Thursday, July 8, 2021

मार्कन्डेय महादेव मंदिर की यात्रा (A Trip to Markandey Mahadev Temple, Kaithi)

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें !

यात्रा के इस लेख में मैं आपको बनारस-ग़ाज़ीपुर मार्ग पर कैथी गाँव में स्थित मार्कन्डेय महादेव मंदिर के दर्शन करवाऊँगा, जो पूर्वाञ्चल का एक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है ! तो हुआ कुछ यूं कि इस यात्रा पर जाने का विचार कल शाम को ही बन गया था इसलिए आज मैं छुट्टी पर था ! सुबह जल्दी उठकर सभी लोग समय से नहा-धोकर तैयार हुए और 8 बजे हम गाड़ी लेकर कैथी के लिए निकल पड़े, जो यहाँ से लगभग 30 किलोमीटर दूर है ! सादात से सैदपुर तक 2 लेन सड़क है, पहले ये मार्ग काफी संकरा मार्ग था लेकिन अब इसका विस्तार करके इसे थोड़ा चौड़ा कर दिया गया है, इस मार्ग पर यातायात के साधन बहुत ज्यादा नहीं है इसलिए अधिकतर निजी गाड़ियां ही दिखाई देती है ! सैदपुर में आकर ये मार्ग वाराणसी-गोरखपुर राजमार्ग में मिल जाता है, जो एक 4 लेन राजमार्ग है, पहले ये भी 2 लेन मार्ग था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसका विस्तारीकरण किया गया है, जिसके तहत इसे अब 4 लेन किया जा रहा है, अधिकतर जगह काम खत्म हो चुका है लेकिन टोल नाके के अलावा कुछ अन्य जगहों पर अभी काम जारी है ! गोमती नदी को पार करने के बाद कुछ दूर चलकर हम राजमार्ग को छोड़कर एक सहायक मार्ग पर चल दिए, ये मार्ग एक रिहायशी कस्बे से होता हुआ मार्कन्डेय महादेव मंदिर की ओर जाता है ! घर से यहाँ पहुँचने में हमें लगभग आधे घंटे का समय लगा और यहाँ से मंदिर पहुँचने में लगभग 10 मिनट ! मंदिर के पास पार्किंग की व्यवस्था भी है, जहां मात्र 20 रुपए का मामूली शुल्क देकर आप गाड़ी खड़ी कर सकते है ! 

मार्कन्डेय महादेव मंदिर का प्रवेश द्वार

गाड़ी पार्किंग में खड़ी करके हम एक गलियारे से होते हुए गंगा नदी के घाट की ओर चल दिए, जो पार्किंग से लगभग आधा किलोमीटर दूर है ! इस मार्ग के दोनों ओर गाड़ियों की लाइन लगी थी, बहुत से लोग गाड़ी पार्किंग में ना लगाकर यहाँ घाट की ओर ले आते है और फिर यहाँ जाम की समस्या बन जाती है ! पूर्वाञ्चल के अलावा लोग बहुत दूर-2 से यहाँ दर्शन के लिए आते है, इन लोगों में नेता, अभिनेता, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सब रहते है ! सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों की लाइन खत्म हुई तो आगे बुजुर्ग और कमजोर तबके के लोग सड़क के दोनों ओर भक्तों से कुछ पाने की आस लगाए बैठे थे, कुछ ने तो चादर बिछा रखी थी, जिस पर चावल बिखरा हुआ था ! कुछ जगह ये चावल थैलियों में बांधकर भी रखे गए थे, यहाँ आने वाले श्रद्धालु पैसों के अलावा चावल और अन्य खान-पान की वस्तुएं भी दान करते है ! आगे बढ़ने पर सड़क किनारे कुछ दुकानदार भी थे, जो पूजा सामग्री के अलावा गंगाजल लाने के लिए प्लास्टिक और मिट्टी के बर्तन बेच रहे थे ! जैसे-2 हम घाट के नजदीक पहुंचते जा रहे थे सड़क के दोनों तरफ दुकानें सजी थी, यहाँ भी घाट पर चढ़ाने के लिए पूजा सामग्री और प्रसाद मिल रहा था, लेकिन मुझे सबसे आकर्षक लगे यहाँ मिलने वाले रंग-बिरंगी गमछे, अलग-2 डिजाइन और रंग के गमछे सबका ध्यान अपनी ओर खींच रहे थे !

रघुवंश चौराहा
सादात का रघुवंश चौराहा

रघुवंश चौराहा पार करते हुए 

सादात से आगे रास्ते में लिया एक चित्र

सादात सैदपुर के बीच रास्ते में कहीं

सादात से सैदपुर जाने का मार्ग

गोरखपुर-वाराणसी मार्ग का एक दृश्य

दाईं ओर मार्कन्डेय महादेव मंदिर को जाता मार्ग 

मंदिर पहुँचने से थोड़ा पहले

मंदिर के बगल में बना पार्किंग स्थल

थोड़ी देर बाद चलते हुए हम नदी किनारे घाट पर पहुँच गए, इस घाट का नाम मंदिर के नाम पर मार्कन्डेय महादेव घाट रखा गया है ! पहले ये घाट इतना बड़ा नहीं था, 3 साल पहले जब मैं यहाँ आया था तो घाट निर्माण कार्य चल रहा था लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ही इस घाट का विस्तारीकरण करके इसे पक्का कर दिया गया है ! अभी यहाँ श्रद्धालुओं की ज्यादा भीड़ नहीं थी, लेकिन घाट पर जितने भी लोग थे सभी अपने-2 क्रियाकलापों में व्यस्त थे, कुछ नदी किनारे पूजा-पाठ कर रहे थे तो कुछ पानी में डुबकी लगा रहे थे ! घाट पर घूम रहे पंडे और नौका चालक भी अपने काम में व्यस्त थे, दोनों की निगाहें यहाँ आने वाले हर श्रद्धालु पर थी, लोगों का मन्तव्य जाने बिना ये घाट पर आने वाले हर इंसान को आकर्षित करने में लगे थे, जहां पंडे व्यवस्थित तरीके से पूजा-पाठ कराने की बात कर रहे थे तो नौका चालक नाव में बिठाकर संगम तक घुमाने का आश्वासन दे रहे थे ! ऐसे ही घूमते हुए एक नाव चालक से हमने नौकायान के बाबत बात की, थोड़ा मोलभाव करके किराया तय हुआ और हम सब उसकी नाव में सवार हो गए ! आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मार्कन्डेय घाट से लगभग एक किलोमीटर दूर गंगा और गोमती का संगम है, गोमती नदी लखनऊ से आगे बढ़ने पर सुल्तानपुर, जौनपुर होते हुए यहाँ कैथी में आकर गंगा में मिल जाती है ! संगम पर भी एक नया घाट बनाया जा रहा है जो आने वाले समय में इस घाट पर जाने के मार्ग भी खुल जाएंगे ! घाट निर्माण का कार्य पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है, जो अब सुंदर आकार लेने लगा है, घाट पर राजस्थान से लाए गए गुंबद लगाए जा रहे है जो घाट के सौन्दर्यकरण को बढ़ाने का काम करेंगे ! घाट निर्माण के साथ ही कैथी से घाट तक आने के लिए एक पक्के मार्ग का निर्माण भी होना है, जिससे यात्रियों के लिए यहाँ आने का मार्ग सुगम हो जाएगा !

मार्कन्डेय महादेव घाट का एक दृश्य

मार्कन्डेय महादेव घाट का एक दृश्य

मार्कन्डेय महादेव घाट का एक दृश्य

मार्कन्डेय महादेव घाट का एक दृश्य

मार्कन्डेय महादेव घाट का एक दृश्य

वर्तमान में लोग नौकायान का आनंद लेते हुए संगम घाट को देखने के लिए नदी मार्ग से आते है ! जब ये घाट बनकर तैयार हो जाएगा तो यहाँ आने वाले लोगों के लिए ये आकर्षण का मुख्य केंद्र होगा ! प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की मार्कन्डेय महादेव मंदिर परिसर को पूर्वाञ्चल का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल में परिवर्तित करने की योजना है जिसके तहत मंदिर के आस-पास के 4 किलोमीटर के क्षेत्र को विकसित करना है इसके अंतर्गत यात्री प्रतीक्षालय, विश्राम घर, सार्वजनिक शौचालय, घाटों पर स्नान घर, पक्की सड़कें, लाइटें, नए प्रवेश द्वार, मंदिर के मुख्य द्वार तक स्टील बेरिकेडिंग शेड का निर्माण, और मंदिर के मुख्य द्वार पर पीतल के परत की स्थापना जैसे कार्य किए जाने है ! इसके अलावा नदी के उस पार के श्रद्धालुओं के आवागमन के लिए पीपा पुल का निर्माण भी होना है, जब ये सब बनकर तैयार हो जाएंगे तो निश्चित तौर पर यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक अलग अनुभव होगा ! हालांकि, किसी भी धार्मिक स्थल को विकास की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि फिर ऐसे धार्मिक स्थलों का व्यापारीकरण शुरू हो जाता है ! अब ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि मार्कन्डेय महादेव मंदिर को इस विकास की क्या कीमत चुकनी पड़ेगी ! 

देखिए मैं भी आपको नौका सवारी से दूर कहाँ ले गया, ऐसा कभी होता है तो आप मुझे टोक दिया कीजिए, वरना मैं यात्रा बीच में छोड़कर पता नहीं आपको लेकर कहाँ निकल जाऊँ ! चलिए, वापिस यात्रा पर लौटते है जहां हमारे नौका चालक ने किनारे से धकेलकर नाव को पहले पानी की धारा में किया और फिर इसमें लगी मोटर चला दी ! नाव तेजी से धारा की दिशा में चल दी और हम धीरे-2 हम घाट से दूर होते गए, नदी के बीच से देखने पर पता चलता है कि ये घाट भी काफी दूर तक फैला है ! वैसे, हमारे अलावा कई और नावें भी इस समय नदी में चल रही थी, सभी नाव वाले यात्रियों को लेकर संगम की ओर ही जा रहे थे ! बच्चे नाव में बैठकर बहुत खुश थे, जो उनके चेहरे से साफ झलक रहा था, अस्थिर मन भी गंगा की लहरों को देखकर शांत हो रहा था ! कुछ देर बाद हमारी नाव संगम के ठीक सामने खड़ी थी, यहाँ हमारी बाईं ओर से आती गोमती नदी आकर गंगा में मिल रही थी, नदी की चौड़ाई यहाँ काफी अधिक है ! संगम के पास बन रहा नया घाट यहाँ से साफ दिखाई देता है, निर्माण कार्य जारी है, अधिकतर काम पूरा हो चुका है जो रह गया है उम्मीद है वो जल्द ही पूरा हो जाएगा ! संगम के पास कुछ देर के लिए चालक ने नाव रोकी और फिर वापिस मार्कन्डेय घाट की ओर चल दिया, यहाँ से आगे कोई भी नाव नहीं जा रही थी ! 

नाव से दिखाई देता मार्कन्डेय महादेव घाट का एक दृश्य

गंगा नदी में नौकायान

हमारा चालक संगम की ओर नाव ले जाते हुए

संगम स्थल पर बन रहा नया घाट

नाव से दिखाई देती गंगा नदी

अगले 10 मिनट बाद हम वापिस मार्कन्डेय घाट पर पहुँच चुके थे, यहाँ नौकायान का भुगतान करने के साथ ही हम सब नाव से उतर गए, नौका चालक भी एक बार फिर से घाट की ओर नए यात्रियों को खोजने निकल पड़ा ! नाव से उतरकर हमने नदी किनारे पूजा की और फिर गंगाजल लेकर वापिस मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए, मंदिर पार्किंग स्थल के पास ही था, हम चाहते तो दर्शन के लिए पहले मंदिर भी जा सकते थे लेकिन सोचा गंगाजल से ही भोलेनाथ का जलाभिषेक करेंगे ! चलिए, जब तक हम मंदिर पहुँच रहे है, आपको इस धार्मिक स्थल से संबंधित कुछ जानकारी दे देता हूँ ! वाराणसी-गोरखपुर मार्ग पर कैथी गाँव के पास स्थित ये मंदिर उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थलों में से एक है, शिवरात्रि के अवसर पर तो यहाँ देश के अलग-2 हिस्सों से लाखों श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए आते है, तब यहाँ वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर से भी ज्यादा भीड़ होती है ! सावन के महीने में यहाँ मेला लगता है जो एक महीने तक चलता है, तब भी काफी लोग अपनी परेशानियों को दूर करने के लिए यहाँ मन्नतें लेकर आते है ! मार्कन्डेय मंदिर के बारे में कई कथाएं प्रचलित है, ऐसी ही एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में जब मार्कन्डेय जी का जन्म हुआ तो उन्हें आयु दोष था, जिसके कारण उनका जीवन मात्र 14 वर्ष का था ! ज्ञानी ब्राह्मणों की सलाह पाकर उनके पिता ऋषि मृकण्ड सपरिवार गंगा-गोमती के संगम तट पर शिवजी की आराधना करने लगे !

घाट पर लिया एक चित्र

घाट से मंदिर जाने का मार्ग

सड़क किनारे लगी दुकानें

घाट से मंदिर जाने का मार्ग
जैसे ही बालक मार्कन्डेय के जीवन के 14 वर्ष पूर्ण हुए, यमराज उन्हें लेने आ गए, उस समय मार्कन्डेय जी भी शिव आराधना में लीन थे, यमराज जैसे ही उनके प्राण लेने आगे बढ़े, तभी भगवान शिव प्रकट हुए ! शिव और यमराज में युद्ध हुआ, और अंतत यमराज को खाली हाथ वापिस लौटना पड़ा ! तब भगवान शिव ने मार्कन्डेय जी को अमरत्व का वरदान दिया और ये भी कहा कि इस धार्मिक स्थल पर शिवजी से पहले उनके इस भक्त की पूजा की जाएगी ! बस तभी से यहाँ महादेव के साथ उनके भक्त की भी पूजा होने लगी और ये स्थान मार्कन्डेय महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया ! एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार महाशिवरात्रि और उसके अगले दिन श्रीराम लिखकर बेलपत्र अर्पित करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है, ऐसी और भी कई कथाएं इस स्थान के बारे में प्रचलित है ! चलिए, वापिस यात्रा पर लौटते है जहां हम एक बार फिर से गोस्वामी तुलसी दास जी स्मृति द्वार से होते हुए मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर पहुँच गए है ! मंदिर तक जाने वाले इस गलियारे के दोनों ओर पूजा सामग्री, खिलौने, और श्रंगार का सामान लिए दुकानें सजी है, जबकि बीच में स्टील की रेलिंग लगी है, इन दुकानों के पीछे हमारी बाईं ओर पार्किंग स्थल है ! आज यहाँ कुछ ज्यादा भीड़ थी, क्योंकि 3 साल पहले जब मैं यहाँ आया था तो गिनती के लोग ही मंदिर परिसर में थे, तब हमने आराम से दर्शन किए थे लेकिन आज लोगों की भीड़ देखकर लग नहीं रहा कि दर्शन हो पाएंगे !

घाट से मंदिर जाते हुए बना गोस्वामी तुलसी दास स्मृति द्वार

मंदिर जाने के मार्ग पर दोनों ओर सजी दुकानें

मंदिर जाने के मार्ग पर दोनों ओर सजी दुकानें

गलियारे में एक दुकान से हमने मंदिर में चढ़ाने के लिए प्रसाद और अन्य पूजा सामग्री ले ली, जूते-चप्पल भी यहीं छोड़ दिए ! कुछ दूर चलने के बाद ये गलियारा मंदिर के प्रवेश द्वार पर आकर खत्म हो गया ! सफेद संगमरमर से बने प्रवेश द्वार पर स्वर्णिम परत चढ़ी है जिसपर शिवलिंग उकेरा गया है ! मुख्य द्वार पर 12 ज्योतिलिंगो की आकृतियां बनी हुई है और उनके नाम भी लिखे गए है ! मुख्य द्वार से प्रवेश करके हम मंदिर परिसर में दाखिल हुए, गर्भ गृह एक चबूतरे पर बने मंदिर के बीच में स्थित है, जिसके प्रवेश द्वार के ठीक सामने एक नंदी स्थापित है ! गर्भ गृह में शिवलिंग की स्थापना की गई है जिसके चारों तरफ चांदी का एक घेरा बनाया गया है, शिवलिंग के ऊपर भी चांदी का छत्र लगा है, जो देखने में बहुत सुंदर लगता है, गर्भ गृह में फोटोग्राफी वर्जित है, इसलिए यहाँ के फोटो हम नहीं ले पाए ! शिवलिंग पर जल चढ़ाने के बाद मिट्टी का पात्र मंदिर परिसर के पिछले भाग में जाकर तोड़ा जाता है, इसके लिए स्थान निर्धारित किया गया है ! इसके अलावा मुख्य परिसर में संतोषी माता का एक मंदिर भी है और कुछ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की गई है ! आज तो भीड़ की वजह से गर्भ गृह के दर्शन नहीं हो पाए, हम चाहते तो भीड़ में अन्य लोगों की तरह खड़े रहकर जल चढ़ा सकते थे लेकिन कोरोना महामारी को देखते हुए भीड़ में जाना हमें ठीक नहीं लगा, इसलिए हमने मंदिर के बाहर ही जल चढ़ा दिया ! इस लेख में कुछ चित्र मेरी पिछली यात्रा के है, जब हमने यहाँ आराम से दर्शन किये थे !

प्रवेश द्वार से दिखाई देता मंदिर का एक दृश्य

गर्भ गृह के प्रवेश द्वार का एक दृश्य

गर्भ गृह के बगल में बना एक मंदिर

मंदिर परिसर का एक दृश्य

मंदिर परिसर का एक दृश्य

मंदिर परिसर का एक दृश्य

मंदिर परिसर का एक दृश्य

मंदिर परिसर का एक दृश्य

मंदिर परिसर का एक दृश्य
मंदिर से बाहर आते हुए हमने स्मृति स्वरूप प्रवेश द्वार के पास कुछ फोटो भी लिए, और घर के लिए थोड़ा खरीददारी भी की ! मंदिर से बाहर आने वाले मार्ग के बीच में से होते हुए हम पार्किंग स्थल पहुंचे, यहाँ से गाड़ी लेकर चले तो वाराणसी-गोरखपुर राजमार्ग पर चढ़ने से पहले एक होटल में चाय-पानी के लिए रुके ! ये एक नया होटल बना था, साफ-सफाई का बढ़िया इंतजाम था, बैठने का भी अच्छा इंतजाम था ! होटल में गए तो चाय पीने थे लेकिन बच्चों ने ठंडा पीने की जिद कर दी, सामने गर्मा-गर्म समोसे और जलेबियाँ भी दिख गई, फिर क्या था सबने जमकर खाया, अगले आधे घंटे में खा-पीकर फ़ारिक हुए ! यहाँ से चले तो साढ़े ग्यारह बज रहे थे, वापसी में भी हम उसी मार्ग से आए जिससे सुबह गए थे, हालांकि, वापिस जाने के कुछ अन्य मार्ग भी है लेकिन ये मार्ग ठीक था तो हम दूसरे मार्ग पर नहीं गए ! घर पहुँचने में हमें आधा घंटा ही लगा और 12 बजे तक हम घर पर थे, घर जाकर थोड़ी देर आराम किया और फिर सब अपने-2 काम में व्यस्त हो गए ! इसके साथ ही आज का ये सफर खत्म होता है जल्द ही आपको फिर किसी नई जगह पर लेकर चलूँगा !

मंदिर से बाहर जाने का मार्ग

मंदिर से बाहर जाने का मार्ग

वाराणसी-गोरखपुर मार्ग पर बन रहा एक नया टोल प्लाजा

घर पहुँचने से पहले सादात में लिया एक चित्र

बस अब घर पहुँचने ही वाले है 

क्यों जाएँ (Why to go)अगर धार्मिक स्थलों पर घूमना आपको अच्छा लगता है तो मार्कन्डेय महादेव मंदिर आपके लिए एक बढ़िया विकल्प है, ये मंदिर वाराणसी से महज 30 किलोमीटर दूर है ! इस मंदिर को देखने आ रहे  है तो वाराणसी भी घूमते हुए जाइए, यहाँ देखने के लिए बहुत मंदिर है इसके अलावा बनारस के घाट तो दुनिया भर में प्रसिद्ध है अगर शाम को थोड़ा समय निकाल सकते है तो यहाँ दशावमेघ घाट पर रोज शाम को होने वाली गंगा आरती में ज़रूर शामिल हो ! 

कब जाएँ (Best time to go): आप साल के किसी भी महीने में यहाँ जा सकते है हर मौसम में यहाँ अलग ही आनंद आता है गर्मी के दिनों में भयंकर गर्मी पड़ती है तो सर्दी भी कड़ाके की रहती है !

कैसे जाएँ (How to reach): मार्कन्डेय महादेव मंदिर आने के लिए वैसे तो सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन रजवारी है लेकिन यहाँ बहुत गिनती की ट्रेनें आती है ! यहाँ का सबसे नजदीकी बड़ा रेलवे स्टेशन वाराणसी है जो यहाँ से 30 किलोमीटर दूर है ! वाराणसी में देश के हर कोने से ट्रेन आती है और वाराणसी से ग़ाज़ीपुर या गोरखपुर जाने वाली किसी भी बस में बैठकर आप यहाँ आ सकते है ! यहाँ का नजदीकी हवाई अड्डा बाबतपुर है जो यहाँ से 40 किलोमीटर दूर है ! 

कहाँ रुके (Where to stay): वैसे तो मार्कन्डेय महादेव मंदिर में रात्रि विश्राम के लिए धर्मशाला की व्यवस्था है लेकिन अगर आप होटल में रुकना चाहते है तो वाराणसी में रुकिए, वहाँ अच्छे विकल्प है ! वाराणसी से यहाँ आप पौने घंटे में पहुँच जाएंगे ! वाराणसी में 500 रुपए से लेकर 4000 रुपए तक के होटल मिल जाएँगे ! 

क्या देखें (Places to see): यहाँ घूमने के लिए इस मंदिर के अलावा मार्कन्डेय महादेव घाट है और गोमती-गंगा का संगम भी एक दर्शनीय स्थल है, गंगा में नौका की सवारी का आनंद भी ले सकते है !

2 comments:

  1. Pradeep bhai... Bahut acha lga aapka blog read krke.... Very interesting and knowledgeable.....

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    1. Thank You bhai Romit. Check karo aur dekho kya hai tumhare matlab ka blog par.

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