Thursday, June 7, 2018

बीकानेर का लालगढ़ पैलेस (Lalgarh Palace of Bikaner)

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

इस यात्रा वृतांत को शुरू से पढने के लिए यहाँ क्लिक करें !

बीकानेर यात्रा के पिछले लेख में आप करणी माता मंदिर के दर्शन कर चुके है, लेकिन पिछला लेख खत्म करने से पहले मैं आपको ये बताना भूल गया कि देशनोक में जिस पार्क में हम आराम करने के लिए रुके थे उसके बगल में ही एक मंदिर भी था या यूं कह लीजिए कि मंदिर से सटा एक पार्क था ! जब हम पार्क में थे तो लगे हाथ मंदिर के दर्शन भी कर लिए, ये इस रिहायशी इलाके का एक स्थानीय मंदिर था, दोपहर के समय यहाँ हमारे अलावा 2 लोग और थे जो यहाँ बगल में एक निर्माणाधीन इमारत में काम कर रहे थे ! चलिए, आगे बढ़ते है जहां हम बीकानेर में बस से उतरकर चौराहे पर खड़े किसी ऑटो की प्रतीक्षा कर रहे थे ! हाथ दिखाकर एक ऑटो रुकवाया और उससे लालगढ़ पैलेस चलने को कहा, लेकिन जिससे भी पूछते वो लालगढ़ पैलेस जाने से मना कर देता, जब 2-3 बार ऐसा हो गया तो पूछने पर हमें एक ऑटो वाले ने बताया कि यहाँ से सीधे लालगढ़ का ऑटो नहीं मिलेगा, पहले बस स्टैंड जाओ, वहाँ से लालगढ़ के लिए ऑटो मिल जाएगा ! उसके कहे अनुसार हम बस स्टैंड होते हुए लालगढ़ पैलेस पहुंचे, ये महल शहर से बाहर एक शांत स्थान पर है, यहाँ की सड़कें भी खाली थी और आस-पास का माहौल भी शांत था ! ऑटो से उतरने के बाद कुछ कदम पैदल चलकर हम लालगढ़ पैलेस के प्रवेश द्वार के सामने खड़े थे, आस-पास की इमारतों में ये एक शानदार स्थान है ! चलिए, आगे बढ़ने से पहले आपको इस पैलेस से संबंधित कुछ जानकारी दे देता हूँ !

लालगढ़ पैलेस का एक दृश्य

प्राप्त जानकारी के अनुसार लालगढ़ पैलेस का निर्माण 20वीं सदी में बीकानेर के महाराज गंगा सिंह के लिए करवाया गया था ! महल का निर्माण ब्रिटिश सरकार ने ये कहकर करवाया था कि तत्कालीन जूनागढ़ किला महाराज गंगा सिंह के लिए उपयुक्त नहीं था ! महल का डिजाइन एक ब्रिटिश वास्तुकार ने तैयार किया और ये महल हिन्दू, मुग़ल और यूरोपीय वास्तुकला का एक अनूठा मिश्रण है ! इस तरह महल का निर्माण कार्य 1902 में शुरू हुआ और अगले 25 सालों के लंबे अंतराल के बाद 1926 में बनकर ये तैयार हुआ ! फिर महाराज गंगा सिंह की इच्छानुसार इस महल का नाम उनके पिता के सम्मान में उन्हीं के नाम पर रखा गया, और इस तरह ये महल लालगढ़ पैलेस के नाम से जाना जाने लगा ! महल का एक भाग लक्ष्मी निवास पैलेस है जो वर्तमान में एक हेरिटिज होटल है यहाँ शादियों से लेकर, फिल्मों की शूटिंग और विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते है ! बॉलीवुड फिल्म "खूबसूरत" के कई दृश्यों को इस महल में फिल्माया गया है ! इसके अलावा महल के एक अन्य भाग में संग्रहालय बनाया गया है, जहां प्रदर्शनी के लिए विभिन्न वस्तुओं को रखा गया है ! इस महल की भव्य इमारत, आंतरिक भाग की साज-सज्जा और बनावट आज भी यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है !

लालगढ़ पैलेस का प्रवेश द्वार

प्रवेश द्वार से दिखाई देता दृश्य

प्रवेश द्वार से हेरिटेज होटल की तरफ जाता मार्ग

महाराजा गार्डन के सामने खड़ा देवेन्द्र

अंदर से दिखाई देता प्रवेश द्वार

महल में खान-पान के लिए कैंटीन की व्यवस्था है तो मनोरंजन के लिए टेनिस, बैडमिंटन और कुछ अन्य खेल खेलने की व्यवस्था भी है ! महल में एक पुस्तकालय भी है जहां अनेक दुर्लभ पुस्तकों के अलावा हड़प्पा सभ्यता और गुप्तकाल की कलाकृतियों को सहेज कर रखा गया है ! चलिए, वापिस यात्रा पर लौटते है जहां हम लालगढ़ पैलेस के प्रवेश द्वार से अंदर दाखिल हो चुके है ! थोड़ा अंदर जाते ही सामने टिकट घर है, जहां से हमने संग्रहालय देखने के लिए मात्र 25 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से 2 टिकट लिए ! आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि संग्रहालय के खुलने का समय सुबह 10 बजे से शाम 5:30 बजे तक है ! ये संग्रहालय प्रवेश द्वार से अंदर जाने पर बाईं ओर स्थित है और ठीक इसके सामने एक खुला घास का मैदान है जिसमें कई तरह के पौधे लगाए गए है ! मैदान के उस पार लक्ष्मी निवास पैलेस (हेरिटेज होटल) है, जहां सिर्फ होटल में रुकने वालों को ही जाने की अनुमति है ! खैर, अब हम चलते हुए संग्रहालय के सामने पहुँच चुके है, जहां बाहर एक बग्गी को शीशे के कैबिन में प्रदर्शनी के लिए रखा गया था, जो कभी राजघराने द्वारा उपयोग में लाया जाता था ! एक अन्य कैबिन में बीकानेर की वर्तमान राजकुमारी राज्यश्री से संबंधित कुछ वस्तुएं रखी गई थी ! 

संग्रहालय के सामने वाला मैदान

संग्रहालय जाने वाले मार्ग से दिखाई देता लक्ष्मी निवास पैलेस

संग्रहालय का प्रवेश द्वार

संग्रहालय में रखी एक बग्गी

बीकानेर की वर्तमान राजकुमारी राज्यश्री

संग्रहालय में अंदर दाखिल हुए तो यहाँ प्रदर्शनी के लिए विभिन्न वस्तुओं को शीशे के बक्सों में रखा गया था, ताकि लोग इन्हें ना छूएँ ! शुरुआत करते है पहले बक्से से जिसमें चांदी से बने भवन निर्माण के उन उपकरणों को रखा गया था जिससे गंगा सागर डैम और कुछ अन्य स्थानों पर निर्मित स्मारकों की आधारशिला रखी गई थी ! एक अन्य बक्से में बीकानेर की मुद्राओं को रखा गया था जो किसी जमाने में बीकानेर द्वारा जारी की गई थी ! यहाँ शाही परिधानों, उनके शाही परिवार द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली रोजमर्रा की वस्तुओं को भी प्रदर्शनी के लिए लगाया गया था जिनमें चांदी, चीनी मिट्टी और कांच के बने बर्तन भी शामिल है ! थोड़ा और आगे बढ़े तो एक बक्से में पदकों को प्रदर्शनी के लिए रखा गया था, वहाँ अंकित जानकारी के अनुसार ये पदक अलग-2 समय पर हुए युद्धों में दी गई सेवाओं के लिए बीकानेर ने अर्जित किए थे ! एक गैलरी में चित्रों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी ये चित्र बीकानेर पर शासन करने वाले अलग-2 राजाओं की थी ! विमान की आकृति में बना एक विशेष शीशा भी दिखाई दिया जो राज घराने की महिलायें उपयोग में लाती रही होंगी ! आगे बढ़े तो एक बड़े बक्से में ट्रॉफियों को सजाकर रखा गया था जिन्हें देखकर कोई भी ये अनुमान लगा सकता है कि ये बीकानेर द्वारा घुड़सवारी और पोलो प्रतियोगिता में अर्जित की गई होंगी ! 

गंगा सागर डेम का शिलान्यास करने वाला निर्माण उपकरण

एक अन्य स्मारक का शिलान्यास करने वाला निर्माण उपकरण

बीकानेर द्वारा जारी की गई मुद्राएं

एक शाही पोशाक

चांदी का एक बर्तन

विभिन्न युद्धों में योगदान देने के लिए बीकानेर द्वारा अर्जित किए पदक

विभिन्न युद्धों में योगदान देने के लिए बीकानेर द्वारा अर्जित किए पदक


विमान की आकृति में बना एक शीशा

इसके अलावा भी कई ट्रॉफियाँ और अन्य वस्तुएं अलग-2 बक्सों में प्रदर्शनी के लिए रखी गई थी, आप चित्रों में इन्हें देख सकते है ! संग्रहालय में बीकानेर राजघराने के ब्रिटिश सरकार से मधुर संबंधों का उल्लेख भी किया गया है ! गैलरी कक्ष से बाहर निकले तो हम एक गलियारे में पहुंचे, जहां एक ट्रेन को प्रदर्शनी के लिए रखा गया था, ये ट्रेन किसी समय बीकानेर द्वारा संचालित की जाती थी ! दीवार पर अंकित जानकारी के अनुसार ये ट्रेन बीकानेर राज्य द्वारा 1946 में आयात की गई थी और बीकानेर के महाराजा सादुल सिंह और उनके परिवार द्वारा उपयोग में लाई जाती थी ! फिर 1949 में बीकानेर के भारत में विलय के बाद इन ट्रेन के डिब्बों को बीकानेर के महाराजा की निजी संपति के तौर पर रहने दिया गया ! भारत सरकार से हुई संधि के अनुसार बीकानेर के महाराजा और उनका परिवार अपनी इस निजी ट्रेन में पूरे भारतवर्ष में जहां कहीं भी मीटर गेज लाइन बिछी थी वहाँ यात्रा करने के लिए स्वतंत्र थे ! लेकिन फिर 1972 में बीकानेर के महाराजा करणी सिंह के शासनकाल में ये चलन बंद हो गया, क्योंकि उनके आदेश पर इस ट्रेन के डिब्बों को सादुल संग्रहालय में प्रदर्शनी के लिए रख दिया गया ! यहाँ से बाहर निकले तो संग्रहालय के सामने वाले मैदान में कुछ देर बैठकर महल की सुंदरता हो निहारते रहे और फिर वापसी की राह पकड़ी !

प्रदर्शनी के लिए रखी कुछ ट्रॉफियाँ

बीकानेर द्वारा संचालित ट्रेन


प्रदर्शनी के लिए रखी ट्रेन 


यहाँ से चले तो ऑटो में सवार होकर हम जूनागढ़ किले के पास उतर गए, इस किले के पीछे एक बाजार है हमें ये बाजार घूमना था इसलिए पैदल ही चल दिए ! यहाँ हम सत्ता बाजार में काफी देर तक घूमे, यहाँ खान-पान की एक से बढ़कर एक दुकान है, हमने भी कुछ स्थानीय व्यंजनों का स्वाद चखा और घर के लिए भी कुछ मिठाइयां ली, यहाँ के खान-पान की दुकानों पर भीड़ देखकर लगता है कि यहाँ के लोग स्वाद के बड़े शौकीन है ! अधिकतर दुकानों पर लाइन ही लगी थी, हम धीरे-2 धर्मशाला की ओर बढ़ रहे थे, थोड़ा-2 करके हम काफी खा चुके थे, अब ये पचाना भी जरूरी था ! इसलिए धर्मशाला पहुंचे तो काफी देर तक हम परिसर में बने पैदल मार्ग पर टहलते रहे, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मोहता धर्मशाला का परिसर काफी बड़ा है, अंदर गणेश जी का एक प्राचीन मंदिर भी है ! पूजा करने के लिए हम भी इस मंदिर में गए, और कुछ समय मंदिर में व्यतीत किया ! शुरुआत में तो यहाँ चुनिंदा लोग ही थे लेकिन जैसे-2 शाम होते जा रही थी यहाँ आने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी ! लोग काम से घर लौटते हुए भी घर जाने से पहले यहाँ दर्शन करने के लिए आ रहे थे ! मंदिर से निकलकर हम काफी देर तक इस परिसर में घूमते रहे और फिर अपना सामान लेकर स्टेशन के लिए निकल पड़े जो यहाँ से कुछ कदमों की दूरी पर ही था ! रात्रि ट्रेन पकड़कर हम सुबह दिल्ली पहुँच गए, तो दोस्तों इसी के साथ हमारा ये सफर खत्म होता है, जल्दी ही आपसे एक नए सफर पर फिर मुलाकात होगी !

संग्रहालय के सामने से दिखाई देता एक दृश्य

लक्ष्मी निवास पैलेस का एक दृश्य

महल परिसर से दिखाई देता एक अन्य दृश्य

लक्ष्मी निवास पैलेस का एक दृश्य

धर्मशाला परिसर में गणेश जी के मंदिर में बने कुछ चित्र

धर्मशाला परिसर में गणेश जी के मंदिर में बने कुछ चित्र

रेल्वे स्टेशन का एक दृश्य 

दिल्ली के लिए हमारी ट्रेन 

क्यों जाएँ (Why to go Bikaner): अगर आपको ऐतिहासिक इमारतें और किले देखना अच्छा लगता है, तो राजस्थान में बीकानेर का रुख कर सकते है !

कब जाएँ (Best time to go Bikaner): बीकानेर जाने के लिए नवम्बर से फरवरी का महीना सबसे उत्तम है इस समय उत्तर भारत में तो कड़ाके की ठण्ड और बर्फ़बारी हो रही होती है लेकिन राजस्थान का मौसम बढ़िया रहता है ! इसलिए अधिकतर सैलानी राजस्थान का ही रुख करते है, गर्मी के मौसम में तो यहाँ बुरा हाल रहता है !

कैसे जाएँ (How to reach Bikaner): बीकानेर देश के अलग-2 शहरों से रेल और सड़क मार्ग से जुड़ा है, देश की राजधानी दिल्ली से इसकी दूरी लगभग 460 किलोमीटर है जिसे आप ट्रेन से आसानी से तय कर सकते है ! दिल्ली से बीकानेर के लिए कई ट्रेनें चलती है और इस दूरी को तय करने में लगभग 11-12 घंटे का समय लगता है ! अगर आप सड़क मार्ग से आना चाहे तो ये दूरी तो बढ़कर लगभग 500 किलोमीटर हो जाती है लेकिन दूरी तय करने का समय घटकर 8 घंटे हो जाता है ! सड़क मार्ग से भी देश के अलग-2 शहरों से बीकानेर के लिए बसें चलती है, आप निजी गाडी से भी बीकानेर जा सकते है !


कहाँ रुके (Where to stay near Bikaner): बीकानेर में रुकने के लिए कई विकल्प है, यहाँ 500 रूपए से शुरू होकर 10000 रूपए तक के होटल आपको मिल जायेंगे ! आप अपनी सुविधा अनुसार होटल चुन सकते है ! यहाँ कई धर्मशालाएं भी है जहाँ रुकना काफी सस्ता पड़ता है ! खाने-पीने की सुविधा हर होटल में मिल जाती है, आप अपने स्वादानुसार भोजन ले सकते है !


क्या देखें (Places to see near Bikaner): बीकानेर में देखने के लिए बहुत जगहें है जिसमें जूनागढ़ किला, लालगढ़ पैलेस, और देशनोक में स्थित करनी माता का मंदिर प्रमुख है ! खरीददारी के लिए बीकानेर के में आपको काफी कुछ मिल जायेगा, आप यहाँ से राजस्थानी परिधान, और सजावट का सामान खरीद सकते है !

समाप्त...

No comments:

Post a Comment