Thursday, August 27, 2015

हिमालयन वाटर फाल - एक अनछुआ झरना (Untouched Himachal – Himalyan Water Fall)

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

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यात्रा के पिछले लेख में मैने आपको मक्लॉडगंज का स्थानीय भ्रमण करवाया, अब आगे, सुबह समय से सोकर उठे, अपनी इस ग्रीष्मकालीन यात्रा के दौरान आज हमारा 7वाँ दिन था ! अब तक हम भाग्सू नाग झरने पर तो 2 बार जा चुके थे, पर मक्लोडगंज में भाग्सू नाग ही अकेला झरना नहीं है, एक और झरने के बारे में हमें त्रिउंड की ट्रेकिंग के दौरान पता चला 
था ! जब हम त्रिउंड जा रहे थे तो हमने गालू मंदिर के पास एक बोर्ड पर हिमालयन वॉटर फॉल के बारे में पढ़ा था ! स्थानीय लोगों से पूछताछ के बाद हमें पता चला कि गालू मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर एक प्राकृतिक झरना है ! स्थानीय लोगों ने हमें ये भी बताया कि दुर्गम मार्ग होने के कारण बहुत कम लोग ही इस झरने तक जा पाते है और इसलिए इस झरने के आस-पास भीड़-भाड़ और गंदगी भी कम है ! झरने तक जाने के लिए इतनी जानकारी हमारे लिए पर्याप्त थी, जानकारी मिलने के साथ ही हम लोगों के मन में इस झरने को देखने की इच्छा प्रबल हो गई थी ! पर क्योंकि उस दिन तो हम त्रिउंड जा रहे थे इसलिए हमने सोचा कि हिमालयन वॉटर फॉल किसी और दिन आएँगे ! 
galu temple
गालू मंदिर के पास लिया एक चित्र (A view from Galu Temple, Mcleodganj)

त्रिउंड से वापस आने के बाद एक दिन आराम करके आज हम इस झरने को देखने जाने वाले थे !हिमालयन वॉटर फॉल जाने के लिए हम लोग नहा-धोकर तैयार हुए और सुबह 8 बजे अपने होटल से निकल लिए ! आज हम उसी रास्ते से जा रहे थे जिस रास्ते से हम त्रिउंड से वापसी के दौरान आए थे ! सुबह होटल से ये सोच कर निकले कि इस वॉटर फॉल में भी जी भरकर नहाएँगे ! नहाकर पहनने के लिए हमने अतरिक्त कपड़े तो अपने साथ रख लिए थे, पर भीगने के डर से आज मैंने जूते नहीं पहने थे और बाद में मुझे ये ग़लती बहुत भारी पड़ी ! अक्सर भाग्सू नाग झरने पर तो मैं स्लीपर पहन कर ही चला जाता था क्योंकि ये हमारे होटल से ज़्यादा दूर नहीं था और यहाँ जाने के लिए रास्ता भी इतना दुर्गम नहीं था कि स्लीपर पहन कर ना जाया जा सके ! पर हिमालयन वॉटर फॉल हमारे होटल से काफ़ी दूर था, और यहाँ आने का रास्ता भी दुर्गम था, ये बात होटल से निकलते वक़्त मेरे मन में एक बार भी नहीं आई ! मैं ठहरा बेवकूफ़ इंसान, जिस दिन सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी उसी दिन दिमाग़ से काम नहीं लिया ! 

मन में हिमालयन वॉटर फॉल देखने की इच्छा इतनी प्रबल थी कि ये भी नहीं सोचा कि पहाड़ों पर चढ़ाई के लिए जा रहा हूँ और वो भी चप्पल पहन कर ! होटल से चले तो सबकुछ ठीक था, पर आधे रास्ते में ही मेरी चप्पल ने धोखा दे दिया जिसका ज़िक्र मैं इस लेख में आगे करूँगा ! होटल से निकल कर जैसे ही हम सब मक्लोडगंज के मुख्य चौहारे से थोड़ा आगे बढ़े, इन्द्र देवता एक बार फिर से हम पर मेहरबान हो गए ! 
आज तो हम जंगल के बीच में ही थे जब बारिश शुरू हुई, आस-पास कहीं कोई छुपने की जगह भी नहीं दिखाई दी, फिर क्या था फटाफट सारा भीगने वाला सामान (पर्स, मोबाइल, घड़ी और कैमरा) एक पोलिथीन में करके बैग में रखा और तेज़ी से चलने लगे ! जब भी मैं कभी ऐसी जगहों पर घूमने जाता हूँ तो पोलिथीन तो हमेशा ही अपने बैग में रखता हूँ ताकि ज़रूरत के समय भीगने वाला सामान इसमें रखा जा सके ! हमारी किस्मत भी देखिए, जिस दिन भी कहीं दूर घूमने जाने की योजना बनाई, उसी दिन इन्द्र देवता हम पर इतने मेहरबान हुए कि बारिश ही कर दी ! 

फिर चाहे त्रिऊंड की चढ़ाई हो या हिमालयन वॉटर फाल ! कल जब मोनेस्ट्री और मक्लोडगंज में घूम रहे थे तब बारिश नहीं हुई और आज जब हिमालयन वॉटर फॉल जाने की बारी आई तो इतनी तेज बारिश ! हो सकता है यहाँ उँचाई पर रोज ही बारिश हो रही हो, मन में यही बातें चल रही थी और हम बारिश से बचने के लिए कोई छत ढूँढने में लगे थे ! छत ढूँढते-2 हम सब भीग चुके थे, जब कोई छत नहीं मिली तो वहीं एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए, पेड़ घना था इसलिए इसके नीचे बारिश की बूंदे नहीं आ रही थी ! थोड़ी देर बाद जब बारिश धीमे हुई तो हम लोग आगे बढ़े, वैसे तो आज की बारिश ज़्यादा देर नहीं हुई पर किसी को भिगो देने के लिए ये बारिश काफ़ी थी ! थोड़ा सा आगे बढ़ने पर हम सब धर्मकोट पहुँच गए, आज हम दुकान में खाने-पीने के लिए नहीं रुके ! बारिश रुकने के बाद मौसम काफ़ी साफ हो गया था इसकी पुष्टि गालू मंदिर पहुँच कर हुई, जब घाटी में दूर तक ना नज़ारा एकदम साफ दिखाई देने लगा ! गालू मंदिर जाने के लिए आज हम सड़क मार्ग से आए थे, बारिश की वजह से जंगल वाला मार्ग फिसलन भरा होगा इसलिए उस मार्ग पर जाना उचित नहीं समझा ! 

अपनी ठंड दूर करने के लिए गालू मंदिर के पास हमने एक दुकान में बैठ कर चाय पी और आमलेट खाए !फिर दुकान से बाहर आकर चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो दूर-दूर तक हरी-भरी पहाड़ियाँ दिखाई दे रही थी ! मौसम इतना साफ हो गया कि आज तो त्रिउंड की पहाड़ी भी बिल्कुल साफ नज़र आ रही थी ! वैसे आज हमें गालू मंदिर आते हुए ज़्यादा लोग नहीं मिले थे, गालू मंदिर के पास दुकान पर 2 लोग ज़रूर मिले थे जो त्रिऊंड जा रहे थे ! चाय-नाश्ता करने के बाद जैसे ही हम लोग गालू मंदिर से थोड़ा आगे बढ़े, मेरी चप्पल ने जवाब दे दिया ! अब रास्ते में कोई दुकान भी नहीं थी जहाँ से मैं नया चप्पल ले लेता या पुराने की ही मरम्मत करवा लेता ! जंगल में नंगे पैर चलना भी ख़तरे से खाली नहीं था, एक तो पथरीला रास्ता और दूसरा जंगली कीड़े-बिच्छुओं का डर ! पथरीले रास्ते पर नंगे पैर चलने से पैरों की क्या दुर्गति होती ये मैं अच्छी तरह से जानता हूँ ! वापिस मक्लोडगंज जाकर चप्पल ठीक करवाने की हिम्मत नहीं थी, इसलिए जैसे-तैसे कर के खुद ही इसकी मरम्मत की और आगे बढ़े !

मेरा सुझाव है कि अगर आप पहाड़ों पर कहीं घुमक्कडी के लिए जा रहे है तो अपने साथ स्पोर्ट्स शूज ज़रूर रखें ! पहाड़ों पर चढ़ाई के दौरान रास्तों पर इनकी पकड़ अच्छी बनती है, और फिसलन का डर भी कम रहता है ! चमड़े के जूते या स्लीपर पहन कर कभी भी पहाड़ों पर चढ़ाई ना ही करे तो अच्छा है ! मैं जानता हूँ कि आप में से बहुत से लोग ऐसे भी होंगे जिन्होंने चमड़े के जूते या चप्पल पहन कर कई पहाड़ लाँघे होंगे और सकुशल वापस भी आ गए होंगे ! पर अनहोनी कभी भी बोल कर सामने नहीं आती, इसलिए अपनी तरफ से ही सावधानी बरतनी चाहिए ! खैर छोड़िए, बहुत ज्ञान बाँट लिया अब आपको वापस अपने सफ़र पर लेकर चलता हूँ ! गालू मंदिर से थोड़ा आगे बढ़ने पर रास्ते में एक जगह से देखने पर नीचे पहाड़ की तलहटी में बसे गाँव और गाँव के उस पार नड्डी का नज़ारा भी दिखाई दे रहा था ! नड्डी जाने के दो रास्ते है एक तो डल-झील होकर जाता है जिससे हम पिछले साल गए थे और एक रास्ता यहाँ गालू मंदिर के पास से है !

इस बार हम समय की कमी के कारण नड्डी नहीं जा पाए, वरना खूबसूरती तो वहाँ भी खूब बिखरी हुई है ! 
इस मार्ग पर चलते हुए रास्ते में हमें एक दुकान मिली, दुकान क्या थी तंबू के अंदर ही खाने-पीने का सामान रखा था और तंबू भी इस समय बंद कर रखा था ! तंबू के अंदर से गाने बजने की आवाज़ आ रही थी, इसलिए हमने सोचा इस दुकानदार से झरने की ओर जाने का रास्ता पूछ लेते है ! तंबू के पास जाकर आवाज़ लगाई तो कोई नहीं बोला, हमें लगा कि शायद दुकानदार अंदर आराम कर रहा होगा ! जब तंबू के किनारे से झाँक कर अंदर देखा तो अंदर कोई नहीं था और रेडियो चालू कर के छोड़ रखा था ! मेरा अनुमान है कि अक्सर दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर जहाँ लोगों का आना-जाना बहुत कम होता है, स्थानीय दुकानदार अपनी दुकानों को ऐसे ही बंद करके चले जाते है ! जंगली जानवर उनकी दुकान को नुकसान ना पहुँचाए इसके लिए रेडियो या आवाज़ करने वाले कोई अन्य उपकरण चला कर रख देते है !

इसके वन्य प्राणी इस भ्रम में रहते है कि दुकान में कोई है और ये जीव दुकान के आस-पास नहीं फटकते ! सोचिए, आदमी अपनी और अपने समान की सुरक्षा के लिए क्या-2 दिमाग़ लगाता है ! जब उस तंबू में हमें कोई नहीं मिला तो वहीं दुकान के सामने पत्थरों पर बैठ गए ! थोड़ी देर आराम करने के बाद हम उसी पगडंडी का अनुसरण करते हुए आगे बढ़े जिस पगडंडी पर चलकर हम यहाँ तक आए थे ! हमारी किस्मत अच्छी थी क्योंकि थोड़ा सा आगे बढ़ने पर ही वो रास्ता दो भागों मे विभाजित हो रहा था जिसमें से एक रास्ता तो नीचे जा रहा था और दूसरा रास्ता जिस पर पेंट से दिशा-सूचक के साथ हिमालयन वॉटर फॉल लिखा हुआ था वो उपर की ओर जा रहा था ! भला हो इस दुर्गम मार्ग पर दिशा निर्देश लगाने वालों का, हम झरने की ओर जाने वाले रास्ते पर आगे बढ़ गए ! झरने की ओर जाने वाला रास्ता आगे जाकर एक घने जंगल में मिल रहा था और जंगल में घुसने के बाद तो पता भी नहीं चल रहा था कि जाना किस तरफ है !

अकेले इस झरने पर जाना बहुत मुश्किल होगा, एक तो सुनसान रास्ता और दूसरा घना जंगल, वैसे इस मार्ग पर यात्रा करना भी बहुत रोमांचकारी रहा ! किस्मत का दामन थामे हुए और भगवान का नाम लेते हुए हम सब आगे बढ़ते रहे ! यहाँ फिर से रास्ता दो भागों में बँट रहा था और इस बार तो कोई दिशा-सूचक भी नहीं मिला ! अक्कड़-बक्कड़ करके एक मार्ग पर आगे बढ़े, फिर जब थोड़ी दूर जाने के बाद आगे हमें कोई रास्ता नहीं मिला तो वापस उसी जगह आ गए और इस बार दूसरी दिशा में चल दिए ! इस बार हमारी मेहनत रंग लाई और हमें एक रास्ता आगे जाता हुआ दिखाई दिया ! वैसे इस रास्ते को लेकर हम विश्वस्त तो नहीं थे पर हमारे पास इस मार्ग पर जाने और वापस लौटने के अलावा तीसरा कोई विकल्प नहीं था, हमने आगे बढ़ना ही उचित समझा ! आगे बढ़ने पर जब रास्ते में हमें फिर से पत्थरों पर हिमालयन वॉटर फॉल के साथ दिशा-सूचक चिन्ह दिखाई दिए तो थोड़ा उम्मीद बँधी, दिशा-सूचकों का अनुसरण करते हुए हम सब झरने की ओर बढ़े जा रहे थे !

एक जगह तो भू-स्खलन के कारण सरक कर नीचे रास्ते में गिरे बड़े-2 पत्थरों ने पूरा रास्ता घेर लिया, भू-स्खलन वाले मार्ग को हमने बहुत सावधानी से पार किया, क्योंकि पैर रखने से पत्थर सरक कर नीचे गिर रहे थे ! 
यहाँ से आगे बढ़ने पर हम लोग कई उँचे-नीचे रास्तों से होते हुए जब एक पहाड़ी के पास पहुँचे तो हमें पानी के गिरने की आवाज़ सुनाई दी ! अक्सर पहाड़ों पर जब पानी उँचाई से पत्थरों पर गिरता है तो बहुत तेज़ गर्जना उत्पन्न करता है, पानी की आवाज़ सुनकर हमें अंदेशा हो गया कि झरना कहीं आस-पास ही है ! पर पहाड़ी पर आवाज़ गूँजती भी है, इसलिए कभी-2 अंदाज़ा लगाना थोड़ा मुश्किल भी हो जाता है ! फिर थोड़ा और आगे बढ़ने पर हमें पानी का कुंड दिखाई देने लगा, दूर से देखने पर तो ये कुंड बहुत छोटा लग रहा था, ये कुंड झरने के पानी से ही बना था ! आवाज़ से लग रहा था कि झरना भी कहीं आस-पास ही है पर अभी तक हमें ये दिखाई नहीं दिया था !

कुंड देखने के बाद हम पानी की आवाज़ सुनकर उसी दिशा में आगे बढ़ने लगे जहाँ से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी ! झरने तक पहुँचने के लिए हमें उस पहाड़ी से नीचे उतरना था जिसपर हम चल कर यहाँ तक पहुँचे थे और इस पहाड़ी से उतरना बहुत मुश्किल काम था ! मुश्किल इसलिए क्योंकि रास्ता बहुत संकरा और फिसलन भरा था, हम लोग बहुत संभल कर आगे बढ़ रहे थे कि तभी अचानक मेरा पैर फिसला और मैं नीचे गिरने को हुआ ! लेकिन इसी बीच शशांक ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे संभाल लिया वरना उस दिन तो मेरा काम तमाम था ! जान अगर ना भी जाती तो एक-दो हड्डियों का टूटना तो तय था, मेरे हाथ-पैर टूटने का पक्का इंतज़ाम हो गया था ! दरअसल, उस सँकरे रास्ते में पानी गिरने की वजह से काई जमा हो गई थी और फिर मैने चप्पल पहन रखे थे, जिस वजह से मेरे पैरों की पकड़ नहीं बन पाई ! एक वजह ये भी थी कि हम लोग उस संकरे रास्ते को पहचानने में थोड़ी सी भूल कर बैठे ! ये जगह हमारे अंदाज़े से भी ज़्यादा फिसलन भरी थी, इस वजह से मैं गिरा था !

मुझे उपर खींचने के बाद हम सब उस संकरे रास्ते को छोड़कर नीचे जाने के लिए किसी दूसरे रास्ते की तलाश में जुट गए ! 
थोड़ी देर की मेहनत के बाद हमें दूसरा रास्ता मिल गया, ये रास्ता झाड़ियों की वजह से पहले हमें दिखाई नहीं दिया था, या फिर यूँ कह लीजिए कि झरने के इतने करीब पहुँचने के बाद हम लोगों की उत्सुकता इतनी बढ़ गई थी कि हमने इस मार्ग को नहीं देखा ! ये एक सबक भी है कि कभी भी किसी सुंदर जगह को देख कर अपना धैर्य मत खोइए ! बल्कि अपने दिमाग़ को शांत रखकर पूरी सावधानी के साथ अगला कदम बढ़ाइए ! इस नए रास्ते से हम नीचे उतरे और पानी तक पहुँच गए, सामने ही झरना भी था ! वैसे, झरना हमारी सोच से तो छोटा था पर नीचे पानी का कुंड ठीक-ठाक गहरा था, इसमें आराम से नहाया जा सकता था, पानी का बहाव भी काफ़ी तेज था, भाग्सू नाग झरने से भी तेज ! ये झरना तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरा हुआ था, चौथी तरफ पानी बह कर जा रहा था, यहाँ खड़े होने पर ना तो आप किसी को देख सकते थे और ना ही सहायता के लिए किसी को पुकार सकते थे !

पानी की गर्जना ही इतनी तेज थी कि आवाज़ दब कर रह जा रही थी, आस-पास के हालात देख कर अनुमान लगाना मुश्किल नहीं था कि यहाँ गिनती के लोग ही आते होंगे ! झरना हमारी उम्मीद के मुताबिक तो नहीं था पर फिर भी इतनी दूर चलकर इस झरने के लिए आए थे इसलिए नहाना तो बनता ही था ! थोड़ी देर तक आस-पास का निरीक्षण करने के बाद हमें अनुमान हो गया कि किस कुंड में नहाया जा सकता है, दरअसल वहाँ दो कुंड बन रहे थे एक कुंड तो वहीं था जहाँ हम खड़े थे और दूसरा कुंड थोड़ा आगे बंद रहा था ! जहाँ हम खड़े थे वहाँ से दूसरे कुंड की गहराई लगभग 20 फीट नीचे थी, और पानी का बहाव इतना तेज था की पहले कुंड में नहाने के दौरान तेज धारा किसी को बहा कर दूसरे कुंड में धकेल सकती थी ! मतलब ये कि अगर उपर वाले कुंड से नीचे गिरे तो सीधे नीचे वाले कुंड में पहुँचोगे जो काफ़ी लंबा-चौड़ा था और उसकी गहराई भी अधिक थी ! 

नीचे वाले कुंड में कोई ना गिरे इसलिए हमने उपर वाले कुंड के निकास के पास बड़े-2 पत्थरों और वहीं पास में पड़े टूटे हुए पेड़ को खिसका कर लगा दिया ताकि पानी के बहाव से कोई नीचे ना गिर जाए ! फिर हम लोग बड़ी सावधानी से कुंड में उतरे, झरने का पानी इतना ठंडा था कि एक मिनट से कम समय में ही पूरे शरीर में कंपकपी दौड़ गई ! वैसे ठंड भी शुरुआत में ही लगती है, एक बार हम पानी में घुसे तो थोड़ी देर बाद शरीर ने अपने आपको पानी के अनुरूप ढाल लिया ! पानी में रहते हुए अब हमें ज़्यादा ठंड नहीं लग रही थी, एक घंटे तक हम लोग पानी में ही नहाने का आनंद लेते रहे ! फिर पानी से बाहर आकर एक पत्थर पर बैठ गए, थोड़ी देर में हवा चलने के कारण फिर से ठंड लगने लगी ! हमने जल्दी से अपने कपड़े बदले और फिर वहीं एक पत्थर पर बैठ कर आस-पास के नज़ारों को देखने लगे ! आसमान एकदम साफ दिखाई दे रहा था, एक भी बादल नहीं, काफ़ी देर तक ऐसे ही पत्थर पर लेट कर आसमान की ओर देखते रहे ! 

जब यहाँ काफ़ी समय बिता लिया और फोटो भी बहुत खींच लिए तो लगभग 2:30 बजे वापसी की राह पकड़ी ! बेशक, झरना तो कुछ ख़ास नहीं था पर झरने तक पहुँचने के रास्ते और वहाँ पहुँच कर पानी में स्नान करके हमारे मन को संतुष्टि हो गई थी ! वापिस आते हुए भी हम रास्ते में कई जगह रुके और बहुत सारी फोटो खींची, अगले एक घंटे में हम सब गालू-मंदिर पहुँच गए ! यहाँ से थोड़ा आगे निकल कर एक जगह से बहुत सुंदर नज़ारे दिखाई दे रहे थे तो हम लोग थोड़ी देर के लिए वहाँ भी रुक गए ! यहाँ हमें एक गाड़ी भी दिखाई दी, शायद गाड़ी वाला किसी पर्यटक को गालू-मंदिर छोड़ने आया था ! यहाँ से आगे बढ़े तो हमें एक स्थानीय लोगों का ग्रुप मिला जो नशा करने में व्यस्त थे, हमने उन्हें अनदेखा कर दिया और आगे मक्लॉडगंज की ओर बढ़ गए ! रास्ते में बहुत से मोड़ और घने जंगल से होते हुए हम सवा पाँच बजे मक्लॉडगंज पहुँचे ! थोड़ी देर मक्लॉडगंज के बाज़ार में घूमने के बाद हम सब अपने होटल चले गए ! 

यहाँ हमने रात का खाना खाया और फिर से वापस मक्लोडगंज के बाज़ार में आइसक्रीम खाने के लिए आ गए ! आइस्क्रीम खाने के बाद हम सब थोड़ी देर तक तो वहीं चौराहे के पास लोहे की बेंच पर बैठे रहे, इस यात्रा पर अब तक का सफ़र शानदार बीता था, हर दिन कुछ नया देखने और सीखने को मिल रहा था ! जब रात होने लगी तो हम आराम करने के लिए वापिस अपने होटल चले गए !

galu temple
On the way to Himalyan Waterfall, Mcleodganj
himalyan water fall
झरने की ओर जाने का मार्ग दिखता एक बोर्ड
valley galu temple
दूर दिखाई देता पहाड़ी पर बसा एक गाँव (Another view from Galu Temple)
view from galu temple
A beautiful view of Valley, Mcleodganj
shop in galu temple

way to himalyan water fall
हिमालयन वॉटर फॉल जाने का मार्ग
forest galu temple
हिमालयन वॉटर फॉल जाने का मार्ग
forest in galu temple
जंगल में से गुज़रते हुए विपुल (Into the wild)
trek to himalyan waterfall


view enroute
दूर दिखाई देती एक पहाड़ी
way to himalyan waterfall
रास्ते में दिखाई देता घाटी का एक नज़ारा
trek to himalyan waterfall
पहाड़ी से सरक कर आए पत्थर (Land slide on the way to Himalyan Waterfall)
trek to himalyan waterfall
झरने तक जाने का ऊबड़-खाबड़ रास्ता
way to himalyan waterfall


view from himalyan waterfall
झरने तक जाने का ऊबड़-खाबड़ रास्ता
route himalyan waterfall


himalyan waterfall
झरने के नीचे बना एक कुंड (Himalyan Waterfall)
पीछे दिखाई देता झरना
himalyan waterfall
इन पेड़ों को डालकर हमने पानी का बहाव रोका
in himalyan waterfall


near himalyan waterfall


झरना घाटी में काफ़ी नीचे था
back from himalyan waterfall
वापसी में दिखाई देता एक खूबसूरत नज़ारा
view from galu temple



galu temple
गालू मंदिर (Galu Temple, Mcleodganj)
view from galu temple
Beautiful view of Valley
galu temple to mcleodganj
गालू मंदिर से धर्मकोट आते हुए
गालू मंदिर से धर्मकोट आते हुए
way to mcleodganj


mcleodganj market
मक्लॉडगंज बाज़ार में हितेश और विपुल
mcleodganj market


mcleodganj market



क्यों जाएँ (Why to go Dharmshala): अगर आप दिल्ली की गर्मी और भीड़-भाड़ से दूर सुकून के कुछ पल पहाड़ों पर बिताना चाहते है तो आप धर्मशाला-मक्लॉडगंज का रुख़ कर सकते है ! यहाँ घूमने के लिए भी कई जगहें है, जिसमें झरने, किले, चर्च, स्टेडियम, और पहाड़ शामिल है ! ट्रेकिंग के शौकीन लोगों के लिए कुछ बढ़िया ट्रेक भी है !

कब जाएँ (Best time to go Dharmshala): वैसे तो आप साल के किसी भी महीने में घूमने के लिए धर्मशाला जा सकते है लेकिन झरनों में नहाना हो तो बारिश से बढ़िया कोई मौसम हो ही नहीं सकता ! वैसे अगर बर्फ देखने का मन हो तो आप यहाँ दिसंबर-जनवरी में आइए, धर्मशाला से 10 किलोमीटर ऊपर मक्लॉडगंज में आपको बढ़िया बर्फ मिल जाएगी !

कैसे जाएँ (How to reach Dharmshala): दिल्ली से धर्मशाला की दूरी लगभग 478 किलोमीटर है ! यहाँ जाने का सबसे बढ़िया साधन रेल मार्ग है दिल्ली से पठानकोट तक ट्रेन से जाइए, जम्मू जाने वाली हर ट्रेन पठानकोट होकर ही जाती है ! पठानकोट से धर्मशाला की दूरी महज 90 किलोमीटर है जिसे आप बस या टैक्सी से तय कर सकते है, इस सफ़र में आपके ढाई से तीन घंटे लगेंगे ! अगर आप सड़क मार्ग से जाना चाहे तो दिल्ली से धर्मशाला के लिए हिमाचल टूरिज़्म की वोल्वो और हिमाचल परिवहन की सामान्य बसें भी चलती है ! आप निजी गाड़ी से भी धर्मशाला जा सकते है जिसमें आपको दिल्ली से धर्मशाला पहुँचने में 9-10 घंटे का समय लगेगा ! इसके अलावा पठानकोट से बैजनाथ तक टॉय ट्रेन भी चलती है जिसमें सफ़र करते हुए धौलाधार की पहाड़ियों का विहंगम दृश्य दिखाई देता है ! टॉय ट्रेन से पठानकोट से कांगड़ा तक का सफ़र तय करने में आपको साढ़े चार घंटे का समय लगेगा !

कहाँ रुके (Where to stay in Dharmshala): धर्मशाला में रुकने के लिए बहुत होटल है लेकिन अगर आप धर्मशाला जा रहे है तो बेहतर रहेगा आप धर्मशाला से 10 किलोमीटर ऊपर मक्लॉडगंज में रुके ! घूमने-फिरने की अधिकतर जगहें मक्लॉडगंज में ही है धर्मशाला में क्रिकेट स्टेडियम और कांगड़ा का किला है जिसे आप वापसी में भी देख सकते हो ! मक्लॉडगंज में भी रुकने और खाने-पीने के बहुत विकल्प है, आपको अपने बजट के अनुसार 700 रुपए से शुरू होकर 3000 रुपए तक के होटल मिल जाएँगे !

क्या देखें (Places to see in Dharmshala): धर्मशाला में देखने के लिए वैसे तो बहुत जगहें है लेकिन अधिकतर जगहें ऊपरी धर्मशाला (Upper Dharmshala) यानि मक्लॉडगंज में है यहाँ के मुख्य आकर्षण भाग्सू नाग मंदिर और झरना, गालू मंदिर, हिमालयन वॉटर फाल, त्रिऊँड ट्रेक, नड्डी, डल झील, सेंट जोन्स चर्च, मोनेस्ट्री और माल रोड है ! जबकि निचले धर्मशाला (Lower Dharmshala) में क्रिकेट स्टेडियम (HPCA Stadium), कांगड़ा का किला (Kangra Fort), और वॉर मेमोरियल है !


अगले भाग में जारी...

डलहौजी - धर्मशाला यात्रा
  1. दिल्ली से डलहौजी की रेल यात्रा (A Train Trip to Dalhousie)
  2. पंज-पुला की बारिश में एक शाम (An Evening in Panch Pula)
  3. खजियार – देश में विदेश का एहसास (Natural Beauty of Khajjar)
  4. कालाटोप के जंगलों में दोस्तों संग बिताया एक दिन ( A Walk in Kalatop Wildlife Sanctuary)
  5. डलहौज़ी से धर्मशाला की बस यात्रा (A Road Trip to Dharmshala)
  6. दोस्तों संग त्रिउंड में बिताया एक दिन (An Awesome Trek to Triund)
  7. मोनेस्ट्री में बिताए सुकून के कुछ पल (A Day in Mcleodganj Monastery)
  8. हिमालयन वाटर फाल - एक अनछुआ झरना (Untouched Himachal – Himalyan Water Fall)
  9. पठानकोट से दिल्ली की रेल यात्रा (A Journey from Pathankot to Delhi)

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