ग्वालियर से वापसी का सफर (Road Trip from Gwalior to Delhi)

रविवार, 10 मार्च 2019

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यात्रा के पिछले लेख में मैंने आपसे ग्वालियर में बिताई अपनी एक शाम का जिक्र किया था, चलिए आगे बढ़ते है, गाड़ी गैराज में खड़ी करके हम सोने के लिए अपने कमरे में आ गए ! बातें करते हुए रात को कब नींद आई पता ही नहीं चला, लेकिन सुबह समय से नींद खुल गई ! नित्य-क्रम से फ़ारिक होकर एक बार फिर हम तीनों होटल से निकलकर गांधी नगर की गलियों में घूमने चल दिए ! सुबह-2 का समय होने के कारण बाहर ज्यादा चहल-पहल नहीं थी, गली में जनरल स्टोर की दुकानों के अलावा चाय की कुछ टपरियाँ भी खुल चुकी थी, नाश्ते का सामान लिए कुछ रेहड़ी वाले भी अपनी तैयारियों में जुटे थे ! ऐसी ही एक रेहड़ी पर जाकर हम रुके, इसका मालिक पोहा बनाने की तैयारी कर रहा था, पूछने पर पता चला कि पोहा तैयार होने में अभी 10-15 मिनट लग जाएंगे ! हमें कोई जल्दी नहीं थी, टहलते हुए गली का एक लंबा चक्कर लगा आए, वापिस आकर देखा तो पोहे उबलकर थाल में सज चुके थे ! इस रेहड़ी के ठीक सामने एक चाय की दुकान भी थी, 3 चाय बनाने का आदेश देकर हमने अपने लिए पोहे भी बनवा लिए ! यहाँ खड़े होकर चाय की चुसकियाँ लेते हुए पोहे खाने में जो आनंद आया वो शायद किसी होटल में बैठकर नहीं मिलता ! मैंने अक्सर देखा है कि कई बार छोटी दुकानों पर खान-पान का स्वाद बड़ी दुकानों से ज्यादा अच्छा होता है ! पोहे खाते हुए हम आस-पास से गुजर रहे लोगों की दिनचर्या भी देख रहे थे, जो बड़ी व्यस्त लग रही थी ! उस समय शायद हम भूल गए थे कि ऐसी ही एक दिनचर्या हमारी भी है, वैसे अगर रोजमर्रा की भागम-भाग से दूर सुकून के कुछ पल भी मिल जाए तो ज़िंदगी के मायने बदल जाते है !

ग्वालियर के किले का एक दृश्य

वैसे मुझे यहाँ दूसरे बड़े शहरों के मुकाबले काफी शांत माहौल लगा, यहाँ कोई शोर-शराबा नहीं था, मुझे इस शहर में आए 1 दिन ही हुआ था लेकिन फिर भी यहाँ एक अपनापन सा था ! कुछ देर बाद चाय-पोहे का नाश्ता करके फ़ारिक हुए तो टहलते हुए वापिस अपने होटल में पहुंचे, समय नौ बजने वाले थे ! यहां कमरे में बिखरा अपना सारा सामान व्यवस्थित किया और रिसेप्शन पर पहुंचे, वैसे हमारा अधिकतर सामान तो गाड़ी में ही था, लेकिन फिर भी जरूरी सामान हम अपने साथ कमरे में ले आए थे ! रिसेप्शन से गैराज में जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी थी, मैं गाड़ी लाने गैराज में चला गया ! होटल का किराया हम पहले ही दे चुके थे, इसलिए कमरे की चाबी रिसेप्शन पर देकर हितेश और शशांक भी होटल से बाहर आ गए ! सामान गाड़ी में रखकर हमने अपने सफर की शुरुआत की और एक बार फिर से गांधी नगर की गलियों में निकल पड़े ! घर वापिस जाने से पहले हम ग्वालियर का किला जाना चाहते थे, सोचा था, मन किया तो ठीक वरना एक बार किले को बाहर से ही देख लेंगे ! हमारे होटल से ये किला लगभग 2 किलोमीटर दूर था, कुछ गलियों से निकलकर हम एक बाजार से होते हुए किले की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि इस किले में प्रवेश करने के 2 मार्ग है, एक पैदल मार्ग है जिसे ग्वालियर गेट के नाम से जाना जाता है जबकि दूसरे मार्ग पर गाड़ियां भी जा सकती है इसे उरवाई गेट के नाम से जाना जाता है, हम इसी गेट से जा रहे थे !

ग्वालियर के किले का टिकट घर का एक दृश्य 

टिकट शुल्क की जानकारी देता एक बोर्ड

पार्किंग से किले की ओर जाने का मार्ग

उरवाई गेट से होकर जाने वाला मार्ग काफी संकरा और चढ़ाई भरा है जिसके दोनों ओर बड़ी-2 चट्टाने है, सड़क किनारे इन चट्टानों पर सुंदर मूर्तियाँ बनाई गई है ! बाहरी प्रवेश द्वार से एक सड़क सीधे किले के पास स्थित पार्किंग स्थल के सामने पहुँचती है, जहां से किले तक आपको पैदल ही जाना होता है ! उरवाई गेट से निकलकर कुछ देर बाद हम पार्किंग स्थल में थे, यहाँ हमारे अलावा इक्का-दुक्का गाड़ियां ही दिखाई दे रही थी, गाड़ी से उतरकर हम किले की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि यहाँ रोज शाम को लाइट एण्ड साउन्ड शो का हिन्दी-अंग्रेजी में आयोजन किया जाता है ! 25 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से प्रवेश शुल्क अदा करके हमने टिकट ली और किले की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! चलिए, आगे बढ़ने से पहले थोड़ी जानकारी आपको इस किले के बारे में दे देता हूँ, प्राप्त जानकारी के अनुसार इस किले का निर्माण 8वीं शताब्दी में महाराजा सूरजसेन ने करवाया था, उनके नाम का सूरज कुंड किले परिसर में मौजूद है ! बाद में अलग-2 शासकों ने इस किले में कई इमारतों का निर्माण करवाया, जैसे राजा मान सिंह तोमर ने मान मंदिर महल का निर्माण करवाया, इसी प्रकार गुजरी महल का निर्माण महारानी मृगनयनी के लिए करवाया गया था ! ग्वालियर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल ये किला गोपांचल पहाड़ी पर स्थित है और 3 वर्ग किलोमीटर में फैला है, किले की ऊंचाई 300 फीट है !

मार्ग में स्थित एक इमारत

दूर से दिखाई देता ग्वालियर का किला 

इसी मार्ग से चलकर हम आए थे

दूर से दिखाई देता ग्वालियर का किला 

किले का एक और दृश्य

किले के बाहरी भाग से दिखाई देता एक दृश्य

ग्वालियर का किला और मैं

अंदर जाने से पहले किले के बाहर रुककर एक ऊंची जगह से किले और इसके आस-पास के कई चित्र लिए, यहीं कुछ सीढ़ियां बनी थी जहां लाइट एण्ड साउन्ड शो होता है ! यहाँ से किले और ग्वालियर शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है ! किले में लुका-छुपी, कलंक के अलावा भी कई फिल्मों के दृश्य फिल्माए गए है ! प्रवेश द्वार से किले में दाखिल हुए और बारी-2 से किले के अलग-2 हिस्सों में घूमते रहे, किले में एक बावली है जिसमें इस समय थोड़ा पानी था ! इसके अलावा किले परिसर में जहांगीर महल, शाहजहाँ महल भी है, जहांगीर महल को शेर मंदिर भी कहा जाता है, प्राप्त जानकारी के अनुसार इस महल का निर्माण शेरशाह सूरी ने करवाया था लेकिन बाद में जहांगीर ने इसका जीर्णोंदार करवाया इसलिए इसका नाम जहांगीर महल पड़ गया ! इस महल के ठीक सामने उत्तर-पूर्व दिशा में शाहजहाँ महल स्थित है, इसका निर्माण शाहजहाँ ने करवाया था इसलिए इसका ये नाम पड़ा, मुगल शैली में बना ये महल भी इस किले के मुख्य आकर्षण स्थलों में आता है ! चलिए, अब आप चित्रों के माध्यम से इस किले का भ्रमण कीजिए, हम तो इस बार समय की कमी के कारण ये किला ठीक से नहीं घूम पाए और इसके कुछ हिस्से ही देखे, लेकिन भविष्य में दोबारा ग्वालियर घूमने आऊँगा तो ये किला जरूर देखूँगा ! वैसे इस किले में देखने के लिए जहांगीर महल और शाहजहाँ महल के अलावा अस्सी खंबों की बावली, मानसिंह पैलेस, गुजरी महल, सास-बहू मंदिर, सिद्धाञ्चल जैन टेम्पल केव और दिगम्बर जैन मंदिर प्रमुख स्थल है ! किले परिसर में एक संग्रहालय भी है जहां ग्वालियर के आस-पास मिली दुर्लभ मूर्तियों को प्रदर्शनी के लिए रखा गया है !

इस यात्रा की कुछ सुनहरी यादें

किले के अंदर का एक दृश्य

किले के अंदर का एक दृश्य

किले परिसर के एक दृश्य

किले परिसर में बनी बावली

बावली के पास से दिखाई देता एक दृश्य

बावली के अंदर से दिखाई देता शशांक

बावली के अंदर से लिया एक चित्र 

किले परिसर में लिया एक अन्य दृश्य

जहांगीर महल की जानकारी देता एक बोर्ड 

किले से दिखाई देता ग्वालियर का एक दृश्य

किले के एक कोने से दिखाई देता एक दृश्य

किले के भीतर का एक दृश्य

किले के अंदर लिया एक चित्र

किले की दीवार पर रखी एक तोप

मानसिंह महल की जानकारी देता एक शिलालेख 

सोचा थोड़ा फोटोसेशन हो जाए

ग्वालियर की कुछ सुनहरी यादें

ग्वालियर की कुछ सुनहरी यादें

मार्च के महीने में भी तेज गर्मी थी

किले परिसर से वापिस चले तो 10 बजने वाले थे, ग्वालियर से निकलकर कुछ देर बाद हम कोटेश्वर मार्ग से निकलकर दाएं मुड़कर जेल रोड पर पहुंचे ! इस मार्ग पर कुछ दूर चलकर बहोदपुर मार्ग से होते हुए एक ग्रामीण क्षेत्र में पहुंच गए, यहाँ हम गूगल मैप के सहारे चल रहे थे ! सागरतल मार्ग से होते हुए कुछ देर बाद हम ग्वालियर बाइपास पर पहुंचे, यहाँ से बाएं मुड़कर हम उसी मार्ग पर पहुँच गए जिससे यहाँ आए थे ! वापिस आते हुए हम धोलपुर से पहले चम्बल नदी से पहले एक छोटे से बाजार में रुके, यहाँ माता का एक प्रसिद्ध मंदिर भी था, हालांकि, हम मंदिर नहीं गए ! यहाँ सड़क किनारे दोनों ओर काफी दूर तक दुकाने सजी थी, भूख लगी थी तो सोचा कुछ हल्का-फुल्का खाकर आगे बढ़ते है ! एक दुकान पर रुककर कुछ मिठाई खाई और घर के लिए भी ले ली, स्थानीय दुकानों पर चम्बल के डाकुओं के किस्से सुनने को मिल जाते है। कुछ दुकानदारों के पूर्वज तो खुद डकैत थे ! हालांकि, अब हालात काफी बदल गए है, और नई पीढ़ी अब सामान्य जीवन जी रहे है ! यहाँ से चले तो चम्बल नदी के पुल पर भी कुछ देर के लिए रुके, ये पुल काफी चौड़ा है, चम्बल नदी मगरमच्छों के लिए देशभर में मशहूर है ! इसके बाद आगरा बाइपास पर भी हम कुछ देर के लिए रुके और शाम 3 बजे तक हम घर पहुँच चुके थे ! तो इसके साथ ही ये सफर खत्म होता है, जल्द ही किसी नए सफर पर आपसे फिर मुलाकात होगी !

चम्बल नदी का एक दृश्य

समाप्त..

ग्वालियर यात्रा

  1. दिल्ली से ग्वालियर की सड़क यात्रा (A Road Trip from Delhi to Gwalior)
  2. ग्वालियर की एक शाम (An Evening in Gwalior)
  3. ग्वालियर से वापसी का सफर (Road Trip from Gwalior to Delhi)
Pradeep Chauhan

घूमने का शौक आख़िर किसे नहीं होता, अक्सर लोग छुट्टियाँ मिलते ही कहीं ना कहीं घूमने जाने का विचार बनाने लगते है ! पर कुछ लोग समय के अभाव में तो कुछ लोग जानकारी के अभाव में बहुत सी अनछूई जगहें देखने से वंचित रह जाते है ! एक बार घूमते हुए ऐसे ही मन में विचार आया कि क्यूँ ना मैं अपने यात्रा अनुभव लोगों से साझा करूँ ! बस उसी दिन से अपने यात्रा विवरण को शब्दों के माध्यम से सहेजने में लगा हूँ ! घूमने जाने की इच्छा तो हमेशा रहती है, इसलिए अपनी व्यस्त ज़िंदगी से जैसे भी बन पड़ता है थोड़ा समय निकाल कर कहीं घूमने चला जाता हूँ ! फिलहाल मैं गुड़गाँव में एक निजी कंपनी में कार्यरत हूँ !

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