Monday, December 14, 2015

श्रीनगर स्थानीय भ्रमण (Local Sight Seen of Srinagar)

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आज सुबह सोकर उठे तो ब्रश करके नहाने से पहले अपने होटल से बाहर निकलकर नाव की ओर चल दिए ! यहाँ से सूर्योदय का शानदार नज़ारा दिखाई दे रहा था, हमने थोड़ी देर यहीं बैठकर कुछ फोटो खींचे और डल झील में जाती हुई नावों को देखते रहे ! इस समय नावों में बैठकर कुछ बच्चे अपने स्कूल जा रहे थे तो कुछ अन्य नाव वाले अपनी दुकानदारी सजाने में लगे थे ! मैं अपने पिछले लेख में आपको बता चुका हूँ कि यहाँ डल झील में फेरी वाले नावों के माध्यम से ही ज़रूरत का सारा सामान बेचते रहते है ! इस झील में भाँति-2 की नावें थी, छोटी-बड़ी, रंग-बिरंगी नावों को डल झील में तैरते हुए देखना बहुत अच्छा लगता है, कभी-2 तो मन करता है घंटो बैठ कर इन नावों को ऐसे ही देखते रहो ! फिर हमने आवाज़ लगाकर बिलाल को बुलाया और उससे घाट के उस पार चलने को कहा ! इतना सुनते ही वो अपनी नाव का चप्पू लेकर आ गया और हमें लेकर घाट की ओर चल दिया !

dal lake ghat
घाट के पास लिया एक चित्र

अगले 10 मिनट बाद हम दोनों घाट पार करके मुख्य बाज़ार में टहल रहे थे, यहाँ हम एक सैलून ढूँढ रहे थे ताकि हजामत करवा सके ! एक स्थानीय दुकानदार से पूछने पर पता चला कि सैलून मुख्य बाज़ार से थोड़ा अंदर जाकर है ! सैलून पहुँचकर हम 20 मिनट में दाढ़ी बनवाकर फारिक हो गए ! सैलून से वापिस आते हुए मुख्य मार्ग से थोड़ी पहले एक छोटे होटल में हल्का-फुल्का नाश्ता किया, नाश्ते के बाद हमने बालूशाही जैसी दिखने वाली एक मिठाई का स्वाद भी चखा ! बातचीत के दौरान पता चला कि इस होटल का मालिक बिजनौर का था और यहाँ पिछले कई सालों से रहकर होटल व्यवसाय में था ! होटल से बाहर आकर थोड़ी देर बाज़ार में घूमते रहे फिर बिलाल को फोन करके घाट पर आने के लिए बोल दिया ! हर बार हाउसबोट से घाट पर आने-जाने के लिए हमें बिलाल से  ही कहना होता था ! वो नाव लेकर हमें छोड़ने और लेने आ जाता था, फोन करके के थोड़ी देर बाद हमें अपने हाउसबोट से नाव आती दिखाई दी ! फिर अगले 15-20 मिनट में हम सब वापिस अपने हाउस बोट पहुँच गए !

वैसे आज हमारा विचार यहाँ के स्थानीय बाग-बगीचे देखने का था, पर उस से पहले भी हमें अपना होटल बदलना था ! इसलिए हम फटाफट नहा-धोकर तैयार हुए और अपना सारा सामान अपने-2 बैग में रख लिया ! हाउसबोट के किराए का तो हम अग्रिम भुगतान कर ही चुके थे और यहाँ रुकने के दौरान हमने खाने-पीने का सारा सामान भी बाहर से ही लिया था, थोड़ा बहुत जो बिल बना उसका भुगतान हमने यहाँ से निकलते हुए कर दिया ! अपना-2 बैग लेकर हम दोनों हाउसबोट से बाहर आ गए और घाट पर जाने के लिए नाव का इंतजार करने लगे ! यहाँ की नाव लेकर बिलाल कहीं गया हुआ था इसलिए जब एक अन्य नाव आई तो उसमें सवार होकर हम दोनों घाट की ओर चल दिए ! इस बार हमारा होटल "रॉयल पर्ल" डल झील से दूर खयबेर हॉस्पिटल के पास एक बाज़ार में था ! घाट पर नाव से उतरकर हम दोनों एक सूमो में सवार हुए और डलगेट के लिए चल दिए ! 5 मिनट से भी कम समय लगा हमें डलगेट पहुँचने में, यहाँ सूमो से उतरकर हम एक पुल को पार करते हुए खयबेर हॉस्पिटल की ओर चल दिए !

खयबेर हॉस्पिटल पहुँचने के बाद भी हमारे होटल का कुछ अता-पता नहीं था, होटल को अपने आप ढूँढने में ज़्यादा समय व्यर्थ होता ! इसलिए हमने ज़्यादा देरी ना करते हुए हॉस्पिटल के सामने पहुँचकर अपने होटल में फोन कर दिया, थोड़ी देर में ही हमारे होटल से एक युवक आया और हमें होटल की ओर लेकर चल दिया ! ये होटल खयबेर हॉस्पिटल के बगल से जाने वाले एक मार्ग पर थोड़ी अंदर जाकर था, इसलिए मुख्य मार्ग से ये दिखाई नहीं दे रहा था ! होटल पहुँचकर हितेश ने कागज़ी कार्यवाही पूरी की और फिर होटल वाला हमें कमरा दिखाने के लिए प्रथम तल पर ले गया ! यहाँ एक ही कतार में कई कमरे थे, हमने पहला कमरा देखा तो यही हमें पसंद आ गया, इसलिए दूसरा कमरा देखने की नौबत ही नहीं आई ! अपना सारा सामान कमरे में रखकर हम आज के घूमने पर चर्चा करने लगे, कई विचार बने और बिगड़े, फिर स्थानीय भ्रमण करने पर दोनों की सहमति बनी !

फिर एक बैग में कैमरा और खाने-पीने का थोड़ा सामान लेकर हम डल गेट से थोड़ा आगे टीआरसी रोड पर लगने वाले रविवार बाज़ार की ओर चल दिए ! बस से टीआरसी चौक पर उतरने के बाद अपनी बाई ओर जाने वाले मार्ग पर पैदल ही चल दिए, ये बाज़ार दिल्ली में लगने वाले रविवार बाज़ार की तरह ही था ! खाने-पीने से लेकर, घर की ज़रूरत का सारा सामान इस बाज़ार में मौजूद था, हमने कुछ फेरी वालों से स्थानीय व्यंजनों का स्वाद भी चखा ! इसके बाद हम काफ़ी देर तक उस बाज़ार में घूमते रहे, फिर जब थक गए तो वापिस अपने होटल की ओर चल दिए ! मेरी तबीयत ठीक नहीं थी, बुखार सा लग रहा था इसलिए सोचा होटल जाकर थोड़ा आराम करूँगा तो राहत मिल जाएगी ! टीआरसी चौक से एक बस में सवार हुए और डलगेट से सीधे पुल पार करके खयबेर चौक उतर गए ! दोपहर के 3 बज रहे थे, जब हम बस से उतरे, होटल पहुँचकर मैं सो गया !

नींद खुली शाम को 5 बजे, थोड़ी देर बाद हितेश आया, पूछने पर उसने बताया कि वो बाज़ार में टहलने चला गया था ! आज तो निषाद बाग नहीं जा पाए, सोचा कल तक तबीयत ठीक हो जाएगी तो कल चले जाएँगे ! समय से रात्रि का भोजन किया और फिर अपने-2 बिस्तर पर आराम करने चले गए, रात को मेरी हालत खराब हो गई ! शायद खाने में कुछ गड़बड़ थी, रात को जो उल्टियाँ शुरू हुई तो वो सुबह तक जारी रही, 3-4 बार उल्टी करके हालत एकदम पस्त थी ! सुबह नहा-धोकर तैयार हुए, अब थोड़ी राहत लग रही थी, पर पूरी तरह से अब भी ठीक नहीं था इसलिए हितेश को बोल दिया कि यार तू घूम ले ! पर जब उसने अकेले जाने से मना कर दिया तो हिम्मत करके मैं भी घूमने जाने के लिए तैयार हो गया ! मैने सोचा यार मेरे चक्कर में ये भी नहीं घूमेगा, ये ठीक नहीं रहेगा ! अपने होटल से निकलकर खयबेर चौक पहुँचे और वहाँ से बस लेकर डलगेट उतर गए ! यहाँ से एक दूसरी सूमो में सवार होकर निषाद बाग के लिए चल दिए, सूमो में सवार कुछ स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान पता चला कि यहाँ निशात, मुगल, और ट्यूलिप बाग है !

सबसे पहले हम निशात बाग जाने वाले थे इसलिए इस बाग के सामने पहुँचकर सूमो से उतर गए ! सड़क के किनारे मौजूद टिकट घर से जब बगीचे का प्रवेश टिकेट लेने पहुँचा तो उसके पास 500 रुपए खुले नहीं थे ! काफ़ी कोशिश कर ली पर बात नहीं बनी, अंत में इस बाग के सामने मौजूद खाने-पीने की एक दुकान में पहुँच गए ! यहाँ चाय-पकोडे का ऑर्डर दे दिया और साथ ही एक डोसा बनाने को भी कह दिया, यहाँ के पकोड़ो का स्वाद ठीक था ! खा-पीकर तृप्त हो गए तो होटल वाले का बिल चुकाकर 500 रुपए के खुले भी करवा लिए ! यहाँ से निकलकर टिकट खिड़की पर पहुँचा और निशात बाग में जाने के दो टिकट 20 रुपए प्रति टिकट के हिसाब से ले लिए ! प्रवेश द्वार पर टिकट दिखाकर बाग में अंदर चले गए, यहाँ आकर हमने देखा कि तरह-2 के फूल इस बाग में मौजूद थे ! ये बाग मुख्य सड़क से काफ़ी उँचाई पर है इसलिए यहाँ से देखने पर डल झील बहुत शानदार दिखाई देती है !

हमारे अलावा वहाँ काफ़ी पर्यटक मौजूद थे, वैसे तो ऐसे बगीचे अपनी दिल्ली में भी काफ़ी है पर आबो-हवा का फ़र्क तो पड़ता ही है ! इसलिए तो हर साल लोग देश-विदेश से श्रीनगर आते है और ये बगीचे उनसे भी अछूते नहीं रहते, आख़िर कुछ तो बात है इन बगीचों में जो हर साल यहाँ हज़ारों पर्यटक समय बिताने आते है ! बगीचे में अंदर चलने के लिए एक पक्का मार्ग बना है, मार्ग के दोनों ओर रंग-बिरंगे फूल लगे है ! बीच-2 में घास के हरे मैदान बहुत सुंदर दृश्य प्रस्तुत करते है, मैदान में जगह-2 खड़े चिनार के पेड़ तो यहाँ की खूबसूरती में चार चाँद लगा देते है ! कहते है भारत में सिर्फ़ कश्मीर ही एक राज्य है जहाँ चिनार के पेड़ पाए जाते है, ये पेड़ खूब घने होते है ! अन्य किसी भी राज्य में चिनार के पेड़ ना होने का मुख्य कारण वहाँ का वातावरण बताया जाता है ! पर मुझे इस बात पर संशय है, हो सकता है किसी ने भारत के दूसरे राज्यों में इस पेड़ को लगाकर देखा ही ना हो, या हो सकता है वातावरण वाली बात सच हो !

लेकिन मेरे हिसाब से कश्मीर जैसा मौसम तो भारत के कई उत्तरी राज्यों में होता है तो फिर वहाँ चिनार के पेड़ों को सही वातावरण ना मिलना कुछ अटपटा सा लगता है ! खैर, मैं भी कहाँ निशात बाग घुमाते-2 चिनार के पेड़ को लेकर बैठ गया ! इस बाग में कई मैदान है, दरअसल ये एक सीढ़ीनुमा बाग है, जिसमें बार-2 कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर एक मैदान आ जाता है ! हर मैदान में तरह-2 के रंग-बिरंगी फूल लगे हुए है, फूलों की देख-रेख के लिए कुछ लोग भी यहाँ मौजूद थे जो यहाँ आने वाले हर पर्यटक से फूलों के बीज/पौधे खरीदने संबंधित बातें कर रहे थे ! हालाँकि, हम वहाँ से कोई फूल-पौधा नहीं लाए, ऐसे ही आगे बढ़ते हुए एक मैदान में कुछ लोग कश्मीरी परिधानों में पर्यटकों की फोटो खींचने में लगे थे ! बहुत से लोग जिनमें से अधिकतर जोड़े ही थी इन कश्मीरी परिधानों में फोटो खिंचवा रहे थे, हमने थोड़ी देर वहीं खड़े होकर इन परिधानों को देखा, फिर आगे बढ़ गए !

प्रकृति प्रेमी को इस बगीचे में देखने के लिए काफ़ी कुछ मिलेगा वरना आम आदमी तो यहाँ आकर चला जाएगा और कहेगा कि निशात बाग में देखने को ऐसा तो कुछ नहीं है ! वैसे ये अपनी-2 धारणा है, इसलिए हो सकता है आपकी धारणा मुझसे अलग हो ! अब तक हम आधा बाग घूम चुके थे और अभी भी काफ़ी कुछ देखने को बाकी बचा था, ऐसे ही आगे बढ़ते हुए जब हम एक मैदान में पहुँचे तो वहाँ एक छोटा सा कुंड था जिसका पाने एक तिरछी दीवार से होता हुआ नीचे गिर रहा था ! दूर से देखने पर ये झरने जैसा लग रहा था, दरअसल इस कुंड का पानी काफ़ी गंदा था और ऊँचाई से गिरने पर इसमें झाग बन रहा था, ये सफेद झाग ही दूर से देखने पर झरने जैसा लग रहा था ! हमने यहाँ कुछ स्थानीय बच्चों को भी देखा जो निश्चित तौर पर अपने स्कूल से भागकर यहाँ समय बिताने आ गए थे !

घूमते हुए हम बाग के अंतिम छोर तक पहुँच गए, यहाँ हमारी बाईं ओर बाग के आख़िर में एक ऊँची इमारत थी ! हमने सोचा क्यों ना इस इमारत में भी चला जाए, शायद कुछ ज़रूरी जानकारी हाथ लग जाए, लेकिन जब इमारत में पहुँचे तो वहाँ लगे गंदगी का ढेर देख कर निराशा हाथ लगी ! अंदर गए तो शराब की टूटी हुई बोतलें और दूसरा कूड़ा करकट देखकर वापिस आ गए ! बाग के मुख्य द्वार से बाहर निकलकर डल झील के किनारे चल दिए, यहाँ एक फेरी वाले से दो कुलफियाँ लेकर खाने लगे ! इस दौरान अपने अगले पड़ाव पर भी चर्चा करते रहे, अंत में विचार बना कि चश्मेशाही चला जाए ! निशात बाग के सामने आने-जाने वाली लगभग सभी गाड़ियाँ रुकती है, एक बस में सवार होकर हम दोनों वापिस डलगेट की ओर चल दिए, इस मार्ग पर आगे जाकर एक तिराहा आता है यहाँ से बाईं ओर जाने वाला मार्ग चश्मेशाही होते हुए परी महल को जाता है !

मोड़ पर हम दोनों बस से उतर गए, यहाँ से चश्मेशाही 2 किलोमीटर दूरी पर है लेकिन सारा रास्ता चढ़ाई वाला है ! एक बार तो पैदल जाने का मन भी हुआ लेकिन फिर वहीं सड़क के किनारे खड़े एक ऑटो वाले से बात की तो 300 रुपए में सौदा तय हुआ ! वो हमें चश्मेशाही और परी महल दिखाकर वापस इस मोड़ पर छोड़ने वाला था, ऑटो में सवार होकर हम दोनों चश्मेशाही के लिए चल दिए ! रास्ते में ही सड़क के बाईं ओर एक अन्य मार्ग ट्यूलिप गार्डन के लिए जाता है, स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार ट्यूलिप गार्डन अभी बंद था इसलिए हम यहाँ नहीं गए ! रास्ते में सड़क के दोनों ओर सुरक्षा बल के जवान तैनात थे ! 10 मिनट बाद हम दोनों चश्मेशाही के सामने पहुँच गए, यहाँ टिकट खिड़की से दो टिकट लेकर मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश किया ! यह भी एक बाग ही है जहाँ कई प्रकार के फूल-पौधे है, निशात बाग में हम पहले ही काफ़ी फूल देख चुके थे इसलिए ये फूल हमें कुछ ख़ास नहीं लगे !

इस बाग में अंदर एक पानी की धारा है जो निरंतर बहती रहती है, लोग इस पानी की तुलना अमृत से करते है और पीने के लिए अपने साथ ले जाते है ! खैर, जो कुछ भी हो हम दोनों यहाँ ज़्यादा देर नहीं रुके, इस बीच मेरी तबीयत फिर से खराब होने लगी और हमें परी महल देखे बिना ही वापिस अपने होटल आना पड़ा ! ऑटो वाले को उसका भुगतान किया और वापिस अपने होटल पहुँच गए ! यहाँ आकर आराम किया, दवाइयाँ भी ली, पर ज़्यादा राहत नहीं मिली ! खराब तबीयत की वजह से मैं कहीं घूमने जाने की हालत में नहीं था, इसलिए हितेश को बोल दिया कि अगर उसे कहीं घूमने जाना हो तो वो जा सकता है, पर उसने अकेले जाने से मना कर दिया ! अगले दिन हमारी वापसी की टिकटें थी इसलिए इस बार के सफ़र में ज़्यादा नहीं घूम पाए, पर जितना भी घूमे वो मजेदार रहा ! मैने सोच रखा है कि एक बार फिर से श्रीनगर ज़रूर आना है ताकि बची हुई जगहों को देख सकूँ !

sunday market srinagar
Way to Sunday Market, Srinagar
sunday market srinagar
स्थानीय बाज़ार में घूमते हुए हितेश (Way to Sunday Market, Srinagar)

sunday market
बिक्री के लिए रखा सामान (Sunday Market, Srinagar)
nishat garden
निशात बाग में लिया एक चित्र (A view from Nishat Garden, Srinagar)
nishat bag
(A view from Nishat Garden, Srinagar)
garden nishat

way to nishat garden
बाग के अंदर जाने का मार्ग (A view from Nishat Garden, Srinagar)
long tree

water tank

chinar leave
पानी में गिरा हुआ चिनार का पत्ता
view of dal lake
दूर दिखाई देती डल झील (Dal Lake Appearing on backside)
waterfall in srinagar
झरने सा दिखाई देता पानी

nishat garden
निशात बाग में लिया एक और चित्र

old building
पुरानी इमारत के पास लिया एक चित्र
view from nishat garden
इमारत से दिखाई देता एक दृश्य (A view from Nishat Garden)
view from nishat garden
इमारत से दिखाई देता एक और दृश्य (A view from Nishat Garden)
chinar tree
चिनार का पेड़ (Chinar Tree, Srinagar)
flowers in nishat garden
निशात बाग से लिया एक चित्र
flowers in nishat garden
निशात बाग से लिया एक चित्र
flowers in nishat garden


chashmeshahi
चश्मेशाही में निकलती अमृत धारा (A view of Chashmeshahi Garden, Srinagar)
क्यों जाएँ (Why to go Srinagar): अगर आप श्रीनगर की डल झील में नौकायान के अलावा हाउसबोट में कुछ दिन बिताना चाहते है तो कश्मीर जाइए ! यहाँ घूमने के लिए पहाड़, झील, प्राकृतिक नज़ारे, बगीचे, नदियाँ सब कुछ है ! ऐसे ही इसे "धरती का स्वर्ग" नहीं कहा जाता, जो भी एक बार यहाँ आता है, वो यहाँ की खूबसूरती की तारीफ़ किए बिना नहीं रह पाता !

कब जाएँ (Best time to go Srinagar): वैसे तो आप साल के किसी भी महीने में श्रीनगर जा सकते है लेकिन यहाँ आने का सबसे बढ़िया समय अप्रैल से अक्तूबर का है सर्दियों में तो यहाँ कड़ाके की ठंड पड़ती है कई बार तो डल झील भी जम जाती है !  

कैसे जाएँ (How to reach Srinagar): दिल्ली से श्रीनगर की दूरी 808 किलोमीटर है जिसे तय करने में आपको लगभग 15-16 घंटे का समय लगेगा ! श्रीनगर देश के अन्य शहरों से सड़क और हवाई मार्ग से अच्छे से जुड़ा है जबकि यहाँ का नज़दीकी रेलवे स्टेशन उधमपुर है ! वैसे तो बारामूला से बनिहाल तक भी रेलवे लाइन है लेकिन इस मार्ग पर लोकल ट्रेन ही चलती है ! बारामूला से बनिहाल जाते हुए रास्ते में श्रीनगर भी पड़ता है ! उधमपुर से श्रीनगर तक आप बस या टैक्सी से भी आ सकते है, इन दोनों जगहों के बीच की कुल दूरी 204 किलोमीटर है और पूरा पहाड़ी मार्ग है जिसे तय करने में लगभग 5 घंटे का समय लगता है !

कहाँ रुके (Where to stay in Srinagar): श्रीनगर एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है यहाँ रुकने के लिए बहुत होटल है ! आप अपनी सुविधा अनुसार 800 रुपए से लेकर 2000 रुपए तक का होटल ले सकते है ! लेकिन अगर आप श्रीनगर में है तो कम से कम 1 दिन तो हाउसबोट में ज़रूर रुके ! डल झील में बने हाउसबोट में रुकने का अनुभव आपको ज़िंदगी भर याद रहेगा !

कहाँ खाएँ (Eating option in Srinagar): श्रीनगर में अच्छा-ख़ासा बाज़ार है, यहाँ आपको अपने स्वाद अनुसार खाने-पीने का हर सामान मिल जाएगा !

क्या देखें (Places to see in Srinagar): श्रीनगर और इसके आस-पास घूमने की कई जगहें है जिसमें से शंकराचार्य हिल, ट्यूलिप गार्डन, डल झील, सोनमर्ग, बेताब वैली, निशात गार्डन, मुगल गार्डन, शालीमार बाग, गुलमर्ग, परी महल, पहलगाम, खीर भवानी मंदिर और चश्मेशाही प्रमुख है !

अगले भाग में जारी...

श्रीनगर यात्रा
  1. श्रीनगर यात्रा - उड़ान भरने से पहले का सफ़र (Pre-Departure Journey)
  2. दिल्ली से श्रीनगर की विमान यात्रा (Flying Delhi to Srinagar)
  3. श्रीनगर हवाई अड्डे से डल झील की बस यात्रा (A Road Trip to Dal Lake)
  4. श्रीनगर से पहलगाम की सड़क यात्रा (A Road Trip to Pehalgam)
  5. सेब के बगीचों में बिताए कुछ पल (An Hour in Apple Orchard)
  6. श्रीनगर स्थानीय भ्रमण (Local Sight Seen of Srinagar)
  7. श्रीनगर से दिल्ली वापसी (Return Journey to Delhi)

4 comments:

  1. प्रदीप जी, यात्रा का वर्णन सुन्दर है. और भी अच्छा होता अगर आप हाउस बोट और होटल के कमरे के किराये का वर्णन कर देते. इस से जाने वाले यात्रियों को अपना बजट बनाने में सुविधा होती है.

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    1. शर्मा जी धन्यवाद ! होटल का किराया 1000 रुपए प्रतिदिन था और हाउसबोट का किराया प्रतिदिन 850 रुपए था जिस दौरान मैं वहाँ रुका था दोनों ही जगहों के किराए में मुझे 50 प्रतिशत छूट मिली थी ! वैसे जिस हाउसबोट में मैं रुका था उसमें रुकने की सलाह तो बिल्कुल नहीं दूँगा, यहाँ बहुत हाउसबोट है आप किसी में भी रुक सकते है !

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  2. बाग़ बहुत सुंदर है पर तुम्हारी तबियत ख़राब होने से लुत्फ़ नहीं उठा सके ये यात्रा फीकी लग रही है

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    1. हाँ, बुआ ये यात्रा फीकी ही थी !

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