जोधपुर का उम्मेद भवन (Umaid Bhawan Palace, Jodhpur)

रविवार, 24 दिसंबर 2017

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जोधपुर यात्रा के पिछले लेख में आपने जसवंत थड़ा के बारे में पढ़ा, दिनभर घूमने के बाद रात को अपने होटल की छत पर बंगाली परिवार से बातचीत के बाद हम अपने कमरे में सोने आ गए ! अब आगे, कल दिनभर की थकान के कारण रात को बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई, रात को थोडा ठंडा मौसम होने के बावजूद बढ़िया नींद आई और सुबह समय से सोकर उठे ! आज घूमने वाली सारी जगहें शहर से थोडा दूर थी इसलिए हमारा विचार सबसे पहले किराए पर एक मोटरसाइकिल लेने का था ताकि सुगम यात्रा सुनिश्चित कर सके ! सुबह ये समय यहाँ भी ठंडा मौसम था, लेकिन दिन में यहाँ तापमान सामान्य था ! बिस्तर से उठने के बाद हम बारी-2 से समय से नहा-धोकर तैयार हो गए और अपने बैग में खाने-पीने का कुछ सामान लेकर पैदल ही स्टेशन की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! मैंने कल स्टेशन से होटल जाते हुए किराये पर मिलने वाली मोटरसाइकिल की दुकान देखी थी ! हमने सोच लिया था कि अगर किराए पर बाइक मिली तो ठीक वरना ऑटो से ही घूम लेंगे ! रास्ते में एक-दो दुकानों से किराए पर मिलने वाली बाइकों से सम्बंधित जानकारी भी लेनी चाही, लेकिन इस बाबत किसी से कोई सहायता नहीं मिली ! आखिरकार हम स्टेशन वाली रोड पर पहुँच गए, स्टेशन से करीब 200 मीटर पहले हमें अपनी बाईं ओर किराए पर बाइक का एक विज्ञापन दिखाई दिया !

उम्मेद भवन पैलेस का एक दृश्य

दुकान में जाकर हमने किराए पर मिलने वाले दुपहिया की बात की तो पता चला कि स्कूटी के लिए हमें प्रतिदिन 500 रूपए और मोटरसाइकिल के लिए 700 रूपए खर्च करने होंगे ! बाइक हो या स्कूटी, पेट्रोल तो हमें अलग से ही डलवाना पड़ेगा, मुझे ये सौदा थोडा महंगा लग रहा था, लेकिन थोडा मोलभाव की तो स्कूटी का सौदा 300 रूपए में तय हो गया ! हेलमेट हमें एक ही मिला था, वो भी खानापूर्ति के लिए लग रहा था, ये ढंग से बाँधा भी नहीं जा रहा था, लेकिन फिर भी जैसे-तैसे करके इसे सिर पर फंसा ही दिया ! कुछ कागजी कार्यवाही पूरी करने और अपनी एक आईडी जमा करवाने के बाद जैसे ही हम स्कूटी लेकर यहाँ से चले, रेलवे स्टेशन पार करते ही सामने एक पेट्रोल पम्प दिखाई दिया ! 200 रूपए का पेट्रोल डलवाकर हम आगे बढे, मेरा अनुमान था कि आज हमें कुल 30-35 किलोमीटर की यात्रा करनी थी, जिसके लिए इतना पेट्रोल बहुत था ! यहाँ से चलने के बाद हमें सबसे पहले उम्मेद भवन पैलेस देखने जाना था, गूगल मैप हमने पेट्रोल पम्प पर ही चालू कर लिया और इसके सहारे ही हम एक अंडरपास से होते हुए उम्मेद भवन पैलेस की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! एक रिहायशी इलाके से होते हुए हम शहर से बाहर जाने वाले मार्ग पर पहुँच गए ! वैसे तो ये रेलवे स्टेशन से इस पैलेस की दूरी मात्र 4 किलोमीटर है, लेकिन गूगल भी कभी-2 भटक जाता है, बेकार ही हमें 8-9 किलोमीटर का चक्कर लगवा दिया !

मैप पर भरोसा करके ही हम शहर से बाहर निकल गए, वैसे इस समय हम जहाँ थे वहां से भी उम्मेद भवन दिखाई दे रहा था, लेकिन हमें अंदाजा हो गया था कि हम इस भवन के पास जाने के बजाय इससे दूर जा रहे है ! सड़क के किनारे रूककर एक दुकानदार से पूछा तो उसने इस बात की पुष्टि की कि हम गलत मार्ग पर जा रहे है, पैलेस की ओर जाने वाला मार्ग तो पीछे रह गया है ! हम यहाँ से वापिस मुड़े और कुछ दूर चलने के बाद अपनी बाईं ओर जा रहे एक मार्ग पर मुड गए, ये मार्ग उम्मेद भवन की ओर जा रहा था ! मार्ग थोडा चढ़ाई भरा था, रास्ते में कुछ निर्माणाधीन इमारतें भी दिखाई दी, थोडा आगे बढ़ने पर एक जगह बैरियर लगा था ! इन सभी जगहों को पार करते हुए आख़िरकार हम कुछ देर बाद उम्मेद भवन के सामने खड़े थे, यहाँ सड़क के दाईं ओर पार्किंग स्थल था जहाँ कई वाहन खड़े थे ! वैसे अगर आप ऑटो से आना चाहे तो यहाँ तक ऑटो भी आते है ! हमने अपनी स्कूटी पार्किंग में खड़ी की और अपना कुछ सामान स्कूटी की डिग्गी में ही रख दिया ! कुछ खाने-पीने का सामान लेकर पार्किंग से चले तो उम्मेद भवन के प्रवेश द्वार के पास सुरक्षा जांच करवाने के लिए रुके ! आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि पैलेस के अन्दर खाने-पीने का सामान ले जाने पर पाबन्दी है, हाँ, हमारी तरह आप भी सुरक्षा जांच अधिकारी की नज़र से बचाकर चोरी-छुपे खाने का कुछ ले जा पाए तो अलग बात है !


उम्मेद भवन पैलेस का एक दृश्य

उम्मेद भवन पैलेस का एक दृश्य
ऐसे कई लोगों को गेट पर खड़े सुरक्षाकर्मी ने अन्दर जाने से रोका जो अपने साथ खाने-पीने का सामान लेकर आए थे ! हमने सोच रखा था कि अगर चेकिंग के दौरान हमारा सामान पकड़ा गया तो पार्किंग में जाकर स्कूटी में रख देंगे, अगर सामान अन्दर ले जा सके तो घूमने के दौरान भूख लगने पर खा लेंगे, वैसे भी हम होटल से नाश्ता किये बिना ही निकले थे ! प्रवेश द्वार से थोडा आगे बढ़ते ही सामने बाईं ओर कैंटीन है, कैंटीन से थोडा आगे बढ़ने पर बाईं ओर ही प्रसाधन है, यहाँ से थोडा और आगे बढ़ने पर मुख्य मार्ग दाईं ओर मुड़ जाता है ! इस मोड़ से उम्मेद भवन का एक शानदार दृश्य दिखाई देता है, बलुआ पत्थर से बने इस महल की सुन्दरता देखते ही बनती है ! आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि इस महल की वास्तुकला “हेनरी वॉन लेन्चेस्टर” ने तैयार की थी, जो “एडविन लुटियन” के समकालीन थे, लुटियन ने नई दिल्ली में कई इमारतों की रूपरेखा तैयार की थी ! कई भारतीय स्थापत्य कलाओं के मिश्रण से बना होने के बावजूद भी उम्मेद भवन में राजपूत परंपरा की झलक साफ़ दिखाई देती है ! इस महल में 347 कमरे, कई बरामदे और एक बड़ा हाल है, फिल्हाल महल को तीन हिस्सों में बाँट दिया गया है ! एक हिस्से में ये म्यूजियम है जहाँ आम लोग आसानी से जा सकते है, दूसरे हिस्से को ताज होटल के अंतर्गत दे दिया गया है जिसमें यहाँ आने वाले देशी-विदेशी लोगों के ठहरने की व्यवस्था है, जबकि तीसरा भाग मारवाड़ के महाराज गज सिंह द्वितीय का निवास स्थल है !

हम आज म्यूजियम वाले भाग में घूमने जा रहे है, वैसे, इस इमारत को देखकर कोई भी नहीं कह सकता कि इसे बने 80 वर्ष हो चुके है, ऐसा लगता है जसे हाल ही में इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ हो ! जहाँ से मुख्य मार्ग मुड रहा था वहीँ किनारे लोगों के बैठने के लिए पत्थर के चबूतरे बने है जिनपर बैठकर यहाँ आने वाले लोग खूब फोटो खिंचवाते है, हमने भी आगे बढ़ने से पहले रूककर यहाँ कुछ फोटो लिए ! उम्मेद भवन के आस-पास हरियाली भी खूब है, महल के चारों तरफ खूब पेड़-पौधे लगे है, प्राप्त जानकारी के अनुसार 26 एकड़ क्षेत्र में फैले इस महल के 15 एकड़ क्षेत्र में तो हरियाली ही है ! मुख्य भवन के ठीक सामने तो घास का एक बड़ा मैदान भी है, जिसमें रंग-बिरंगे फूल तो लगे ही है, बढ़िया बागबानी भी की गई है ! ताज होटल के अंतगर्त आने वाले महल के उस भाग का प्रवेश द्वार म्यूजियम के प्रवेश द्वार से थोड़ी दूरी पर ही था ! जिस दौरान हम म्यूजियम में प्रवेश कर रहे थे, तभी कुछ पर्यटकों को लेकर एक गाडी होटल के सामने आकर रुकी ! गाडी में से कुछ विदेशी लोग उतरे, जिनका स्वागत होटल के कर्मचारियों ने फूल-मालाओं और राजस्थानी संगीत से किया, हम म्यूजियम के प्रवेश द्वार के पास खड़े होकर ये सारा दृश्य देख रहे थे ! स्वागत दल के सदस्य परंपरागत वेशभूषा में थे, उन्होंने गाडी के द्वार खोलकर इन विदेशी मेहमानों का महल में स्वागत किया, मेहमानों की ख़ुशी उनके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रही थी !


महाराजा गज सिंह द्वितीय का एक चित्र

मारवाड़ की महारानी का एक चित्र

उम्मेद भवन पैलेस का एक माडल

उम्मेद भवन पैलेस से सम्बंधित एक जानकारी

म्यूजियम के अन्दर रखा एक वाद्य यंत्र
कसम से, ऐसा स्वागत देखकर हमें ही वीआईपी वाली फीलिंग आ रही थी तो जिनका स्वागत हो रहा था उनकी मनोस्थिति तो क्या ही होगी ? उन विदेशियों के अन्दर जाने के बाद हम भी म्यूजियम के प्रवेश द्वार पर अपना टिकट दिखाकर अन्दर दाखिल हुए, प्रवेश द्वार से अन्दर जाते ही सामने एक बड़ा हाल है, जहाँ द्वार के ठीक सामने वाली दीवार पर महाराजा गज सिंह द्वितीय की बड़ी तस्वीर लगी है ! इसी दीवार पर उम्मेद भवन से सम्बंधित कई जानकारियाँ भी अलग-2 चित्रों के माध्यम से दी गई है ! ऐसे ही एक चित्र में अंकित जानकारी के अनुसार दुनिया के बड़े महलों में शामिल इस महल का निर्माण महाराजा उम्मेद सिंह ने अपने शासनकाल (1918 से 1947) के दौरान करवाया ! चित्तर पहाड़ी पर बने इस महल का निर्माण कार्य 1929 में शुरू हुआ और ये 15 सालों तक चला, महल को बनाने में प्रयोग हुए मकराना के पत्थर और अन्य निर्माण सामग्रियों को राजस्थान के अलग-2 हिस्सों से एक स्पेशल ट्रेन के जरिये लादकर यहाँ लाया गया था ! अकाल पीड़ित लोगों की सहायता के लिए बनाए गए इस महल को बनाने से 3000 लोगों को 15 वर्ष तक काम मिला, इस महल को बनाने में कुल 94.5 लाख रूपए खर्च हुए ! शुरुआत में इस महल का नाम छित्तर पैलेस था लेकिन बाद में इसे उम्मेद भवन पैलेस के नाम से जाना जाने लगा !

म्यूजियम के अन्दर महल को बनाने से लेकर महाराजा उम्मेद सिंह के जीवन से सम्बंधित अन्य जानकारियों को चित्रों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है ! मारवाड़ के इतिहास में ऐसे अनेक शासक हुए जिन्होनें अपने सुशासन और गरिमापूर्ण व्यक्तित्व से जनता के हृदय में अमिट स्थान बनाया, इन शासकों ने अपने व्यक्तित्व और कृतित्व के माध्यम से मारवाड़ के लोगों का जीवन स्तर सुधारने का कार्य किया ! महाराजा उम्मेद सिंह भी इन्हें शासकों में से एक थे, उन्हें शिल्पकला और स्थापत्य कला का प्रेमी, पोषक और संरक्षक माना जाता है ! अपने शासन काल में महाराजा उम्मेद सिंह ने मारवाड़ के विकास हेतु कोई कसर नहीं छोड़ी, अपने काम के कारण उन्हें आधुनिक मारवाड़ का निर्माता भी कहा जाता है ! जोधपुर के विकास हेतू किये गए उनके कार्य यहाँ जगह-2 अंकित है,  म्यूजियम में भी अलग-2 गैलरी बनाई गई है जिसमें से “लाइफ स्टाइल गैलरी” में 40 और 50 के दशक को दर्शाया गया है, जबकि एक अन्य गैलरी में वर्तमान शाही परिवार, और उनके जीवन से सम्बंधित चीजों को दर्शाया गया है ! धीरे-2 हम म्यूजियम में आगे बढ़ रहे थे, यहाँ हाल के बीचों-बीच उम्मेद भवन का माडल रखा गया है जिसमें आप पूरे महल की बनावट देख सकते है ! हम टहलते हुए यहाँ से दूसरे कक्ष में पहुंचे, यहाँ खाने-पीने की एक मेज पर चाँदी के बर्तन रखे गए थे जो मारवाड़ के शाही परिवार द्वारा प्रयोग में लाए जाते थे !


म्यूजियम के अन्दर रखे चाँदी के बर्तन

म्यूजियम के अन्दर का एक दृश्य


महल के अन्दर एक दीवार पर बनी पेंटिंग
म्यूजियम में रखा हर एक सामान अपने आप में कुछ विशेषता लिए हुए है, कुछ वस्तुओं की जानकारी तो यहाँ दी भी गई है ! यहाँ से आगे बढे तो अगला कक्ष घड़ियों से भरा हुआ था, इस कक्ष में अलग-2 रूप-रंग और आकार की घड़ियाँ प्रदर्शन के लिए रखी गई है, कुछ तो ट्रेन के इंजन के आकार की भी थी ! मुझे तो इंजन के आकर की घडी सबसे अच्छी लगी, इनमें से कुछ घड़ियों पर तो तारीख भी अंकित थी ! घूमते हुए हम एक अन्य कक्ष में पहुंचे जो कभी सभागार हुआ करता था, मारवाड़ के महाराज इस कक्ष में सभाएं किया करते थे ! इस कक्ष में दीवारों पर सुन्दर चित्रकारी भी की गई है जो यूरोप के एक चित्रकार ने बनाए थे, हर चित्र अपने आप में विशिष्ट था ! कुछ देर बाद हम सभी हाल घूमकर बाहर आ गए, यहाँ छत की तरफ जालियां लगी हुई थी, ताकि पक्षी और अन्य जीव नीचे ना आ सके ! यहीं पर एक किनारे बिक्री के लिए कपडे और अन्य सामग्रियां रखी गई थी, हमने सोचा बाहर निकलने से पहले इन दुकानों में भी घूम लेते है, शायद कुछ पसंद आ ही जाए ! खैर, कुछ समय यहाँ बिताने के बाद हम महल से बाहर आ गए ! अब तक हम दोनों को ही बढ़िया भूख लग चुकी थी, मैदान में एक खाली जगह देखकर अपने साथ लाए चने और रेवड़ियाँ खाई ! यहाँ से निकलकर पार्किंग में पहुंचे और अपनी स्कूटी लेकर अपनी अगली मंजिल मंडोर बाग की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए, जिसका वार्वन मैं अपने अगले लेख में करूँगा !


म्यूजियम के अन्दर राखी दुर्लभ घड़ियों में से एक घडी

ट्रेन के इंजन के आकार की एक घडी

ट्रेन के इंजन के आकार की एक घडी

हाल की छत का एक दृश्य
क्यों जाएँ (Why to go Jodhpur): अगर आपको ऐतिहासिक इमारतें और किले देखना अच्छा लगता है तो निश्चित तौर पर राजस्थान में जोधपुर का रुख कर सकते है !


कब जाएँ (Best time to go Jodhpur): जोधपुर जाने के लिए नवम्बर से फरवरी का महीना सबसे उत्तम है इस समय उत्तर भारत में तो कड़ाके की ठण्ड और बर्फ़बारी हो रही होती है लेकिन राजस्थान का मौसम बढ़िया रहता है ! इसलिए अधिकतर सैलानी राजस्थान का ही रुख करते है, गर्मी के मौसम में तो यहाँ बुरा हाल रहता है !

कैसे जाएँ (How to reach 
Jodhpur): जोधपुर देश के अलग-2 शहरों से रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा है, देश की राजधानी दिल्ली से इसकी दूरी 620 किलोमीटर है जिसे आप ट्रेन में सवार होकर रात भर में तय कर सकते है ! मंडोर एक्सप्रेस रोजाना पुरानी दिल्ली से रात 9 बजे चलकर सुबह 8 बजे जोधपुर उतार देती है ! अगर आप सड़क मार्ग से आना चाहे तो उसके लिए भी देश के अलग-2 शहरों से बसें चलती है, आप निजी गाडी से भी जोधपुर जा सकते है ! 


कहाँ रुके (Where to stay near 
Jodhpur): जोधपुर में रुकने के लिए कई विकल्प है, यहाँ 600 रूपए से शुरू होकर 3000 रूपए तक के होटल आपको मिल जायेंगे ! आप अपनी सुविधा अनुसार होटल चुन सकते है ! खाने-पीने की सुविधा भी हर होटल में मिल जाती है, आप अपने स्वादानुसार भोजन ले सकते है !


क्या देखें (Places to see near Jodhpur): जोधपुर में देखने के लिए बहुत जगहें है जिसमें मेहरानगढ़ किला, जसवंत थड़ा, उन्मेद भवन, मंडोर उद्यान, बालसमंद झील, कायलाना झील, क्लॉक टावर और यहाँ के बाज़ार प्रमुख है ! त्रिपोलिया बाज़ार यहाँ के मुख्य बाजारों में से एक है, जोधपुर लाख के कड़ों के लिए जाना जाता है इसलिए अगर आप यहाँ घूमने आये है तो अपने परिवार की महिलाओं के लिए ये कड़े ले जाना ना भूलें !


अगले भाग में जारी...

जोधपुर यात्रा
  1. दिल्ली से जोधपुर की ट्रेन यात्रा (A Train Journey from Delhi to Jodhpur)
  2. जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग का इतिहास (History of Mehrangarh Fort, Jodhpur)
  3. जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग की सैर (A Visit to Mehrangarh Fort, Jodhpur)
  4. मेहरानगढ़ दुर्ग के महल (A Visit to Palaces of Mehrangarh Fort, Jodhpur)
  5. मारवाड़ का ताजमहल - जसवंत थड़ा (Jaswant Thada, A Monument of Rajpoot Kings)
  6. जोधपुर का उम्मेद भवन (Umaid Bhawan Palace, Jodhpur)
  7. रावण की ससुराल और मारवाड़ की पूर्व राजधानी है मण्डोर (Mandor, the Old Capital of Marwar)
  8. जोधपुर की बालसमंद और कायलाना झील (Balasmand and Kaylana Lake of Jodhpur)
  9. जोधपुर का क्लॉक टावर और कुछ प्रसिद्द मंदिर (Temples and Clock Tower of Jodhpur)
Pradeep Chauhan

घूमने का शौक आख़िर किसे नहीं होता, अक्सर लोग छुट्टियाँ मिलते ही कहीं ना कहीं घूमने जाने का विचार बनाने लगते है ! पर कुछ लोग समय के अभाव में तो कुछ लोग जानकारी के अभाव में बहुत सी अनछूई जगहें देखने से वंचित रह जाते है ! एक बार घूमते हुए ऐसे ही मन में विचार आया कि क्यूँ ना मैं अपने यात्रा अनुभव लोगों से साझा करूँ ! बस उसी दिन से अपने यात्रा विवरण को शब्दों के माध्यम से सहेजने में लगा हूँ ! घूमने जाने की इच्छा तो हमेशा रहती है, इसलिए अपनी व्यस्त ज़िंदगी से जैसे भी बन पड़ता है थोड़ा समय निकाल कर कहीं घूमने चला जाता हूँ ! फिलहाल मैं गुड़गाँव में एक निजी कंपनी में कार्यरत हूँ !

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