Thursday, August 27, 2015

हिमालयन वाटर फाल - एक अनछुआ झरना (Untouched Himachal – Himalyan Water Fall)

शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

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यात्रा के पिछले लेख में मैने आपको मक्लॉडगंज का स्थानीय भ्रमण करवाया, अब आगे, सुबह समय से सोकर उठे, अपनी इस ग्रीष्मकालीन यात्रा के दौरान आज हमारा 7वाँ दिन था ! अब तक हम भाग्सू नाग झरने पर तो 2 बार जा चुके थे, पर मक्लोडगंज में भाग्सू नाग ही अकेला झरना नहीं है, एक और झरने के बारे में हमें त्रिउंड की ट्रेकिंग के दौरान पता चला 
था ! जब हम त्रिउंड जा रहे थे तो हमने गालू मंदिर के पास एक बोर्ड पर हिमालयन वॉटर फॉल के बारे में पढ़ा था ! स्थानीय लोगों से पूछताछ के बाद हमें पता चला कि गालू मंदिर से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर एक प्राकृतिक झरना है ! स्थानीय लोगों ने हमें ये भी बताया कि दुर्गम मार्ग होने के कारण बहुत कम लोग ही इस झरने तक जा पाते है और इसलिए इस झरने के आस-पास भीड़-भाड़ और गंदगी भी कम है ! झरने तक जाने के लिए इतनी जानकारी हमारे लिए पर्याप्त थी, जानकारी मिलने के साथ ही हम लोगों के मन में इस झरने को देखने की इच्छा प्रबल हो गई थी ! पर क्योंकि उस दिन तो हम त्रिउंड जा रहे थे इसलिए हमने सोचा कि हिमालयन वॉटर फॉल किसी और दिन आएँगे ! 
galu temple
गालू मंदिर के पास लिया एक चित्र (A view from Galu Temple, Mcleodganj)

Monday, August 24, 2015

मोनेस्ट्री में बिताए सुकून के कुछ पल (A Day in Mcleodganj Monastery)

वीरवार, 19 जुलाई 2012

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यात्रा के पिछले लेख में आपने त्रिऊंड के बारे में पढ़ा, ट्रेकिंग के कारण अच्छी-ख़ासी थकान हो गई थी ! इसलिए वापिस आने के बाद थोड़ी देर मक्लॉडगंज बाज़ार में घूमने के बाद खा-पीकर हम वापिस अपने होटल पहुँच गए ! अब आगे, सुबह थोड़ा देरी से सोकर उठे, रात को बढ़िया नींद आई तो त्रिऊंड के सफ़र की सारी थकान दूर हो गई हम सब बिस्तर से निकलकर अपने होटल ही छत पर सुबह का नज़ारा देखने के लिए पहुँच गए ! धौलाधार की पहाड़ियों पर जब सुबह-2 सूरज की किरणें पड़ती है तो ये पहाड़ियाँ सुनहरे रंग में नहा कर और भी सुंदर दिखाई देती है ! पहाड़ भी हर मौसम में अपना रंग बदलते है, सर्दियों में बर्फ पड़ने पर सफेद, बारिश होने पर हरे-भरे, और सूर्य की किरणें पड़ने पर सुनहरे रंग के हो जाते है ! बहुत देर तक हम लोग अपने होटल की छत पर बैठ कर इस सुंदर दृश्य को देखते रहे ! त्रिउंड की यात्रा करने के बाद आज हम आराम के साथ-2 मस्ती करने के मूड में थे, इसलिए आज हमारा कहीं दूर जाने का विचार नहीं था, सबने सोचा कि आज का दिन यहीं मक्लॉडगंज के आस-पास ही घूम लिया जाए ! 

A view of our hotel room, Mcleodganj

Thursday, August 20, 2015

दोस्तों संग त्रिउंड में बिताया एक दिन (An Awesome Trek to Triund)

बुधवार, 18 जुलाई 2012 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम डलहौजी से बस यात्रा करके धर्मशाला पहुँचे, और फिर हम सब शाम तक भाग्सू नाग झरने में नहाते रहे ! अब आगे, दिन भर सफ़र की थकान और झरने में नहाने के कारण रात को बढ़िया नींद आई ! सुबह जल्दी सोकर उठे, और नित्य-क्रम में लग गए ! आज हम त्रिउंड घूमने जाने वाले थे ये मक्लॉडगंज में एक शानदार ट्रेक है हर साल मक्लॉडगंज आने वाले हज़ारों लोग इस ट्रेक को करते है ! त्रिऊंड के बारे में हमने स्थानीय लोगों से काफ़ी जानकारी एकत्रित कर ली थी ! पिछली साल धर्मशाला यात्रा के दौरान समय के अभाव में त्रिउंड नहीं जा पाए थे, पर आज इस यात्रा पर जाने के लिए सभी लोग उत्साहित थे ! नाश्ता तो सुबह 9 बजे से पहले मिलने वाला नहीं था, ये जानकारी हम होटल वाले से पिछली रात को ही ले चुके थे ! हमने सोचा अगर नाश्ते के इंतज़ार में यहाँ बैठे रहे, तो पहुँच लिए त्रिउंड ! बस फिर क्या था, रास्ते में अपने साथ ले जाने के लिए ज़रूरी सामान अपने बैग में रखा, और त्रिउंड की चढ़ाई के लिए निकल पड़े ! 

mcleodganj market
त्रिऊंड - सफ़र की शुरुआत (A view of Mcleodganj Market)

Monday, August 17, 2015

डलहौज़ी से धर्मशाला की बस यात्रा (A Road Trip to Dharmshala)

मंगलवार, 17 जुलाई 2012 

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तीन दिन डलहौज़ी घूमने के बाद चौथे दिन सुबह हम लोग अपने होटल से निकलकर धर्मशाला जाने के लिए डलहौज़ी के बस स्टैंड पर पहुँच चुके थे ! सुबह के सात बजने में दस मिनट शेष थे, और डलहौज़ी के बस स्टैंड पर धर्मशाला जाने की पहली बस तैयार खड़ी थी ! हम सब इस बस में चढ़ गए, अन्दर जाने पर हमने देखा कि कुछ सवारियाँ पहले से ही बस में मौजूद थी, हमने भी अपने लिए एक-2 सीट ले ली ! सुबह सात बजकर पंद्रह मिनट पर हमारी बस डलहौज़ी से चली ! यहाँ से बमुश्किल 5-6 किलोमीटर ही आगे गए होंगें कि बस एक चौराहे पर आकर रुक गई, ये वही चौराहा था, जहाँ दिल्ली से डलहौज़ी आते समय हम पहली बस को छोड़ कर दूसरी बस में बैठे थे ! कंडक्टर से पूछने पर पता चला कि बस यहाँ नाश्ता-पानी के लिए रुकी थी, जिस किसी को भी कुछ खाना-पीना था वो यहाँ से ले सकता था क्योंकि बस यहाँ पंद्रह-बीस मिनट रुकने वाली थी ! अब इतनी सुबह हमारा तो कुछ खाने-पीने का मन नहीं था, पर हमने सोचा कि जब तक बस यहाँ रुकी है रास्ते में खाने के लिए कुछ सामान खरीद लिया जाए ! 

bus travel
ड़लहौजी में बस में बैठे हुए

Friday, August 14, 2015

कालाटोप के जंगलों में दोस्तों संग बिताया एक दिन (A Walk in Kalatop Wildlife Sanctuary)

सोमवार, 16 जुलाई 2012 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने खाज़ियार के बारे में पढ़ा, अब आगे, आज डलहौज़ी में हमारा आखिरी दिन था, कहने को तो हम पिछले दो दिनों से लगातार डलहौज़ी में घूम रहे थे, पर फिर भी अभी तक हम यहाँ की सभी जगहें नहीं घूम पाए थे ! अभी भी डलहौज़ी और इसके आस-पास घूमने के लिए काफी जगहें बाकी थी ! हमने मन ही मन सोचा कि आज के दिन जितना घूम सके उतना घूमेंगे, और जो रह जायेगा वो अगली बार डलहौज़ी आने पर घूम लेंगे ! सभी लोग सुबह की दिनचर्या में लगे हुए थे, नहा-धोकर तैयार हुए, अपनी ज़रूरत का सामान लिया, और फिर से गाँधी चौक की तरफ अपनी बस के इंतज़ार में चल दिए ! आज हम कालाटोप वाइल्डलाइफ सेंचुरी जा रहे थे, और यहाँ जाने के लिए भी बस गाँधी चौक से होकर ही जाती है ! अपना तो नियम है कि अगर पहाड़ों पर कहीं दूर घूमने जाना हो तो अपनी यात्रा की शुरुआत सुबह जल्दी कर लो, ताकि आपके पास घूमने का पर्याप्त समय रहे ! इस तरह अगर आप रास्ते में कहीं प्रकृति के नजारों का आनंद लेने के लिए थोड़ी देर रुकना चाहे, तो भी आपको समय की कमी ना महसूस हो ! 

hotel bhandari
अपने होटल की छत पर शशांक और मैं (A view from our Hotel Terrace, Dalhousie)

Tuesday, August 11, 2015

खजियार – देश में विदेश का एहसास (Natural Beauty of Khajjar)

रविवार, 15 जुलाई 2012 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पॅंच-पुला के बारे में पढ़ा, अब आगे, डलहौज़ी की रात इतनी ठंडी थी, कि सुबह बिस्तर से बाहर निकलने का मन ही नहीं हो रहा था ! बिस्तर पर लेटे-2 ही अपने कमरे की खिड़की से बाहर झाँक कर देखा, तो सूर्योदय हो चुका था ! फिर तो आलस को एक तरफ रखकर फटाफट बिस्तर से बाहर निकले, और अपने कमरे की छत पर सुबह की खूबसूरती का नज़ारा देखने के लिए पहुँच गए ! उस समय हमारे होटल की छत पर कुछ बंदर घूम रहे थे, हमें देखते ही सारे बंदर भाग खड़े हुए ! यहाँ छत पर से बहुत सुन्दर नज़ारा दिखाई दे रहा था, हल्की-2 लालिमा लिए दूर लाल रंग का सूर्य दिखाई दे रहा था, और सूरज की किरणें घने पेड़ों को चीर कर हम तक आ रही थी ! हम लोग वहीँ छत पर एक किनारे बैठ कर प्रकृति की सुन्दरता को निहारने लगे, मोबाइल में समय देखा तो सुबह के सात बज रहे थे ! डलहौज़ी में आज हमारे पास घूमने जाने के लिए तीन जगहें थी, कालाटोप वाइल्डलाइफ सेंचुरी, डायन कुण्ड, और खजियार ! इन जगहों में हमारे होटल से सबसे दूर खजियार था, जिसकी दूरी यहाँ से करीब 22 किलोमीटर थी !
gandhi chowk dalhousie
गाँधी चौक पर बस का इंतजार करते हुए शशांक (Gandhi Chowk in Dalhousie)

Friday, August 7, 2015

पंज-पुला की बारिश में एक शाम (An Evening in Panch Pula)

शनिवार, 14 जुलाई 2012 

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यात्रा के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि किस तरह हम दिल्ली से ट्रेन का लंबा सफ़र तय करके पठानकोट होते हुए यहाँ डलहौजी पहुँचे ! अब आगे, होटल पहुँचने के बाद तैयार होकर खाने-पीने के बाद हम लोग पंच-पुला घूमने निकल पड़े, दोपहर के तीन बज चुके थे, इसलिए हमने आज का दिन डलहौज़ी में आस-पास घूमना ही उचित समझा ! पंच-पुला, डलहौज़ी के मुख्य बाज़ार (गाँधी चौक) से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर है, जहाँ जाने के लिए वैसे तो आप गाँधी चौक से बस या टैक्सी ले सकते है, पर पहाड़ों पर घुमक्कड़ी का असली मजा तो पैदल ही आता है ! पहाड़ों पर प्रकृति के जो नज़ारे आप पैदल चल कर देख सकते है वो बस या कार में बैठ कर शायद ही कभी दिखाई दे ! पंज-पुला जाने के लिए हम चारों गाँधी चौक से तीन बजे पैदल ही निकल पड़े ! गाँधी चौक से थोडा सा आगे बढ़ने पर मुख्य सड़क दो भागों में विभाजित हो जाती है, ऊपर जाने वाली सड़क खजियार होते हुए चंबा निकल जाती है जबकि नीचे जाने वाला मार्ग पंच-पुला होते हुए आगे चला जाता है ! 

way to panch pula
पंज-पुला जाते हुए मार्ग में (On the way to Panch Pula)

Monday, August 3, 2015

दिल्ली से डलहौजी की रेल यात्रा (A Train Trip to Dalhousie)

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

बात जुलाई की है जब सूर्य देव खूब आग बरपा रहे थे, बारिश शुरू हो चुकी थी पर फिर भी गर्मी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी ! सम्पूर्ण उत्तर भारत में गर्मी से बुरा हाल था, या यूँ कहिए कि पूरा उत्तर भारत गर्मी से झुलस रहा था ! ऐसे में मन हुआ कि इस गर्मी से राहत पाने के लिए कुछ दिन कहीं ठंडी जगह पर घुमक्कड़ी कर ली जाए ! फिर सोचा कि ऐसे मौसम में कहाँ जाया जाए, क्यूंकि अखबारों में रोज़ पढने को मिल रहा था कि बारिश से पहाड़ो पर जीवन अस्त व्यस्त हो गया है। बारिश के मौसम में कहीं बादल फटने की खबर आ रही थी तो कहीं नदिया उफान पर चल रही थी ! यही सोच कर मन असमंजस में था कि इस मौसम में घूमने जाना ठीक रहेगा या नहीं ! सोचते-2 कब मुझे नींद आ गई पता ही नहीं चला, और जब नींद खुली तो सुबह के 6 बज रहे थे ! मैं जल्दी से उठ कर नहा-धोकर तैयार होने के बाद मोटरसाइकल लेकर अपने दफ़्तर के लिए निकल पड़ा !अभी मुश्किल से आधे रास्ते ही पहुँचा था कि तभी मेरा फोन बजने लगा, सच कहूँ अगर आप कहीं जाम में फँसे हो, और आपका फोन बजने लगे तो उठाने का बिल्कुल भी मन नहीं होता !

train to pathankot
दिल्ली से चलते समय