बजे पैदल ही निकल पड़े ! गाँधी चौक से थोडा सा आगे बढ़ने पर मुख्य सड़क दो भागों में विभाजित हो जाती है, ऊपर जाने वाली सड़क खजियार होते हुए चंबा निकल जाती है जबकि नीचे जाने वाला मार्ग पंच-पुला होते हुए आगे चला जाता है ! 

way to panch pula
पंज-पुला जाते हुए मार्ग में (On the way to Panch Pula)

Monday, August 3, 2015

दिल्ली से डलहौजी की रेल यात्रा (A Train Trip to Dalhousie)

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

बात जुलाई की है जब सूर्य देव खूब आग बरपा रहे थे, बारिश शुरू हो चुकी थी पर फिर भी गर्मी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी ! सम्पूर्ण उत्तर भारत में गर्मी से बुरा हाल था, या यूँ कहिए कि पूरा उत्तर भारत गर्मी से झुलस रहा था ! ऐसे में मन हुआ कि इस गर्मी से राहत पाने के लिए कुछ दिन कहीं ठंडी जगह पर घुमक्कड़ी कर ली जाए ! फिर सोचा कि ऐसे मौसम में कहाँ जाया जाए, क्यूंकि अखबारों में रोज़ पढने को मिल रहा था कि बारिश से पहाड़ो पर जीवन अस्त व्यस्त हो गया है। बारिश के मौसम में कहीं बादल फटने की खबर आ रही थी तो कहीं नदिया उफान पर चल रही थी ! यही सोच कर मन असमंजस में था कि इस मौसम में घूमने जाना ठीक रहेगा या नहीं ! सोचते-2 कब मुझे नींद आ गई पता ही नहीं चला, और जब नींद खुली तो सुबह के 6 बज रहे थे ! मैं जल्दी से उठ कर नहा-धोकर तैयार होने के बाद मोटरसाइकल लेकर अपने दफ़्तर के लिए निकल पड़ा !अभी मुश्किल से आधे रास्ते ही पहुँचा था कि तभी मेरा फोन बजने लगा, सच कहूँ अगर आप कहीं जाम में फँसे हो, और आपका फोन बजने लगे तो उठाने का बिल्कुल भी मन नहीं होता !

train to pathankot
दिल्ली से चलते समय

Thursday, July 30, 2015

लाखामंडल से मसूरी की सड़क यात्रा (A Road Trip to Mussoorie)

रविवार, 27 दिसंबर 2009 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम पहाड़ी की तलहटी में स्थित टाइगर फॉल में स्नान करके वापसी ख़तरनाक चढ़ाई करके अपनी गाड़ी पर पहुँचे ! अब आगे, टाइगर फॉल से वापिस आने के बाद मन काफ़ी रोमांचित हो गया था, सब यही कह रहे थे कि रास्ते में ऐसी एक-दो जगहें और देखने को मिल जाए तो ये मज़ा दुगुना हो जाएगा ! इसी दौरान जयंत बोला कि इसी मार्ग पर यहाँ से 50 किलोमीटर दूर एक जगह है लाखामंडल ! इस जगह के बारे में चकराता के स्थानीय लोगों ने जयंत को बताया था कि लाखामंडल में भी घूमने लायक कुछ जगहें है ! इस बार हम सब जयंत को बड़े ध्यान से सुन रहे थे, उसकी बात ख़त्म होते ही हम सब एक ही स्वर में बोले, ठीक है भाई, लाखामंडल भी घूमते हुए चलेंगे ! अपने पाठकों की जानकारी के लिए बता दूँ कि लाखामंडल एक प्राचीन शिव मंदिर के लिए प्रसिद्द है, जहाँ हर वर्ष हज़ारों श्रद्धालु आते है ! कुछ लोग तो ये भी कहते है कि पांडवों ने अपना कुछ समय यहाँ लाखामंडल में भी व्यतीत किया था ! 

map lakhamandal
लाखामंडल में मानचित्र

Monday, July 27, 2015

टाइगर फॉल में दोस्तों संग मस्ती (A Perfect Destination - Tiger Fall)

रविवार, 27 दिसंबर 2009 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम रोमांच से भरे एक सफ़र को तय करके देवबन पहुँचे और कुछ समय वहाँ बिताने के बाद वापिस अपने होटल आ गए ! अब आगे, रात को बढ़िया नींद आई तो सुबह समय से सोकर उठे, उठने के बाद भी काफ़ी देर तक कंबल में ही बैठे रहे ! यहाँ चकराता में इतनी जबरदस्त ठंड पड़ रही थी कि बिस्तर से निकलने की हिम्मत किसी की भी नहीं हो रही थी ! वैसे, कल रात खूब अच्छी नींद आने का कारण ये था कि आज का कमरा कल वाले कमरे से काफ़ी बड़ा और बिस्तर भी काफ़ी नरम था ! दरअसल, कल दोपहर को जब एक नवविवाहित जोड़े ने ये कमरा खाली किया तो होटल वाले को अपना फ़ायदा दिखा, अभी उसके पास यही एक कमरा खाली था, और हमने दो कमरे लिए हुए हुए थे ! अब अगर हम चारों वो दो कमरे छोड़ कर एक ही कमरे में आ जाते तो होटल वाले के पास एक की जगह दो कमरे खाली हो जाते ! हमें भी कोई आपत्ति नहीं थी, इसलिए दो छोटे कमरों से अच्छा एक बड़े कमरे में रहना ज़्यादा उचित लगा ! 

view from hotel chakrata
होटल की छत से दिखाई देता एक दृश्य (A view from our Hotel in Chakrata)

Thursday, July 23, 2015

देवबन के घने जंगल की रोमांचक यात्रा (Road Trip to Deoban, Chakrata)

शनिवार, 26 दिसंबर 2009 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने चकराता के स्थानीय भ्रमण के बारे में पढ़ा ! अब आगे, सुबह 8 बजे जब मैं सोकर उठा, देखा तो जयंत पहले ही उठ चुका था, वो बोला चल यार छत पर चलकर सूर्योदय के नज़ारे देखते है ! ठंड बहुत थी, बिस्तर से निकलने का मन तो नहीं हो रहा था, पर फिर भी हिम्मत करके बाहर निकलकर हम दोनों कमरे से बाहर चल दिए ! छत पर जाने से पहले बगल वाले कमरे में जाकर देखा तो दरवाजा खुला हुआ था और हमारे दोनों साथी अभी भी सो रहे थे ! हमारे जाने की आहट सुनकर वो दोनों भी जाग गए और फिर हम चारों छत पर सुबह के नज़ारे देखने चल दिए ! आज मौसम साफ लग रहा था इसलिए दूर तक फैले सुंदर नज़ारे देखे जा सकते थे, वैसे ठंड भी खूब तेज लग रही थी ! ठंड के मारे पूरा शरीर कंपकपा रहा था, हालत ये थी कि जैकेट की जेब से हाथ बाहर निकालने का मन भी नहीं हो रहा था, कान बरफ जैसे ठंडे हो गए थे, और ठंड के कारण ऐसा लग रहा था कि पैरों में उंगलियाँ ही ना हो ! 

view from hotel
होटल की छत से सूर्योदय (A view of sunrise from our Hotel, Chakrata)

Monday, July 20, 2015

चकराता के जंगल में बिताई एक शाम (A Beautiful Evening in Chakrata)

शुक्रवार, 25 दिसंबर, 2009 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम गुड़गाँव से एक लंबी यात्रा करके चकराता पहुँचे ! अब आगे, वैसे हमने अपनी यात्रा शुरू करने से पहले इंटरनेट से चकराता में अपने रुकने के लिए होटल तो ढूँढे थे, पर इंटरनेट से ढूँढने पर चकराता में हमें गिनती के ही होटल मिले थे और उनमें से किसी में भी कोई कमरा खाली नहीं था ! काफ़ी माथापच्ची के बाद भी जब चकराता में रुकने के लिए कोई होटल नहीं मिला तो हमने सोचा कि कोई बात नहीं, हम चकराता पहुँच कर कोई होटल ढूँढ लेंगे, क्योंकि बहुत से ऐसे छोटे-बड़े होटल भी होते है जिनकी जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं होती ! इंटरनेट पर तो ज़्यादातर नामचीन होटल ही दिखाई देते है, या फिर ऐसे होटल जो पैसे खर्च करके अपनी वेबसाइट बनवाते है ! इसलिए चकराता पहुँचने के बाद हमारा सबसे पहला काम अपने लिए एक होटल ढूँढना था, ताकि थोड़ा आराम करने के बाद नहा- धोकर चकराता घूम सके ! 

hotel uttrayan
हमारे होटल का कमरा

Thursday, July 16, 2015

चकराता का एक यादगार सफ़र (A Memorable Trip to Chakrata)

वीरवार, 24 दिसंबर 2009 

दिसंबर 2009 की एक दोपहर थी, जब में अपने दफ़्तर में बैठा खाना खाने की तैयारी में था, दिन काफ़ी व्यस्त चल रहे थे, दफ़्तर के लिए सुबह 6 बजे घर से निकलकर रात को 10 बजे घर में वापसी होती थी, रोजाना इस दिनचर्या से परेशान हो चुका था ! उस दौरान अर्थव्यवस्था ठीक ना होने के कारण नौकरियों की भी खूब मारा मारी थी, इन दिनों मैं संविदा पर एक कंपनी के माध्यम से दिल्ली हवाई अड्डे पर कार्यरत था ! दोपहर का खाना खाने के लिए अभी बैग से निकाला ही था कि तभी मेरा फोन बजा, उठाकर देखा तो ये जयंत था, कुशल-क्षेम पूछने के बाद वो बोला, कहीं घूमने चलेगा क्या ? जब मैने जगह के बारे में पूछा तो वो बोला, जगह का अभी सोचा नहीं है पर अगर 3-4 दोस्त हो गए, तो जगह भी सोच लेंगे ! इस साल मार्च में शिर्डी से आने के बाद मेरी कोई यात्रा नहीं हुई थी, इसलिए अपने दोस्तों को बोल रखा था अगर किसी का कहीं घूमने जाने का विचार बने तो मुझे भी ज़रूर बताना, मौका मिला तो मैं भी साथ चल दूँगा ! 

meerut
गाड़ी का टायर बदलने के दौरान लिया एक चित्र (Somewhere in Meerut)

Monday, July 13, 2015

झीलों के शहर उदयपुर में आख़िरी शाम (One Day in Beautiful Jaismand Lake)

शनिवार, 31 दिसम्बर 2011

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आज उदयपुर में हमारा आख़िरी दिन था, शाम 7 बजे हमें दिल्ली जाने के लिए ट्रेन पकड़नी थी ! सुबह जब सोकर उठे तो चाय के दौरान हमारी माउंट आबू की यात्रा पर चर्चा होने लगी, शशांक की मौसी ने पूछा माउंट आबू में सब जगहें घूम लिए, हमने हाँ में सिर हिलाया ! फिर जब उन्होनें पूछा कि दिलवाड़ा मंदिर कैसा लगा, तो मैं और शशांक एक दूसरे को देखने लगे ! हमने उम्मीद नहीं की थी कि माउंट आबू से वापसी के बाद इस तरह के प्रश्न भी पूछे जाएँगे ! खैर, दिलवाड़ा मंदिर तो हम घूम कर ही नहीं आए थे इसलिए कह दिया वो तो हमने देखा ही नहीं ! बड़े अचरज से शशांक की मौसी ने कहा, जो सबसे बढ़िया जगह थी वो तुमने देखी ही नहीं तो तुमने क्या खाक माउंट आबू देखा? फिर इस बात पर चर्चा होने लगी कि जिस मंदिर को देखने के लिए लोग देश-विदेश से आते है, माउंट आबू जाकर तुम वो ही जगह नहीं घूम कर आए ! दिलवाड़ा मंदिर नहीं देखना था तो फिर तुम गए क्या करने थे माउंट आबू ! हमने जो-2 जगहें देखी थी सब गिनवा दी, इस पर वो बोली, जो सबसे ज़रूरी चीज़ थी वो ही तुम छोड़ आए और बोल रहे हो माउंट आबू घूम कर आए है !

jaismand lake
पीछे दिखाई देती जयसमंद झील (A glimpse of Jaismand Lake, Udaipur)

Thursday, July 9, 2015

वन्य जीव उद्यान में रोमांच से भरा एक दिन (A Day Full of Thrill in Wildlife Sanctuary)

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम उदयपुर से बस यात्रा करके माउंट आबू पहुँचे ! कल दिन भर हम गुरु शिखर, सनसेट पॉइंट और कुछ अन्य जगहें भी घूम चुके है ! अब आगे, जो बंदूक हमने माउंट आबू के माल रोड से खरीदी थी उसे लेकर वापिस होटल आ गए और निशाना लगाने का अभ्यास करने लगे ! रात को निशाना लगाते हुए कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला, सुबह सोकर उठे तो काफ़ी ठंड थी ! हमारे कमरे में खिड़की ना होने के कारण हमें तो पता भी नहीं चल रहा था कि बाहर मौसम के क्या हालात थे ! अपने बेड के सिरहाने स्टूल पर रखी घड़ी उठाकर समय देखा तो सुबह के 7 बजने वाले थे, आज तो ठंड के साथ-2 आलस भी अपने चरम पर थी, इसलिए बिस्तर से बाहर निकलने का मन ही नहीं हुआ ! फिर अचानक से जाने क्या हुआ कि हिम्मत करके बिस्तर से बाहर निकला और बाथरूम की ओर चल दिया ! मुँह धोने के लिए जैसे ही टूटी खोलकर पानी हाथ में लिया, मेरी हिम्मत जवाब दे गई, ऐसा लगा जैसे हाथ में पिघली हुई बरफ ले ली हो, वापस आकर फिर से बिस्तर में लेट गया !

way to nakki lake
नक्की झील जाते हुए (On the way to Nakki Lake)

Sunday, July 5, 2015

उदयपुर से माउंट आबू की बस यात्रा (Road Trip to Mount Abu)

वीरवार, 29 दिसंबर 2011

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यात्रा के पिछले लेख में आप सिटी पैलेस और उदयपुर का चिड़ियाघर देख चुके है अब आगे, उदयपुर भ्रमण के बाद अगले दिन घूमने के लिए हमें माउंट आबू जाना था, यहाँ जाने वाली बस की जानकारी हम पिछली शाम को ही ले आए थे ! उदयपुर से माउंट आबू के लिए सुबह हर आधे घंटे में बस चलती है, हम सुबह 7 बजे वाली बस से जाने वाले थे ताकि समय से माउंट आबू पहुँच सके ! सुबह समय से सोकर उठे और जल्दी से नित्य-क्रम से निबट कर अपने साथ ले जाने के लिए एक बैग तैयार किया ! हम माउंट आबू में एक रात रुकने वाले थे इसलिए साथ ले जाने का सामान थोड़ा ज़्यादा हो गया था, गरम कपड़े जो रख लिए थे ! इन दिनों भारतीय क्रिकेट टीम आस्ट्रेलिया दौरे पर थी, इसलिए सुबह 5 बजे मैच देखने के यहाँ घर के कुछ सदस्य उठ जाते थे, इन्होनें ही हमें उदयपुर बस स्टैंड तक छोड़ दिया ! बस स्टैंड पर पहुँचने के बाद हम दोनों एक स्थानीय अधिकारी से माउंट आबू जाने वाली बस के बारे में पूछकर वहीं एक पत्थर की सीट पर बैठ कर बस के डिपो से बाहर आने का इंतज़ार करने लगे !

mini nakki lake
छोटी नक्की झील (A view of Mini Nakki Lake, Mount Abu)

Wednesday, July 1, 2015

उदयपुर की शान - सिटी पैलैस (City Palace of Udaipur)

बुधवार, 28 दिसंबर 2011 

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यात्रा के पिछले लेख में मैं आपको पिछोला झील और रोपवे का भ्रमण करवा चुका हूँ अब आगे, रोपवे से वापस आने के बाद हम दोनों ऑटो में बैठ कर अपनी अगली मंज़िल की ओर चल दिए ! पूछने पर ऑटो वाले ने बताया कि वो हमें चिड़ियाघर लेकर जा रहा है ! मैने सोचा यार चिड़ियाघर तो हमने अपने दिल्ली में ही देख रखा है, फिर यहाँ चिड़ियाघर में जाकर क्यों समय बर्बाद करना, जितना समय हम चिड़ियाघर में बिताएँगे उतने समय में तो किसी नई जगह को घूम लेंगे ! इस पर शशांक बोला, अगर हम ऐसे ही अगर मना करते रहे तो ये तो अंत में कह देगा कि मैने 12 जगहें दिखाने को कहा था अब आपका मन ही नहीं है तो इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ! बात तो ये सही थी इसलिए मैं चुप ही रहा और हम दोनों ऑटो में बैठकर चिड़ियाघर के लिए चल दिए ! थोड़ी देर बाद हम दोनों चिड़ियाघर के मुख्य दरवाजे पर पहुँच गए, ऑटो से उतरकर हमने चिड़ियाघर में प्रवेश किया ! चिड़ियाघर की टिकट खिड़की पर पहुँचकर 10 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से हमने दो टिकट खरीदे और अंदर चले गए ! 

city palace
सिटी पैलेस के अंदर (Entrance of City Palace)

Sunday, June 28, 2015

पिछोला झील में नाव की सवारी (Boating in Lake Pichhola)

बुधवार, 28 दिसंबर, 2011

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यात्रा के पिछले लेख में आपने दिल्ली से उदयपुर तक की ट्रेन यात्रा के बारे में पढ़ा, अब आगे, स्टेशन से घर पहुँचने के बाद हम दोनों नित्य-क्रम से फारिक होने लगे ! जब तक हम नहा-धोकर तैयार हुए, हमारे लिए नाश्ते में पराठे और आमलेट तैयार हो चुका था ! नाश्ते की मेज पर हमें खाने के साथ-2 उदयपुर के बारे में काफ़ी महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी मिली ! अपनी योजना के मुताबिक मैने तो उदयपुर में घूमने के लिए जगहों की एक लंबी-चौड़ी सूची बना रखी थी ! इस जानकारी के मुताबिक आज हम लोग स्थानीय भ्रमण के लिए जाने वाले थे ! नाश्ता करने के बाद हमने अपने साथ ले जाने का ज़रूरी समान अपने बैग में रखा और आज के सफ़र के लिए निकल पड़े ! उदयपुर घूमने के लिए हम दोनों ने 500 रुपए में एक ऑटो कर लिया, जो हमें 12 जगहें दिखाने वाला था ! फिर भगवान का नाम लेकर हम दोनों ऑटो में बैठे और अपनी यात्रा की शुरुआत की ! पर ये क्या, अभी ब्मुश्किल 2 किलोमीटर ही चले होंगे कि ऑटो में कुछ तकनीकी खराबी आ गई ! 
pichhola lake
Boating in Lake Pichhola

Thursday, June 25, 2015

दिल्ली से उदयपुर की रेल यात्रा (A Train Trip to Udaipur)

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011

बात दिसम्बर 2011 के तीसरे सप्ताह की है जब मैं एक दिन शाम को अपना काम ख़त्म करके ऑफिस से घर निकलने की तैयारी में था ! सोचा कंप्यूटर बंद करने से पहले एक बार ईमेल चेक कर लूँ, जब इनबॉक्स खोला तो किसी ट्रैवल एजेन्सी की ओर से एक ईमेल आई हुई थी ! ईमेल पढ़ने पर पता चला कि एक ट्रैवल एजेन्सी ने अपनी ओर से भारत भ्रमण के लुभावने प्रस्ताव दे रखे थे ! सर्दियों के मौसम का पर्यटन पर बहुत बुरा असर पड़ता है और ट्रैवल एजेंसियों का तो लगभग सारा कारोबार ही चौपट हो जाता है ! गिनती के लोग ही इस मौसम में घूमना पसंद करते है इसलिए अपना खर्च निकालने के लिए ये एजेंसियाँ पर्यटकों को विभिन्न प्रकार के लुभावने प्रस्ताव देती है ! मैं तो अपनी यात्रा की तैयारी खुद ही करता हूँ वो अलग बात है कि ट्रेवल एजेंसियों की वेबसाइट पर जाकर किसी शहर में घूमने लायक जगहों की जानकारी ज़रूर ले लेता हूँ ! वैसे घूमने जाने का मन तो मेरा हमेशा ही रहता है पर इस समय किसी का साथ ना मिलने के कारण मन को शांत कर रखा था ! ईमेल पढ़ने के बाद तो घूमने जाने का कीड़ा मन में चुलबुलाने लगा, सोचा, कोई तो होगा जो इस समय मेरे साथ घूमने जाने के लिए हाँ कहेगा ! 

train to udaipur
ट्रेन में लिया एक चित्र (Train Journey Delhi to Udaipur)

Friday, June 19, 2015

मक्लॉडगंज से पालमपुर की बस यात्रा (A Road Trip to Palampur)

मंगलवार, 19 जुलाई 2011 

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आज सुबह आराम से सोकर उठे, आज हमारा यहाँ मक्लॉडगंज में आख़िरी दिन था इसलिए हमें कोई जल्दबाज़ी नहीं थी ! इस यात्रा में तो त्रिऊंड जाने का समय नहीं मिला, पर ये निश्चय कर लिया था कि अगली बार यहाँ आए तो त्रिऊंड की चढ़ाई ज़रूर करेंगे ! उठने के बाद नित्य-क्रम से निवृत हुए और नहाने से पहले अपना सारा समान अपने-2 बैग में रख लिया, इसी बीच होटल वाले से सुबह का नाश्ता तैयार करने को भी कह दिया ! पालमपुर की कुछ जानकारी तो हमें पहले से थी और कुछ जानकारी हमने होटल वाले से ले ली, फिर वापस आकर जब तक हम नहा-धोकर तैयार हुए, हमारा नाश्ता भी तैयार हो चुका था ! नाश्ता करने के बाद होटल वाले का सारा हिसाब-किताब कर दिया, और अपना बैग लेकर मोनेस्ट्री के पास से होते हुए मक्लॉडगंज के मुख्य चौराहे की ओर चल दिए ! यहाँ की यात्रा काफ़ी बढ़िया रही, पर त्रिऊंड और मोनेस्ट्री के अलावा कुछ और जगहें हम दोनों नहीं घूम पाए, जिसका हमें काफ़ी दिन तक मलाल रहा ! 
bus to palampur
रास्ते में किसी चौराहे पर लिया गया एक चित्र (A view from bus stop)

Tuesday, June 16, 2015

मक्लॉडगंज चर्च और धमर्शाला स्टेडियम (A Day in HPCA Stadium, Dharamshala)

सोमवार, 18 जुलाई 2011 

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रोज की तरह आज भी समय से सोकर उठे, आज 18 जुलाई है और मक्लॉडगंज में हमारा तीसरा दिन ! आज हम चर्च, और धर्मशाला स्टेडियम घूमने जाने वाले थे, त्रिऊंड जाने की इच्छा भी एक बार मन में हुई, पर जानकारी और समय के अभाव में इस बार त्रिऊंड जाना उचित नहीं समझा ! अगली बार अतिरिक्त समय लेकर धर्मशाला आएँगे और तब त्रिऊंड की चढ़ाई भी कर लेंगे ! नित्य-क्रम से फारिक होने के साथ ही सुबह का नाश्ता करने के बाद हम दोनों फिर से अपना बैग लेकर आज के सफ़र के लिए निकल पड़े ! मक्लॉडगंज के मुख्य चौराहे से होते हुए आज हम चर्च की तरफ चल दिए, मुख्य चौराहे से चर्च की दूरी लगभग 400 मीटर के आस पास होगी ! बीच में ही मक्लॉडगंज का बस अड्डा भी पड़ता है जहाँ से धर्मशाला और अन्य स्थानों पर जाने के लिए बसें और जीप मिलते है, टहलते-2 हम दोनों सुबह 9 बजे चर्च के मुख्य द्वार तक पहुँच गए ! हम दोनों ने मुख्य द्वार से चर्च के अंदर प्रवेश किया, इस समय चर्च के मुख्य भवन का दरवाजा बंद था ! 
john church
चर्च का प्रवेश द्वार (St. Johns Church Entrance, Mcleodganj)

Saturday, June 13, 2015

कांगड़ा घाटी में बिताए कुछ यादगार पल (Time Spent in Kangra Valley)

रविवार, 17 जुलाई 2011 

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यात्रा के पिछले लेख में आप भाग्सू नाग झरने पर घूम चुके है अब आगे, सुबह जब सोकर उठे तो सारी थकान दूर हो चुकी थी और मैं एकदम तरोताज़ा महसूस कर रहा था, मतलब आज की यात्रा के लिए मेरा शरीर बिल्कुल तैयार था ! वैसे आज हमारा विचार डल-झील होते हुए आगे नड्डी की ओर घूमने जाने का था, और ये सारा सफ़र हमें पैदल ही तय करना था ! बिस्तर से उठकर सबसे पहले नित्य-क्रम से फारिक होकर होटल वाले को नाश्ते के लिए बोल दिया, ताकि जब तक हम तैयार हो, हमारा भोजन भी तैयार हो जाए ! आधे घंटे बाद जब हम दोनों तैयार होकर होटल की छत पर पहुँचे जहाँ होटल का रसोई घर था, तो हमारा नाश्ता तैयार हो चुका था ! नाश्ते में हमने गोभी और प्याज़ के पराठे खाए और फिर वापस अपने कमरे में आ गए जोकि भूमितल पर था ! यहाँ आकर हमने अपने साथ आज की यात्रा पर ले जाने के लिए एक छोटा बैग तैयार किया, जिसमें कैमरा, पानी की बोतलें, और कुछ कपड़े रख लिए, ताकि रास्ते में कोई दिक्कत ना हो ! 
hotel in mcleodganj
होटल के कमरे का दृश्य (A view of our Hotel Room)

Tuesday, June 9, 2015

भाग्सू नाग झरने में मस्ती (Fun in Bhagsu Naag Waterfall)

शनिवार, 16 जुलाई 2011 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दिल्ली से ऊना होते हुए धर्मशाला पहुँचे ! रात को होटल ना मिलने के कारण हम बस अड्डे पर ही सो गए ! अब आगे, जब उजाला हुआ तो हम दोनों धर्मशाला से मक्लॉडगंज जाने वाले मार्ग पर आकर खड़े हो गए, यहाँ एक स्थानीय युवक से पूछने पर पता चला कि यहीं से मक्लॉडगंज जाने के लिए नियमित अंतराल पर बसें मिलती है ! एक विचार तो यहाँ धर्मशाला में ही होटल लेने का बना, पर उस युवक ने ही हमें बताया कि यहाँ कमरा लेने का कोई फ़ायदा नहीं है क्योंकि घूमने की ज़्यादातर जगहें उपर मक्लॉडगंज में ही है ! हमने भी सोचा कि जब सारी जगहें उपर ही है तो यहाँ कमरा लेने का तो कोई मतलब ही नहीं बनता, एक दिन समय निकालकर आएँगे और यहाँ नीचे धर्मशाला भी घूम जाएँगे ! सात बजे के आस-पास हमें इस मार्ग पर एक बस आती दिखाई दी, जब वो पास आकर रुकी तो पता चला कि यही बस मक्लॉडगंज जाएगी ! 
hotel in mcleodganj
होटल के कमरे का दृश्य (A view from our Hotel Room)