Wednesday, August 1, 2018

कालाढूंगी का कॉर्बेट वाटर फाल (Corbett Water Fall in Kaladungi)

वीरवार, 01 मार्च 2018

हमारा रानीखेत जाने का विचार एकदम से ही बना था, हुआ कुछ यूं कि शादी की सालगिरह के अवसर पर परिवार संग किसी यात्रा पर जाने का मन हुआ ! वैसे भी किसी पारिवारिक यात्रा पर गए हुए काफी समय हो गया था और फिर सालगिरह से अच्छा मौका क्या हो सकता था ? इसी बहाने परिवार संग शहर की भीड़-भाड़ से दूर पहाड़ों पर सुकून के कुछ पल बिताने का मौका भी मिल जायेगा, और रोजमर्रा की दिनचर्या से भी कुछ राहत मिल जाएगी ! मार्च के प्रथम सप्ताह में होली के अवसर पर छुट्टी के 3 दिन मिल रहे थे, 1 दिन की छुट्टी लेकर 4 दिन के लिए किसी लम्बी यात्रा पर जाया जा सकता था ! बस फिर क्या था, एक छुट्टी लेकर रानीखेत जाने की यात्रा की योजना बना ली, सोचा, इस बार की होली पहाड़ों पर ही मनाई जाए ! निर्धारित दिन हम समय से तैयार होकर सुबह सवा 5 बजे अपनी गाडी लेकर इस यात्रा के लिए घर से निकल पड़े ! रास्ते में एक जगह रूककर गाडी में पेट्रोल और सीएनजी की टंकी भी भरवा ली, सुबह का समय होने के कारण नोयडा तक खाली मार्ग मिला, नतीजन पौने 7 बजे तक हम नोयडा पार करते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग 24 पर जा चढ़े,! इस मार्ग पर आए 3 साल से अधिक का समय हो गया था, मुझे उम्मीद थी कि इतनी सुबह यहाँ ज्यादा जाम नहीं मिलेगा, लेकिन मेरा अंदाजा गलत था !
कालाढूंगी का कॉर्बेट वाटर फाल 

Monday, June 11, 2018

हुमायूँ के मक़बरे की सैर (A visit to Humayun’s Tomb, New Delhi)

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दिल्ली भ्रमण करता हुआ आज मैं आपको ले चल रहा हूँ निज़ामुद्दीन दरगाह के पास स्थित हुमायूँ के मक़बरे की सैर पर ! हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मक़बरे तक जाने के लिए आप रेलवे स्टेशन से उतरकर ऑटो या बस पकड़ सकते है, रिक्शे की सवारी का लुत्फ़ लेने के लिए आपको थोड़ी दूर पैदल चलना पड़ेगा, ई-रिक्शे की सवारी का आनंद लेने का मन हो तो वो भी आपको स्टेशन के पास ही मिल जायेंगे ! वैसे स्टेशन से इस मक़बरे की दूरी ज़्यादा नहीं है इसलिए अगर मौसम अच्छा हो तो आप ये यात्रा पैदल भी कर सकते है, लेकिन गर्मी ज्यादा हो तो पैदल ना ही जाएँ ! मैं भी ट्रेन से उतरने के बाद स्टेशन से बाहर निकला और कुछ घुमावदार रास्तों से होता हुआ पैदल ही मक़बरे की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिया ! इस बीच रास्ते में एक चौराहे के पास नीली गुम्बद भी है, जो एक ऐतिहासिक मुगलकालीन इमारत है, इस गुम्बद के चारों तरफ रेलिंग लगाईं गई है और अन्दर जाने पर पाबन्दी है ! मैं भी दूर से ही इस नीली गुम्बद की कुछ फोटो लेने के बाद आगे बढ़ गया, 15-20 मिनट बाद मैं मक़बरे के सामने पहुंचा !

हुमायूँ के मकबरे का एक दृश्य

Wednesday, May 23, 2018

जैसलमेर दुर्ग के मंदिर और अन्य दर्शनीय स्थल (Local Sight Seen in Jaisalmer)

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप जैसलमेर के कुछ पांच सितारा होटलों के बारे में पढ़ चुके है, सम से वापिस आकर हमने बाइक वापिस की और सोनार किले के अखय पोल के सामने पहुँच गए ! अखय पोल इस दुर्ग का वही प्रवेश द्वार है जिससे होते हुए कल हमने सोनार किले का भ्रमण किया था, अब आगे, रात के समय किले के प्रवेश द्वार को कृत्रिम रोशनी से सजाया गया था जो देखने में बहुत सुन्दर लग रही थी ! मुख्य द्वार से होते हुए हम किला परिसर में दाखिल हुए, थोडा अन्दर जाते ही बाईं तरफ बने पार्किंग क्षेत्र को पार करके आगे ऊँचाई पर इसी तरफ एक मंदिर स्थित है कल हम ये मंदिर नहीं देख पाए थे लेकिन आज हमारे पास पर्याप्त समय था तो इस मंदिर में दर्शन के लिए चल दिए ! चढ़ाई भरे मार्ग से होते हुए कुछ ही देर में हम मंदिर के सामने खड़े थे, मंदिर के बाहरी प्रवेश द्वार के पास जूते उतारकर हम मंदिर परिसर में दाखिल हुए ! मुख्य भवन के सामने एक खुला बरामदा है जहाँ बैठकर लोग भक्ति में ध्यान लगाते है, भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित इस मंदिर के मुख्य भवन में द्वारकाधीश की प्रतिमा स्थापित है, यहाँ द्वारकाधीश को दाढ़ी-मूंछ वाले रूप में दिखाया गया है ! 

जैसलमेर दुर्ग के अन्दर मंदिर का एक दृश्य 

Saturday, May 19, 2018

जैसलमेर के पांच सितारा होटल (Five Star Hotels in Jaisalmer)

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

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घूमने की दृष्टि से जैसलमेर बहुत बढ़िया शहर है, यहाँ आपको अपनी पसंद और बजट के हिसाब से खाने-पीने, घूमने, और रुकने के कई विकल्प मिल जायेंगे ! जहाँ एक ओर आपको रुकने के लिए सस्ते होटल, धर्मशाला और होमस्टे मिल जायेंगे वहीँ जैसलमेर और इसके आस-पास पांच सितारा होटलों और टेंटों की भी कमी नहीं है ! यही कारण है कि यहाँ हर वर्ष हज़ारों देसी-विदेशी सैलानी घूमने के लिए आते है ! यात्रा के इस लेख में मैं आपको जैसलमेर और इसके आस-पास के कुछ होटलों से सम्बंधित जानकारी ही देने वाला हूँ ! यात्रा के पिछले लेख में आप सम का भ्रमण कर चुके है, कुलधरा जाते हुए हमें रास्ते में पड़ने वाले एक पांच सितारा होटल जैसलकोट में जाने का मौका मिला था ! तो चलिए इसी होटल से शुरुआत करते है, हुआ कुछ यूं कि जब हम जैसलमेर से सम जाने वाले मार्ग को छोड़कर कुलधरा के लिए मुड़े तो कुछ दूर चलने के बाद हमें सड़क के बाईं ओर थोड़ी दूरी पर एक भव्य इमारत दिखाई दी ! दूर से देखने पर ये किसी महल जैसा लग रहा था लेकिन हमें अंदाजा हो गया था कि ये कोई होटल ही है ! शहर से दूर रेगिस्तान में ऐसी भव्य इमारत किसी का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित करेगी, मुख्य सड़क से एक सहायक मार्ग इस इमारत की ओर जा रहा था !

होटल जैसलकोट का एक दृश्य

Sunday, May 13, 2018

खाभा रिसोर्ट और सम में रेत के टीले (Khabha Resort and Sam Sand Dunes)

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप खाभा फोर्ट के बारे में पढ़ चुके है, फोर्ट देखने के बाद हम यहाँ से निकलकर खाभा रिसोर्ट की ओर चल पड़े, अब आगे, इस फोर्ट से खाभा रिसोर्ट की दूरी बहुत ज्यादा नहीं है, मुश्किल से 5 मिनट का समय लगा और हम रिसोर्ट के प्रवेश द्वार के सामने खड़े थे ! सड़क किनारे बाइक खड़ी करके हम प्रवेश द्वार से होते हुए रिसोर्ट परिसर में दाखिल हुए, यहाँ एक खुला मैदान है जिसमें बीच-2 में पेड़-पौधे भी लगे है ! पैदल चलने के लिए बने पक्के रास्ते से होते हुए हम अन्दर गए तो यहाँ कई झोपड़ीनुमा कमरे बने थे, एक तरफ तो टेंट भी लगे थे, ये सारी सुविधा यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए थी ! रोशनी के लिए छोटे-2 पोल लगाए गए थे जिनमें लाइटें लगी थी और बीच-2 में चबूतरे बने थे जिनपर टेबल और कुर्सियां रखी थी ! चबूतरों के चारों कोनों पर सजावट के लिए काले मटके रखे हुए थे, थोडा और आगे बढ़ने पर एक गोल चबूतरा आया, जिसके चारों तरफ लोगों के बैठने की व्यवस्था थी, जबकि बीच में अलाव जलाने का प्रबंध किया गया था ! कुल मिलाकर पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए यहाँ सारा इंतजाम किया गया था, रोजाना शाम ढलते ही राजस्थानी कलाकार यहाँ मेहमानों के लिए राजस्थानी लोकनृत्य और अन्य रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करते है !

सम से दिखाई देता टेंटों का एक दृश्य

Sunday, May 6, 2018

खाभा फोर्ट – पालीवालों की नगरी (Khabha Fort of Jaisalmer)

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

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जैसलमेर यात्रा के पिछले लेख में आप कुलधरा गाँव के बारे में पढ़ चुके है अब आगे, कुलधरा से चले तो ढाई बज रहे थे, कुछ ही देर में हम कुलधरा गाँव से निकलकर मुख्य मार्ग पर पहुँच गए ! ये मार्ग खाभा फोर्ट होता हुआ आगे जाकर जैसलमेर से सम जाने वाले मार्ग में मिल जाता है ! दिसंबर का महीना होने के बावजूद जब यहाँ तीखी धूप लग रही थी, तो सोचिये गर्मियों में तो क्या ही हाल होता होगा ! इधर भी सड़क के किनारे कंटीली झाड़ियों की भरमार थी, दूर तक फैले रेगिस्तान में कहीं-2 इक्का-दुक्का कीकर के पेड़ भी दिखाई दे रहे थे ! तपती दोपहरी में इस मार्ग पर गिनती के वाहन ही चल रहे थे, वैसे भी अधिकतर लोग कुलधरा देखकर सम जाने के लिए वापिस लौट जाते है ! गिनती के कुछ लोग ही ये किला देखने आगे जाते है, हम खाभा फोर्ट देखना चाहते थे, वैसे भी कुलधरा गाँव से खाभा फोर्ट की दूरी महज 17 किलोमीटर है तो हमें आने-जाने में कुल 34-35 किलोमीटर की  अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही थी लेकिन बदले में ये फोर्ट भी तो देखने को मिल रहा था ! कुछ दूर चलने के बाद एक चौराहा आया, हम बिना मुड़े सीधे चलते रहे और थोड़ी देर बाद डेढा गाँव पहुंचे, यहाँ एक पुलिस नाका भी था, वो अलग बाद है कि नाके पर कोई मौजूद नहीं था !

खाभा फोर्ट का एक दृश्य

Sunday, April 22, 2018

कुलधरा – एक शापित गाँव (Kuldhara – A Haunted Village)

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप लोद्रवा से वापिस आते हुए रास्ते में पड़ने वाले चुंधी-गणेश मंदिर में दर्शन कर चुके है, जैसलमेर पहुंचकर रात्रि में जैसलमेर दुर्ग के कुछ चित्र लेने के बाद हम भोजन करके आराम करने के लिए वापिस अपनी धर्मशाला पहुंचे ! अब आगे, दिनभर सफ़र की थकान होने के कारण रात को बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई, सुबह अपने नियमित समय पर सोकर उठे ! हजूरी सेवा सदन में चाहे खान-पान की सुविधा नहीं थी लेकिन गर्म पानी की बढ़िया व्यवस्था थी, सुबह-2 नहाने के लिए 15 रूपए प्रति बाल्टी के हिसाब से बढ़िया गर्म पानी मिल जाता था ! बिस्तर से निकलकर हम दोनों बारी-2 से नित्य-क्रम से निवृत होने में लग गए, वैसे तो रात भर आराम करने से सारी थकान दूर हो चुकी थी, लेकिन रही-सही कसर गर्म पानी से स्नान ने दूर कर दी ! धर्मशाला में खान-पान की कोई दुकान ना होने के कारण चाय पीने के लिए भी हमें बाज़ार का रुख करना पड़ता था, आज भी नहा-धोकर चाय पीने के लिए हमने बाज़ार का ही रुख किया ! यहाँ से निकलने से पहले हमने एक बैग में खाने-पीने का कुछ सामान रख लिया, और एक बार फिर से हम जैसलमेर की गलियों से होते हुए दुर्ग की ओर जाने वाले मार्ग पर चल पड़े !

कुलधरा गाँव का एक दृश्य

Wednesday, April 18, 2018

लोद्रवा का चुंधी-गणेश मंदिर (Chundhi Ganesh Temple of Lodruva)

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

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जैसलमेर यात्रा के पिछले लेख में आप लोद्रवा के जैन मंदिर घूम चुके है, मंदिर से बाहर निकले तो अँधेरा हो चुका था, गाडी में सवार होकर हम जैसलमेर के लिए वापसी कर रहे थे, इस बीच मन में उधेड़-बुन चल रही थी कि जैसलमेर पहुँच कर कठपुतली का शो देखा जाए या स्थानीय बाज़ार घूमा जाए ! आज दिनभर की यात्रा के पल भी मन के किसी कोने में घूम रहे थे और हम तेजी से जैसलमेर की ओर प्रस्थान कर रहे थे ! इस बीच सड़क पर एक ब्रेकर आया और भूरा राम इसे देख नहीं पाया, नतीजन, गाडी जोर से उछली और हमारा सिर गाडी की छत से टकराया ! मन में चल रहे सारे विचार एकदम से गायब हो गए, हम कुछ कहते उससे पहले भूरा राम ही बोल पड़ा, सरजी मुझे ब्रेकर दिखाई नहीं दिया, इसलिए गाडी उछल गई, आप लोगों को चोट तो नहीं लगी ! खैर, चिंता वाली कोई बात नहीं थी इसलिए हम समय गंवाए बिना फिर से आगे बढ़ गए, कुछ दूर जाने पर रास्ते में पैदल जा रहे एक वृद्ध ने हाथ देकर गाडी रुकने का इशारा किया तो हमने उसे भी अपने साथ बिठा लिया ! उसे पास के ही एक गाँव में जाना था, पैदल जाता तो जाने कितना समय लग जाता, हम उसे रास्ते में छोड़ते हुए आगे बढ़ गए !

चुंधी गणेश मंदिर के अन्दर का एक दृश्य

Tuesday, April 10, 2018

लोद्रवा के जैन मंदिर (Jain Temples of Lodruva)

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप जैसलमेर का बड़ा बाग देख चुके है, यहाँ से चले तो साढ़े पांच बज रहे थे, शाम होने लगी थी लेकिन फिर भी हल्की-2 धूप बाकी थी ! गाडी में सवार होकर कुछ ही देर में हम बड़ा बाग परिसर से निकलकर लोद्रवा जाने वाले मार्ग पर पहुँच गए ! अब आगे, जैसलमेर में मुख्य मार्गों को छोड़ दे तो सहायक मार्ग ज्यादा चौड़े नहीं है, लोद्रवा जाने वाले मार्ग का हाल भी कुछ ऐसा ही था, एकदम सीधी सड़क थी जो काफी दूर तक जाती दिखाई दे रही थी ! रास्ते में बीच-2 में कुछ उतार-चढ़ाव भी है और सड़क के दोनों ओर कंटीली झाड़ियां और नागफनी के पौधे है ! वैसे कुल मिलाकर शानदार दृश्य दिखाई दे रहा था, हमारी गाडी तेजी से आगे बढ़ रही थी, इस बीच सामने से जब कोई दूसरी गाडी आ जाती तो भूरा राम को गाडी सड़क से थोडा नीचे उतारनी पड़ती ! कुछ दूर जाने के बाद रास्ते में ही भूरा राम का गाँव पड़ा, गाडी सड़क के किनारे खड़ी करके कुछ देर के लिए वो गाँव में स्थित अपने घर गया ! परिवार के सदस्यों से मिलकर जब वो 10 मिनट बाद आया तो कुछ बच्चे भी उसके साथ थे, शायद उसके छोटे भाई-बहन थे !

लोद्रवा के जैन मंदिर का एक दृश्य


Saturday, April 7, 2018

जैसलमेर का बड़ा बाग (Bada Bagh of Jaisalmer)

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने जैसलमेर की गदीसर झील का भ्रमण किया, अब आगे, हम झील में नौकायान करके निकले तो शाम के पांच बजने वाले थे, भूरा राम के साथ गाडी में सवार होकर हम कुछ ही देर में हम यहाँ की भीड़-भाड़ से निकलकर एक खुले मार्ग पर पहुँच गए ! रास्ते में सड़क के किनारे पड़ने वाले होटलों में चहल-पहल शुरू हो चुकी थी, शाम के समय तो इन पांच-सितारा होटलों की रौनक देखते ही बनती है ! वास्तव में राजस्थान के पांच सितारा होटलों का कोई मुकाबला नहीं है, लम्बे-चौड़े क्षेत्र में फैले यहाँ के होटल किसी किले की तरह दिखाई देते है ! अँधेरा होते-2 इन होटलों में मद्दम रोशनी जगमगाने लगती है और यहाँ बजने वाला मधुर संगीत माहौल को रोमांटिक बना देता है, यहाँ सड़क के दोनों तरफ एक कतार में कई होटल है ! जिस मार्ग पर हम चल रहे थे ये मार्ग सम की ओर जाता है और शाम के समय इस मार्ग पर सम जाने वाले लोगों की भीड़ बढ़ जाती है, आज भी गाड़ियाँ हमारी गाडी के बगल तेजी से तेजी से सम के लिए निकल जा रही थी ! गनीमत थी कि हमें इस मार्ग पर ज्यादा दूर नहीं जाना था, थोडा आगे बढ़ने पर हम एक तिराहे पर पहुँच गए, यहाँ से सीधा जाने वाला मार्ग सम को निकल जाता है जबकि दाईं ओर जाने वाला मार्ग बड़ा बाग होते हुए लोंगेवाला को चला जाता है !
बड़ा बाग में बने छतरियां और स्मारक

Wednesday, April 4, 2018

जैसलमेर की गदीसर झील (Gadisar Lake of Jaisalmer)

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप जैसलमेर की प्रमुख हवेलियों का भ्रमण कर चुके है, नाथमल की हवेली देखने के बाद हम बड़ा बाग देखने जाने वाले थे लेकिन बड़ा बाग देखने से पहले हम रास्ते में पड़ने वाली गदीसर झील घूमना चाहते थे ! क्या पता, बाद में ये झील देखने के लिए समय मिले या नहीं, इसलिए आज जैसलमेर के आस-पास की जितनी जगहें देख लेंगे, कल पर दबाव कम हो जाएगा ! नाथमल की हवेली से निकलने के बाद 5-7 मिनट की यात्रा करके हम गदीसर झील के सामने पहुँच गए, हमें मोटरसाइकिल से यहाँ छोड़कर भूरा राम गाडी लेने चला गया ताकि बड़ा बाग़ घूमने जाने में आसानी रहे ! क्या कहा, कौन भूरा राम, अरे ये देखिये, हम भूरा राम के साथ जैसलमेर की हवेलियाँ घूम लिए और मैं भूरा राम से आपका परिचय करवाना ही भूल गया ! भूरा राम एक स्थानीय लड़का था जो हमें जैसलमेर घुमाने के लिए गाइड के रूप में मिला ! हुआ दरअसल कुछ यूं कि जब हम सोनार किले से शाही महल देख कर जैसलमेर की गलियों में भटक रहे थे तो एक गली से गुजरते हुए हम एक चित्रकार के घर के सामने पहुंचे ! यहाँ कुछ चित्रों को सूखने के लिए बाहर लटकाया गया था, ये चित्र इतने सुन्दर थे कि इनपर नज़र पड़ते ही हमारे कदम अपने आप ही रुक गए ! 


गदीसर झील का प्रवेश द्वार (टीलों की द्वार)

Friday, March 30, 2018

जैसलमेर की शानदार हवेलियाँ (Beautiful Haveli’s of Jaisalmer)

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

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इस यात्रा के पिछले लेख में आप जैसलमेर दुर्ग का भ्रमण करते हुए यहाँ स्थित राजा और रानी के शाही महल देख चुके है, महल से बाहर आने के बाद हम जैसलमेर दुर्ग की संकरी गलियों से होते हुए बाहर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! इस महल के अलावा जैसलमेर शहर में घूमने के लिए अभी गदीसर झील, मंदिर पैलेस, और यहाँ की विश्व प्रसिद्द हवेलियाँ अभी बाकी है ! राजस्थानी परिधान और साज सज्जा का सामान लेने के लिए जैसलमेर में कई बाज़ार है, इन सभी जगहों के बारे में बारी-2 से बताऊंगा, चलिए, फिल्हाल दुर्ग का भ्रमण जारी रखते हुए आज के सफ़र की शुरुआत करते है जैसलमेर की हवेलियों से, जो अपनी सुन्दरता के लिए देश ही नहीं, विदेशों में भी प्रसिद्द है ! जैसलमेर में पीले-2 पत्थरों से बनी ऐसी कई विशाल और सुन्दर हवेलियाँ है जिन्हें शाही अंदाज में सजाया गया है और जिनके दीदार के लिए रोजाना हज़ारों देसी-विदेशी पर्यटक राजस्थान के इस रेगिस्तान का रुख करते है ! इन बहुमंजिला हवेलियों में अनगिनत कमरे है, जिनकी बालकनी और दरवाजों पर विशेष कलाकृतियाँ बनाई गई है, पत्थरों को तराश कर बनाई गई ये कलाकृतियाँ राजस्थानी कलाकारी का एक उत्कृष्ट नमूना है जो यहाँ आने वाले पर्यटकों का ध्यान बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है !
सालम सिंह की हवेली का एक दृश्य

Saturday, March 24, 2018

जैसलमेर के सोनार किले की सैर (A Visit to Jaisalmer Fort)

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप जोधपुर से जैसलमेर पहुँचने और यहाँ रुकने का इंतजाम करने के हमारे संघर्ष के बारे में पढ़ चुके है ! दोपहर का भोजन करने के बाद हम सदर बाज़ार से होते हुए जैसलमेर दुर्ग के अखय पोल के सामने पहुंचे, अब आगे, अखय पोल किले में जाने का एक बाहरी प्रवेश द्वार है इस द्वार से होते हुए महल तक जाने के लिए आपको 3 और द्वार पार करने होंगे जिनके नाम क्रमश: सूरज पोल, गणेश पोल और हवा पोल है ! जैसे-2 हम आगे बढ़ते जायेंगे, मैं इन द्वारों का वर्णन करता रहूँगा ! अखय पोल के ठीक सामने एक व्यस्त चौराहा है, जहाँ हमेशा ऑटो वालों का जमावड़ा लगा रहता है लेकिन फिर भी यातायात व्यवस्था को दुरुस्त बनाए रखने के लिए यहाँ पुलिस वाले भी तैनात किये गए है ! अखय पोल द्वार के दोनों तरफ शाही ध्वज के साथ ढाल और भाले लगाए गए है ! इस प्रवेश द्वार से अन्दर जाते ही एक खुला क्षेत्र है जहाँ दाईं ओर तो एक कतार में कई दुकानें है जबकि बाईं ओर एक पार्किंग स्थल है ! यहाँ खड़े होकर देखने से इस दुर्ग की विशालता का अंदाजा हो जाता है, कहते है जैसलमेर भारत का इकलौता दुर्ग है जिसमें वर्तमान में भी लोग निवास करते है ! पार्किंग स्थल से थोडा आगे बढ़ने पर बाईं ओर चबूतरे पर एक मंदिर बना है, जिसका वर्णन मैं इस यात्रा के अंतिम लेख में करूँगा !



जैसलमेर किले के अन्दर महल का एक दृश्य

Monday, March 19, 2018

जोधपुर से जैसलमेर की रेल यात्रा (A Train Trip from Jodhpur to Jaisalmer)

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने जोधपुर के क्लॉक टावर और कुछ प्रमुख मंदिरों के बारे में पढ़ा, जोधपुर घूमने के बाद हम रात्रि ट्रेन पकड़कर जैसलमेर के लिए प्रस्थान कर चुके है ! अब आगे, रात को जब हमारी ट्रेन जोधपुर से चली तभी कुछ दलाल हमारी कोच में घूम रहे थे, जो जैसलमेर में सस्ता होटल दिलाने के नाम पर लोगों को बेवकूफ बनाते है ! ट्रेन के हर कोच में ऐसे 2-3 दलाल रहते है, रात को ट्रेन चलते ही ये यात्रियों में से अपना शिकार ढूंढना शुरू कर देते है ! चलती ट्रेन में होटल के पम्पलेट बांटे जाते है जिसमें होटल के कमरों की फोटो, और वहां मिलने वाली सुख-सुविधाएं से सम्बंधित जानकारी रहती है ! इसी पम्पलेट में होटल सस्ता देने का कारण भी बताया जाता है, जिसे पढ़कर अच्छे-खासे पढ़े लिखे आदमी भी आसानी से इन दलालों के जाल में फँस जाते है ! खासतौर से अगर कोई जैसलमेर पहली बार आ रहा हो तो उसका इनके जाल में फंसने की पूरी संभावना रहती है, ऐसे ही दलाल जयपुर से जैसलमेर आने वाली ट्रेन में भी घूमते रहते है ! मेरी आप लोगों से अपील है कि अगर आप जैसलमेर घूमने आ रहे है तो इन दलालों से दूर ही रहे, वरना आपका घूमने का मजा तो किरकिरा होगा ही, आप बुरे अनुभव के साथ यहाँ से वापिस जायेंगे !

मंदिर पैलेस का एक दृश्य

Friday, March 16, 2018

जोधपुर का क्लॉक टावर और कुछ प्रसिद्द मंदिर (Temples and Clock Tower of Jodhpur)

रविवार, 24 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने बालसमंद और कायलाना झील के बारे में पढ़ा, दोनों झील देखने के बाद हम एक माल में पहुंचे ! अब आगे, मॉल से निकले तो कुछ देर बाद हम राव जोधा की मूर्ति के पास से होकर ही निकले, शहर के बाहर ही बाहर होते हुए हम बाइक वाले के पास पहुंचे ! स्कूटी वापिस करके हमने अपने कागज़ वापिस लिए और पैदल ही जोधपुर के क्लॉक टावर की ओर चल दिए, कल हम क्रिसमस की वजह से क्लॉक टावर नहीं देख पाए थे, इसलिए आज तो इसे देखना ही था ! टहलते हुए कुछ बाज़ारों से निकलकर हम क्लॉक टावर पहुंचे, क्लॉक टावर के पास भी एक बड़ा बाज़ार है जहाँ खान-पान से लेकर साज-सज्जा का सामान मिलता है, बाज़ार के बीच से निकलकर हम क्लॉक टावर के सामने खड़े थे ! चलिए, अन्दर जाने से पहले मैं आपको इस क्लॉक टावर से सम्बंधित कुछ जरुरी जानकारी दे देता हूँ ! सन 1910 में राजा सरदारसिंह के शासनकाल में जोधपुर में नई मंडी के पास एक बाज़ार बनवाया गया, इस बाज़ार का नाम सरदार सिंह के नाम पर ही था ! चौपड़ के आकर में बने इस बाज़ार के बीचों-बीच सौ फुट ऊंचे एक घंटाघर का निर्माण करवाया गया, जिसमें तीन लाख रूपए की घडी लगवाई गई !


जोधपुर के क्लॉक टावर का एक दृश्य

Tuesday, March 13, 2018

जोधपुर की बालसमंद और कायलाना झील (Balasmand and Kaylana Lake of Jodhpur)

रविवार, 24 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप मंडोर उद्यान घूम चुके है, पार्किंग से अपनी स्कूटी लेने के बाद हम वापिस जोधपुर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! अब आगे, कुछ दूर चलने के बाद हम मुख्य मार्ग को छोड़कर अपनी दाईं ओर जा रहे एक मार्ग पर मुड गए, ये बीकानेर-बाड़मेर मार्ग था, इस पर ज्यादा यातायात नहीं था ! कुछ दूर चलने के बाद चढ़ाई भरा मार्ग शुरू हो गया, यहाँ सड़क किनारे पेड़-पौधे तो थे लेकिन आस-पास खनन क्षेत्र होने के कारण धूल भी बहुत उड़ रही थी ! लगभग 3 किलोमीटर चलने के बाद हम सड़क के बाईं ओर जा रहे एक कच्चे मार्ग पर मुड गए ! यहाँ दूर तक फैली पत्थरों की खदानें थी, जहाँ बड़े-2 पत्थरों को काट कर भवन निर्माण के लिए पत्थर निकाले जा रहे थे ! कहीं मशीनों से काम लिया जा रहा था तो कहीं मजदूर पत्थर तोड़ने में लगे थे, बाहरी लोगों का आवागमन तो यहाँ ना के बराबर ही था ! यहाँ काम करने वाले लोगों के अलावा हम ही थे जो इस मार्ग पर चल रहे थे, हमारे लिए सांस लेना भी दूभर हो रहा था लेकिन फिर भी हिम्मत करके हम घुमावदार रास्तों से होते हुए आगे बढ़ते रहे ! कुछ दूर चलने के बाद गूगल मैप ने रास्ता दिखाना बंद कर दिया, देवेन्द्र असमंजस में था कि अब किधर जाए ! अब यहाँ कोई पक्का मार्ग तो था नहीं, कच्चे मार्ग पर ही ट्रेक्टर और ट्रकों से पत्थरों की ढुलाई हो रही थी !


balasmand lake
बालसमंद झील का एक दृश्य (A view of Balasmand Lake)

Saturday, March 10, 2018

रावण की ससुराल और मारवाड़ की पूर्व राजधानी है मण्डोर (Mandor, the Old Capital of Marwar)

रविवार, 24 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप उम्मेद भवन घूम चुके है, अब आगे, उम्मेद भवन से बाहर निकले तो पार्किंग से अपनी स्कूटी लेकर हम उसी मार्ग से वापिस आ गए जिससे यहाँ आए थे ! कुछ ही देर में हम उम्मेद भवन वाले मार्ग से निकलकर मुख्य मार्ग पर पहुँच गए, फिर एक फ्लाईओवर से होते हुए हम रास्ते में पड़ने वाले एक बाज़ार को पार करने के बाद मंडोर उद्यान पहुंचे ! यहाँ उद्यान के सामने ही एक पार्किंग स्थल है, अपनी स्कूटी पार्किंग में खड़ी करके हम उद्यान के प्रवेश द्वार की ओर बढे, लेकिन अन्दर जाने से पहले हमारी नज़र सड़क के उस पार स्थित मिठाइयों की दुकानों पर पड़ी ! हमने मन ही मन सोचा उद्यान घूमने में तो काफी समय लग जायेगा इसलिए अन्दर जाने से पहले पेट-पूजा कर लेते है, पता नहीं अन्दर कुछ खाने को मिलेगा भी या नहीं ? फिर सड़क के उस पार जाकर हमने एक दुकान पर रूककर चाय पी और कचोरियाँ खाई, देवेन्द्र को शायद ये ज्यादा अच्छी नहीं लगी, लेकिन अपने को ये गरमा-गर्म कचोरियाँ खाकर मजा आ गया और भूख भी कुछ हद तक शांत हो गई ! कचोरियाँ निबटाकर हम प्रवेश द्वार से होते हुए उद्यान में दाखिल हुए, जहाँ अन्दर जाने के लिए पक्का मार्ग बना है और मार्ग के किनारे चलने के लिए फुटपाथ भी है, जिसपर थोड़ी-2 दूरी पर फेरी वाले अपनी दुकान सजाये बैठे है !


मंडोर उद्यान में बने देवल (Deval in Mandor Garden)

Monday, February 26, 2018

जोधपुर के महाराजा का निवास स्थल है उम्मेद भवन (Umaid Bhawan Palace, The Residence of King of Marwar)

रविवार, 24 दिसंबर 2017

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जोधपुर यात्रा के पिछले लेख में आपने जसवंत थड़ा के बारे में पढ़ा, दिनभर घूमने के बाद रात को अपने होटल की छत पर बंगाली परिवार से बातचीत के बाद हम अपने कमरे में सोने आ गए ! अब आगे, कल दिनभर की थकान के कारण रात को बिस्तर पर जाते ही नींद आ गई, रात को थोडा ठंडा मौसम होने के बावजूद बढ़िया नींद आई और सुबह समय से सोकर उठे ! आज घूमने वाली सारी जगहें शहर से थोडा दूर थी इसलिए हमारा विचार सबसे पहले किराए पर एक मोटरसाइकिल लेने का था ताकि सुगम यात्रा सुनिश्चित कर सके ! सुबह ये समय यहाँ भी ठंडा मौसम था, लेकिन दिन में यहाँ तापमान सामान्य था ! बिस्तर से उठने के बाद हम बारी-2 से समय से नहा-धोकर तैयार हो गए और अपने बैग में खाने-पीने का कुछ सामान लेकर पैदल ही स्टेशन की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! मैंने कल स्टेशन से होटल जाते हुए किराये पर मिलने वाली मोटरसाइकिल की दुकान देखी थी ! हमने सोच लिया था कि अगर किराए पर बाइक मिली तो ठीक वरना ऑटो से ही घूम लेंगे ! रास्ते में एक-दो दुकानों से किराए पर मिलने वाली बाइकों से सम्बंधित जानकारी भी लेनी चाही, लेकिन इस बाबत किसी से कोई सहायता नहीं मिली ! आखिरकार हम स्टेशन वाली रोड पर पहुँच गए, स्टेशन से करीब 200 मीटर पहले हमें अपनी बाईं ओर किराए पर बाइक का एक विज्ञापन दिखाई दिया !



उम्मेद भवन पैलेस का एक दृश्य

Wednesday, February 21, 2018

मारवाड़ का ताजमहल है जसवंत थड़ा (Jaswant Thada, A Monument of Rajpoot Kings)

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप मेहरानगढ़ दुर्ग के महल देख चुके है, किले से निकलने से पहले मैंने आपको चामुंडा देवी के दर्शन भी करवा दिए ! अब आगे, किले से घूमकर निकले तो शाम के साढ़े चार बज रहे थे, मेरी जानकारी के अनुसार जसवंत थड़ा में शाम 5 बजे तक ही प्रवेश मिलता है ! अब यहाँ से निकलकर जसवंत थड़ा पहुँचते-2 ही 15-20 मिनट लग जायेंगे, इसलिए हमारा विचार इसे कल ही देखने का था, लेकिन किले में मौजूद एक सुरक्षा कर्मचारी से पूछने पर पता चला कि शाम साढ़े पांच बजे तक इसमें प्रवेश किया जा सकता है ! ये सुनकर हम किले से निकलकर तेज क़दमों से जसवंत थड़ा की ओर जाने वाले मार्ग पर चल पड़े, एक विचार ऑटो में जाने का भी हुआ लेकिन आस-पास कोई खाली ऑटो ना होने के कारण ये विचार त्याग दिया ! 10-15 मिनट की पद यात्रा करके हम मुख्य मार्ग को छोड़कर जसवंत थड़ा जाने वाले मार्ग पर पहुँच गए, मेहरानगढ़ किले से निकलते ही रास्ते में हमें सड़क किनारे एक तालाब भी दिखाई दिया, लेकिन इसका पानी बहुत गन्दा था इसलिए हमने इसकी फोटो भी नहीं ली ! मुख्य मार्ग से जसवंत थड़ा जाने वाले मार्ग पर मुड़ते ही सड़क के दाईं ओर एक पहाड़ी पर हमें घोड़े पर सवार राव जोधा की मूर्ति दिखाई दी !


जसवंत थड़ा का एक दृश्य

Saturday, February 17, 2018

मेहरानगढ़ दुर्ग के महल (A Visit to Palaces of Mehrangarh Fort, Jodhpur)

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आप मेहरानगढ़ के संग्रहालय में स्थित हाथी-हौदे, पालकियां और हुक्के देख चुके है, अब आगे, तस्वीर स्टूडियों से बाहर आने के बाद अगला नंबर था “दौलत खाना” देखने का, लेकिन अन्दर जाने से पहले हम कुछ देर श्रृंगार चौकी के पास बने चबूतरे के किनारे बैठ कर महल की दीवारों पर की गई कारीगरी नक्काशीदार जालियों को जी भरकर देखना चाहते थे ! सूर्य की रोशनी जब इन जालियों की ज्यामितीय नक्काशी के बीच से निकल कर आती है तो बहुत सुन्दर लगती है ! यहाँ खाली बैठे रहना भी एक सुखद एहसास देता है, मन करता है यहाँ घंटो बैठकर यूँ ही इन नक्काशियों को देखते रहे, वैसे ये जालियां पर्दा प्रथा की परंपरा को भी कायम रखती है ! आप देख सकते है कि यहाँ खड़े होकर जालियों के उस पार देखना संभव नहीं है लेकिन जालियों के उस पार से बाहर देखना बहुत आसान है ! राजपरिवार की महिलाएं सामने आए बिना इन जालियों के पीछे से ही नीचे बरामदे में होने वाली कार्यवाही देखा करती थी ! महल की खिडकियों के ऊपर बने ये झरोखे झोपड़ियों की छत से प्रभावित थे, ये जाली और झरोखे, राजपूत वास्तुकला का हिस्सा है, कुछ समय बैठने के बाद हम दौलतखाना देखने के लिए उठ गए !


दौलतखाने में रखी एक पालकी 

Tuesday, February 13, 2018

जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग की सैर (A Visit to Mehrangarh Fort, Jodhpur)

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने मेहरानगढ़ किले के इतिहास के बारे में पढ़ा, टिकट लेने के बाद हम जयपोल द्वार से होते हुए किले के अन्दर प्रवेश कर चुके है ! अब आगे, किले के बाहरी द्वार पर बने तोप के गोलों के निशानों के बारे में थोड़ी जानकारी तो मैं आपको पिछले लेख में दे ही चुका हूँ ! ये गोले उन्नीसवीं सदी के शुरू में हुए एक लम्बे युद्ध के दौरान दागे गए थे ! जब तत्कालीन मारवाड़ शासक की अचानक मृत्यु हो गई, तो रीति के अनुसार उनकी होने वाली मंगेतर उदयपुर की राजकुमारी का विवाह राज्य के नए उत्तराधिकारी महाराजा मानसिंह से होना था ! लेकिन उदयपुर के महाराणा इस रीति से सहमत नहीं थे और उन्होंने राजकुमारी का विवाह जयपुर के महाराजा से तय कर दिया ! इस निर्णय से राठौर वंश की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची, परिणामस्वरूप गुस्से में आकर जयपुर की तरफ बढ़ते विवाह के उपहारों से भरे कारवां पर मानसिंह ने हमला कर दिया और युद्ध प्रारंभ हो गया ! इस युद्ध में मानसिंह पराजित हुए और मेहरानगढ़ लौट आए, अगले 6 महीने तक जयपुर की सेना ने इस किले के चारों तरफ घेरा डाले रखा, स्थिति बहुत गंभीर थी, भोजन और पानी की किल्लत भी हुई ! लेकिन अपने पूरे काल में मेहरानगढ़ के किले पर कोई भी बलपूर्वक जीत हासिल नहीं कर सका !

मेहरानगढ़ के संग्रहालय में रखा एक हाथी-हौदा 

Saturday, February 10, 2018

जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग का इतिहास (History of Mehrangarh Fort, Jodhpur)

शनिवार, 23 दिसंबर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने दिल्ली से जोधपुर पहुँचने तक की यात्रा के बारे में पढ़ा, जोधपुर में कमरा लेने के बाद एक बैग में खाने-पीने का कुछ सामान लेकर हम मेहरानगढ़ किला देखने निकल पड़े ! अब आगे, होटल से निकलने के बाद हम जोधपुर के त्रिपोलिया बाज़ार से होते हुए किले की ओर बढ रहे थे, कुछ दूर तक तो रास्ता समतल था लेकिन जैसे-2 हम किले के करीब पहुँचते गए, हल्की-2 चढ़ाई आती गई और अंत में तो एकदम खड़ी चढ़ाई आ गई ! इस मार्ग पर चलते हुए हमें कई सैलानी मिले, कुछ स्थानीय थे तो कुछ विदेशी, इनमें से कुछ लोग किले की ओर जा रहे थे तो कुछ किला देखकर वापिस आ रहे थे ! किले से थोड़ी पहले हम फोटो खींचने के लिए एक ऊंची जगह पर रुके, यहाँ से दूर तक फैला जोधपुर शहर दिखाई दे रहा था ! आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि जोधपुर में अधिकतर घरों का रंग नीला है जिस कारण इसे नीली नगरी भी कहा जाता है ! हालांकि, जहाँ खड़े होकर हम फोटो खींच रहे थे वहां से ये नीला शहर नहीं दिखाई देता, शहर का ये नया हिस्सा बाद में बसा है जबकि नीला शहर पुराना जोधपुर है जो किले के पीछे स्थित है ! ये जोधपुर के प्राचीन इलाकों में से एक है और इसे ब्रहमनगरी के नाम से भी जाना जाता है, इस नीले शहर का वर्णन मैं किले के भ्रमण के दौरान करूँगा !


मेहरानगढ़ किले के अन्दर का एक दृश्य

Friday, January 26, 2018

दिल्ली से जोधपुर की ट्रेन यात्रा (A Train Journey from Delhi to Jodhpur)

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

केदारनाथ से वापिस आने के बाद 2 महीने बीतने को थे, इस बीच काम की व्यस्तता के कारण किसी भी यात्रा पर जाने का संयोग नहीं बना था, सर्दियों ने दस्तक दे दी थी और ये वर्ष भी अपनी समाप्ति की ओर था ! जब काम करते-2 मन ऊब गया तो आखिरकार दिसंबर के तीसरे सप्ताह में एकदम से घूमने जाने का कीड़ा जाग उठा ! लेकिन इस बार पहाड़ों पर जाने की इच्छा नहीं हो रही थी, इसलिए सोचा क्यों ना इस बार राजस्थान में ही कहीं घूम आऊँ ! क्रिसमस की छुट्टी की वजह से एक लम्बा सप्ताह मिल रहा था, इसलिए मैंने 2 अतिरिक्त छुट्टियाँ लेकर 5 दिवसीय यात्रा की योजना बना ली ! साल का अंत होने के कारण हर जगह अच्छी भीड़-भाड़ मिलने वाली थी, टिकट मिलने की उम्मीद भी ना के बराबर ही थी ! आनन-फानन में ट्रेन की टिकटें देखी तो स्लीपर में ही कन्फर्म टिकटें मिल रही थी ! वैसे राजस्थान वाले रूट पर टिकटों को लेकर ज्यादा मारामारी नहीं थी, वरना इस समय देश के किसी दूसरे हिस्से में कन्फर्म टिकटें मिलना काफी मुश्किल था ! मेरी इस 5 दिवसीय यात्रा पर देवेन्द्र भी मेरे साथ जा रहा था, और हम इस यात्रा में जोधपुर, जैसलमेर, और बीकानेर की यात्रा करने वाले थे ! इससे पहले देवेन्द्र और मैं केदारनाथ और शिमला की यात्रा पर भी साथ जा चुके है ! निर्धारित दिन हम अपने-2 दफ्तर से काम निबटा कर इस यात्रा के लिए निकल पड़े !


जोधपुर रेलवे स्टेशन के बाहर का एक दृश्य

Sunday, January 21, 2018

सालासर बालाजी – जहाँ दाढ़ी-मूछ वाले हनुमान जी विराजमान है (Temple of Lord Hanuman in Salasar Balaji)

शनिवार, 16 सितम्बर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने खाटूश्याम से सालासर पहुँचने तक की यात्रा के बारे में पढ़ा, अब आगे, सालासर पहुँचते-2 ही दोपहर हो गई थी और सबको तेज भूख लग रही थी । सुबह खाटूश्याम से चलते समय हल्का-फुल्का नाश्ता ही किया था, जो सालासर पहुँचने से पहले ही पच चुका था । धर्मशाला में थोड़ी देर आराम करने के बाद हम पेट पूजा करने के लिए यहाँ से थोड़ी दूर स्थित बाज़ार की ओर चल दिए, बाज़ार की जानकारी हमने पार्किंग से आते हुए वहां खड़े एक व्यक्ति से ले ली थी । धर्मशाला से निकले तो हम टहलते हुए मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर पहुँच गए, यहाँ अच्छा-ख़ासा बाज़ार था, बाज़ार के बीच में ही मंदिर का प्रवेश द्वार भी है ! बाज़ार में खान-पान की कई दुकानें थी, हम महालक्ष्मी भोजनालय पर जाकर रुके । यहाँ हमने 100 रूपए थाली के हिसाब से पहले एक थाली ली और भोजन का स्वाद चखा, खाना बढ़िया लगा तो सबके लिए थालियाँ मंगवा ली । दाल-चावल, रोटी-सब्जी, अचार, सलाद सब था इस थाली में और भरपेट था, खाना खाकर मजा आ गया, अब तो इतना खाना खा लिया था कि शायद रात को खाने की ज़रूरत भी ना पड़े ।

सालासर से वापिस आते हुए रास्ते में लिया एक चित्र

Wednesday, January 17, 2018

खाटूश्याम से सालासर बालाजी की सड़क यात्रा (A Road Trip from Khatu Shyam to Salasar Balaji)

शनिवार, 16 सितम्बर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने खाटूश्याम के बारे में पढ़ा, दर्शन करने के बाद हम खा-पीकर यहाँ से चले तो कुछ ही देर में मुख्य मार्ग को जोड़ने वाले तिराहे पर पहुँच गए ! रात को हम दाईं तरफ से आए थे और अब हमें बाईं ओर मुड़ना था, वैसे रास्ता इतना भी मुश्किल नहीं था लेकिन रात को अँधेरा होने की वजह से धर्मशाला ढूँढने में हमें थोड़ी परेशानी हुई थी ! अब यहाँ से सालासर जाते हुए हम रास्ते में पड़ने वाली अन्य जगहों के अलावा रेवासा झील भी देखना चाहते थे जो खाटूश्याम से मात्र 29 किलोमीटर दूर है हालांकि, ये झील मुख्य मार्ग से थोडा हटकर है ! झील के पास ही जीण माता का प्रसिद्द मंदिर भी है, गूगल मैप का सहारा लेकर हम इस झील की ओर जाने वाले मार्ग पर चल दिए ! खाटू से निकलकर हम रींगस मार्ग पर चल रहे थे, थोड़ी दूर जाने पर मुख्य मार्ग से एक रास्ता अलग हो रहा था, हम एक चरवाहे से पूछकर मुख्य मार्ग पर ही चलते रहे ! थोड़ी आगे बढ़ने पर सड़क के किनारे एक मंदिर दिखाई दिया, मंदिर की बाहरी दीवार इतनी ऊंची थी कि मुख्य ईमारत का कुछ अता-पता नहीं चल रहा था, बाहर से देखने पर मंदिर भी कुछ ख़ास नहीं लग रहा था लेकिन फिर भी जाने क्यों हम सबकी इच्छा इस मंदिर में जाने की हुई !


श्रीराम मंदिर के अन्दर का एक दृश्य 

Saturday, January 13, 2018

खाटूश्याम – कलयुग में कृष्ण के अवतार (Khatu Shyam Temple of Rajasthan)

शनिवार, 16 सितम्बर 2017

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा किस तरह हम गुडगाँव से निकलकर देर रात खाटूश्याम पहुंचे और सुबह जल्दी उठकर मंदिर में दर्शन के लिए चल दिए ! अब आगे, पूजा सामग्री लेकर हम बाहरी प्रवेश द्वार से होते हुए मंदिर परिसर में पहुंचे, यहाँ लोहे के पाइप की रेलिंग नहीं है ! इन रेलिंग रेलिंग को पार करते हुए हम मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार की ओर चल दिए, इस समय तो यहाँ ज्यादा भीड़ नहीं थी, गिनती के कुछ लोग ही मंदिर परिसर में थे ! जैसे-2 दिन चढ़ता जायेगा, यहाँ आने वाले श्रधालुओं की भीड़ भी बढती जाएगी, श्रधालुओं की संख्या बढ़ने पर ये रेलिंग ही भीड़ को नियंत्रित करती है ! लोग कतार में खड़े होकर इन रेलिंग से होते हुए मंदिर के मुख्य भवन में प्रवेश करते है, मुख्य भवन में जाने के लिए आपको कुछ सीढ़ियों से होकर जाना होता है ! इस मंदिर में श्याम के शीश की पूजा होती है, हर सुबह आरती से पहले श्याम का श्रृंगार होता है, और फिर आरती के बाद भोग लगाया जाता है ! इस सारी प्रक्रिया के दौरान मंदिर के द्वार तो खुले रहते है लेकिन मूर्ति के आगे एक पर्दा लगा दिया जाता है, भोग लगाने के बाद आम लोगों के दर्शन हेतु ये पर्दा हटा दिया जाता है ! जब हम मंदिर में पहुंचे तो श्रृंगार की तैयारी चल रही थी, इसलिए हम मुख्य भवन से 10 कदम दूर एक कतार में खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे !


कुंड के पास का एक दृश्य 

Sunday, January 7, 2018

गुडगाँव से खाटूश्याम की एक सड़क यात्रा (A Road Trip from Gurgaon to Khatu Shyam)

शुक्रवार, 15 सितम्बर 2017

खाटू श्याम की यात्रा पर जाने का मेरा विचार तो काफी समय से बन रहा था, लेकिन किसी ना किसी वजह से इस यात्रा पर जाने का दिन निर्धारित नहीं हो पा रहा था ! आखिरकार सितम्बर के महीने में वो दिन आ ही गया जब इस यात्रा पर जाने का संयोग बना !  सितम्बर के तीसरे सप्ताह में एक दिन लोकेश का फ़ोन आया, बातचीत के दौरान जब उसने पूछा, खाटू श्याम कब चलने का विचार है क्या ? मैं तो इस यात्रा पर जाने के लिए कबसे तैयार बैठा था, इसलिए मैंने कहा, चल यार इसी हफ्ते चलते है ! इस पर वो बोला, एक मित्र भी साथ चलने के लिए कह रहा था, मैं उससे बात करके शाम तक बताता हूँ ! दिनभर काम में व्यस्त रहने के बाद मुझे शाम तक इन्तजार भी नहीं करना पड़ा और ऑफिस से निकलने से पहले ही लोकेश का फ़ोन भी आ गया ! इस तरह शुक्रवार, 15 सितम्बर को इस यात्रा पर जाना निर्धारित हुआ, इस यात्रा पर हम 3 दिनों के लिए जा रहे थे ! शुक्रवार दोपहर बाद गुडगाँव से निकलकर, खाटू श्याम और सालासर बालाजी देखते हुए हम रविवार शाम तक घर वापिस आने वाले थे ! यात्रा में केवल 2 दिन ही शेष थे, लेकिन इस यात्रा के लिए हमें ज्यादा तैयारी नहीं करनी थी इसलिए परेशानी वाली कोई बात नहीं थी !


खाने के समय लिया एक चित्र

Monday, January 1, 2018

सोनप्रयाग का संगम स्थल और त्रियुगीनारायण मंदिर (TriyugiNarayan Temple in Sonprayag)

शनिवार, 14 अक्तूबर 2017

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वासुकी गंगा और मन्दाकिनी नदी का संगम

यात्रा के पिछले लेख में आपने केदारनाथ से सोनप्रयाग वापसी के बारे में पढ़ा, अब आगे, होटल से अपने कपडे  लेकर हम सोनप्रयाग में बने घाट की ओर नहाने के लिए चल दिए ! होटल वाले ने हमसे कहा कि नदी का पानी काफी ठंडा रहता है इसलिए हम होटल में ही नहाकर घूमने के लिए घाट पर जाएँ ! लेकिन हमने ठान लिया था कि आज सोनप्रयाग में नहाकर ही वापिस जाना है इसलिए ठण्ड की परवाह किए बिना ही हम होटल से निकलकर घाट की ओर चल दिए ! सोनप्रयाग से गौरीकुंड जाने वाले मार्ग पर 100-150 मीटर चलने के बाद ही दाईं ओर संगम स्थल है, जिस दिन हम सोनप्रयाग आए थे तो यहाँ पहुँचते हुए ही अँधेरा हो गया था इसलिए हम संगम नहीं देख पाए थे ! आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि सोनप्रयाग में वासुकी ताल से आने वाली वासुकी गंगा और केदारनाथ से आने वाली मन्दाकिनी नदी का संगम होता है ! संगम स्थल मुख्य मार्ग से काफी नीचे है, जहाँ जाने के लिए कुछ सीढियाँ बनी है, और सीढियाँ ख़त्म होते ही झाड-झंझाड़ है ! इस समय नदी में पानी काफी कम था, इसलिए नदी के किनारे दूर तक बिखरे छोटे-बड़े पत्थर दिखाई दे रहे थे ! बारिश के समय जब जलस्तर बढ़ जाता है तो पानी नदी के किनारे तक आ जाता है !


सोनप्रयाग में घाट के पास का एक दृश्य (A view of Sangam in Sonprayag)